रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर:डाँ. बलदेव(शभूलाल शर्मा"बसन्त")
*रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर .. - डॉ. बलदेव*
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कृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साथ मेरा पाँच दशक से अधिक समय तक घनिष्ठ एवं घरेलू संबंध रहा है । वे जीवन पर्यन्त नवोदित रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देते रहे। गीत , कहानी , निबंध , आलेख , आलोचनात्मक लेख आदि साहित्य के हर विधा को निरंतर पोषण दिया। जिनकी प्रतिभा ने नवोदित रचनाकारों को खूब प्रभावित किया । ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी बलदेव भैया आज स्मृतिशेष हैं ।
उनके हिन्दी व छत्तीसगढ़ी साहित्य में शिल्प सौन्दर्य का एक सहज रूप ---- दृष्टिगोचर होते हैं , इसमें बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग सुन्दर बन पड़ा है । भाषा सरल है , पढ़ते ही आत्मसात हो जाते हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ आज साहित्य जगत के राष्ट्रीय फलक पर जगमगा रहे हैं ।
भैया जी के इस साहित्यिक यात्रा में आदरणीया भाभीश्री जी ने उनको सदैव प्रोत्साहित किया । वे हमेशा उनकी ख्याल रखतीं थीं । भैया जैसे जीवन साथी पाकर अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानतीं हैं । बलदेव भैया जी भी यही कहते थे कि , "आज मैं साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ भी हूँ , तुम्हारी भाभीश्री जी की बदौलत है" । वे हमेशा यह भी कहते थे कि ----- "मैं भाग्यशाली हूँ , जो मुझे ऐसी धर्मपत्नी मिली है " । भैया के लेखन एवं सम्मान होने पर भाभीश्री को बड़ी संतुष्टि मिलती , ताकि उनकी लेखनी की गति निरंतर चलती रहे। दाम्पत्य जीवन के कठिन से कठिन मार्ग में भी दोनों ने एक - दूसरे का साथ नहीं छोड़ा । कहीं भी जाना होता था , दोनों साथ - साथ आना - जाना करते थे तथा भैया जी के हर आवश्यता का भाभीश्री ध्यान रखतीं थीं ।
स्मृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साहित्यकारों की एक मित्र मंडली थी , ----- जिसमें जीवन सिंह ठाकुर , स्मृतिशेष रामलाल निषाद , जय प्रकाश 'मानस' , संतोष रंजन शुक्ल और खुद मैं शामिल था । हम लोग सप्ताह में एक बार रविवार को एक जगह बैठते थे । खासकर मेरे घर में उन सभी का जमवाड़ा होता था तथा साहित्यिक चर्चायें होती थी । उसमें आसपास के कुछ नवोदित रचनाकार एवं दो - तीन प्रबुद्ध वर्ग के लोग होते थे । जिसमें --- डॉ . प्रमोद सोनवानी 'पुष्प' , श्री चन्द्रमणी ठेठवार एवं स्व. सदानंद नाग गुरु जी निश्चित रूप से शामिल होते थे । मैंने एक बात जो देखी-- उसमें बलदेव भैया का प्रकृति के साथ गहरा लगाव था , वन - पर्वत , नदी - नाले , पशु - पक्षी के साथ गाँव की सादगी उनके ह्रदय में विद्यमान थे । जो पाठक को आकृष्ट करते हैं । क्योंकि , गाँव का निराला जीवन प्रकृति के गोद में ही पलता है । उनकी लेखनी की एक ख़ास विशेषता है - सरल भाषा , सरसता , कल्पना की ऊँची उड़ान के द्वारा पाठकों के मन में जिज्ञासा भर देते हैं । हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी के सभी विधाओं में भैया जी ने अपनी लेखनी चलाई है । भैया जी के कलम की बात का तो कहना ही क्या ।
गाँव एवं प्रकृति से जुड़े उनके कुछ शब्द चित्र देखिये .....
छुही लिपाय रगबग बिथिहा ,
गोबर लिपाय अंगना ।
पइरी पहिरे नोनी के देखा ,
ठुमुक - ठुमुक के रेंगना ।।
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चंवर ढाल ले बोहिस केलो
पिघलत चांदी के झरना ।
पथरा - पहार एको नइ हे जै
जइसे कोटरी - हिरना ।।
इस तरह भैया जी की लेखनी में अजब की जादू और उसकी बात ही अलग है ।
अंत में स्मृतिशेष डॉ . बलदेव भैया जी के साथ बिताये गये स्वर्णिम पल को कदापि नहीं भुलाया जा सकता । भैया जी मेरे ही नहीं , ना जाने कितने साहित्यकारों की हृदय में निवास करते हैं । मेरी दृष्टि उनके कनिष्ठ पुत्र चि. वसंत राघव पर टिकी रहेगी । जो कि - भैया जी के साहित्यिक अवदानों को अनवरत जारी रखने का व्रत लिया है ।
अंत में स्मृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी को मेरा शत् शत् नमन ।।
- शंभूलाल शर्मा 'वसंत'
शिवकुटीर करमागढ़-रायगढ़
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