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विशेष लेख

(छः अक्टूबर डाँ. बलदेव जी की जयंती पर विशेष) अनन्य अनुसंधिस्तु डा. बलदेव ************************ डॉ बलदेव को पहली बार मैंने तब देखा था जब मैं बमुश्किल 9-10 वर्ष का था। वे मेरे पिता और हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. ईश्वर शरण पाण्डेय के पास अपनी पीएचडी थीसिस की पांडुलिपि लेकर आए थे। उन्होंने पिताजी से आग्रह किया कि वे इसे पढ़कर अपने बहुमूल्य सुझाव दें ताकि यह शोध अधिक प्रामाणिक, परिवर्धित,परिष्कृत और परिमार्जित बन सके। प्रो ईश्वर शरण जी के साथ उनकी अनेक बैठकें हुईं। कई अध्यायों पर चर्चा हुई। अनेक संशोधन किए गए। तब जाकर दोनों शोध की उत्कृष्टता एवं गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त हुए। मैं बहुत जिज्ञासा से दोनों के वार्तालाप को सुना करता था। अब भी  मैं अपने पूज्य पिता को डॉ बलदेव का प्रशंसात्मक उल्लेख करते सुनता हूँ। वे प्रायः कहते हैं - उन जैसे शोधकर्त्ता अब कहाँ? कैसी अद्भुत लगन! कैसा गहन समर्पण!! डॉ बलदेव के अंदर का शोधकर्त्ता, जिज्ञासु, सत्यान्वेषी आजीवन सक्रिय रहा। उन्होंने छत्तीसगढ़ में निवास करने वाली कितनी ही अल्प चर्चित और अचर्चित विभूतियों पर गहन एवं प्रामाणिक शोध कार्य किया जिसके का...