कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं:-समीक्षक-डाँ. बलदेव
कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ
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डाँ.बलदेव
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केदारनाथ अग्रवाल प्रेम , प्रकृति और श्रम सौन्दर्य के अप्रतिम कवि हैं । कवि का हृदय क्या है ? प्यार का लहराता समन्दर ही है , जिसमें सूर्य , चाँद , तारागण , धरती - अम्बर , पेड़ , पहाड़ , चट्टान , नदी , चिड़िया , श्रम - सीकर से लथपथ मजदूर किसान डूबते - तिरते - उतराते नजर आते हैं । सूर्य उनकी रचना के केन्द्र में है । समस्त सृष्टि सूर्य ऊर्जा से संचालित है । सूर्य भविष्य को अंकुरित करता है , प्रभात अबीर गुलाल से धरती को रंग देता है उसके आरक्त हलाहल से श्यामल शृंग गुंजार करते हैं । वस्तुतः सूर्य केदारनाथ अग्रवाल का सर्वाधिक प्रिय बिम्ब है , वह भूमिपुत्र को भानु में तब्दील करता है , जीवन संग्राम में वही लड़ने की शक्ति देता है । दरअसल सूर्य प्यार का आलोक है जो मनुष्य और प्रकृति को शक्ति और क्रांति से आह्लादित करता है । सूर्य धरती को रूप - रस - गंध और रंग से भर देता है । सूर्य जीवन में उल्लास , साहस और उत्साह का पुञ्ज है , केदारनाथ अग्रवाल के ये सारे शब्दचित्र वस्तुतः सूर्य स्तवन ही हैं जो वैदिक ऋचाओं का स्मरण कराते हैं । उनके पेड़ - पौधे मात्र वानस्पतिक नहीं वे सजीव बन्धु - बाँधव हैं जो धरती से हमें जोड़े हुए हैं-
मरकत पातों की श्याम लता को सरसाए
सूर्यातप से खड़े पेड़ छवि छीर नहाए
प्यारे लगते हैं , मुझको मेरे माई से
नाता जोड़े हैं वे भी धरती माई से
प्रेम और सौन्दर्य के अनूठे कवि केदारनाथ अग्रवाल अत्यधिक संवेदनशील हैं , उन्होंने प्रेम की माधुरी के एक से बढ़कर एक सुन्दर और सजल चित्र खींचे हैं । इस सन्दर्भ में उनका यह गीत बरबस ही सामने खिंचा चला आता है :-
मांझी न बजाओ बंशी मेरा मन डोलता
मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता
जल का जहाज जैसे पल पल डोलता
माझी न बजाओ वंशी मेरा प्रन टूटता
मेरा प्रन टूटता जैसे तृन टूटता
तृन का निवास जैसे बन बन टूटता
मांझी न बजाओ वंशी मेरा तन झूमता
मेरा तन झूमता है तेरा तन झूमता
मेरा तन तेरा तन एक बन झूमता
यह गीत इतना मादक और मधुर है कि पाठक का मन बीन के आगे नाग जैसे झूमने लगता है । भाषा शिल्प सभी दृष्टि से यह गीत हिन्दी साहित्य में एक बेजोड़ रचना है । धीरे पालकी उठाओ मेरे गोपाल की ' भी इसी तरह का मधुर गीत है । केदारनाथ जी शब्द रचना में बड़े मितव्ययी हैं । एक शब्द न इधर न उधर न कम न ज्यादा वे क्षणिकाओं जैसी रचना में भी विराट बिम्बों को उतारने में समर्थ हैं । उनका एक छोटा सा बिम्ब लीजिए जिसमें विराट को भी प्रतिबिम्बित करने की क्षमता है-
बालक ने
ताल को कँपा दिया
कंकड़ से बालक ने
ताल को कँपा दिया
ताल को नहीं
अनन्त काल को कँपा दिया
केदारनाथ अग्रवाल की कविता में लोक लय की जो निराली छटा है वह अन्यत्र दुर्लभ है । वे लोकधर्मी कवि हैं । केदारनाथ अग्रवाल को अपने कर्तृत्व पर बड़ी आस्था है , विश्वास है -
" कविताओं में अमर रहूँगा, गीत अभी जीवित है।
इसमें मैं जीवित हूँ "
और जिन्दगी को गीत से गढ़ना पड़ेगा जैसी पंक्तियाँ , इस जनपद के कवि को जननायक के रूप में उपस्थित करती हैं , उनका कथन है-
' मैं जागता रहूँगा
झंझकारता रहूँगा
हर सिन्धु के लहर से पुकारता रहूँगा '
अन्त तक उनका हौंसला बुलन्द था , उनका संकल्प देखिए -
' हाड़ मांस का मैं हूँ बूढ़ा पेड़
अब भी प्राणवंत जीवन्त '
उन्होंने ' युग की गंगा ' में बहुत पहले ही घोषित कर दिया था -
सूर्य की आलोक आभा मैं नयन में आंजता हूँ
ब्याल जैसे काल को भी , चेतना से नाथता हूँ।
काव्य के मउहर बजाते . लोकलय में नाचता हूँ
जागरण है प्राण मेरा क्रांति मेरी जीवन है जीवन है
तो मृत्यु भी है । और मृत्यु है तो जीवन के अस्तित्व से अस्वीकार किसे हो सकता है , ये दोनों ही नैरन्तर्य में प्रवाहमान शक्तियाँ हैं । कवि की चेतना इसी से परिचालित है , उनका स्पष्ट कथन है -
मुक्त हूँ मैं चेतना की पारदर्शी सत्यदर्शी चांदनी में
जी रहा हूँ । बजता रहा हूँ काव्य कहीं रागिनी में
प्राणपन से मय होकर भी नहीं मैं मर्त्य हूँ
यह अध्यात्म का नया रूप है जिसकी अवस्थिति शून्य में नहीं , आकाश में नहीं , वह अलौकिक भी नहीं , पूर्णतया लौकिक है । प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल का प्रिय विषय है , किसान । केदारनाथ अग्रवाल के कवि को किसान भानु में तब्दील होता दिखाई देता है । युग की गंगा , नींद के बादल , लोक और आलोक , फूल नहीं रंग बोलते हैं , आग का आईना , गुल मेहंदी , पंख और पतवार , हे मेरी तुम , मार प्यार की थापें , कहें केदार खरी खरी , बम्बई का रक्त स्नान , अपूर्वा , बोले बोल अबोल , जो शिलाएँ तोड़ते हैं , जमुन जल तुम , अनियारी हरियाली , खुली आँखें - खुले डैने , आत्मगंध , पुष्पदीप , बसन्त में प्रसन्न हुई पृथ्वी , कुहकी कोयल , खड़े पेड़ की देह , चेता नैया खेता , जैसे समस्त संग्रहों में , श्रम - सौन्दर्य की ही प्रमुखता देखी जा सकती है , उन्होंने श्रम शक्ति का जयगान इन शब्दों में किया है -
जमींदार की नहीं न राजा की है धरती
अब है आज हमारी धरती
यह इंकलाबी गीत है , धरती आदिकाल से किसान की माता है , वह उसका पुत्र है । कवि का संकल्प है-
हम जोतें कोमल बन जाए माता धरती
हम बोएं अंकुर उपजाए माता धरती
हम सींचें श्रम जल लहराए माता धरती
अन्न अन्न ही हमें लुटाए माता धरती
जिसकी जोत उसकी धरती का उद्घोष करने वाले कवि केदारनाथ अग्रवाल ने मेघ की ललकार से उसकी शक्ति की तुलना की है । किसान को वे सकल शक्ति का स्रोत मानते हैं । उन्होंने किसान की सुख - दुख , विवशता , गरीबी - दैन्य के साथ उसकी शक्ति , सहनशीलता , श्रम की महत्ता और दृढ़ निश्चय को एक छोटी - सी कविता में ठोस रूप में अभिव्यक्त किया है जो कि समूची हिन्दी कविता में विशिष्ट है।
जब जब देखा / लोहा देखा
लोहा जैसे तपते देखा गलते देखा
ढलते देखा मैंने उसे गोली जैसा चलते देखा
श्रम शक्ति का अमोघ अस्त्र है लोहा । हथौड़ा और हंसिया मार्क्सवाद के चिर परिचित बिम्ब हैं , जिसे कवि ने पुनर्प्रतिष्ठित किया है । " एक हथौड़ा वाला इस घर में पैदा हुआ । " यह मध्यवर्गीय चेतना का उल्लास है , जिसका संघर्ष जन्म से मृत्यु तक अविराम चलता रहता है , ऐसी प्रहारक कविता लिखने वालों में केदारनाथ अकेले हैं , उनका काव्य मनुष्य की जिजीविषा की गौरवगाथा है , खड़ी सुनहली फसल की कालरात्रि में लाठी लेकर रखवाली करने वाला कोई केदारनाथ अग्रवाल का कवि ही हो सकता है । श्रम सौन्दर्य का एक से एक बढ़कर चित्ताकर्षक बिम्ब केदारनाथ जी ने उकेरे हैं , पर ' चन्द्रगहना से लौटती बेर ' की ये पंक्तियाँ अद्वितीय हैं , इसमें किसान के श्रम , सौन्दर्य और दृढ़ता को ' चने ' के रूप में एकाकार कर दिया है-
देखता हूँ दृश्य अब मैं
मेड़ पर इस खेत की बैठा अकेला
एक बीते के बराबर
यह हरा ठिगना चना
बाँध मुरैठा शीश पर
छोटे गुलाब फूल का
सजकर खड़ा है
मार्क्सवादी चेतना को समग्रता के साथ , शोषण के विरुद्ध मनुष्य की चेतना को केदारनाथ अग्रवाल ने अत्यन्त संवेदनशील और रागात्मक बना दिया है यहाँ । खेत में हल जोतते उनके नाहर बैल , धौलागिरि शृंग शिखर से भी अधिक ऊँचे हैं । गाँव का लुहार काले लोहे को लाल कर जैसा चाहता है वैसी आकृति दे सकता है । श्रम सौन्दर्य के सन्दर्भ में केदारनाथ अग्रवाल की कविता मुक्तिबोध , नागार्जुन , त्रिलोचन और शील से भी कई कदम आगे है । सच्चे अर्थ में ही वे ही निराला के घनभार से अट्टालिका को हिला देने वाली चेतना के सार्थवाह हैं - हल , हँसिया का और हथौड़े का परचम लहराने वाले कवि केदारनाथ जी धरती पुत्र थे , वायवी चिन्तन से अलग वे ठोस यथार्थ के कवि थे । साम्यवादी विचारधारा के इस कवि पर उनके अभिन्न मित्र डॉ . रामविलास शर्मा ने अर्थ विस्तार वाली टिप्पणी की है - हिन्दी कविता के यथार्थवाद को विकसित करने में निराला के बाद जिन कवियों का योगदान है उनमें केदारनाथ अग्रवाल अग्रगण्य हैं । उन्हें क्रांतिकारी यथार्थ के संस्थापक कवि कहना चाहिए ।
केदारनाथ जी पेशे से वकील थे , जीवनयापन के लिए उन्हें कठिन संघर्ष करना पड़ा था । उनके हालात उन्हीं के शब्दों में ये थे-
बी.पी. का रूपिया देना है
खड़ा डाकिया देख सामने परेशान हूँ
टका नहीं है
या
नौ पेटों के पलने वाले टूटे घर में
या
और सिसकते हैं जब दोनों गरम आंच में
दरअसल ' पेशा ' को धार देने वाली तिकड़मी व्यावसायिकता से दूर , वे एक सरल सहज इन्सान थे । उन्होंने कठिन संघर्ष के दिनों में भी अपने कवि जीवन को कुटिलता , कांइयापन , धूर्तता , मक्कारी और चालाकी से दूर रखा । मजदूर किसानों के हक को वाणी देने वाले इस कवि ने कभी भी किसी किसान के विरुद्ध कोई केस नहीं लड़ा । वे किसानों के दुख दर्द में उनके साथ थे , उनका हृदय उनके लिए इतना खुला हुआ था कि उनकी लड़ाई में साथ देने के लिए उन्हें अपने टूटने - बिखरने का भय भी नहीं था-
अस्तित्व का हमें भय नहीं
हम तो नहीं काल हारा
कवि को अपने कर्म पर , जीवनशैली पर पूरा विश्वास . था उन्हें तथाकथित परलोक में नहीं , बल्कि इसी धरती में विश्वास है । संक्षेप में धरती पुत्र इस कवि को जीवन और जगत दोनों पर अटूट आस्था है । वे लोक लय के कवि हैं जिसमें संघर्ष भी है और सौन्दर्य भी । उनका उद्घोष है-
हम न रहेंगे , तब भी ये खेत रहेंगे
इन खेतों पर घन घहराते / शेष रहेंगे
जीवन देते , प्यास बुझाते । श्याम बदरिया
लहराते ये केश रहेंगे
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद में केदारनाथ जी की बड़ी आस्था थी , पर वे कट्टर नहीं थे । मनुष्य पर , उसकी प्रबल शक्ति पर उन्हें दृढ़ विश्वास था । उन्होंने लिखा भी है - मैं न तो किसी परमशक्ति ईश्वर पर विश्वास करता हूँ और न आदमी से बढ़कर किसी देव - दानव को मानता हूँ । मेहनतकश इन्सान ही उनके देवी देवता हैं , उन्हें भी वे कर्मपथ में आरूढ़ करते दिखाई देते हैं -
स्वप्न के जो देव हैं
हाथ में हल और हंसिया थमाकर
उन्हें मजबूर करता हूँ
कि जोतो और काटो
और पेट की पहली समस्या मिटाओ
शोषित पीड़ित मजदूरों के पक्षधर कवि केदारनाथ जी ने मार्क्स के सिद्धान्तों की व्याख्या में समय न बिताकर उसे अधिकाधिक व्यावहारिक बनाया । मार्क्सवाद को उन्होंने भारतीय जन - जीवन के पक्ष में किया । वे सरल , सीधी जनता की उत्पीड़न और सहनशक्ति से परिचित तो थे ही पर उनकी चुप्पी के विरुद्ध अत्याचार अनाचार के विरुद्ध लड़ने की शक्ति से भी वाकिफ थे , श्रम का सूरज कहलाने वाले क्रांतिकारी इस कवि की उद्घोषणा है -
घन गरजे जन गरजे
बंदी सागर को लख कातर
एक रोष से
घन गरजे घन गरजे
क्षिति की छाती को लख जर्जर
एक शोध से
घन गरजे
शक्ति के असफल प्रयासों को देखकर वे हिंसा तक का समर्थन करते हैं - काटो काटो करबी , मारो मारो हंसिया , उस पर लोहा मारो बारम्बार तड़तड़ मारो । जिससे वह जल्दी टूटे , यह सब नवसृजन के लिए था , देश दुनियां को बेहतर बनाने के लिए था । उनके विचार में जहाँ नाश का ताण्डव बर्बर चल रहा हो वहाँ हिंसा और अहिंसा क्या है । वह आत्महत्या के बजाय चेतन के टापों से चांद के सिर को कुचलने के आकांक्षी हैं । उनके विचार में , वे हाथ ही क्या जो चट्टानों को तोड़ने में असमर्थ हैं ।
केदारनाथ अग्रवाल सक्रिय राजनीति में कभी नहीं रहे पर देश की राजनीति की उनमें प्रखर चेतना थी । वे समय की धार को पहिचानने वाले कवि थे , थोड़े से धक्के में टूट जाने वाले कच्चे घड़े नहीं थे । देश की पूँजीवादी व्यवस्था , अफसरशाही , छद्म आजादी को देखकर वे उसकी तीखी आलोचना करते हैं -
आग लगे इस राम राज्य में
रोटी सूखी और कौर छीना है
थाली सूनी अन्न छिना है ।
पेट धंसा है राम राज्य में
आग लगे इस राम राज्य में
सत्ताइस साल में यहाँ का नेतृत्व खूखार हो गया , उसने ही जहरीली गरीबी को पैदा किया है । पूँजीवादी सभ्यता स्वतंत्रता के पूर्व ही आ गई थी पर , इस समय वह जकड़ने वाली सबसे ताकतवर रूप में हमारे सामने है , इस पर भी बौद्धिक वर्ग विदेशी पूँजीवाद की वकालत कर रहा है , कवि ने युवा वर्ग को सुख - शान्ति को नष्ट करने वाली इस सभ्यता से सावधान करते हुए इन साहबजादों की कड़ी निन्दा की है -
वह तो अब बिल्कुल लगता है
टेम्स नदी का जाया
पौंड देश का भक्त भिखारी
डालर का दुलराया
कवि ने युवा वर्ग को कमान की तरह तने रहने की सलाह दी है , क्योंकि ये जानते हैं इसी शक्ति से समाज विरोधी शक्तियों का नाश होगा-
काल नगर गर्जन करेगा
क्रोध विष वर्धन करेगा
सत्य से परदा कटेगा
झूठ का तब सिर फटेगा
क्रांतिकारी इस कवि ने युवा पीढ़ी के लिए कई इंकलाबी गीत लिखे हैं और उन्हें आश्वस्त भी किया है-
जो जीवन की आग जलाकर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा ।
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा ।
सौन्दर्य चेतना के इस अप्रतिम कवि ने प्रकृति के नानाविध छवियों का बेलाग रूपांकन किया है । इससे उनकी कविता रूप , रस , स्पर्श , गंध और ध्वनियों में परिवर्तित हो गई है । उनकी प्रकृति निःसंग भी है और मनुष्य का अन्तरंग भी । छोटी - छोटी कविताओं में उनके ऐन्द्रिय बिम्ब ऐसे भास्वर बन पड़े हैं जैसे तारे नदी के जल में उतर आए हैं -
इकला चाँद / असंख्य तारे / नील गगन के खुले किवाड़े कोई हमको / कहीं पुकारे / हम आएंगे बाँह पसारे
प्रकृति के आमंत्रण से किसे अस्वीकार होगा । पंत और निराला ने , प्रकृति ने जनपद की काली मिट्टी के कवि को अधिकाधिक प्रेरणा प्रदान की है । फर्क इतना ही है कि इन्होंने श्रम सौन्दर्य को प्रकृति में एकाकार कर दिया है । रंग संयोजन में भी वे अद्भुत विम्बों का निर्माण करते हैं - ' फूल नहीं रंग बोलते हैं ' की एक छोटी - सी कविता है -
पंखुरियों से समुद्र के अन्तस्थल के
नील , श्वेत और गुलाबी / शंख बोलते हैं ।
बल्लरियों से फूल अखंड मौन , अमंद नाद
एक ही वृत्त पर प्रतिष्ठित धैर्य और उन्माद है
यहाँ विरोधाभासी रंग और ध्वनियां काव्य में एक लोक - लय का निर्माण करती हैं , कभी - कभी तो लगता है केदार लोक लय के एकान्त साधक हैं । ग्राम्य चित्रण में केदार इतने तन्मय होते हैं कि मनुष्य का भी प्रकृति में रूपान्तरित कर देते हैं या प्रकृति को ही मानवीय क्रिया - कलापों में तब्दील कर देते हैं । ' युग की गंगा ' में उनकी एक प्रसिद्ध कविता है , जो आजादी के जमाने में उसकी सम्पूर्ण स्वतंत्रता या स्वच्छन्दता को हवा के बहाने अभिव्यक्त करती है-
हवा हूँ हवा मैं वसन्ती हवा हूँ
चढ़ी पेड़ महुआ थपाथप मचाया
गिरी धम्म से फिर चढ़ी आम ऊपर
उसे भी झकोरा किया कान में कू
उतर कर भगी मैं हरे खेत पहुँची
यहाँ गेहुँओं में लहर खूब मारी
पहर दोपहर क्या अनेकों प्रहर तक
केदारनाथ का प्रकृति सौन्दर्य सूफियाना है , वे उसे मनुष्य से अलग रखकर नहीं देखते इसीलिए डॉ . रामविलास शर्मा ने उन्हें सूफी कवि तक कह डाला है कहीं - कहीं केदार ऊपर से रोमानी लगते हैं पर वे खड़े हैं ठोस यथार्थ की धरती पर । दरअसल केदार प्रकृति और जीवन को अलग - अलग नहीं देखते । वे प्रकृति को जड़ नहीं चेतन मानते हैं , उनके चित्रों में प्रकृति सर्वाधिक शक्तिशालिनी भी है , वह जड़ता को निरन्तर तोड़ने वाली है-
दिन हिरन सा चौकड़ी भरता चला
धूप की चादर सिमटकर खो गई
खेत घर , वन , गाँव का
दर्पण किसी ने तोड़ डाला
शाम की सोना - चिरैया
नीम में जा सो गई
पेड़ - पौधे बुझ गए जैसे दिए
केन ने भी जांघ अपनी ढांक ली
रात है यह रात , अंधी रात
और कुछ नहीं बात
रात का प्रभाव केवल प्रकृति पर नहीं मनुष्य पर भी पड़ता है । केदार जैसे कवि वहाँ भी तमस में सौन्दर्य की पहिचान कर लेते हैं । यह एक प्रकार से तमस से ज्योति की ओर बढ़ने की अचेत कोशिश है ।
चली गई है कोई श्यामा
आँख बचाकर , नदी नहाकर
कांप रहा है अब व्याकुल
विकल नील जल
छोटे हाथ सबेरा होत
लाल कमल से खिल उठते हैं ।
करनी करने को उत्सुक हो -
धूप हवा में हिल उठते हैं
जो कवि आग में भी फाग की मस्ती का अनुभव कर सकता है , वह कोई केन किनारे का ही कवि हो सकता है । केन और केदारनाथ दोनों एक हैं , बचपन से महाप्रयाण तक कवि का केन से नाता माँ , बेटी और प्रेयसी जैसा ही रहा है । इसीलिए कवि को केन नदी किनारे का कवि कहा जाता है । असल में केन उनके बाहर - भीतर प्रवाहित है , उनके सम्पूर्ण चेतना में , अस्तित्व में प्रवाहित है । उनका शब्द - शब्द केन नदी के जलाभिषेक से सजल है । केन को वे क्षण भर के लिए विस्मृत नहीं कर सकते । केन पर केदार ने अनेक कविताएँ लिखी हैं जो यथार्थ की भूमि को सिंचित करती रहती हैं मार्क्सवादी शुष्क जीवन दृष्टि को सरल और सरस बनाती रहती हैं । जब भी अवसर मिला केदार वहीं मिलेंगे केन नदी पर -
केन किनारे पल्थी मारे
पत्थर बैठा है गुमसुम
सूरज पत्थर सेंक रहा है गुमसुम
.. केन निरन्तर प्रवहमान नदी है ठीक कवि की जिन्दगी की तरह , जब भी कवि नीरस निष्फल वकालती जीवन में हुआ उसका शरण्य केवल केन ही रही , बकलम खुद -
दोनों हाथ में रेती है
नीचे अगल - बगल रेती है
रेती पर ही पाँव पसारे
बैठा हूँ इस केन किनारे
सचमुच केदार प्रकृति , प्रेम और सौन्दर्य के अद्भुत चितेरे हैं । उन्हें सूर्य , धूप , नदी , पेड़ , चट्टान , चिड़िया सभी से बेहद प्यार है । मजदूर - किसान और गंगा की इस सहायक नदी से केदारजी को अजब - गजब की दीवानगी थी । उन्होंने अपने प्रिय पात्र खेतिहर मजदूर किसान के चरित्र को केन पर ही प्रतिबिम्बित किया है -
केन कूल का कर्मठ पानी
चट्टानों के ऊपर चढ़कर
मार रहा है , घूंसे कसकर
तोड़ रहा है तट चट्टानी
कवि मित्र नागार्जुन ' जन मन के सजग चितेरे ' शीर्षक अपनी प्रसिद्ध कविता में उनका जीवन्त चित्र खींचा है -
प्यारे भाई मैंने तुमको पहचाना है
समझा बुझा जाना है
केन कूल की काली मिट्टी , वह तुम हो
केन का बांकपन कवि की रचनाओं में सर्वत्र देखा जा सकता है , स्वाभाविक है उनके न रहने पर केन बेहद उदास हुई होगी , जिसे कवि ने मृत्यु के पूर्व ही देख लिया था-
आज नदी बिल्कुल उदास थी
सोई थी अपने पानी में
किसी ने केदारनाथ अग्रवाल को केन - कूल का कर्मठ कवि कहा तो किसी ने उन्हें केन किनारे का गीत विहग कहा तो ठीक ही कहा है । स्पष्टता , सादगी और निश्छलता की प्रतिमूर्ति केदारजी के मित्रों में डॉ . रामविलास शर्मा , नागार्जुन , त्रिलोचन , शमशेर बहादुर सिंह , शील मार्क्सवादी कवि थे , पर नरेन्द्र शर्मा , नरोत्तम नागर भी मित्र थे , इन सबसे बढ़कर उनकी मित्र थी , उनकी प्राणप्रिय पत्नी पार्वती देवी जी । केदारनाथ जी का ब्याह बचपन में ही जब वे मात्र कक्षा 7 वीं के छात्र थे , नैनी ( इलाहाबाद ) के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था । पार्वती जी उनकी प्रेरणा का केन्द्र बिन्दु थीं , वे उनकी पत्नी और प्रेयसी दोनों थीं । केदारजी ने समूचे हिन्दी साहित्य में दाम्पत्य प्रेम का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है । उन्होंने प्रेम का खुला इजहार किया है , कहीं भी उसमें संकोच नहीं है , वह उनके कवि मित्र शमशेर बहादुर सिंह से कहीं अधिक मांसल है , पर है वह स्वस्थ , सुन्दर और पवित्र । स्त्री देह का एक निर्दोष चित्र देखिए -
भूल सकता मैं नहीं ये कुच खुले दिन
ओंठ से चूमे गए / उजले धुले दिन
जो तुम्हारे साथ बीते / रस भरे दिन
बावरे दिन
दीप की लौ से गरम दिन
वास्तव में केदारजी अपनी पत्नी को प्राण - प्रण से चाहते थे । गृहस्थ जीवन में कितने संघर्ष आए पर वे टूटे नहीं , जीवन के प्रति उन्हें अटूट आस्था थी , इसलिए वे सदा प्रसन्न रहते थे । वकील होते हुए भी उनके पास तंगी बनी रहती थी , यहाँ तक पार्सल छुड़ाने के लिए एक बार उनके पास 23 रुपए तक नहीं थे । उन्होंने अपना चरित्रांकन स्वयं किया है-
हे मेरी तुम
गठरी चोरों की दुनियां में
मैंने गठरी नहीं चुराई
इसीलिए कंगाल हूँ
भुक्खड़ शहंशाह हूँ
और तुम्हारा प्यार हूँ
तुमसे पाता प्यार हूँ
केदारजी पेशे से वकील थे , पर उन्होंने इसे पैसा कमाने का साधन नहीं बनाया । जो काइयांपन चालाकी इसके लिए अपेक्षित है , उससे सदैव दूर रहने वाले वे सरल चरित्रवान व्यक्ति थे । यह शाश्वत सत्य है कि गृहस्थ जीवन का सुदृढ़ आधार अर्थ ही होता है पर केदारजी ने छल - कपट , अन्याय , झूठ - फरेबी से अपने पवित्र गृहस्थ जीवन को सदैव दूर ही रखा , इसीलिए उनका मस्तक गर्वोन्नत । वे अत्याचार अन्याय के विरुद्ध खरी - खोटी लिखने और सुनाने में कभी नहीं चूकते थे , वस्तुतः उनका गृहस्थ जीवन प्यार से सराबोर था , किसी से किसी को कोई शिकायत नहीं , आजीवन प्यार ही प्यार ।
हे मेरी तुम
यही खुशी है प्यार न बदला
प्रथम प्यार का ज्वारर न बदला
मधुदानी व्यवहार न बदला
विधुर जीवन में उनका प्यार बराबर उसी तरह था , जो शुरू - शुरू में था । दरअसल वे पार्वती देवी को अपनी अभिन्न व चेतना के रूप में आठों याम महसूस करते थे । बीमार पत्नी ने उनसे कभी कहा था - बाबू जी हमको छिपा लो , कवि ने स्वयं कहा है - पत्नी हमारी चेतना में है , हम अपना प्यार का घेरा डालते थे , स्वप्न में जैसा होता है - आ गई ... बैठ गई , बार-बार देख रही है यह सघन की विब्यार्ज अभिव्यक्ति है ।
भीतर रोता / बाहर हंसता / व्यथा सूर्य सी
मुख पर खिलती / जीने की ऐसी क्षमा
मुझको मिलती / योगी होकर मैं साधे हूँ
संभोगी मन / रह रह कँपता न होकर भी
तुम हो मेरे पास / लबालब प्यार से आकंठ
डुबाए हुए / तुम्हें देखता हूँ दिल और दिमाग में
वास्तव में दाम्पत्य जीवन का यह प्यार इतना शक्तिशाली है कि कवि का विश्वास है काल भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता -
प्यार तुम्हारा प्रबल प्रवहर है मिला मुझे
कर रहा अमर / नहीं मिलेगी विजय काल को
जिसमें व्यथित है । हार - हहर
पत्नी की स्मृति में ही यह कवि जीता - जागता है । उसकी हार्दिक आकांक्षा है -
तुम मेरी । मैं तुम्हारा
हम दोनों ने तन मन - वारा
रहा न कोई कूल किनारा
जाओ लेकिन आत्मगंध दे जाओ ।
जाते जाते , मृत्यु विजेता चुम्बन देकर
डॉ.बलदेव जी को सादर प्रणाम।
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