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Showing posts from April, 2021

रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-लेखक:-डाँ. बलदेव

लेख रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-- --------------------------------------------  लेखक:-डाँ. बलदेव  राजा चक्रधर सिंह को कथक नृत्य के विकास के लिए योग्य शिष्यों की तलाश थी। अक्सर गणेशोत्सव के समय जो गम्मत या नाचा पार्टियां आती, उन्हीं में से बाल कलाकारों का चुनाव किया जाता था। बाकायदा इन बाल कलाकारों का खर्चा , आवास व्यवस्था समेत 25 रूपये माहवारी छात्रवृति भी दी जाती थी। दरबार में प्रथम नृत्य गुरु जगन्नाथ प्रसाद थे और उनका पहला शिष्य थे अनुजराम मालाकार । वे रायगढ़ के पूर्व नेपाल दरबार में नियुक्त थे। कालांतर में पं. कार्तिकराम, कल्याणदास, फिरतू महाराज एवं बर्मनलाल जी इस घराने से दीक्षित होकर चार कीर्ति स्तंभ के रुप में सामने आये।  पं. कार्तिकरामः-   अपने जीवन में कथक.नृत्य का पर्यायवाची बन गये कार्तिकराम का जन्म चांपा-जांजगीर के एक छोटे से गाँव भंवरमाल में सन् 1910 में हुआ था। वे अपने चाचा माखनलाल की गम्मत नाचा पार्टि में बतौर बाल कलाकार के रुप में हिस्सा लिया करते थे। एक दफा गणेश मेला के दौरान परी के रूप में राजा चक्रधर सिंह ने उन्हें देख लिया। बालक जितना सुन्...

रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर:डाँ. बलदेव(शभूलाल शर्मा"बसन्त")

*रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर .. - डॉ. बलदेव* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ कृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साथ मेरा पाँच दशक से अधिक समय तक घनिष्ठ एवं घरेलू संबंध रहा है । वे जीवन पर्यन्त नवोदित रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देते रहे। गीत , कहानी , निबंध , आलेख , आलोचनात्मक लेख आदि साहित्य के हर विधा को निरंतर पोषण दिया। जिनकी प्रतिभा ने नवोदित रचनाकारों को खूब प्रभावित किया । ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी बलदेव भैया आज स्मृतिशेष हैं ।  उनके हिन्दी व छत्तीसगढ़ी साहित्य में शिल्प सौन्दर्य का एक सहज रूप ---- दृष्टिगोचर होते हैं , इसमें बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग सुन्दर बन पड़ा है । भाषा सरल है , पढ़ते ही आत्मसात हो जाते हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ आज साहित्य जगत के राष्ट्रीय फलक पर जगमगा रहे हैं ।  भैया जी के इस साहित्यिक यात्रा में आदरणीया भाभीश्री जी ने उनको सदैव प्रोत्साहित किया । वे हमेशा उनकी ख्याल रखतीं थीं । भैया जैसे जीवन साथी पाकर अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानतीं हैं । बलदेव भैया जी भी यही कहते थे कि , "आज मैं साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ भी हूँ , तुम्हारी भाभीश्री ज...

नवोदित रचनाकारों के प्रेरणास्रोत थे डाँ. बलदेव (डाँ. प्रमोद सोनवानी)

*नवोदित रचनाकारों के प्रेरणास्त्रोत थे डॉ. बलदेव* ~~~~~~~~~~~~~~~~~ छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण साहित्यकार व शिक्षाविद् डॉ. बलदेव जी से मेरी मुलाकात अक्सर शिवकुटीर करमागढ़ में होता था । जब भी ललित निबंधकार जय प्रकाश 'मानस' जी का रायगढ़ आगमन होता तो , डॉ. बलदेव जी के साथ करमागढ़ अवश्य आते थे । वहीं करमागढ़ के सुरम्यवादी में बना बालकवि 'वसंत' जी का निवास स्थल - शिवकुटीर में , उनसे मुलाकात होती थी ।  वे मुझे बाल साहित्य के एक नवागत रचनाकार के रूप में कुशल मागर्दर्शन देते रहते थे । उनका कहना था कि - "बाल कविता यदि सृजन करनी हो तो , सबसे पहले बच्चों के हाव -भाव को समझना सिखो । क्योंकि , उसी से बालकाव्य का प्रथम पुट निकलकर सामने आता है ।  डॉ. साहब व्याकरण संबंधित जानकारी देते हुये कहते थे - " पति - पत्नी , इन दो छोटे शब्द का भेद समझ लोगे तो पूरे व्याकरण को समझना तुम्हारे लिए आसान हो जायेगा ।  वे ऐसी छोटी - छोटी युक्ति के माध्यम से , बड़ी - बड़ी बातों को समझाने की कोशिश किया करते थे।  डॉ.बलदेव जी , जब भी करमागढ़ आते उनकी सेवा करने का मुझे सुअवसर मिलता था ।  वे मुझे नाम से नहीं ब...

पुण्य पथ पथिक:डाँ. बलदेव(रामनाथ साहू)

पुण्य पथ पथिक ************** पुण्य पथ पथिक बढ़ चला कर् विरल नेह -उपवन । स्मृतियाँ इतनी घनी .. इतनी घनी कि लगता है तुम पास ही हो यकीनन । सहज सरल समरस समगात तुम्हारी मन्द - मन्द मुस्कान जैसे प्राची में मुकुलित नवल प्रभात जिसके भी सर पर रखा प्रशस्त हस्त बन गया वह साम गान उदगाता । अवदान तुम्हारा  युग सम्भाल सके तो सम्भाले कहाँ से लाते थे तुम यह सब भर भर लुटाते पर कभी न् घटता । विस्मित चकित खड़े हैं हम क्या सचमुच कुछ हुआ ? नहीं ।  कभी और कोई भवभूति तुम सा समान- धर्मा आएगा तुम्हारे मर्मों को जगत को समझाएगा तुम तो शाश्वत हो ..चिरन्तन हो । अभी तो इस समय केवल तुम्हारा वंदन । रामनाथ साहू देवरघटा डभरा जिला जांजगीर चाम्पा  मो -9977362668

डाँ. बलदेव साव:एक शुध्द बहाव:-सुरेश उपाध्याय

डाँ. बलदेव साव: एक शुध्द बहाव :- सुरेश उपाध्याय -----------------------------------------  हिन्दी में जो भी मेरे फ्रैंड , फिल्मकार या गाइड हैं, उनमें डाँ. बलदेव साव जितने मेरे आत्मीय, अंतरंग और अभिन्न मित्र हैं, शायद कोई दूसरा नहीं और इसका सबसे मुख्य और मूल कारण यही है कि उनके भीतर का समपर्ण का भाव शिद्दत और संजीदगी के साथ घर कर गया है। वे जिसके विरोधी है, तो विशुद्ध और पूर्ण रूप से विरोधी ही हैं और इसके विपरीत वे जिसके प्रति समर्पित और सेवा भावी हैं, वहाँ पर उन पर कोई भी और कभी भी उंगली उठाने में सर्वथा असमर्थ है, और असहाय अनुभव करता है। छत्तीसगढ़ में रायगढ़ शहर में रचे बसे जनकवि श्री आनंदी सहाय शुक्ल जी जो रिश्ते में मेरे रिश्ते में श्वसुर हैं, उनके प्रति जो श्रध्दा और आस्था डाँ. बलदेव साव में है, संभवतः किसी अन्य में नहीं। और यही कारण है कि आनंदी सहाय शुक्ल के जो तीन-चार छोटे-मोटे संकलन प्रकाश में आये हैं, वे डाँ. बलदेव साव ने ही अपनी अचानक और अनायास मेहनत मशक्कत से जलाये हैं।श्री शुक्ल जी के प्रति जो जिम्मेदारी का अहसास उन्हें है, उसे महसूस कर मैं उनके प्रति आभार, धन्यवाद और अहोभ...

हिंदी साहित्य के दुलर्भ रत्न:-डाँ. बलदेव (जयन्त कुमार थोरात)

हिन्दी साहित्य के दुलर्भ रत्न-डाँ. बलदेव ----------------------------------------------------- (जयन्त कुमार थोरात)             उन दिनों मैं रायगढ़ जिले में पदस्थ था। पदस्थापना के बाद साहित्यिक अभिरुचि के कारण वहां के साहित्यकारों से मेरा जल्दी ही परिचय हो गया। वहाँ के ख्याति लब्ध साहित्यकार डा. आनन्दी सहाय शुक्ल जी से मेरी अच्छा खासा मित्रता हो गयी थी। वे प्रतिदिन शाम चार बजे मेरे कार्यालय में आते थे व आधे घंटे बैठ कर चले जाते थे।उनके अधिकतर साहित्य की बात होती थी। चुंकि वे उम्र में मुझ से काफी बड़े थे इस कारण मेरी इच्छा के अनुसार मुझे 'जयन्त जी'  ही कहा करते थे। एक दिन उनके साथ एक अपरिचित व्यक्ति भी आये। जब वे दोनों मेरे कमरे के भीतर आये उस समय में किसी जरूरी फाईल में उलझा था। इस कारण मैंने शुक्ल जी को बैठने को कहा व एक एक उड़ती नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर डाल कर काम में लग गया। अपने कार्य से मुक्त हो कर मैंने शुक्ल जी की ओर देखा।          तभी मेरी नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर पड़ी। वे कद से छोटे, थोड़ा भारी बदन,सर पर खिचड़ी बाल,आँखो...

बल देने वाले डाँ. बलदेव भैय्या:-डाँ. देवधर महंत

बल देने वाले डा बलदेव भैया ***********************   "प्रिय देवधर । तुम निराला की तरह महाप्राण हो  ।अपनी कन्या के शोक से उबरो ।तुम्हारे भीतर अपार प्रतिभा है। तुम्हें अभी बहुत कुछ सृजन करना है । तुम निराला की सरोज स्मृति को पढ डालो।" मैं अपने गांव में था .जैसे ही डाकिया ने डा बलदेव की यह दुर्लभ  पाती दी,मेरे शोक विदग्ध मन पर शीतलता के छींटे पड गये ।सन् 1993 में वज्रपात हुआ था. मेरी सात वर्षीया दुहिता रेणुकाश्री का सफदरजंग हास्पिटल दिल्ली मे निधन हो गया था ।हम दोनों पति -पत्नी लंबे समय तक शोकाकुल रहे ।डा बलदेव ने मानो झकझोर दिया था। मैं"सरोज स्मृति " में डूब गया था ।शनै:-शनै: मैं अपनी दुनिया में लौटने लगा । ड्यूटी ज्वाइन किया । ऐसे थे डा बलदेव ।       डा बलदेव जैसा घनघोर अध्ययनशील,शोधकर्ता और समर्पित रचनाधर्मी  मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं पाया । उन्होंने मुझे साहित्य सृजन को सांस की तरह लेना सिखाया ।वे स्वप्न में भी कविताएं रचा करते थे।              अक्टूबर सन् 1988 से 1992-93 तक शासकीय सेवा के बहाने  मेरा ...

डाँ. बलदेव और पांडेय परिवार:-शिवकुमार पाण्डेय

डाँ. बलदेव और पांडेय परिवार:-  शिवकुमार पांडेय -------------------------------------- डाँ. बलदेव उन साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने साहित्य की हर विधा पर अपनी लेखनी चलाई है। कविता, कहानी,समीक्षा लेखन में सिध्दहस्त शास्त्रीय संगीत, नृत्य एवं ललित कलाओं पर भी बड़े सिद्दत से लिखना, डाँ. बलदेव के आभ्यांतरिक क्षमता से परिचय कराता है। भाषा साहित्य को समर्पित ऐसे व्यकितत्व कम देखने में आते हैं। बहुताथ साहित्यकार अपनी प्रतिभा का प्रकाशन एवं प्रदर्शन में व्यस्त देखे जाते हैं, वहीं बलदेव जी भूले बिसरे साहित्यकारों को प्रकाश में लाने का गुरूतर कार्य करते दिखाई देते हैं। एक ऐसा साहित्यकार जिसका संबंध हिंदी के बड़े से बड़े साहित्य मनीषियों से लेकर अधुनातन साहित्यकारों से समादरित भाव हो इतना सौम्य एंव सहज हो, देखकर सुखद आश्चर्य होता है। आज साहित्य एवं साहित्यकार गुटीय भावनाओं से ग्रस्त दिखाई पड़ते हैं, वहीं बलदेव जी भूत और वर्तमान के साहित्यकारों को अभ्यांतरित क्षितिज से प्रकाशित जगत की ओर लाने संकल्प लिए दिखाई देते हैं। डाँ. बलदेव शासकीय सेवा में स्थानांतरित होकर जब रायगढ़ आये उनका संबंध साहित्य स...

मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि:-डाँ. बलदेव

मुकुटधर पाण्डेय के काव्य की पृष्ठभूमि *****************************डाँ०बलदेव      पंडित मुकुटधर पाण्डेय संक्रमण काल के सबसे अधिक सामथ्यर्वान कवि हैं। वे व्दिवेदी-युग और छायावाद के बीच की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जिनकी काव्य यात्रा को समझे बिना खड़ी बोली काव्य के दूसरे-तीसरे दशक तक के विकास को सही रूप से नहीं समझा जा सकता। उन्होंने व्दिवेदीयुग के शुष्क उद्यान में नूतन सुर भरा तथा नव बसन्त की अगवानी कर के युग-प्रवर्तन का ऐतिहासिक कार्य किया।       मुकुटधर पाण्डेय जी जीवन की समग्रता के कवि हैं। उनके काव्य में प्रसन्न और उदास दोनों पक्ष के  छायाचित्र हैं। प्रकृति के सौन्दर्य में अलौकिक सत्ता का आभास मिलता है, उसके प्रति कौतूहल उनमें हर कहीं विद्ममान है। यदि एक ओर उनके काव्य में अंतस्सौंदय की तीव्र एवं सूक्ष्मतम अनुभूति, समर्पण और एकान्त साधना की प्रगीतात्मक अभिव्यन्जना है, तो दूसरी ओर व्दिवेदीयुगीन प्रासादिकता और लोकहित का आर्दश। महाकवि निराला ने इन्हीं विशेषताओं के कारण उन्हें मार्जित कवि कहा है। उनके शब्दों में इस जमाने और सनेही जी के जमाने के संधि - स्थल ...

आलोचना में विनम्र उपस्थित के साथ डाँ. बलदेव :-लेखक:-विनोद साव

स्मरण : आलोचना में विनम्र उपस्थिति के साथ डा.बलदेव -    विनोद साव यह वर्ष १९९३ के आसपास की बात होगी जब रायगढ़ में व्यंग्यकार कस्तूरी दिनेश ने अपने व्यंग्य-संग्रह ‘फ़ोकट का चन्दन लगा मेरे नंदन’ का विमोचन करवाया था और हम सब व्यंग्यकारों को आमंत्रित किया था. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कस्तूरी दिनेश के मित्र प्रसिद्द पत्रकार एवं लेखक ललित सुरजन थे. व्यंग्यकार लतीफ़ घोंघी, त्रिभुवन पांडेय और प्रभाकर चौबे थे. वहां कवि आनंदी सहाय शुक्ल जी को पहली बार देखा और सुना था तब अपनी प्रसिद्द कविता ‘बारहमासी’ का उन्होंने वहां पाठ किया था. उसके बाद उनका सम्मान हुआ. विमोचन कार्यक्रम संपन्न हुआ और हम सब रचनाकारों ने अपनी व्यंग्य रचनाओं का पाठ किया. रात में भोजन करने के बाद सारे अतिथि अपने अपने साधनों से लौट गए थे पर मैं और विनोद शंकर शुक्ल रुक गए थे दूसरे दिन की ट्रेन पकड़ने के लिए. हम सुबह रायगढ़ स्टेशन पहुंचे सामने जे.डी पैसेंजर खड़ी थी उसमें बैठ गए इस विश्वास के साथ कि हमें बिलासपुर में छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस मिल जाएगी रायपुर और दुर्ग जाने के लिए. ट्रेन में बैठे तो समय काटने के लिए कल संपन्न हुए कार्यक्रम...

एक शख्सियत:डाँ. बलदेव:-लेखक:- गणेश कछवाहा

एक शख्सियत - डॉ बलदेव  27 मई 2020  "78 वीं जयंती पर विशेष--" *मूर्ति , पूरे सम्मान के साथ स्थापित किया जाय * ------------------- गणेश कछवाहा ,रायगढ़ **यह आदमी जब  जलती अंगीठी लेकर उठ खड़ा होगा तब इन आलीशान मकानों का क्या होगा? -------------------------------------------------------------+ तत्कालीन मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल के एक समृद्ध गांव नरियरा के सामान्य  परिवार साव कुल में एक दीपक का जन्म हुआ वह बहुत प्रकाशमय विशेष दिन था  27 मई 1942 बालक का नामकरण रखा गया बलदेव। नरियरा के पुराने बूढ़े   पीपल और वट के वृक्षों के शीतल वायु के झोंकों से जहां पूरा वातावरण शीतल व पुष्पों के सुगंध से मन मोहक मदमस्त  तथा वनपंखियों के मधु कलरव से मधुगुंजित होता रहा होगा।  वहीं मंदिर की घंटियां व मुहल्ले की महिलाओं ने सोहर गाकर नवजात शिशु को आशीर्वाद दिया होगा।  यही संस्कार ग्रामीण संस्कृति, परिवेश, माटी प्रेम  नन्हें बालक बलदेव के मन में अंकुरित हो गए । डॉ बलदेव बहुत सहज  व सरल थे पर राष्ट्रीय साहित्य परिदृश्य में काफी सम्माननीय व्यक्ति थे । उनस...

छत्तीसगढ़ के जस गवैया, डॉ. बलदेव भइया:-परदेशीराम वर्मा

छत्तीसगढ़ के जस गवैया, डॉ. बलदेव भइया ------------------------------------------------------- परदेशीराम वर्मा सुरता म डॉ. बलदेव ह लिखे हे - रमायन अउ महाभारत म जउन महाकान्तार अउ दंडकारन्य के बरनन हे वोहा हमर इही छत्तीसगढ़ भू-भाग के आय। कोसली नाव के गांव म भगवान राम के महतारी कौसल्या के जनम होय रिहिस, ये बात के संकेत रमायन, महाभारत, कौटिल्य के अर्थसास्त नीति अउ पानिनी बियाकरन म मिलथे। 17वीं सदी म ये भू-भाग के नाव छत्तीसगढ़ होही । 'छत्तीसगढ़़ी इहां के मनखे के मातृभासाएंÓ, सोध के बिसेस काम करइया बलदेवजी ह एकठन बड़का किताब दे के गेे हे। छत्तीसगढ़़ी कविता के सौ साल ये किताब म छत्तीसगढ़ के जम्मो पो_कविमन के रचना हे। जउन ह सोध करइयामन ल रद्दा देखावत रहिथे। छ त्तीसगढ़ के राजगीत लिखइया डॉ. नरेन्द्र देव वरमा ह 'अरपा पइरी के धारÓ गीत म महानदी, इन्द्रावती नदिया के महिमा गाए हे । सरगुजा, रइपुर, नांदगांव, दुरूग ल छत्तीसगढ़़ वंदना म सुरता करके रयगढ़ हावय सुग्घर तोर मऊर मुकुट लिखे हे। रयगढ़ ह साहित्यकारमन के पावन नगरी ए। इहें बड़े साहित्यकार डॉ. बलदेव ह साधना करिस। कविता अउ आलोचना के छेत्र म डॉ...

साहित्य के सहृदय, निष्पक्ष समीक्षक:डाँ. बलदेव साव :-लेखक रामेश्वर वैष्णव

संस्मरण ----------- साहित्य के सहृदय, निष्पक्ष समीक्षक; डाँ. बलदेव साव -------------------------------------------------------------- (रामेश्वर वैष्णव) डाँ. बलदेव साव एक मुकम्मल साहित्यकार थे। साहित्य की शायद ही कोई विधा छूटी हो जिस पर डाँ. साव जी की कलम न चली हो। नई कविता के तो वे श्रेष्ठ हस्ताक्षर थे ही, मगर भारतीय साहित्य जगत में छायावाद के प्रवर्तक के नाम पर प्रायोजित विवाद शुरू हुआ तो डाँ. साव ने पं. मुकुटधर पाण्डेय जी को स्थापित करने के लिए सप्रमाण, तर्क एवं समीक्षा शास्त्र के अनुरूप लेखन का एक अभियान छेड़ दिया तभी उनकी छवि समीक्षक के रूप में स्थापित हो गई।इतना ही नहीं "शारदा प्रकाशन"के नाम से पाण्डेय जी की रचनाओं व अपनी समीक्षा का प्रकाशन कर पूरे भारत में प्रचारित करने का गंभीर दायित्व भी निभाया। संभवतः पं. मुकुटधर पाण्डेय जी रचित "छत्तीसगढ़ी मेघदूत" के प्रकाशनोपंरात उनकी दृष्टि छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत की ओर गई। छत्तीसगढ़ी साहित्य का वह तुतलाता युग था। जिसमें तमाम अभिव्यक्तियां प्रयास के स्तर पर ही थी। लेकिन छत्तीसगढ़ी साहित्य का दु्र्भाग्य रहा है कि उन्हीं दि...

पुनर्पाठ:डाँ. बलदेव:सृजन और सरोकार :-लेखक-रजत कृष्ण

पुनर्पाठ डाँ. बलदेव:सृजन और सरोकार -------------------------------------- रजत कृष्ण छत्तीसगढ़ के अपनी लेखनी से पूर्वी हिंदी की छत्तीसगढ़ी भाषा और खड़ी बोली में समान रूप से लेखन सृजन करने वालों में महत्वपूर्ण नाम है डाँ. बलदेव आज की नई पीढ़ी के लिए डाँ. बलदेव भले ही कोई चमकता हुआ नाम न हो लेकिन छत्तीसगढ़ के जिन मसीजिवियो ने हिंदी जगत को अपनी लेखनी के ताप और जीवन संघर्ष के उदात्त रुप से प्रभावित किया है उनमें यह एक बड़ा नाम हैं। इधर पिछले कुछ दिनों से उनकी हिंदी और छत्तीसगढ़ी कविताओं के पठन का सुअवसर मिला और जो डूबा तो डूबता ही चला गया।       "सूर्य किरण की छाँव में","वृक्ष में तब्दील हो गई औरत"' एवं "खिलना भूलकर"संग्रहों की कविताएं पढ़ते हुए जिस कवि से हमारी मुलाकात होती है वह एक ऐसा संवादी और जन सरोकार वाला कवि है जिसने जीवन संघर्ष और समाजिक सरोकार को ही अपनी कविता के केंद्र में रखा ।जिन दिनों बलदेव साव लेखनी क्षेत्र में आए वह हिंदी काव्य जगत में नई काव्य चेतना और नव्य सामाजिक सांस्कृतिक सरोकार के मूर्त होने का दौर था।उन्नीस सौ साठ-सत्तर  का वह दशक आजादी...