बल देने वाले डाँ. बलदेव भैय्या:-डाँ. देवधर महंत

बल देने वाले डा बलदेव भैया
***********************
  "प्रिय देवधर । तुम निराला की तरह महाप्राण हो  ।अपनी कन्या के शोक से उबरो ।तुम्हारे भीतर अपार प्रतिभा है। तुम्हें अभी बहुत कुछ सृजन करना है । तुम निराला की सरोज स्मृति को पढ डालो।" मैं अपने गांव में था .जैसे ही डाकिया ने डा बलदेव की यह दुर्लभ  पाती दी,मेरे शोक विदग्ध मन पर शीतलता के छींटे पड गये ।सन् 1993 में वज्रपात हुआ था. मेरी सात वर्षीया दुहिता रेणुकाश्री का सफदरजंग हास्पिटल दिल्ली मे निधन हो गया था ।हम दोनों पति -पत्नी लंबे समय तक शोकाकुल रहे ।डा बलदेव ने मानो झकझोर दिया था। मैं"सरोज स्मृति " में डूब गया था ।शनै:-शनै: मैं अपनी दुनिया में लौटने लगा । ड्यूटी ज्वाइन किया । ऐसे थे डा बलदेव ।
      डा बलदेव जैसा घनघोर अध्ययनशील,शोधकर्ता और समर्पित रचनाधर्मी  मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं पाया । उन्होंने मुझे साहित्य सृजन को सांस की तरह लेना सिखाया ।वे स्वप्न में भी कविताएं रचा करते थे।  
           अक्टूबर सन् 1988 से 1992-93 तक शासकीय सेवा के बहाने  मेरा रायगढ़  प्रवास रहा ।इस अवधि में डा बलदेव का निरंतर सानिध्य मेरे जीवन की अमूल्य धरोहर  रहा है। तब रायगढ़ में डा बलदेव ,रामलाल निषाद और इस खाकसार की त्रयी मशहूर थी ।रायगढ प्रवास  मेरे साहित्यिक जीवन का इसलिए भी स्वर्ण काल है ,कि डा बलदेव के साथ छायावाद प्रवर्तक पद्मश्री मुकुटधर पांडेय का सतत सामीप्य मिलता रहा ।पांडेय जी से मिलते रहना जैसे उनके युग को जीना होता था । 
      वे प्रसाद ,पंत ,निराला और महादेवी वर्मा तथा अनेक कवियों के दुर्लभ संस्करण सुनाया करते थे ।उनके आखिरी दिनों में मैं और डा बलदेव भैया उनके बहुत करीब रहे. उनके निधन पर उनकी शव यात्रा एवं अंत्येष्टि में भी प्रोटोकॉल के तहत शासन की ओर से सहभागी बनने का  मुझे अवसर  मिला। डा बलदेव भी उस दिन साथ -साथ रहे । मैंने उस दिन उन्हें बहुत - बहुत उदास पाया । पांडेय जी डा बलदेव को बहुत सम्मान देते थे । डा बलदेव को जनकवि आनंदीसहाय शुक्ल  भी बहुत मानते थे ।जनकवि के निधन की सूचना डा बलदेव ने मुझे तत्काल दी थी । शुक्ल जी के संयोजन में प्रायः कवि गोष्ठियां होती रहती थी।तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और गजलगो विजय वाते डा बलदेव के यहाँ प्रायः आते रहते थे और हमारी साहित्यिक गोष्ठियां गुलजार हुआ करती थीं ।
     रहस के लिए ख्यात ग्राम नरियरा  से अकलतरा होते हुए अंततः  संगीत और कलाप्रेमी राजा चक्रधरसिंह की नगरी में  रमना डा बलदेव के स्वभाव के अनुरूप था ।
  डा बलदेव के रहते मैंने कभी भी निर्बलता महसूस नहीं की । वे मुझे सदैव प्रेरित -प्रोत्साहित करते रहते थे । एक वाक्या सन् 1989 का है ,तब जगदीश मेहर चक्रधर समारोह के प्रमुख सूत्रधार हुआ करते थे ।पैलेस के सामने सभागारनुमा हाल में भव्य कवि सम्मेलन आयोजित हुआ था ।छत्तीसगढी के अग्रपांक्तेय कवि गण पधारे थे ।पं.श्यामलाल चतुर्वेदी ,हरि ठाकुर , लक्ष्मण मस्तुरिया ,रामेश्वर वैष्णव प्रभृति ।स्थानीय कवि चंद्रशेखर शर्मा ,कस्तूरी दिनेश ,रामलाल निषाद भी थे । सहसा डा बलदेव भैया ने आदेश दिया ।देवधर  तुम्हें ही इस भव्य कवि सम्मेलन का सफल संचालन करना है । उनका आशीर्वाद था कि कवि सम्मेलन ऐतिहासिक बन पडा । ऐसी थी डा बलदेव की परख ।दूसरे दिन कवि गण मुकुटधर पांडेय जी के घर जाकर उनके कर कमलों से सम्मान पत्र ग्रहण किये ।
       एक बार मैं रायगढ़ आया था। शायद घर आ रहा था ।
   तब मैं सरगुजा में पदस्थ था ।  डा बलदेव मुझे सीधे पाठक मंच के कार्यक्रम में ले गये ।अशोक झा संचालन कर रहे थे । उस दिन  केदारनाथसिंह की कविता की  किताब "जमीन पक रही है" पर चर्चा हो रही थी ।डा बलदेव ने मुझे त्वरित समीक्षा के लिए आदेशित किया और यह खाकसार उस अग्नि परीक्षा में खरा उतरा । ऐसा था उनका विश्वास ।एक बार आकाशवाणी से "छत्तीसगढ़ के अनाम साहित्यकार " विषय पर मेरी वार्ता प्रसारित होनी थी । शायद सरगुजा से ही आ रहा था ।उन्होंने इतनी महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध करा दी कि मेरा आलेख समृद्ध बन पडा । वे जानकारियों के मानों इनसायक्लोपीडिया थे ।
               -डा देवधर महंत

Comments

Popular posts from this blog

पुनर्पाठ:डाँ. बलदेव:सृजन और सरोकार :-लेखक-रजत कृष्ण

डाँ. बलदेव महत्व:- लेखक राजू पांडेय