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Showing posts from August, 2022

फूल नागफनी का (कहानी) बसन्त राघव

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कहानी:- फूल नागफनी का बसन्त राघव मुझे अपनी बेखुदी पर बड़ी हैरानी होती है । शहर में और भी कई कपड़ों की दुकानें हैं, लेकिन ताज्जुब है मैं यही क्यों चला आया , जबकि मैं यह बिल्कुल नहीं चाहता था। यंत्रवत्.... -  जिस कार ने मुझे इस शानदार दुकान के आगे ला खड़ा किया उसका नाम है क्रेटा cg13hP 00113 सेठ जी ने तपाक से मेरा स्वागत किया। उसकी मुख मुद्रा प्रश्नवाचक की तरह हो गई थी ।मैंने कार, सड़क किनारे लगा दी,और सीना ताने , सीढ़ियां चढ़ने लगता हूँ प्रभावोत्पादक अंदाज में । मैंने सरसरी निगाह से मुआयना किया -  ग्राहकों को सम्मोहित करने वाली सज्जा रंग-बिरंगी साड़ियों का अंबार और कीमती कपड़ों का उपवन पूरी रंगत बदल गई है दुकान की। सब कुछ बदल गया है नौकर बदल गए हैं स्वयं सेठ जी बदल गए हैं और मैं भी तो कितना बदल गया हूं परिवर्तन ही जीवन है । समय सब कुछ बदल कर रख देता है पुराने घाव भर जाते हैं नए घाव उभर आते हैं । "गौंटिया जी तशरीफ रखिये। हमारे अहोभाग्य इतने लंबे अरसे बाद आपने रुख रौशन किया"।  विस्फारित नजरों से देखते हुए सेठ जी ने कहा, फिर अपने एक कर्मचारी की ओर मुखातिब होकर...

एक कटी हुई मनस्थिति (कहानी) बसन्त राघव

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 एक कटी हुई मनस्थिति (कहानी)  ---------------------------      बसन्त राघव भोर से ही धारासार वर्षा होने लगी थी।आठ बजते कुछ थमी। साढ़े सात से क्लास लगती थी। और इस तरह मैं आधा घन्टा लेट हो गया था। मैं धर्मसंकट में पड़ा रहा, कालेज जाऊं कि नहीं।अक्सर ऐसा होता है जिस दिन अधिक बारिश होती उस दिन शहर से तीन किलोमीटर दूरस्थ महाविद्यालय बंद होता।       पहाड़ियों से घिरी हुई कालेज की बिल्डिंग थी। वहां सिर्फ स्नातकोत्तर कक्षाएं ही लगती थी।सिर्फ दो विषय थे अर्थशास्त्र और हिंदी। बहरहाल कुछ सोचकर मैंने कालेज जाने की तैयारी कर ली। रेनकोट डाले और साईकिल बाहर निकाल ली.         कालेज पहुंचते पहुंचते नौ बज गए। कालेज के सामने कुछ लोग फुहार का आनंद लेते हुए दिखाई दे गए। बड़ा सुकून मिला। यद्यपि मुख्य व्दार तक पहुंचने वाला इकलौता मार्ग जलमग्न था इससे मन थोड़ा खिन्न हो गया। ऐसी स्थिति में छात्राओं को विशेष परेशानी यह होती है-कि अगर वे साड़ियों में होती ,तो पिंडली तक साड़ियां उठानी पड़ती है। बगल में कापी किताब दाबनी पड़ती है और ए...

उसके बाद (कहानी) बसन्त राघव

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उसके बाद  (कहानी) -------------- बसन्त राघव श्रीमती सिंह लेटे लेटे कोई पुस्तक पढ़ रही थी लेकिन सच पूछा जाए तो वह सिर्फ  छोटे छोटे अक्षरों की बारीक पगण्डियों में अपनी आखों को मात्र भटका रही थीं । मस्तिष्क का वह केन्द्र जो शब्दों के निहितार्थ को पकड़ता है और उससे संवेदित होता है , कुछ और ही कर रहा था ।     मि . लोकनाथ सिंह भीतर ही भीतर कुढ़ रहे थे और जब कुढ़न पराकाष्ठा पर पहुंच गई तब उन्होंने बती बुझा दी।   "यह क्या मजाक है एल?"  पढ़ने दो डिस्टर्ब न करो ....प्लीज..." श्रीमती सिंह झुंझलाकर बोली।       "रोशनी आंखों में चुभ रही है रमा बाद में पढ़ लेना" मि. सिंह ने अनुनय किया और अपनी पत्नी की बगल में आकर लेट गए। मिसजे सिंह झट करवट बदल ली तब मि. सिंह ने फुसफुसा कर कहा-"यह क्या रमा?इतनी उपेक्षा...." मिसेज सिंह झटके से उठी और अपने पति के पैर दबाने लगी। मि.सिंह ने तुरन्त पैर खींच लिए मानों बिच्छू ने डंक मार दिया हो- "क्या कर रही हो तुम?"    "वही ,जो एक मर्द को अपनी बीबी से अपेक्षा होती है"  मि.सिंह ने फ़िक्र...

संत्रास का देवता (कहानी) बसन्त राघव

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 संत्रास का देवता (कहानी)   --------------------- बसन्त राघव           उस दिन शनिवार था । मास्टर मुस्तफा हुसैन बड़ी मुश्किल से अपनी तनख्वाह लेने आए थे । साथ में एक लड़का था, जिसे सहारा के लिए मास्टर साहब साथ ले आए थे ।        जीवित लाश।  मास्टर साहब को देखकर कोई भी कह सकता था। यही नहीं, रात को अचानक कोई देख ले उन्हें - तो चिल्लाए बिना रह न सकेगाः                प्रेतात्माओं से भी भयावह आकृति । ले- देकर चलने - फिरने और शराब गटकने के अलावा जीवन में कोई और काम न था ।           सच बात तो यह है मास्टर मुस्तफा हुसैन बहुत पहले ही मर चुके थे। वह जो मेरे सामने हांफते हुए बैठे थे, मास्टर मुस्तफा हुसैन चलती - फिरती,रोती - कराहती कब्र ही थी।          सांसों में शराब का तेज भभका। हड्डियों के ढांचे में पिलपिलाया लुन्जपुन्ज शरीर किसी विकट ट्रे...