विशेष लेख
(छः अक्टूबर डाँ. बलदेव जी की जयंती पर विशेष)
अनन्य अनुसंधिस्तु डा. बलदेव
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डॉ बलदेव को पहली बार मैंने तब देखा था जब मैं बमुश्किल 9-10 वर्ष का था। वे मेरे पिता और हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. ईश्वर शरण पाण्डेय के पास अपनी पीएचडी थीसिस की पांडुलिपि लेकर आए थे। उन्होंने पिताजी से आग्रह किया कि वे इसे पढ़कर अपने बहुमूल्य सुझाव दें ताकि यह शोध अधिक प्रामाणिक, परिवर्धित,परिष्कृत और परिमार्जित बन सके। प्रो ईश्वर शरण जी के साथ उनकी अनेक बैठकें हुईं। कई अध्यायों पर चर्चा हुई। अनेक संशोधन किए गए। तब जाकर दोनों शोध की उत्कृष्टता एवं गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त हुए। मैं बहुत जिज्ञासा से दोनों के वार्तालाप को सुना करता था। अब भी मैं अपने पूज्य पिता को डॉ बलदेव का प्रशंसात्मक उल्लेख करते सुनता हूँ। वे प्रायः कहते हैं - उन जैसे शोधकर्त्ता अब कहाँ? कैसी अद्भुत लगन! कैसा गहन समर्पण!!
डॉ बलदेव के अंदर का शोधकर्त्ता, जिज्ञासु, सत्यान्वेषी आजीवन सक्रिय रहा। उन्होंने छत्तीसगढ़ में निवास करने वाली कितनी ही अल्प चर्चित और अचर्चित विभूतियों पर गहन एवं प्रामाणिक शोध कार्य किया जिसके कारण इन विभूतियों को वह मान-सम्मान एवं गौरव प्राप्त हुआ जो उन्हें बहुत पहले मिल जाना था।
डॉ बलदेव एक समर्थ कवि थे। उनकी कविताओं के विम्ब छत्तीसगढ़ की प्रकृति और संस्कृति से प्रेरित होने के कारण अपरिचित और दुरूह नहीं लगते किंतु उनकी कविताएं क्षेत्र की सीमाओं में आबद्ध नहीं होतीं, उनमें मानवीय करुणा का अजस्र स्रोत निरंतर प्रवाहित होता रहता है।
कहा जाता है कि गद्य कवियों की कसौटी होता है। डॉ बलदेव का गद्य साहित्य कभी कभी उनके पद्य साहित्य से अधिक विपुल - अधिक विलक्षण लगता है। जब वे साहित्य, संगीत और छत्तीसगढ़ के इतिहास पर कलम चलाते हैं तब उनके लेखन में वस्तुनिष्ठता एवं वर्णनात्मकता दोनों का अद्भुत समन्वय, संतुलन एवं संयोजन देखने में आता है। उनके वैचारिक निबंध जटिल भावों को सरलता से अभिव्यक्त करने के कारण पाठक को कभी भी दुरूह या जटिल नहीं लगते।
डॉ बलदेव हिंदी आलोचना में एक प्रतिष्ठित नाम हैं। अनेक ख्यातनाम कवियों की चर्चित कविताओं का पुनर्पाठ करने वाले उनके आलेखों की मौलिकता चमत्कृत करने वाली है। पाठक बहुत संकोच से इन आलेखों को पढ़ना प्रारंभ करता है। उसके मन में यह धारणा होती है कि इतने बड़े कवि की इतनी प्रसिद्ध कविता पर भला क्या नया लिखा जा सकता है। किंतु जल्द ही डॉ बलदेव उसे गलत सिद्ध कर देते हैं और वह उनकी विद्वत्ता एवं मौलिक अंतर्दृष्टि के आगे नतमस्तक हो जाता है।
बतौर आलोचक डॉ बलदेव आम साहित्यकारों के लिए सहज उपलब्ध थे। आलोचना के क्षेत्र में इतनी प्रतिष्ठा अर्जित करने के बावजूद उन्होंने सप्रयास स्वयं को आलोचकों के अभिजन वर्ग से दूर रखा। कोई भी नवोदित साहित्यकार अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक के साथ उनका द्वार खटखटा सकता था और उसे चाय नाश्ते के साथ डॉ बलदेव का स्नेह भरा आश्वासन मिल जाता था - पुस्तक छोड़ जाओ, मैं समय देखकर पढूंगा और अवश्य इसकी समीक्षा करूंगा।
मैं डॉ बलदेव को साहित्य सृजन के सजग प्रशिक्षक की भांति देखता हूँ। प्रायः अच्छे कवि और कथाकार उत्कृष्ट आलोचक नहीं होते और बेहतरीन आलोचक जब मौलिक सृजन करने का प्रयास करते हैं तो उनकी कविताएं और कहानियां अंतः प्रेरणा के अभाव से जूझती दिखती हैं। डॉ बलदेव में मौलिक सृजन की जितनी क्षमता थी वैसी ही विद्वत्ता वे बतौर आलोचक प्रदर्शित करते थे। यही कारण है कि वे नवोदित साहित्यकारों के लिए आदर्श गुरु सिद्ध होते थे। यदि उन साहित्यकारों की सूची बनाई जाए जिन्हें डॉ बलदेव ने साहित्य का ककहरा सिखाया तो इसमें शताधिक नाम तो शायद मैं स्वयं जोड़ सकता हूँ।
साहित्य जगत के अनेक बड़े नामों ने डॉ बलदेव के मौलिक शोध पर अनुचित रूप से अपने नाम का ठप्पा लगाया। डॉ बलदेव की पुस्तकों से कई अंश यथावत चुराकर बहुत से लोग बड़े लेखक बन गए। किंतु डॉ बलदेव के मन में कोई कटुता नहीं थी। उन्होंने सबको क्षमा कर दिया था। उनकी विशाल हृदयता देख मैं चकित रह जाता था।
डॉ बलदेव ने अपनी मातृभूमि एवं अपने साहित्यिक पूर्वजों की गौरव स्थापना के लिए अतुलनीय कार्य किया। छायावाद के प्रवर्तक पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय को जब हिंदी साहित्य के इतिहास से विलोपित करने के प्रयास हो रहे थे तब डॉ बलदेव ने अपने सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद उनकी दुर्लभ कृतियों को पुनर्प्रकाशित किया और इन पर विद्वत्तापूर्ण टिप्पणियां भी लिखीं। उन्होंने मुकुटधर जी के अप्रकाशित पत्रों एवं तत्कालीन पत्र पत्रिकाओं को संरक्षित भी किया। आज पूरे देश में और खासकर छत्तीसगढ़ में मुकुटधर जी पर अनेक शोध कार्य हो रहे हैं और हर शोधकर्ता को मुकुटधर विषयक डॉ बलदेव के प्रामाणिक प्रकाशनों और लेखों से बड़ी सहायता मिलती है।
रायगढ़ रियासत की संगीत परंपरा और कथक के रायगढ़ घराने पर डॉ बलदेव का लेखन प्रामाणिक माना जाता है एवं स्रोत सामग्री के रूप में प्रयुक्त होता है। उनकी पुस्तक "रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव" रायगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास की मानक और संग्रहणीय जानकारी देती है।
डॉ बलदेव ने मातृ भाषा छत्तीसगढ़ी को समृद्ध बनाने के लिए कठिन परिश्रम किया। उन्होंने प्रत्येक विधा में सृजन कर छत्तीसगढ़ी साहित्य के भंडार में वृद्धि की। उन्होंने छत्तीसगढ़ी आलोचना को नए आयाम दिए। उन्होंने अनुवाद के माध्यम से भी छत्तीसगढ़ी के पाठकों को इतर भाषाओं की बेहतरीन रचनाओं से परिचित कराया।
यह 2000-2001 की बात है। प्रो. ईश्वर शरण ने सन 1926 में स्व बंशीधर पाण्डेय रचित छत्तीसगढ़ी के प्रथम उपन्यास "हीरू के कहिनी" के गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प लिया और इसके लिए एक वृहद अभियान प्रारंभ किया। मैं इसमें उनका सहायक था। हम पूरे छत्तीसगढ़ में घूमे। छत्तीसगढ़ी साहित्य के हर विद्वान से हमने चर्चा की। सभी विद्वानों ने एकमत से "हीरू के कहिनी" को छत्तीसगढ़ी का प्रथम उपन्यास माना और इसके विभिन्न पक्षों पर आलेख लिखे। हमने इन आलेखों एवं उपन्यास "हीरू के कहिनी" का पुनर्प्रकाशन किया। पुनर्प्रकाशित उपन्यास का विमोचन छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्व श्री अजीत जोगी जी द्वारा किया गया। इसके बाद रायगढ़ स्थित मारवाड़ी पंचायती धर्मशाला में एक ऐतिहासिक द्विदिवसीय संगोष्ठी हुई। छत्तीसगढ़ में किसी पारिवारिक आयोजन में साहित्यकारों का ऐसा जमावड़ा पहले कभी नहीं देखा गया था। इसी संगोष्ठी में मैं मंच संचालन कर रहा था। डॉ बलदेव एक अभिभावक की भांति मेरी सहायता कर रहे थे। हर साहित्यकार के विषय में वे मुझे संक्षेप में बताते जाते थे। तबसे हम और निकट आ गए। बाद में 2005 के आसपास प्रो ईश्वर शरण एवं श्री विनोद कुमार पाण्डेय छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित की जा रही "लोचन प्रसाद पाण्डेय चयनिका" के अनुसंधान से जुड़े। तब मुझे सहित्यवाचस्पति एवं पुरातत्वविद पंडित लोचन प्रसाद के संपूर्ण वाङ्गमय का अवगाहन करने का अवसर मिला। आदरणीय विनोद भाई ने लोचन प्रसाद जी का सम्पूर्ण साहित्य मुझे सौंप दिया। मैंने इस पुस्तक में पाठपूर्व एवं पाठोपरांत विस्तृत टिप्पणियां लिखीं। सौभाग्य से साहित्य मर्मज्ञों को ये बड़ी पसंद आईं और इनकी बड़ी प्रशंसा हुई। डॉ बलदेव ने भी मेरी बहुत हौसलाअफजाई की।
इन दोनों अवसरों के बाद डॉ बलदेव मुझे निरंतर प्रेरित करते रहे। जब भी हमारी भेंट होती वे अपने संग्रह की दुर्लभ पांडुलिपियों की चर्चा करते। मुझे अपने निवास पर आने को कहते। उनकी इच्छा थी कि उनकी अधूरी शोध परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मैं उनकी सहायता करूं। उनका स्नेह और मुझ पर अगाध विश्वास देखकर मैं अभिभूत हो जाता। अनेक बार लगता उन्होंने मुझे अपने मानस पुत्र का दर्जा दे दिया है। किंतु नौकरी और परिवार के उत्तरदायित्वों के कारण मैं लेखन से कट सा गया था।
बाद में परिस्थितियां बदलीं। मेरा स्वास्थ्य बिगड़ गया। निश्चय किया कि शासकीय सेवा त्याग कर पूरा समय लेखन को दूंगा। आज मैं एक पूर्णकालिक लेखक हूँ। किंतु डॉ बलदेव मेरे साथ नहीं हैं। उनके साथ काम करने का दुर्लभ अवसर मैंने गंवा दिया।
डॉ बलदेव के सुपुत्र श्री बसंत राघव निरंतर उनके साहित्य के डिजिटलीकरण में लगे हैं।उनके द्वारा डॉ बलदेव के दुर्लभ लेख सोशल मीडिया के माध्यम से हजारों शोधकर्ताओं तक पहुंच रहे हैं। श्री बसंत राघव स्वयं एक श्रेष्ठ कवि एवं लेखक हैं। उनसे यह आशा है कि वे डॉ बलदेव की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।
जिन सैकड़ों युवा साहित्यकारों को डॉ बलदेव ने प्रशिक्षित किया था उनसे भी यह अपेक्षा है कि वे डॉ बलदेव की विरासत को संरक्षित-संवर्धित करेंगे।
डॉ बलदेव का विपुल साहित्य इधर उधर बिखरा पड़ा है यदि यह एक स्थान पर उपलब्ध हो तो शोधार्थियों को बड़ी सुविधा होगी। हम सभी साहित्यकारों को छत्तीसगढ़ शासन से यह अनुरोध करना चाहिए कि "डॉ बलदेव समग्र" का प्रकाशन शीघ्रातिशीघ्र हो।
जब भी डॉ बलदेव की पुण्यतिथि आती है, उनके अवदान का स्मरण कर अचंभित रह जाता हूँ, उनके स्नेह एवं आत्मीयता की स्मृति नयनों को सजल कर जाती है। वे स्वयं में एक संस्था थे। उनका न रहना एक विराट शून्य छोड़ गया है।
डॉ राजू पाण्डेय
रायगढ़, छत्तीसगढ़
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