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Showing posts from August, 2021

आशीष की वर्षा करता एक ऋषि (संस्मरण)

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आशीष की वर्षा करता एक ऋषि  ************************** बसन्त राघव     पंडित मुकुटधर पाण्डेय जी स्वयं में साहित्य - तीर्थ थे , उनके दर्शनों का लाभ मुझे 10-12 वर्ष की उम्र से होता रहा । पंडित जी काव्य पाठ के लिए कभी बाहर नहीं निकलते थे । हम उनके पड़ोसी थे । अस्तु जब भी गोष्ठियाँ होती । हमारे यहाँ आकर कवियों का बराबर उत्साहवर्धन किया करते थे । इन गोष्ठियों में पुरानी पीड़ी के लोगों में पंडित जी के अतिरिक्त वयोवृद्ध साहित्यकार पं.किशोरी मोहन त्रिपाठी , सेनानी कवि स्व.बन्दे अली फातमी , लाला फूलचन्द , चन्द्रशेखर शर्मा , जनकवि आनंदी सहाय शुक्ल , मुस्तफा हुसैन जैसे सशक्त गीत हस्ताक्षर हुआ करते थे । डॉ . महेन्द्र सिंह परमार , आलोचक प्रवर अशोक कुमार झा और ठाकुर जीवन सिंह भी उपस्थित रहते थे । नये कवियों में स्व.रामेश्वर ठेठवार , रामलाल निषाद , शम्भु प्रसाद साहू आदि दर्जनों कवि हुआ करते थे । इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ अंचल , और उसके बाहर , देश के दूर - दूर से प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ . बलदेव के आमन्त्रण पर रायगढ़ आते तो पंडित जी के दर्शन अवश्य करते , गोष्ठियों अक्सर हमारे यहाँ ही जमती और पा...

भाषा में सृजन का पक्ष लिखती कविता: समीक्षक डाँ. बलदेव

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भाषा में सृजन का पक्ष लिखती कविता ****************************** डाँ. बलदेव           प्रभात त्रिपाठी का सातवाँ काव्य संग्रह 'लिखा मुझे वृक्षों ने' वैभव प्रकाशन रायपुर की ओर से पिछले वर्ष ( 2018 ) के अन्तिम दिनों में आया है । यह किताब कला चेतना से समृद्ध कवि अशोक वाजपेयी को समर्पित है । उम्र , रचना - धर्म और रुचियों की दृष्टि से अशोक वाजपेयी और प्रभात त्रिपाठी में प्रगाढ़ मैत्री है । मेरी नजर में प्रभात जैसा अजीबोगरीब व्यक्तित्व इधर हिन्दी कविता में कम ही है । वह कहीं से लाउड नहीं , उनकी भाषा और शिल्प इधर लिखी जा रही रचनाओं से थोड़ा अलग है । इसलिए शुरु - शुरु में उसमें प्रवेश कुछ अपरिचित , कुछ जटिल सा लगता है , लेकिन अवगाहन के बाद तुरन्त - फुरत उससे बाहर निकल पाना भी सहज नहीं है । प्रभात मेरे प्रिय लेखकों कवियों में हैं , प्रभात की रचना आयातित नहीं है , पर देसी होते हुए भी वह अन्यों जैसा नहीं है ।   ' लिखा मुझे वृक्षों ने संग्रह में छोटी और मझोली कद की इकचालीस कविताएं हैं , जिनमें उनका व्यक्तित्व और समय मुखर है । प्रथम दो रचनाएं पोती...

डाँ. प्रभाकर श्रोत्रिय के रचना कर्म का प्रतिपूर्वक बखान:-बलदेव

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डॉ . श्रोत्रिय के रचना कर्म का प्रीतिपूर्वक बखान *************************************  समीक्षक: डॉ . बलदेव          डॉ . प्रभाकर श्रोत्रिय पर केंद्रित 'आलोचना की तीसरी परंपर' उर्मिला शिरीष के संपादन में प्रकाशित रचना - कर्म का एक विशाल ग्रंथ है । डॉ . श्रोत्रिय पर केंद्रित यह किताब , व्यक्तित्वः संकल्प और प्रतिश्रुति . आलोचक तीसरी परंपरा , नाटककार संवेदन के सरोकार , संपादक सृजन के पक्षधर , निबंधकार , चिंतक की दुनिया , बातचीत एक अलग आवाज़ और पत्र , सम्मतियाँ और लेखक परिचय आदि सात खंडों में विभक्त है , इस ग्रंथ के अध्ययन से डॉ . श्रोत्रिय का चेहरा भिन्न - भिन्न मुद्राओं में प्रत्येक पृष्ठ पर हमसे संवाद करता नज़र आता है ।      डॉ . प्रभाकर श्रोत्रिय श्रमजीवी साहित्यिक संपादक हैं । उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी दक्षता , कुशलता और सामर्थ्य का प्रदर्शन एक सीमा में जिस निष्पक्षता , लोकतांत्रिकता , वस्तुपरकता और आभिजात्य के साथ किया है , वह विरल है . वे अंकुठित गंभीर चिंतन के व्यक्ति हैं । वे बीमार मानसिकता के नहीं स्वस्थ और तेजस्वी मानसिकता के आलोचक...

सम्यक दृष्टि सम्पन्न आलोचक रामविलास शर्मा:-डाँ. बलदेव

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सम्यक दृष्टि सम्पन्न *************** आलोचक डॉक्टर रामविलास शर्मा डॉ . रामविलास: *************************************** डाँ. बलदेव                 शर्मा मेरे गुरू तुल्य थे । वे सम्यक दृष्टि सम्पन्न समालोचक थे , उनके इतिहास लेखन और मार्क्सवादी चिन्तन से हिन्दी साहित्य काफी समृद्ध हुआ । उन्होंने मुझे कई बार अनेक तरह से उपकृत किया । डॉ . साहब के नाम और काम से मैं सन् 1980 के आस - पास ही परिचित हो चुका था । सन् 73 से 79 के बीच जब मैं रिसर्च कर रहा था तो उनके सद्ग्रथों से मुझे बड़ी सहायता मिली , खासकर भारतेन्दु युग , म.प्र . द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण , भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद , निराला की साहित्य साधना आदि से , लेकिन स्मृति में उन्हें चिर स्थायी रखने लायक परिचय छायावाद के प्रवर्तक . पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय की कृतियों के संदर्भ में ही हुआ ।       रायगढ़ में मैं 1977 से पाण्डेय जी के सम्पर्क में मृत्यु पर्यन्त अर्थात् 89 तक रहा । पाण्डेय जी का मैं पड़ोसी था । सुबह शाम मु...

कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं:-समीक्षक-डाँ. बलदेव

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कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ  ****************************** डाँ.बलदेव  ------------- केदारनाथ अग्रवाल प्रेम , प्रकृति और श्रम सौन्दर्य के अप्रतिम कवि हैं । कवि का हृदय क्या है ? प्यार का लहराता समन्दर ही है , जिसमें सूर्य , चाँद , तारागण , धरती - अम्बर , पेड़ , पहाड़ , चट्टान , नदी , चिड़िया , श्रम - सीकर से लथपथ मजदूर किसान डूबते - तिरते - उतराते नजर आते हैं । सूर्य उनकी रचना के केन्द्र में है । समस्त सृष्टि सूर्य ऊर्जा से संचालित है । सूर्य भविष्य को अंकुरित करता है , प्रभात अबीर गुलाल से धरती को रंग देता है उसके आरक्त हलाहल से श्यामल शृंग गुंजार करते हैं । वस्तुतः सूर्य केदारनाथ अग्रवाल का सर्वाधिक प्रिय बिम्ब है , वह भूमिपुत्र को भानु में तब्दील करता है , जीवन संग्राम में वही लड़ने की शक्ति देता है । दरअसल सूर्य प्यार का आलोक है जो मनुष्य और प्रकृति को शक्ति और क्रांति से आह्लादित करता है । सूर्य धरती को रूप - रस - गंध और रंग से भर देता है । सूर्य जीवन में उल्लास , साहस और उत्साह का पुञ्ज है , केदारनाथ अग्रवाल के ये सारे शब्दचित्र वस्तुतः सूर्य स्तवन ही हैं जो वैदिक ऋच...

जेनुइन कवि और उनके विचारों का विस्तार

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जेनुइन कवि और उनके विचारों का विस्तार ********************************** डाँ. बलदेव  ' वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह ' , कविता पुस्तक का यह प्रदीर्थ शीर्षक कषि के शैलीगत वैशिष्ट्य के आग्रह को सूचित करता है । नया गरम कोट - रबर की चप्पल , सूखी झोल - हरा विचार , मुरमी तपती जमीन - हरियाली के विश्वास का विस्तार , मोटी अँधेरी रात की चट्टान - सूरज को चिनगारी जैसे वाक्य - बंध , विनोद कुमार शुक्ल के कविता - संसार को स्वायत्त करने के लिए काफी हैं , इनसे यदि एक तरफ समाज का अंतर्विरोध प्रकट होता है तो दूसरी ओर संभावित युद्ध जिसमें समूह की ताकत अन्याय का खिलाफत करेगी । उपर्युक्त वाक्य - बंधों में अंश के लिए संपूर्ण या संपूर्ण के लिए अंश का आशय प्रकट करने वाला उपलक्ष्य अलंकार या मेटॉनिम का प्रयोग हुआ है , इसके लिए शब्द का अध्ययन अपेक्षित होता है । संकलन की सैंतीस कविताओं को 29 और 8 के आँकड़े में दो वर्गों में रखा जा सकता है । छोटे से आलेख में कंप्यूटराइस्ड नहीं करना चाहूँगा , अतः इस समीक्षा - पद्धति के व्यावहारिक पक्ष पर ही आपका ध्यान केंद्रित करना चाहूँगा । पहले वर्ग की कव...

जब बाबा ने मेरे कान उमेंठे

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जब बाबा ने मेरे कान उमेंठे  ********************* डाँ.बलदेव                           बाम्बे - हावड़ा मार्ग पर एक छोटा - सा स्टेशन है , नैला । स्टेशन से दो किलोमीटर की दूरी पर कलचूरी राजा जाज्वल्यदेव द्वारा बसाया गया नगर है जांजगीर , जो मध्ययुग से ही मीम्मा तालाब और विष्णु के फूटहा मन्दिर के कारण प्रसिद्ध है । हिन्दी के कवि शेष नाथ शर्माशील , बच्चू जांजगीरी और विद्याभूषण का यह जन्मस्थान भी है , स्वाभाविक है यहाँ साहित्यिक हलचल स्वतन्त्रता के पूर्व से रही है , एक बार यहाँ घुमक्कड़ बाबा नागार्जुन आए थे , और उनके सम्मान में शासकी प्रशिक्षण विद्यालय में एक काव्य गोष्ठी हुई थी , घटना विशेष के कारण यह ऐक्यालीस , ब्यालिस साल के बाद भी अविस्मरणीय है , जैसे अभी हाल में ही घटी है ।                         बात सन् 1968 के फरवरी महीने के किसी खुशनुमा दिन की है , उस समय मैं हायर सेकेंड्री जांजगीर में शिक्षक था उसके सामने वाली जगह में स्थित राजकीय बुनियादी प्रशिक...