(कहानी) पंख वाले क्षण:-बसन्त राघव

 

(कहानी)
पंख वाले क्षण
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बसन्त राघव

एक बार फिर मैं उपेक्षित हुआ था  जब प्रसंग वश उसके अभिनय- कला की तारीफ की- तब वह बिलकुल चुप थी। निर्लिप्त - निर्विकार ,जैसे महान योगिनी हो। मैंने हठात् उसकी तरफ देखा था। संस्कृत के प्रोफेसर मि. सिन्हा ने शायद मेरी मनोदशा भांप ली थी। उन्होंने चर्चा का तारतम्य मिलाते हुए कहा - " हाँ , आपने बिलकुल ठीक कहा। उर्वशी की भूमिका में इन्होंने दर्शकों का मन मोह लिया था। बहुत प्राणवान था इनका अभिनय। नृत्य भंगिमाओं और मुद्राओं के माध्यम से इन्होंने जिन गहन अनुभावों की व्यंजना की वह श्लाघनीय है!...."

        इस दीर्घ एवं निर्ब्याज स्तुति से उसके अधरों में सलज्ज मुस्कान पिघलने लगी थी। उसका मुख सुर्ख हो गया था। परन्तु वह पूर्ववत सिर झुकाए हुए बैठी थी। मुझे रश्क हुआ। बगल में बैठे शंशाक शेखर तिवारी ने कोहनी से मुझे धकियाया। अधेड़ प्रोफेसर का व्याख्यान कालीदास के मेघदूत से हटकर उस घमण्डी लड़की पर केन्द्रित हो गया था।

       मिस संध्या गुप्ता, दुर्गा कला एवं विज्ञान महाविद्यालय के प्राचार्य गोपालचंद्र गुप्ता की  बड़ी बेटी।

     संस्कृत के प्रोफेसर उर्वशी का प्रसंग लेकर चले गए थे। पन्द्रह मिनट का अवकाश था। मिस गुप्ता और मिस ठाकुर गर्ल्स कामनरुम की ओर चली गई थी। शंशाक तिवारी ने एक ठहाका लगाया और कहा - " यार, तू अब भी पीछे पड़ा है, वो दिन गए जब वह 15 साल की बच्ची थी अब वह काफी समझदार हो गई है.... मक्खन लगाने से अब काम नहीं चलेगा मेरे यार....वह समझ गई है, हमारा तबका क्या है।"

         "ऐसी की तैसी उसकी" मैंने आवेश में डेस्क के ऊपर हाथ दे मारा और उठ खड़ा हुआ।

         " अरे बैठ यार, कहां जाता है। ले चचा के हाथों का गरमा गरम चाय पी, तबियत खुश हो जाएगी..... शंशाक ने कहा।

        थर्ड पिरियड शुरू हो गया था। प्रो. हन्नू विद्यापति के बारे में धड़ाधड़ बोल रहे थे, जो मेरे लिए निरर्थक  नाद प्रवाह था। मेरा मन उचट गया था, लाख कोशिश की कि व्याख्यान पर ध्यान दूं परंतु बेकार। कुछ घुमड़ने लगा था भीतर। तेज बहाव में किनारे की मिट्टी जिस प्रकार कट कट कर बहती है उसी तरह अतीत के स्मृत्याभास में मेरा वर्तमान बहने लगा।
       एम.ए. पूर्व का साल। हमारे विद्यालयीन प्रतियोगिता में गायकी के लिए संध्या गुप्ता को प्रथम पुरस्कार मिला था। उसकी सफलता ने बहुत उदार बना दिया था मुझे। मन ही मन मैं बहुत खुश था। हमारे बढ़ते हुए तनाव को समाप्त करने का अच्छा अवसर था। मुझे विश्वास था अब तक संध्या का मन साफ हो गया होगा। मैं उसे बधाई देना चाहता था। मैं अवसर ढूंढने लगा। एक दिन वह लाइब्रेरी में मिल गई। मैंने छूटते हुए कहा-
   " कांग्रेचुलेशन, संध्या"
"किस बात के लिए?" उसने बिना निगाह उठाए कहा। मैं निरुपाय उसकी तरफ देखता रहा।और वह व्यस्त भाव से नोट बुक  में कुछ लिखने लगी। हठात् मेरे मुह से निकला - सारी, नहीं पता था कि तुम इतनी मगरूर हो!"वह कुछ नहीं बोली।
"और निष्ठुर भी" मैंने कहा और तिरष्कृत भाव लिए वहाँ से चला आया।
उस घटना के बाद बहुत दिनों तक हमारी बातचीत बंद रही। वैसे वह बहुत कम बोलती थी और मुझे हमेशा लगता जैसे वह सीरियस होने का ढोंग करती है और इस आरोपित गंभीरता के पीछे उसका कल्पित मुखर एवं प्रगल्भ रूप दिखाई दे जाता था। दरअसल वह हम सबके बीच विशिष्ट रहना चाहती थी। वह अत्यधिक आत्मकेंद्रित लड़की थी। उसमें विशेषताएं थीं जो उसके अहंकार को समर्पित थीं। दरअसल जब हम नितांत वैयक्तिक स्तर में जीते हैं तब हमारे चारों ओर 'अंह' की एक अभेद्य खोल तैयार हो जाती है जो हमें भीड़ से अलग कर देती है। हम अन्तर्मुखी हो जाते हैं। हम विशिष्ट होने का भ्रम पाल लेते हैं। जीवन भर। ऐसे ही लोगों में मैं संध्या को शुमार करता हूँ।
कुल मिलाकर उसका व्यक्तित्व बड़ा रहस्यात्मकत लगता था। न जाने क्यों ऐसी कुहरिल लड़कियों के सहचर्य का लोभ मैं कभी संवरण नहीं कर पाया। संध्या मेरी कमजोरी थी।
नाद प्रवाह जारी था और मेरा मन अतीत की सुरम्य घाटी में उतरता चला गया - नीचे  और नीचे। अचानक
प्रो. हन्नू ने पूछा -"क्यों मि. राघव विद्यापति श्रृंगारिक थे या भक्त?.... मि. राघव , मैं आप ही से पूछ रहा हूँ...."
       " जी मुझसे!,क्या पूछा आपने सर?" मैं बौखला गया था। पूरी क्लास हंस पड़ी थी। मिस गुप्ता ने पलट कर मेरी तरफ देखा । उसकी निगाहों में विजेता की चमक थी।  नाद फिर प्रारंभ.......
       उस हँसी की तेज बहाव में सब बहे जा रहे थे शंशाक शेखर तिवारी, मुरलीधर पटेल, ओंकार, विश्वजीत, मिस ममता, मिस ठाकुर और मिस संध्या गुप्ता आदि केवल मैं ही अकेला खड़ा रहा, अडिग चट्टान की तरह , लहरें मुझसे टकरा टकरा कर लौटने लगी । मेरे कर्णकुहर में कुछ शब्द गूंज रहे थे बार बार!विद्यापति श्रृंगारिक थे.... विद्यापति भक्त थे......विद्यापति......"
       अनायास मेरी दृष्टि मिस गुप्ता के झीने ब्लाउज पर उभरे हुए ब्रेजीयर्स की पट्टी पर ठहर गई....। पट्टी जो अचानक टूट गई... और ....मैं बुदबुदा उठा विद्यापति न श्रृंगारिक थे और न ही भक्त.... सबसे पहले वह इंसान थे प्राकृतिक लक्षणों से युक्त.... और मैंने देखा पूरी क्लास मुझसे मुखातिब थी। प्रो. हन्नू ने मुझे घूरा जैसे कह रहे हों.... दिवा स्वप्न देखना हो तो बाहर जावो।
          पता नहीं क्या हो गया था उस दिन। तमाम वर्जनाओं के बावजूद मैं फिर अतीत के भूलभूलैया में खो गया-
       एम.ए अन्तिम का वह साल। महाविद्यालय के वार्षिकोत्सव में हमें अभिज्ञान शाकुन्तल"का नाटक करना था। विगत वर्ष भी संध्या गुप्ता शकुन्तला की भूमिका बखूबी निभा चुकी थी।उसकी शारिरिक रचना  ही कुछ ऐसी थी कि वह पौराणिक सुन्दरी लगती । बड़ी बड़ी स्वप्निल आँखें- उन्नत वक्ष प्रदेश, नितम्ब तक लम्बे केश और अभिजात्य तो जैसे उसके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग था। दुश्यंत की भूमिका के लिए मेरा चयन फिर एक बार किया गया था। एम .ए पूर्व में मैं दुश्यंत की भूमिका कर आया था।परन्तु इस बार मैंने साफ इंकार कर दिया था। मैं नहीं चाहता था कि किसी विशिष्ट के साथ सहज होने की प्रक्रिया में अपने कलाकार को दुहरी मेहनत करनी पड़े। मूलतः इस इंकार में मेरी प्रतिरोध भावना थी। मैं जानता था मेरे बाद मि. अश्विनी कुमार का नाम लिया जाएगा जिससे वह पिछले साल भुगत चुकी थी। हुआ यह था कि 'स्वप्नवासवदत्तम्' के पांचवें अंक में स्वप्न-दृश्य में अश्विनी कुमार ने उदयन की भूमिका में संध्या गुप्ता को जो वासवदत्ता की भूमिका में थी,आलिंगत कर दाम्पत्य जीवन के निगूढ़ और मधुर भावों को कलात्मक परिणति देने की कोशिश की थी। वह घटना महाविद्यालय के इतिहास में अभूतपूर्व थी। इसीलिए मैंने जानबूझकर अश्विनी कुमार का नाम प्रस्तावित किया था। प्रो. चौबे ने साश्चर्य मुझे देखा। मिस गुप्ता भी मुझे घूरने लगी। प्रो. चौबे ने कहा था- मि. राघव , यह जानते हुए भी कि इस नाटक का निर्देशन मैं कर रहा हूँ.... आप इंकार कर रहे हैं....
    "और सर,  यह कौन होता है 'सजेस्ट' करने वाला"
संध्या गुप्ता ने करीब करीब बिफर कर कहा था।

              हम लोगों का मेकअप पूरा हो चुका था। कन्व का आश्रम की सेटिंग हो रही थी। हम दोनों परदे के पीछे खड़े थे।पर्दा उठने में अभी कुछ समय था।प्रो. चौबे अंदर आए और हमें मार्मिक संवादों के लिए सचेत कर गए। मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा था, उस समय। मेरी केन्द्रीय भावनाओं में परिवर्तन सा हो रहा था। मुझे लगा जैसे विचित्र अनुभूति का एक रेला मेरे अन्तर को घेरने लगा है।एक स्पृहणीय आनंद से मेरा रोम रोम झूमने लगा था। ऐसी ही मनःस्थिति में हम दोनों की निगाह एक दूसरे से मिल गई थी, और हम दोनों ही लजा गए थे।
         वह अंगूठे से मंच की कालीन पर कुछ लिखने लगी थी। वह बहुत सुंदर लग रही थी। सम्पूर्ण देह कसी हुई थी। पिण्डली तक सफेद धोती पहने थी। उसके अंगों की गोलाइयों से सौंदर्य छलक रहा था। उसकी बड़ी बड़ी सीप सी पलकों पर  अभ्रकयुक्त गुलाबी चंदन का प्रलेप किया गया था। काजल की रेखाओं तथा भ्रूविलास के कारण उसकी आखों में अनोखा बांकपन आ गया था। उसके मसृण कपोलों के गड्ढों में लज्जा की लाली भरती जा रही थी। फूलों से पूरा श्रृंगार किया गया था उसका। सचमुच वह तापस बाला लग रही थी। उसके अपरूप सौन्दर्य को देखकर मैं जैसे अभिभूत हो गया था। उसने धीरे से कहा-" क्या देख रहे हो राघव?" और मेरा सम्मोहन जैसे टूट गया था। अजीब थे वे क्षण। जिंदगी और नाटक में फर्क कर पाना मुश्किल था। मैं विस्फारित नयनों से उसे देखता रह गया था। उसने फिर फुसफुसा कर कहा- " राघव मुझे डर लग रहा है.... तुम क्यो देख रहे हो मुझे इस तरह.... राघव...."
         प्रो. चौबे फिर हमारे करीब आए और बोले -" तैयार रहना, पांच मिनट में परदा उठा दिया जाएगा", वह चले गए। मैंने धीरे से कहा-
        " संध्या , तुम जैसे महान कलाकार के साथ मैं जम पाऊंगा कि नहीं।"
          " हाँ, तभी न मेरे साथ काम नहीं करना चाहते थे....."
           प्रो. चौबे अंतिम बार आश्रम के सेट का निरीक्षण करने आए और हमें ओ.के का संकेत देकर चले गए। उन्हें बड़ी त्वरा थी। बेचारे बहुत मेहनत कर रहे थे।
       परदा उठा दिया गया था....

     पीरियड समाप्त होने की घंटी बजी। मैं चौंक गया। प्रो. हन्नू का विद्यापति पर व्याख्यान समाप्त हो गया था। मैं उन्हें पूरा पिरियड छला था।.....
       मुझे याद है उस ड्रामे में हम दोनों में से कोई भी ठीक से जम नहीं पाया। प्रो. चौबे ने ड्रामा के अंत में हमें कुछ न कहकर अपना आक्रोश व्यंजित कर दिया था।
        आज सोचता हूँ- छोटी छोटी बातें और घटनायें जीवन में कितना महत्व रखती हैं।
        समय का पंछी उड़ता चला गया। एमफिल का परीक्षा चल रही थी. इस बीच मैंने उसके प्रति भरसक वितृष्णा होने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुआ, उल्टे उसके प्रति रागात्मक अनुभूति घनीभूत हो गई।
         प्रत्येक पेपर के बाद हम लोग मिलते थे। बात चीत निहायत ही औपचारिक स्तर पर होती।  लक्ष्मी पुल (जिसके पास ही हमारा कालेज था) से एक साथ पैदल चलते फिर वह अपने निवास के लिए स्टेशन चौक स्थित सड़क की तरफ मुड़ जाती और मैं अपने रास्ते बढ़ जाता। इस तरह परीक्षा समाप्त हो गई।  चौथा और अंतिम पेपर देकर हम लौट रहे थे।लगता था उस वक्त हमारी सोच के दायरे एक दूसरे के विपरीत नहीं जा रहे थे, बल्कि एक ही दिशा में चल रहे थे। परंतु अपने में अलग अलग दायरे 'मिक्स अप' नहीं हो पाते थे। मैंने भर्राऐ कंठ से पूछा - " पेपर्स कैसे गए?"
    " सो-सो (ऐसे ही) उसने कहा -" और तुम्हारे ?"
"बस ठीक है" मैंने कहा  फर्स्ट क्लास तो आ ही जाएगा न?" उसने कहा
"अरे कहाँ फर्स्ट क्लास , निकल जाएं,वहीं काफी है।"
" वायवा परसों है जानते हो न?" उसने कहा
" हाँ जानता क्यों नहीं, बैगलोर से मि.अग्रवाल साहब आ रहे हैं शायद।"
" हाँ अग्रवाल साहब, पिता जी के स्टूडेंट रह चुके हैं। फुल मार्क्स मिलेंगे.... राघव , कहो तो तुम्हारे लिए सिफारिश करवा दूं......"
    "नो थैंक्स।" पुल आया, वह मुड़ गई।रास्ते निश्चित थे हमारे।
      और इसी क्रम में वायवा भी निकट आया। मेरे बाद शंशाक की बारी थी, उसके बाद संध्या की। मैंने प्रतीक्षा नहीं की। सीधे घर चला आया। सामान रात को ही पैक कर लिया था।बस किताबों को
ट्रंक में रखना बाकी था। उस वक्त सुबह के ग्यारह बजे थे। लोकल ट्रेन का समय एक बजकर बीस मिनट था। मैंने न्यू अप्सरा'  में  खाना खाया और उसके बाद यात्रा की शेष तैयारी करने लगा।
       न जाने क्यों मन बैठा जा रहा था। रिक्शा में सारा सामान रखा जा चुका था। आखिरी बार मैंने सरसरी निगाह से कमरे का मुआइना किया और बाहर आ गया। बाहर ऐन दरवाजे पर संध्या खड़ी थी। मैं उसे देखकर स्तब्ध रह गया।
       " संध्या तुम ?"
   "हाँ", गला रुद्द था...
" क्यों विश्वास नहीं हो रहा है न?"
"मुझे मांफ कर दो संध्या.... पर तुम कैसे आ गई?
क्या तिवारी ने बताया तुम्हें?" मैं जानता था यह मेरे लिए बहुत कमजोर बचाव था।
  " नहीं मुझे किसी ने नहीं बताया- वायवा के बाद तुम बिना मिले ही चले आए....समझ गई, बहुत नाराज हो.....भला ऐसा भी कोई जाता है.... राघव.."
शब्द उसके कन्ठ में फंसने लगे थे। उसकी आखें आसुओं से उद्भासित हो रही थी।
   समझ नहीं आ रहा था..किन शब्दों से उसे आश्वस्त करुं। रिक्शावाला बार बार हमारी तरफ देख रहा था। एक एक क्षण सरकते जा रहे थे। गाड़ी के आने में सिर्फ बीस मिनट रह गए थे।
      संध्या ने रुमाल से आखें पोंछकर कहा- " जो व्यक्ति इस तरह बिना बताए चला जाय,उससे अगली मुलाकात की आशा करना बिलकुल बेमानी है..."
      वाकई मेरा मन उस समय अपराध बोध से भर गया था। मैंने कहा...." तो क्या मैं इस पश्चाताप के साथ बिदा लूं..... कि मैंने किसी का दिल दुखाया है
संध्या , कह दो कि तुमने मुझे क्षमा कर दिया है- वर्ना यह अहसास हमेशा सालता रहेगा.... संध्या..."
       वह मुझे बेबस देखने लगी। पीड़ा थी आखों में। फिर होठों पर सायास मुस्कुराहट ...आसुओं से भीगी हुई मुस्कुराहट लाकर बोली- " जाने वाले को कोई आज तक रोक पाया है राघव... फिर मैं किस अधिकार के साथ तुम्हें.... खैर छोड़ो....गाड़ी का समय भी तो हो रहा है.... अच्छा विदा...."
       और वह यंत्रवत लौट गई तेज कदमों से। मैं उसे मोड़ तक जाते देखता रहा। वह एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखी। मैं रिक्शे पर जा बैठा।
      मुझे शहर से दूर जाना था- अपना गांव।

बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396

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