(कहानी) पंख वाले क्षण:-बसन्त राघव
(कहानी) पंख वाले क्षण ----------------- बसन्त राघव एक बार फिर मैं उपेक्षित हुआ था जब प्रसंग वश उसके अभिनय- कला की तारीफ की- तब वह बिलकुल चुप थी। निर्लिप्त - निर्विकार ,जैसे महान योगिनी हो। मैंने हठात् उसकी तरफ देखा था। संस्कृत के प्रोफेसर मि. सिन्हा ने शायद मेरी मनोदशा भांप ली थी। उन्होंने चर्चा का तारतम्य मिलाते हुए कहा - " हाँ , आपने बिलकुल ठीक कहा। उर्वशी की भूमिका में इन्होंने दर्शकों का मन मोह लिया था। बहुत प्राणवान था इनका अभिनय। नृत्य भंगिमाओं और मुद्राओं के माध्यम से इन्होंने जिन गहन अनुभावों की व्यंजना की वह श्लाघनीय है!...." इस दीर्घ एवं निर्ब्याज स्तुति से उसके अधरों में सलज्ज मुस्कान पिघलने लगी थी। उसका मुख सुर्ख हो गया था। परन्तु वह पूर्ववत सिर झुकाए हुए बैठी थी। मुझे रश्क हुआ। बगल में बैठे शंशाक शेखर तिवारी ने कोहनी से मुझे धकियाया। अधेड़ प्रोफेसर का व्याख्यान कालीदास के मेघदूत से हटकर उस घमण्डी लड़की पर केन्द्रित हो गया था। मिस संध्या गुप्ता, दुर्गा कला एवं विज्ञान महाविद्यालय...