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Showing posts from May, 2021

छायावाद और पं.मुकुटधर पांडेय(समीक्षा ग्रंथ)डाँ. बलदेव

छायावाद और पं.मुकुटधर पाडे़यpdf  

रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव(संगीत ग्रंथ)डाँ. बलदेव

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वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत,डाँ. बलदेव की कविताएं

वृक्ष में तब्दील हो गयी औरतpdf  

वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत(काव्य संग्रह)डाँ. बलदेव

वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत(काव्य संग्रह)डाँ. बलदेव pdf वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत,डाँ बलदेव की कविता संग्रह। pdf

डाँ. बलदेव की काव्म भाषा

डाँ. बलदेव की काव्य भाषा --------------------------------- बसन्त राघव मैं स्वयं स्व.डाँ. बलदेव की रचनाओं का पहला पाठक ही नहीं, कुछ कुछ उनकी रचना प्रक्रिया और उसकी पृष्ठभूमि का साक्ष्य रहा हूँ इसलिए उनकी काव्य-भाषा पर कुछ कहने कुछ लिखने की कोशश की है।उनकी छत्तीसगढ़ी भाषा की चिंता को स्पष्ट करने के लिए यह मुझे जरूरी भी लगा अन्यथा उनकी कविताएं स्वयं बोलती है, विशेष व्याख्या की जरुरत नहीं....              भारत कृषि प्रधान देश है, आज भी देश की कुल आबादी का पचास प्रतिशत परिवार कृषि पर ही निर्भर है, और पच्चीस प्रतिशत परिवार कृषि-मजदूरों का है, याने भारत की कला-संस्कृति, श्रम-सौंदर्य का ही पर्याय है।डाँ. बलदेव कृषक-पुत्र थे,उनकी समस्त रचनाओं के केंद्र में प्राणस्वरूप यही कृषि-संस्कृति या श्रम-सौंदर्य है।उनका यह विषय नया नहीं है, पर उनका शिल्प ,उनकी शैली एकदम नयी है।इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विव्दान ,नंदकिशोर तिवारी की टिप्पणी गौरतलब है, उनके शब्दों में "सन् 1950 से आजतक की छत्तीसगढ़ी कविता में बिल्कुल अलग प्रयोग के दर्श...