संत्रास का देवता (कहानी) बसन्त राघव

 संत्रास का देवता (कहानी)

 

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बसन्त राघव

          उस दिन शनिवार था । मास्टर मुस्तफा हुसैन बड़ी मुश्किल से अपनी तनख्वाह लेने आए थे । साथ में एक लड़का था, जिसे सहारा के लिए मास्टर साहब साथ ले आए थे ।
       जीवित लाश।  मास्टर साहब को देखकर कोई भी कह सकता था। यही नहीं, रात को अचानक कोई देख ले उन्हें - तो चिल्लाए बिना रह न सकेगाः
               प्रेतात्माओं से भी भयावह आकृति । ले- देकर चलने - फिरने और शराब गटकने के अलावा जीवन में कोई और काम न था ।
          सच बात तो यह है मास्टर मुस्तफा हुसैन बहुत पहले ही मर चुके थे। वह जो मेरे सामने हांफते हुए बैठे थे, मास्टर मुस्तफा हुसैन चलती - फिरती,रोती - कराहती कब्र ही थी।
         सांसों में शराब का तेज भभका। हड्डियों के ढांचे में पिलपिलाया लुन्जपुन्ज शरीर किसी विकट ट्रेजेडी की प्रतिमूर्ति दिखाई पड़ती। दुर्बल कृश देह के भीतर शिराओं में रक्त नहीं -  शायद सिर्फ शराब बहती थी।
            उस नर कंकाल में रुधिर की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
    ईष्या, अपमान ,घूटन और विद्रोह का दीमक घुन की तरह मास्टर मुस्तफा हुसैन के हरे-भरे स्वस्थ्य को चट कर गया था ।
             उन्होंने जब पांच पांच  सौ रूपयों की दो गड्डी उठाई तब उनके हाथ बेतरह कांप रहे थे और जब वह एकेक  कर नोटों को गिनने लगे तब समूचा मुख विचित्र ढंग से झटका खाने लगा था । निचला होंठ रह-रहकर बाई ओर भींच जाता। पीली निस्तेज और मृत सी आंखें गड्ढे में धंसी अजीब सी हरकत करती सी लगी।
          मैं उस मूर्ति को अधिक देर तक नहीं देख सका
जुगुप्सा , आत्मदया और निरुपायता की मिली-जुली भावना से मन एकाएक भारी हो गया। किसी अकल्पित नर्क की यातनाग्नि  मेरी चेतना से किसी कोमल स्तर को द्रवित करने लगी थी।
           मैंने एक दीर्घ और ठंडा श्वांस लिया और अपने काम में लग जाने की कोशिश की । पर व्यर्थ उस  अजीबो गरीब इंसान की उपस्थिति के एहसास ने मुझे पूर्ण रूप से असहज बना दिया था । मैं ना चाहते हुए भी उन्हीं के बारे में सोचने लगा
       " ये  य्येक  नि....निय....निन्यानबे..... .... सौ ... , ठीईक होयगा...... कौन गिनता रहे इत्ता सारा "
        उन्होंने सहसा शराब की बोतल मुह से लगा लिया, और दो - चार घुंट गटक कर बेफिक्री के अंदाज में सारे अनगिने नोटों को समेट कर जेब के हवाले कर दिया।
         मैंने कहा -"अरे नहीं, मास्साब , पूरे नोट गिन लीजिए। आजकल विश्वास का जमाना नहीं है।"
          मुस्तफा हुसैन की कोटर में धंसी हुई आखें एकाएक चमत्कृत हो गई। वह मुझे विचित्र भाव से घूरने लगे। शायद अनजाने ही किसी दुखती रग पर अंगुली चली गई थी। वह कुछ दबाकर बोले -  " मुझे सब पर बी..इश्वास ऐ साव जी , सिरिफ अपनी बीइबी पर नाइ ऐ......."
          एक कटु मुस्कान उनके मोटे होठों पर नाच गई। मैं चुप रहा। ऐसे, जैसे कुछ सुना ही नहीं। और एक दुर्दान्त प्रसंग विस्फोटित होने से रह गया।
          उन्होंने अपने कम्पायमान हाथ से- 'रजिस्टर' पर दस्तखत किया और जाने के लिए उठने की कोशिश की पर अपने से उठ नहीं पाए। साथ में जो लड़का आया था, उसी ने सहारा देकर उठाया।
        और तब पहली बार मेरे मन में उनके प्रति अशुभ और अशिव विचार आए थे। मैंने भांप लिया- यह आदमी चंद दिनों का मेहमान है।
       जिस तरह वृन्त‌च्युत होने के पहले एक सूखा खड़खड़ पत्ता वात चक्र  में जोरों से हिलता डुलता है ठीक उसी तरह मास्टर मुस्तफा हुसैन जीवन और मृत्यु के बीच टिल टिल डोलते हुए उस मामूली 'हिचकी' के लिए प्रतीक्षित थे, जो एक पल में उनकी इहलीला समाप्त कर देती।
          लेकिन जिस तरह उस सूखे खड़खड़ पत्ते का भी अपना वासन्ती अतीत होता है ठीक उसी तरह मास्टर हुसैन का भी खुशियों और अरमानों का अतीत था । जिसके परिप्रेक्ष्य में उनका वर्तमान कितना विद्रुप हो कर  रह गया  था।
     उनका एक जमाना था जब बासंती परिवेश में आकांक्षाओं का इन्द्रधनुष जीवन के आकाश में खिला था, और कोई मतवाली कोयल सपनों की अमराई में कूक..कूक  कर मस्ती बिखेरा करती थी । तभी अचानक और असमय जीवन में पतझड़ आया और सारी खुशियाँ सारे अरमान सूख कर रह गए। सब कुछ बर्बाद हो गया ।
          मुस्तफा हुसैन तब कितने संजीदा  जीवट और संकल्पी लगते थे लेकिन उसके बाद कितने मायूस , उखड़े हुए और मृत्यु के आकांक्षी हो गए ।
       हे भगवान ! जीवन भी सुख - दुख का कैसा संघात है !
       मुझे याद आता है । एक समय मास्टर मुस्तफा हुसैन सबको  ज्ञान का प्रकाश बांटा करते थे । लेकिन अब उनका अपना जीवन अज्ञानता के घुप्प अंधकार से आवृत हो गया है । एक समय था जब मुस्तफा हुसैन लोगों को नेकी,सौहाद्र और ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दिया करते थे । लेकिन आज वह स्वयं हजार विसंगतियों का शिकार होकर किस विनाश के रास्ते पर भटक गये हैं।
                        मुस्तफा हुसैन के जीवन का यह विरोधाभास क्या प्रकृति जन्य है ? नहीं  परिस्थिति जन्य । यह इस बात का प्रमाण है कि कोई व्यक्ति परिस्थति वश अशुभ - अशिव और  आत्मपीड़न के रास्तों का जान बुझकर चुनाव कर लेता है !  अपने को मिटाने के लिए ।
              जो व्यक्ति शराब के नाम पर नाक भौं सिकोड़ लिया करता था वही आज शराब को जीवन दायिनी ( या मृत्यु दायिनी ? ) शक्ति मान बैठा है । मुझे याद है जब कोई ग्रामीण शराब पीकर गाली गलौज करता , मियां मुस्तफा बर्दाश्त नहीं कर पाते थे । कहते- ' रसाला, जहर क्या पी लिया है सारे जहान  को बताते फिर रहा है । .......जहर पिया है तो जहर नहीं उगलेगा  तो क्या अमरित उगलेगा बदमाश।

                वही मुस्तफा जीवन को, अमृत-पात्र को ढुलका कर जहर ( शराब ) को सीने से लगाए घूम रहा था। अगर ग्रास कन्ठ में अटक गया हो, तब पानी नहीं शराब का घूंट पीने वाले मुस्तफा मियां अपने आप में एक मिसाल थे ।
         जब वह स्कूल जाते -  शराब की बोतल भी साथ जाती । सिर्फ यही नहीं अगर वह चुनाव कक्ष या  जिला शिक्षा अधिकारी महोदय के कार्यालय  भी जाते तब उनकी चिर सहचरी ( शराब ) साथ न छोड़ती।चाहे जोखिम ही क्यों न उठानी पडे़ । परवाह नहीं।
                 स्कूल के भोले भाले अबोध बालक कभी नहीं समझ पाए - वह जो गुरु जी बोलते थे- वह नहीं , बल्कि टाइगर छाप बोतल बोलती थी । और उन पैतालीस लड़कों के भविष्य का निर्माण मास्टर मुस्तफा हुसैन नहीं बल्कि वही बोतल कर रही थी।

             मुझे याद आते हैं वे दिन जब पत्थलगांव तहसील के तालगांव के मिडिल स्कूल में मेरा तबादला हुआ था। चार शिक्षक, एक लिपिक (याने कि मैं) और चपरासी सोनाऊ कुल छः का स्टाप था, वह। उन सभी में जिसका व्यक्तित्व मुझे सबसे आकर्षक एवं स्निग्ध लगा वह और कोई नहीं, मुस्तफा हुसैन का ही था। हृष्ट- पुष्ट   गोरा शरीर गबरू नवजवान और हंसमुख चेहरा। उनके बातचीत करने के सलीके से मैं मुग्ध हो गया था। मैंने देखा कुछ ही दिनों में वह मेरे अंतरंग हो गए हैं।
              गांव में उनकी खूब धाक थी। सभी वर्ग के लोगों से वह समान मेल-जोल बनाए हुए थे। गांव के लोग यह भूल गए कि मुस्तफा हुसैन एक बाहरी आदमी (सरकारी) हैं। झगड़ा- फसाद के निपटारा के लिए पंचों के बीच उनका महत्वपूर्ण स्थान होता। तीज-त्यौहार में उन्हें स्नेह पूर्वक निमंत्रण मिलता।
               उनमें सबसे विचित्र बात जो थी- वह यह कि मुसलमान होने के नाते वह नमाज तो पढ़ते ही थे, विधिवत रामायण का भी पारायण करते। रामचरित मानस की कई दोहे-चौपाई उन्हें कंठस्थ थी। वह जब हिन्दू ग्रंथ के दुरुह तात्विक विषयों पर अधिकारिक चर्चा करते तब इस विरोधाभास पर बड़ा सुखद आश्चर्य होता।
     पहले पहल किसी नई जगह में रहने बसने की बड़ी समस्या होती है तालगांव में मेरे लिए सबसे बड़ी समस्या थी मकान की। चूंकि तब मैं परिवार नहीं ले गया था और  उस गांव का यह रिवाज था कि किसी
अकेले राम को ( चाहे वह शादीशुदा ही क्यों ना हो) बिना जांचे परखे मकान नहीं दिया जाता था।  इस बेतुक रिवाज के कारण की जानकारी बाद में मिली तब मुझे जोरदार हंसी आई थी ।
           बात उन दिनों की है जब तालगांव में मिडिल स्कूल नया-नया खुला था । एक शिक्षक की नियुक्ति हुई । नाम था कन्हैयालाल । वह शादीशुदा ही नहीं, तीन बच्चों का बाकायदा बाप भी थे। लेकिन जब वह तालागांव आए तब अकेले ही आए थे । तब ऐसा - वैसा कुछ रिवाज भी नहीं था । सच कहा जाए तो इस रिवाज के जनक यही मिस्टर कन्हैयालाल जी थे । खैर......
       उनको बीच बस्ती में एक अच्छा मकान मिल गया था । मकान मालिक अपने परिवार के साथ उसी मकान के एक हिस्से में रहता था । दूसरे हिस्से में उनके नेक किराएदार यही कन्हैयालाल जी रहते थे । पहले तो कन्हैयालाल जी कह दिया कि वह जल्द ही अपने परिवार ले आएंगे । पर लाए नहीं,  हालाकि वह पूरे छः साल वही जमकर रहे - वह मकान, मास्टर साहब की फेमिली से आबाद होने के लिए तरस गया ।
                               छः साल की लम्बी अवधि में  कन्हैयालाल जी काफी खुर्राट हो गए थे । भोले भाले ग्रामवासियों पर उनका अच्छा खासा  रोब था । लेकिन उनका यह रोबदाब बहुत दिनों तक चला नहीं । एक दिन अचानक कन्हैयालाल मकान मालकिन के साथ छेड़छाड़ करते, रंगे हाथ पकडे़ गए। और पकड़ने वाला भी कौन? स्वयं मकान मालिक!
       और इस घटना का वही हश्र हुआ जो आमतौर पर होता है ।
            अलबत्ता मास्टर साहब पिट-पिटा कर येन-केन -प्रकारेण वहां से खिसक गए और अन्यत्र अपना ट्रांसफर करा लिए, लेकिन जाते-जाते शिक्षा विभाग में और खासकर तालगांव के शुद्ध वातावरण में सदा सदा के लिए एक कलंक (हम सब के लिए) उछाल गये। इस घटना का परिणाम कितना घातक और दूरगामी सिद्ध हुआ कि स्वयं कन्हैयालाल भी नहीं जानते होंगे।   
                     अब कौन ऐसा बेवकूफ सरकारी कर्मचारी होगा जो बिना किसी व्यवस्था के -  परिवार को लेकर निहायत ही ऐसी अजनबी जगह में आ धमके।  खुदा ना खास्ता कोई कर्मचारी कुंवारा  हो और कभी तालगांव जैसे गांव में आना हो तो समस्या और भी भयंकर जटिल हो सकती है । इस ओर शासन का ध्यान जरूर जाएगा और कर्मचारियों के हिसाब से सरकारी क्वार्टर जरूर बनवाये जाएंगे ........अस्तु....

                     तो मुझे भी यत्किंचित कन्हैयालाल जी के ऐतिहासिक कृत्य का फल भोगना पड़ा। मकान के वास्ते किसी की खुशामद करने के बदले मैंने स्कूल के एक कमरे में डेरा जमा लिया। हालाकि  स्कूल के ठीक पीछे मरघट और स्कूल गांव से काफी दूर था । रात में ऐसे एकांत की कल्पना मात्र से ही मन सिहर उठता था, पर विवशता बड़ी चीज थी । तीन रातें मैंने, अकेले वहाँ काटी। आधी रात के आसपास नींद खुल जाती और  शेष रात - कुछ लिखकर - कुछ पढ़ कर बिताई जाती। चौथे दिन परिणाम सामने था । मुझे बुखार हो आया । हताशा  और निरुपायता की स्थिति में मेरी हालत  दयनीय हो गई ।
       स्कूल बंद होने के करीब आधा घंटा बाद मुस्तफा हुसैन जी एक आदमी को साथ लेकर मेरे पास आए और बोले  " समान वगैरह ठीक कर लीजिए , अभी आपको चलना है।"
    " तो क्या मकान का इंतजाम हो गया?"  मैंने खुश होकर  पूछा।
          "अजी छोड़िये मकान की चिंता ......आज नहीं तो कल ठीक हो ही जायेगा। ' उन्होंने आत्मीयता से कहा था।  "तो फिर आप कहां चलने के लिए कह रहे हैं ?" मैंने कुछ निराश होकर कहा ।
             "मैंने कहा ना आप निश्चिंत रहें ......सब ठीक हो जाएगा..     अजी चलिए भी  तैयारी कीजिये.......।बंदे का गरीब खाना कब काम आएगा।"
            मुझे लगा जैसे कोई मेरा अपना है यहाँ।
         एक होल्डाल, एक शूटकेस और एक ट्रंक । बस इतना ही समान था जिसे वह आदमी कांवर में डाल कर ले गया ।
        "आइए मेरे साथ"  उन्होंने कहा और मैं कृतज्ञ भाव से उनके साथ हो लिया था।
        थोड़ी ही देर में हम लोग एक पत्थर से बने मकान के दरवाजे के सामने खड़े थे।  उन्होंने हौले से  टीन  का दरवाजा ठेल कर कहा था "यही बन्दा का गरीब खाना है । तशरीफ़ लाएं,"  'जी धन्यवाद' मैं हिचकता-झिझकता अंदर प्रवीष्ट हो जाता हूँ।
      परछी में एक कुर्सी खींचकर मुझे बैठने के लिए आग्रह किया फिर बोले (शायद मेरी मनोदशा भांप ली गई थी)
        " उम्मीद है आप हमें गैर न समझेंगे। आपकी खातिरदारी से हमें फक्र महसूस होगा।"
       " आप कैसी बात करते हैं हुसैन जी, बल्कि मैं तो कहूंगा - आपने मुझ पर जो कृपा की है उसे मैं जीवन भर नहीं भूला सकूंगा।
              तभी दाहिने कमरे से पर्दा हटा कर एक पर्दानशीं महिला प्रगट हुई मुस्तफा हुसैन जी ने उन्हें मेरा परिचय दिया "  सलमा, यह है हमारे अजीज मेहमान .........."
      "सलाम"  दबे कोमल स्वर में , झुककर श्रीमती  हुसैन ने कहा।  और प्रत्युत्तर में, अजीब सी मनःस्थिति से मैंने दोनों हाथ जोड़ लिए।
         एक विधर्मी व्यक्ति के यहाँ अतिथि होने का यह  पहला अवसर था ।आधुनिक विचारों का पोषक जरूर था मैं लेकिन इतना नहीं कि एक मुसलमान या ईसाई के यहां भोजन कर लेता । तब पुराना हिंदू संस्कार एक तरह से हावी था, मुझ पर।  लेकिन जैसा कि मैंने कहा परिस्थितियां बड़ी प्रबल होती हैं।  और फिर जिस श्रद्धा और विश्वास के साथ मुसलमान दम्पति ने मुझ अजनबी को अतिथि माना तो भला मैं उनके आतिथ्य को अस्वीकार करने वाला कौन था।
          शुध्द निरामिष भोजन बना था, और मैंने खूब खाया।  दिन भर की भूख सारे संकोच और गैरत की भावना को दरकिनार कर गई थी ।
             भोजन करने के दौरान मुस्तफा हुसैन ने कहा - " सावजी,  वैसे हम डर रहे थे कि एक अनार्य के घर भोजन करने से कहीं आप इंकार न कर दें । लेकिन आपने तो कमाल कर दिया .....। बड़े प्रेम से आपने हमारा अन्न स्वीकारा.......... वैसे सावजी, हम मुसलमान जरूर हैं पर हममें से कोई भी 'नान वेजटेरियन ' नहीं है......"
        " ऐसा कह कर आप मुझे लज्जित कर रहे हैं हुसैन साहब ।" मैंने कौर मुंह  में डाल कर कहा । "हम चाहे हिंदू हो या मुसलमान, यह सब ऊपरी  बाते हैं ।  भीतर से हम सब एक समान हैं।...... खाने वाले और खिलाने वाले के मन में प्रेम रहे फिर बस।" ...... आप चाहे जो भी खाते हों , हमें क्या उज्र होगा.....हमें तो बस भाजी ही परोस दें........."
              जानता था, हुसैन जी  मुझे समझने की चेष्टा कर रहे थे । वह मुझे समझ सके अथवा नहीं-  वही जाने अलबत्ता मैं उन्हें जरूर समझ गया । दूसरे को खिला पिला कर संतुष्ट होने वाला इंसान, साफ दिल और निरहंकार।
और भी कई वैचारिक स्तरों पर उनसे बातचीत हुई कहीं-कहीं थोड़ा बहुत मतभेद होने के बावजूद हमारे बहुत से विचार आपस में मिलते थे ।
      बिलासपुर उनका गृह नगर था और वही उनकी ससुराल।  उनकी शादी को मुश्किल से दो साल हुए थे। मास्टर साहब के हमेशा प्रफुल्लित दिखाई देने वाले चेहरे से स्पष्ट था, उनकी गृहस्थी 'स्वर्ग' हो गई थी। रथ के दोनों पहियों में समानता समरूपता थी, तालमेल था।
      बाद में यह भी मालुम हुआ कि हुसैन मियां को शायरी लिखकर सुनाने का भी शौक है। उन्होंने जब मेरी साहित्यिक रुझान के बारे में सुना तो बड़े खुश हुए थे।  "अशआर' - हर शेर से यही लगा कि वह किसी पर दिलों जाँ से न्यौछावर  हैं - निःषेश समर्पित कि किसी हूर का चांद सा चेहरा उनके जीवन में अमृत रस छलकता रहता है कि जब वह जिंदगी की आपाधापी में बेहद थकान महसूस करते, तब कोई हंसीन परी अपने आंचल की शीतल छांह में तन - मन की पीड़ा हर लेती है ।आदि.....
        मैं उनके घर करीब एक हफ्ता टिका रहा लेकिन हुसैन मियां की 'तसव्वुर' या  कल्पना का दीदार नहीं कर सका । वैसे ना तो इसकी जरूरत थी और न मैंने अपनी तरफ से कोशिश ही की ।
            मैं देख रहा था,  मेरे रहते हुसैन परिवार को कई बातों में असुविधा होती थी। एक तो जगह पर्याप्त नहीं थी, दूसरे पर्दा का तकाजा।  उधर मुस्तफा जी बड़ी गर्मजोशी से मेरी खातिरदारी किए जा रहे थे । मैंने अचानक एक दिन निवेदन किया -
" हुसैन जी, बहुत हो गया अब कृपया मुझे छुट्टी दीजिए । सोनाऊ (चपरासी) ने कहीं एक मकान ठीक किया है .........
   "अजी, सोनाऊ क्या ठीक करेगा।  वैसे आपके लिए बढ़िया मकान तो मैंने भी ढूंढ रखा है।  लेकिन मैं सोच रहा हूँ जब आपकी फेमिली आ जाए तब वहाँ चले चलियेगा.... मैं जानता हूँ रसोई का खट - राग आपसे नहीं हो पाएगा।"
                   हुसैन जी ने ऐसे कहा जैसे मेरी सारी कमजोरियों को जानते हों।  मैं उस वक्त चुप कर गया। मकान मिल गया था, यही बड़ी बात थी ।
          दूसरे दिन अल सुबह जल्दी-जल्दी शूटकेस में जरूरी कपड़े ठूंसे। तब हुसैन मियां खर्राटे भर रहे थे। उजाला फैलने लगा था। टेबिल पर पड़ी नोटबुक से एक पत्ता फाड़ा और उसमें लिखा -
    "हुसैन जी कृपया नाराज ना हो, पूर्व सूचना के बगैर मैं जा रहा हूँ.......दो-तीन दिन लग सकते हैं लौटने में । अस्तु '
          पत्र को तह करके पेपरवेट के नीचे दबा कर बाहर चला आया।  परछी में सलमा बेगम झाड़ू कर रही थी । मुझे शूटकेस के साथ देख कर वह चकित हो गई । उन्होंने तुरन्त बुरका खींच लिया यद्यपि एक हलकी सी झलक मिल ही गई, जो शायर पति के तसव्वुर  की हकीकत कबूल करने के लिए पर्याप्त थी।
          मैंने झिझकते हुए कहा - हुसैन साहब जागें तब कह दीजिएगा - मैं घर जा रहा हूँ....... अब की बार बच्चें भी साथ आएंगे।'
              "लेकिन".. . लाज के अवगुंठन में उन्होंने बेहद धीमे स्वर में कहा  "थोड़ा ठहर कर जाइयेगा मैं नाश्ता तैयार कर लेती हूँ।"
     " उसकी जरूरत नहीं...... देर हो जाएगी,क्योंकि पहली बस के छूटने का वक्त हो गया है ......इसलिए,"
        और उसके पहले की सलमा बेगम के रुखसार (कपोल) में लाज - सुबह की लाली के साथ गहराती मैं जल्दी से रुखसत हो गया ।
        देखते ही देखते दिन गुजरने लगे।  सच है, सुख के दिन इस कदर जल्दी बीत जाते हैं कि पता ही नहीं चलता।  तालगांव में रहते हमको तीन वर्ष पूरे हो गए  थे ।
         हम दोनों के परिवार आपस में काफी घुल मिल गए।  बच्चों को हुसैन परिवार का बे-इंतिहा प्यार मिला । मिसेज़ हुसैन खासकर बच्चों को खूब लाड़ करती।  दिन भर बच्चे वहीं जमे रहते ।
          मधू (धर्म पत्नी)  कहती -
         "सलमा को बच्चे बहुत प्यारे हैं और अभी तक उसकी गोद हरी नहीं हुई है......बेचारी अपनी कोख से जाये बच्चे का मुख देखने के लिए तरस रही है।...... भगवान भी धीरज की परीक्षा ले रहे हैं....... पूरे पाँच साल हो गए निकाह को और अभी तक ......कहती है-  "छोटू को मुझे दे दो, उसके बिना बड़ा सूना सूना लगता है " .......मजाक ही सही लेकिन उसके हृदय की तड़प तो मालूम पड़ ही जाती है।"
        मैं पत्नी की बात चुपचाप सुनता और गुनता।
    मैं देख रहा था - आए दिन मास्टर साहब (मुस्तफा हुसैन ) भी कुछ गमगीन दिखाई पड़ते थे । खोए -  खोए किसी अज्ञात वेदना के स्वर में अर्धमूर्छित अवस्था में डूबने उतरने लगे थे। "क्या बात है आजकल आप बहुत थके हारे से दीखते हैं ?"    
     एक दिन मैंने उनके घर में पूछा।
उन्होंने उदास स्वर में जवाब दिया-
" कोई खास बात नहीं ,यों ही..... दिल डूबने सा लगा है ।" " और आप फरमाते हैं  "कोई खास बात नहीं " मैंने उनके छुपाव -  दुराव पर किंचित नाराज़ होकर कहा था ।
      उन्होंने कुछ नहीं कहा। चुप ही रहे । थोड़ी देर बाद स्वत: बोले - "अब आपसे क्या छुपाना  साव जी,  दरअसल बात यह है...... हमारी किस्मत में बच्चे का मुख देखना नहीं लिखा है खुदा ने । अब हम बाप नहीं बन सकते साव जी........"
    " क्या कहते हैं आप?"  मैं अचंभित रह गया।  वह अपने को संयत करके बोले - "पिछली गर्मी में हमने जांच करायी थी- ' रिपोर्ट' में लिखा है"
          न जाने कैसा अजीब सा लगा था मुझे।  मेरी स्वयं की अवस्था बड़ी विचित्र हो गई । नाहक छेड़ दिया । मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था-  इतने स्मार्ट दिखने वाले व्यक्ति के शुक्रकीट निष्क्रिय हों.......
          हुसैन मियां के चेहरे पर हीनता के गहरे भाव उग आए थे । मैंने कहा-
         "इसमें निराश होने की बात नहीं हैं मास्साहब। इसका समाधान है ।
          मैं जानता हूँ, इसका समाधान-  पर वह तरीका-  कितना वाहियात और ग़लीज़ .....हमेशा लगेगा - बच्चा अपना नहीं किसी दूसरे-  निहायत ही अनजान व्यक्ति के 'सीमेन' का फल है...... हर पल एक नामुराद वहम जेहन में छाया रहेगा।....  नहीं-नहीं सावजी, इससे तो बेहतर है कि ......
        और वह आगे कुछ बोल नहीं पाए मैंने उन्हें ढाढ़स बंधाते हुए कहा-  "आप नहीं जानते 'मास्साहब, यह वैज्ञानिक युग है। ऐसे 'हार्मोंस' तैयार किये जा चुके हैं जो सुस्त शुक्रकीट को सक्रिय कर देते हैं । आप किसी अच्छे यूरोलॉजिस्ट से बात करके तो देखें । सब ठीक हो जाएगा ।"
        "खैर, देखा जाएगा उन्होंने कहा थकान और भी गहरी हो गई थी।
            याद आती हैं कुछ महत्वपूर्ण तारीखें।   कुछ पन्द्रह अगस्त कुछ छब्बीस जनवरियाँ......जिनमें मुस्तफा हुसैन जी का सवार्धिक ओजस्वी भाषण होता और तालियों की गड़गड़ाहट से सारा विद्यालय गूंज जाता।  उनका वह प्रिय प्रार्थनापरक गीत जिसे इकलाब ने लिखा है- कितने शौर्य के साथ मुस्तफा हुसैन गाते-
" (लब पे आती है दुवा बन के तमन्ना मेरी
   जिंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी)'
           वह भी एक 26 जनवरी थी।  सब कुछ हर वर्ष की तरह जोश ख़रोश से हुआ, लेकिन मुस्तफा जी वैसे (पूर्ववत) न रहे थे । 'टूटन' उनके हर क्रियाकलाप में झलकने लगा था । सिर्फ दो चार  वाक्य चलताऊ ढंग से बोलकर (भाषण में) वापस मेरी बगल में आ बैठे थे।  मैंने उनके मुख पर दृष्टि डाली उन्होंने भी मेरी ओर देखा।  आंखें लाल और कुछ धूमिल सी थीं।  मैंने  धीरे से बुदबुदाया - " लब पे आती है दुवा बन के तमन्ना मेरी ......" और उन्होंने नजरें झुका ली थीं।
                'क्या हो गया है इस आदमी को' मैं अक्सर अपने आप से पूछता।  मैं बहुत चिंतित था उनको लेकर । कभी-कभी मन में 'विचार' आता कहीं 'बच्चा' पेंचीदा तो नहीं हो रहा ? पति से भी ज्यादा तब्दीली बेगम सलमा में हुई थी।  वह भी बेहद चिड़िचिड़ी और खींची  तनी  रहने लगी थी। मामूली सी बात में 'आपा' खो बैठना उनका स्वभाव हो गया था ।
       परिवार में न जाने कैसे, बिखराव की विषाक्त स्थितियां पैदा हो गई थी। दम्पति के चेहरों पर हर वक्त विषाद की छाया डोलती रहती । क्या बात थी, कौन जाने । आखिर वह समय आया जब सब जान गए - इस परिवारिक विघटन का मूल कारण क्या था । सब कुछ उजागर हो गया । जैसे अंधेरे में पड़ी हुई वस्तुओं का रूप रंग आकार नहीं होता, परंतु जब उस पर रोशनी पड़ती है तब सब कुछ स्पष्ट हो जाता है।     
          लेकिन इसके पहले की रोशनी पड़े, अंधेरे की-  मानव मन की अंधेरी गुफाओं में छटापटा रही कुछ ग्रन्थियों की - अधूरी कहानी पूरी हो  जाए......
            सितंबर की पहली तारीख।  रात करीब दस बजे मिस्टर मुस्तफा हुसैन बदहवास मेरे पास आए। मुझे समझते देर न लगी कि कुछ अप्रिय घट गया था।  उन्हें एकांत कमरे में ला बैठाया और पूछा-  क्या बात है ? उन्होंने बदहवासी में कहा -"सावजी, मैं लुट गया।  सलमा ने मिट्टी का तेल पी लिया है ।"
       " लेकिन क्यों??'
     "क्योंकि आज पहली बार मैंने उस पर हाथ उठाया उन्होंने रुआंसा स्वर में कहा ।
        "आखिर क्यों ?? मेरा-  खुद का दिमाग भन्ना रहा था । "ओफ्फ" मैंने कहा और तुरंत अपनी पत्नी को सारी बातें समझाकर जल्दी से जल्दी मुस्तफा मियां  के घर पहुंचने के लिए कहा । पीछे पीछे हम लोग भी पड़ोस के वयोवृद्ध वैद्यराज को लेकर पहुंचे।
        खुशकिस्मती थी कि हमारे पहुंचने के पहले ही श्रीमती सलमा बेगम दो बार उल्टी कर चुकी थी । और घर आयी बला काफी हद तक टल गई । लेकिन यह हमारा भ्रम था बला टली नहीं थी वरन् उसका आना शुरू हुआ था । उस आई गई बला ने स्पष्ट कर दिया-  अभी बहुत कुछ होने को है।
         देर रात तक हम लोग वहीं रहे।  वैद्यराज  ने कोई गोली दी जिसे खाकर वह लम्बी-लम्बी सांस खींचती अर्धचेतनावस्था में लेटी रही। वैद्यराज ने गंभीर होकर कहा-  यह बड़ा बुरा हुआ-  पेट में बच्चा है और.....( ऊपर की ओर दृष्टि उठाकर)  हे ईश्वर, तुम्हारी अद्भुत लीला है!  तू ही बिगाड़ता है और तू ही बनाता है ........."
              
और मुझे ऐसा लगा जैसे एक तीव्र रोशनी हुई है। एक ही पल में सब कुछ उजागर हो गया है.....कुछ भी सुनने समझने को नहीं रह गया था ।
             बिलासपुर जाकर श्रीमती सलमा ने अपना 'एबार्शन' करा लिया।  लेकिन उसके बाद फिर वह विक्षिप्त सी रहने लगी । इधर मियां मुस्तफा हुसैन के मन में बड़े खतरनाक विचार जन्म ले रहे थे जिनका न तो  'एबार्शन'  हो सकता था और न ही उसका गला घोंट कर समाप्त किया जा सकता था। अलबत्ता मिस्टर मुस्तफा हुसैन ने इन जनमते-पकते विचारों से पिंड छुड़ाने के लिए एक जघन्य रास्ता ढूंढ निकाला-  उन्होंने शराब पीनी शुरू कर दी। मैं उनका इतना अंतरंग था,  जिस दिन उन्होंने पहली बार शराब पी- शराब भठ्ठी से झूमते गिरते सीधे मेरे पास आए और आव देखा न ताव एकबारगी  मेरे पैर पकड़ लिए।  मैं अवाक और विस्मित उनको देखता रह गया।
       " म... मुझे मुआफ करना मेरे दोस्त.... आज दोज़ख के रास्ते पर पहला कदम रक्खा है.... म. मैने सोचा,  सरुर छाने के पहले कम से कम अपने अजीज दोस्त का दीदार कर लूं....... बोलो, मैंने ठीक किया न ? अँ (हिचकी)
              मधु आकर सामने खड़ी हो गई। अप्रत्याशित दृश्य को देखकर  विमूढ़ हुई।  बच्चे बड़े कौतूहल से उन्हें देख रहे थे । मेरी आंखों में आंसू थे, जो उस अनपेक्षित परिणति के साक्षी बने।
             "बहुत खूब।" उनको सहारा देकर कुर्सी पर बैठाते हुए मैंने कहा-'" बहुत अच्छा रास्ता चुना है आपने गमों से निजात पाने का । क्या कहेंगे लोग, कभी सोचा आपने एक नामी-गिरामी आइडियल टीचर शराब पीता है..धत्त......"
          बड़ी मुश्किल से मैंने जवाब दिया।  कुछ भी कहना समझना अर्थहीन था । क्षणक्षण उनकी चेतना विलुप्त होती जा रही थी।
          उन्हें चारपाई पर लिटा दिया गया ।
थोड़ी देर में मिसेज हुसैन आ गई।
और अपने पति की दुर्दशा देखकर विचलित सी हो गई।
हमारा कर्तव्य दोहरा हो गया ।
गांव के लोग इकट्ठे हो गए।  फिर तो पीने का वह दौर चला कि जब वह अल्लाह को प्यारे हुए उस वक्त उनकी गोद में टाइगर मार्का  बोतल थी। उनके महाप्रयाण के वक्त उनके पास कोई नहीं था । सिर्फ थी तो वह बोतल जिसने उनको अंतिम विदाई दी और मास्टर मुस्तफा हुसैन चरम शांति  की सहज मुद्रा में अपना जर्जर रक्तहीन पार्थिव शरीर छोड़ गए थे।
          अंतिम दिनों में कितना अभिशप्त हो गया था उनका जीवन-  कितना दर्दनाक और कितना नारकीय।  दुनिया में बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो मृत्यु पथ  पर हठपूर्वक तिल तिल घुलते हुए चले चलते हैं। जिन्हें लगे कि वे हर पल मर रहे हैं-  जिनके कुचले अहम को तुष्टि मिले हर पल  जी जी कर मौत को  निगलने के लिए मुह खोलें और ग्रास छूट जाय- ओफ, कितना दुर्दान्त था यह मृत्यु के साथ आंख मिचौली का खेल ।
                  लेकिन यह खेल चला बहुत दिनों तक । उनकी मृत्यु की आकांक्षी यहाँ तक कि निराश हो चुके थे । हर रात उनके लिए कालरात्रि होती और हर सुबह उनके जीवन की एक और कड़ी। लोग, सुबह उन्हें देखकर कहते -  चलो बेचारा बच गया - आज भर कम से कम जिंदा रहेगा ......।
        ऐसे ही एक दिन, अपनी तनख्वाह लेने पहुंचे थे मास्टर हुसैन । एक महीने में केवल एक दिन अपनी  तनख्वाह लेने के लिए ही तो स्कूल आते थे, वह। बाकी दिन पीकर लाश की तरह घर में पड़े रहते थे । तब किसी को पता नहीं था कि मास्टर साहब का यह आखिरी आना है अपनी तनख्वाह लेने।

                    बच्चों के अभिभावक पूर्णतः ऊब चुके थे । अधिकारियों से शिकायत करते, पर परिणाम कुछ न निकलता।   हुसैन मियां चुपचाप अपने वेतन का एक तिहाई या आधा भाग अधिकारी महोदय की जेब में ठूंस देते और सब काम बन जाता। इस तरह दो वर्ष खींच ले गए थे वे।
     उनका स्वास्थ्य पूर्ण रूप से चौपट हो गया था । इधर सलमा बेगम पच्चीस से छब्बीस और फिर सत्ताईस की हो गई। उनके हुश्न में अचानक ही निखार आ गई थी।
        जिंदगी के तमाम हसीन लमहात अभी शेष थे। पूरी रात अभी बाकी थी । एक जल गया तो क्या?  कोई दूसरा आएगा...... जल मरेगा...... तीसरा आएगा - फिर चौथा....... फिर भोर का तारा चमकेगा-  डूब जाएगा ......फिर सुबह का उजियाला फैलेगा - तब कहीं जाकर शम्मा  बुझेगी-। बहुत लम्बा सफर है..........
             मैं देख रहा था - मिसेज मुस्तफा हुसैन ने अपने आपको एक बिलकुल ही नए रूप में ढाल लिया था । शायद यही उनका असली रूप था। या हो सकता है परिस्थितियों ने इस रूप को निखारा हो । कौन जानता है ! बहरहाल हुसैन मियां इस सुलगती - जलती शम्मा को  निरूपाय देखते रहे और भीतर ही भीतर आत्मा की छटपटाहट महसूस करते रहे । अलग-अलग दायरों में जिंदगी घटती रही। घटनाएं होती रहीं।
        हर रोज, शाम ढले, एक फटफटिया आती और मुस्तफा हुसैन जी के द्वार के पास खड़ी हो जाती।
उसमें से आर. आई. (रेवन्यू इंस्पेक्टर) नूर मोहम्मद उतरते और श्रीमती सलमा अधरों में ताजा मुस्कान लिए द्वार पर स्वागत करती ।.....और बिलकुल सबेरे फटफटिया फिर स्टार्ट हो चली जाती। गांव वाले सांस रोके यह सब देख रहे थे।
      रात को, जब अनायास ही 'मास्टर साहब' का नशा कम होता और आसपास की भौतिकता का सही सही बोध होने लगता तब वह पागलों की तरह चिल्लाते और अपनी मौजूदगी का- अपने जीवित रहने का एहसास कराते, तब सलमा बेगम आर.आई.- नूर मोहम्मद के पहलू से रटपटा कर उठती और खाली गिलास को शराब से भर कर स्वयं पति (परमेश्वर) के मुह में उढ़ेल देती। मियां कृतज्ञभाव से !अपनी बीवी की ओर देखते-  बड़े-बड़े, घूंट से शराब गटक जाते और पुनः गहरे नशे में डूब जाते- और सलमा बेगम अपनी बड़ी बड़ी उनींदी आँखों में गुलाबी डोरे लिए वापस लौट जाती।
                       मुस्तफा हुसैन के नशे का फायदा और भी कई महत्वपूर्ण लोगों ने उठाया पर उन सबका जिक्र करना  अप्रासंगिक होगा । गांव के बड़े बुजुर्ग इस स्थिति से क्रुद्ध थे उनका खयाल था - बेगम सलमा की 'नेक चलनी' का प्रभाव गांव की बहू बेटियों पर पड़ सकता है । बात सही भी थी पर सवाल था  बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे ! गांव वाले तो पटवारी को भी माई बाप मानते हैं ....फिर बात तो एक आर.आई.की थी! खैर.....
                     एक दिन स्कूल इंस्पेक्टर  दौरा में आए।  शाला समिति के सदस्यों ने हिम्मत करके एक अर्जी पेश की जिसमें मास्टर मुस्तफा मियां को मुअत्तल करने  या कम से कम  अन्यत्र ट्रांसफर करने की मांग की गई थी।
               चालाक और दुनियादार स्कूल इंस्पेक्टर ने बिफरे लोगों को अत्यन्त कौशल से समझाया-
" देखिए, आप लोग अधिक चिंतित न हों, मुस्तफा मियां अब चंद दिनों के मेहमान हैं। फिर तो वह स्वयं ट्रांसफर हो जाएंगे (ऊपर आसमान की ओर संकेत)   
         गांव वालों का आक्रोश तत्काल काफूर हो गया और उसकी जगह सहज मानवीय संवेदना उत्पन्न हो गई मुस्तफा हुसैन खुश होकर दो सौ  के नोट, इंस्पेक्टर साहब की ठंडी और प्यासी जेब में डाल दिए।
               और इसी क्रम में याद आता है वह विशिष्ट दिन जब एक लड़के ने आकर कहा - 'मतवार गुरु जी तुंहला बुलाय हावें-  अभीच्चे। कहिन हे -,  जरूरी काम हवय। "
              मैं पशोपेश में पड़ गया - जाऊं कि नहीं । धर्म पत्नी की सख्त निषेधाज्ञा थी। इधर अंतरात्मा कहती थी कि मैं जरूर जाऊँ। अंत में मैंने अंतरात्मा की बात मान ली, पर जैसे ही कदम बढ़ाया मधु रास्ता रोककर खड़ी हो गई - 'ए लो'
               'मैं पूछती हूँ ,इतने बड़े गांव में क्या आप ही अकेले न्यायमूर्ति हैं? आप वहाँ नहीं जा सकते हो!"  "यह क्या, तुम भी, मुझे इतना कमजोर समझती हो?" मैंने एकदम उसके मर्म को छुआ। वह मुझे कुटिल   मुस्कान के साथ देखने लगी।  मैं आगे बढ़ना चाहा तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली - " आपको क्या जरूरत है वहां जाने की - उन दोनों के बीच में पड़ने ?"
   "देखो मधु, तुम नहीं समझती....... कितने दिनों के बाद तो बेचारे ने याद की है। न जाने क्या विपत्ति पड़ी है ।
           " कमीनी ने पी ली होगी फिर मिट्टी का तेल और क्या........" वह आग बबूला हो गई ।
       तब तो मुझे जल्दी जाने दो....... छोड़ो रास्ता प्लीज वर्ना .........
        "वर्ना ! क्या करेंगे ?? वह आशंकित हो उठी। तुम्हें भी ले जाऊंगा उठाकर .......फूल की तरह तो हल्की हो....... ऐसे......"
  " अरे...अरे , यह क्या पागलपन है? ......छोड़िए" और मैं उसे नीचे भूमिस्थ कर वेग से बाहर निकल गया।
      उनके घर में मातम सा छाया हुआ था।  मुस्तफा मियां जमीन पर सरकी (चटाई)  डाल दीवाल पर  टेक लगाए बैठे हुए थे। रसोई घर की दहलीज पर सलमा बैठी थी। वातावरण भारी था।
        अभिवादन के रूप में मुस्तफा हुसैन साहब के पपड़ाए होठों में फीकी और निरस मुस्कान थिरक गई। मैं कुर्सी पर बैठ गया तो वह बोले-
" सावजी, बहुत अकेला पड़ गया हूँ मैं...... आप सभी हैं यहाँ और मैं तन्हा हो जाऊं यह बड़ी अफसोस जनक ......ओक्क......बात है आपको देखने की बड़ी हसरत थी..... और आज सुबह - ओक्क,... ओक..ओ... .. मुझे लगा जैसे रुखसत होने का लम्हा बिलकुल करीब है ......जानता था, आज आप जरूर आएंगे...ओ..ओक्क..... तशरीफ़  लाने का जहमत गंवारा किया.....हम आभारी है.... (लगातार उबकाई)    
                 "कैसे लग रहा है आपको ?' मैंने, उनके करीब जाकर पूछा।  करुणा का एक सोता फूटा था,भीतर।
              "बस ऐसे ही...  साव जी ओक्क.. ऊफ्फ आज  सुबह से पी नहीं जरा भी इसलिए यह..... सलमा जरा पानी लाना तो हलक एकदम सूख  गया है" ' ओक्क...
    सलमा पानी ले आई।
            " यह क्या सलमा, मैंने तो पानी मांगा था और तुमने शराब भर लाई.....ओक्क, ओक्क..... (लगातार)
सलमा अपने पति की पीठ और छाती सहलाने लगी, वह बोली ....    "अब हद हो गई, पानी भी आपको शराब दिखाई देने लगा है...... अगर शराब दी होती तो आपका यह 'ओख-ओक्क' कब का बंद हो गया होता" स्वर में गहरी उपेक्षा थी और चेहरे में तीखी विकृति के भाव जो मेरे उपस्थिति को नजर अंदाज कर उभर आए थे । मैं सोच सकता था मुस्तफा हुसैन ने अकेलेपन की जो बात कहीं उसमें कितनी सच्चाई थी । मुझे महसूस हुआ, मेरा आना श्रीमती सलमा बेगम को बढ़ा नागवार गुजरा था ।शायद उन्हें डर था कहीं मुस्तफा हुसैन  जी मेरी उपस्थिति में कुछ ऐसा वैसा ना बक दें जिससे उन्हें किसी रहस्य के उद्घाटित होने का खतरा हो...... और वही अनजाने में मुस्तफा जी से हो गया, जिसका सलमा को डर था।
                 अपनी पत्नी की कटूक्ति से मुस्तफा आहत हो गए । वह अपलक उनकी ओर देखते रह गए थे ।
       "देख लीजिए भाई जान, क्या शराब है गिलास में? बर्दाश्त  की भी हद होती है .......जब यह शराब मांगने हैं और मैं शराब दे देती हूँ  तब कहते हैं कि मैंने शराब के बदले पानी दे दिया है और जब पानी मांगते हैं मैं पानी देती हूँ तब कहते हैं.....ओफ मैं ऊब गई हूँ, इनके रवैये से........ मैं तटस्थ भाव से उनकी ओर देखा भर। बोला कुछ नहीं ।
            "खुदा के लिए चुप कर जाओ सलमा, मुझे माफ कर दो (लगातार हिचकी) मुझसे गलती हो गई।....... दरअसल शराब के बगैर में अब एक पल भी नहीं रह सकता वर्ना मुझे अब तुम भी शराब नजर आवोगी .......यह साव जी भी......
        ( मैं देख रहा था मास्टर साहब अपना मानसिक संतुलन खोते जा रहे थे और मैं अपने आपको कोस रहा था, क्यों आ गया यहाँ।) सलमा ने जले में नमक छिड़का - " हाँ- हाँ क्यों नहीं, अब आपको सारी दुनिया शराब नजर आएगी...... इसीलिए तो इन्हें बुलाया है ताकि यह सिद्ध कर सको, आपकी इस तरह दुर्गत करने की पूरे जिम्मेदारी मैं ही हूँ..... या खुदा "
         'मास्साहब, अब आप शराब पी डालिए । और यदि आप मेरी उपस्थिति में पीना नहीं चाहते तो मैं चलता हूँ"
           मैं जाने के लिए खड़ा हो गया।
   " न- न सावजी, अभी आप ना जाएं' उन्होंने उठने की कोशिश की पर उठ न सके।  मैंने कहा- "तो फिर आप शराब या आपके पुराने लब्ज में जहर क्यों नहीं पीते ? आप कुछ कहना चाहते हैं न ?'
             वह उदास और सूनी सूनी नजरों से मुझे देख रहे थे । कुछ कहना चाहते थे, पर कहने में असमर्थ थे। एक तो अनवरत हिचकी उठ रही थी, दूसरे, सलमा के आक्षेप से मन की बात कहने की कोई गुंजाइश नहीं थी।
           शाम घिर रही थी और मिस्टर मुस्तफा हुसैन क्रमशः बुझ रहे थे।  मैं अविलम्ब वहाँ से चला जाना चाहता था । तभी श्रीमती सलमा ने आक्रामक तरीके से मेरे सामने आकर कहा -
" भाई जान, अब यह क्या कहेंगे.... जब तक एक बोतल शराब नहीं पी लेंगे- कुछ न कह पाएंगे.....और मेरी जिद्द है इधर यह शराब पिएं, उधर में ज़हर पी लूंगी। ...... भाईजान, अच्छा हो गया आप खुद आ गए।  मैं बहुत दिनों से आपसे मिलने की सोच रही थी"
              " चलिए अच्छा हुआ, आपको तकलीफ करने की जरूरत नहीं पड़ी।  मैं स्वयं हाजिर हो गया..... लेकिन क्या मैं पूछ सकता हूँ आपने इस तरह अचानक क्यों जिद्द पकड़ ली जबकि इस तरह की जिद्द  इनके लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है ।"
      सलमा बेगम प्रश्नयुक्त दृष्टि से मेरी ओर देखने लगी ।
मैंने कहा-"अब जबकि काफी देर हो गई है और आपके शौहर इतनी खुराक बढ़ा चुके हैं कि एकाएक शराब बंद कर देना निश्चित रूप से मौत के मुह में ढकेल देना होगा"
         वह मेरी ओर बड़ी विचित्र नजरों से देखने लगी उसे विश्वास न था कि वह अपने ही हथियार से इस तरह घायल हो जाएगी।
        मुस्तफा हुसैन ने कांपते हाथों से पानी का गिलास मुंह से लगा लिया और तुरन्त गिलास होठों से अलग कर दिया ।
       "आप खड़ी खड़ी क्या देख रही है जाइये- जल्दी शराब ले आइये।"  न जाने कब दबा हुआ आक्रोश कैसे फूट गया मैं स्वयं नहीं समझ सका। 
      "हाय अल्ला" के साथ बेगम सलमा दौड़कर कमरे के भीतर चली गई और फफक  फफक कर रोने लगीं।
       " अब रोने से क्या फायदा, बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ कर रख दी । मैं पूछता हूंँ- आप बांझ ही रह जाती तो क्या हो जाता .........क्या वे लोग इंसान नहीं जिनका कोई बच्चा नहीं है ?  लानत है आपकी नासमझी पर, एक देवता को आप ने राक्षस बना कर रख दिया......" मैं मन ही मन बुदबुदाया।
           मिस्टर मुस्तफा हुसैन की आंखों से तर तर आंसू बह रहे थे ।
        और उसके बाद - उस तनावपूर्ण वातावरण में एक क्षण भी रहना मेरे लिए नामुमकिन था । अच्छा हुआ मैं तुरन्त चला आया वर्ना हर रोज की तरह शाम को मेहमान बनकर आने वाले मियां नूर मोहम्मद की सवालिया आंखों की  प्रतिव्दंदिता भी झेलनी पड़ती।
          इस घटना के ठीक दूसरे दिन हम लोगों ने सुना कि मुस्तफा मियां 'रिजाइन' कर चुके हैं।  पूरा स्टाफ स्तब्ध रह गया । लेकिन यह होना ही था । अगर वह अपनी ओर से रिजाइन न देते तो भी नौकरी छूट जाती। नौकरी ही क्यों सब कुछ। शायद, यह क्लेशकारी निर्णय उसी अपरिहार्य भविष्य का पूर्वाभास था।
         मैं स्कूल से जैसे ही घर पहुंचा यह देखकर मेरे आश्चर्य की सीमा न थी कि सलमा बेगम और मधु किसी गहन विचार में निमग्न बैठी है।  आहट पाकर सलमा तो झट से ओट में हो गई लेकिन मधू इत्मीनान से उठती हुई  मुझे इस तरह से घूलने लगी जैसे कह रही हो - "कल मेरा कहना ना मानकर पंचायती करने गए थे - उसी करनी का फल है- भोगो अब"
            मैं कपड़े बदल कर चारपायी पर बैठा ही था कि मधू चाय लेकर आई और फुसफुसा कर कहने लगी-
             "कल जाकर पता नहीं क्या गुल खिलाए कि आज बेचारे ने इस्तीफा दे दिया....  देवी जी जब से बैठी हैं इंतजार में - 'भाई जान कब आएंगे- भाई जान कब आएंगे रट लगाकर मेरी जान खाए जा रही है.... जाइये संभालिए उसे......." और वह फनफनाती हुई चली गई बाहर।
         पिछले कई महीनों से सलमा ने आना बंद कर दिया था।  उस दिन भी न आती वह, लेकिन. सहसा अपने आपको नितान्त असहाय और घोर नैराश्य की स्थिति में पाकर हतबुद्धि हो गई थी।  ठोकर और प्रताड़ना दी और वह चली आई थी। वैसे, मैं स्वयं सोच रहा था-  उसके पहले दिन मैं जिस तरह से उसके (सलमा) मुंह में लताड़ दिया था और जिस तरह उत्तेजना की जानलेवा मनःस्थिति में उसे छोड़कर तथा क्लाइमेक्स में पहुंचते-पहुंचते सारे जलते संदर्भों से कट कर चला आया था । उस स्थिति में - उस जैसी विद्रोहिणी स्त्री का मौन बैठ जाना नामुमकिन है- उसे  अपनी तरफ से सफाई देने और मुझसे जवाब तलबी के लिए आना ही था।
         और उसने अपनी सफाई दी।  ढेर सारे आरोप अपने पति के ऊपर मढ़कर। सारे आरोप जीवन के नर्क बन जाने के बाद की घटनाओं पर आधारित थे-  ऐसा एक भी आरोप नहीं था जो परिणति के मूल कारणों पर प्रकाश डालता।
           काश कि वह स्वयं बेनकाब हो जाती और अपनी सारी गलतियों को स्वीकार लेती  तब उसके प्रति नफरत नहीं सहानुभूति होती,-  उसके सभी क्रियाकलापों को हम परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखते।
                 उसका कहना था-
      " जब कोई मर्द इतना निकम्मा हो जाता है कि लोग उसकी बीवी पर कीचड़ उछाले और वह चुपचाप देखता रह जाए तब उस अभागन की मजबूरी का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है ।.....
         ......लोग समझ जाते हैं अब रास्ता साफ है। फिर क्या है! जिसके मन में जो आता है-  लांछन थोप देता है .....औरत एकदम हलकी पड़ जाती है न!
            ...... खसम का यह हाल है कि चार हजार की शराब पी जाते हैं महीने में -  बाकी बचा क्या?  मात्र छः हजार रुपये- उससे  क्या होता है-  राशन का खर्च, घर का किराया , दूध का खर्च-  रावत का खर्च... कपड़ा- लत्ता, ...दवा - दारू का खर्च ?  ऊपर से यह कि नौकरी पर लात मार दी ........ कैसे कटेगी जिंदगी? मेरा क्या हश्र होगा??
            हजार प्रश्न  मुह बाएं खड़े थे । समस्याएं ज्वलन्त थी परन्तु उत्तर एक भी नहीं-  कोई निदान नहीं । एक विकल्प था - तलाक !
                  मैंने कहा भी उसे कि वह तलाक क्यों नहीं ले लेती । तलाक का नाम सुनकर वह एकाएक चमत्कृत हो गई पर वह नाटक था।  मैं समझता था।  जब वह यहाँ तक अपने आपको  खींच लाई तो कुछ दिन और सब्र करने में क्या नुकसान था । और फिर तलाक से कुछ फायदा भी नहीं था।  मास्टर साहब के नाम से प्राविडेंट फंड में हजारों की जमा राशि पर अधिकार कैसे होता ?
        उधर, बीच-बीच में जब भी मौका मिलता, मधू आंखों के संकेत से मुझे सचेत करती कि टालो इस कुलच्छनी को ऐसों को अधिक मुह देना अच्छा नहीं"
                    सलमा अपने आपको बेकसूर साबित करने की  जितनी कोशिश करती, उसके गोरे गालों की हड्डियों के पास हलके हलके दाग, पाउडर की तह में - उतने ही अधिक झलकने लगते थे जो नारी सुलभ लज्जा और कमनीयता को हठात्  दबाकर  निर्लज्ज कामुकता के ठोस प्रमाण के रूप में उभर आए थे ।
जब वह चलने लगी , तब मैंने कहा- 
   "इस्तीफा की चिंता मत करें, उसे रुकवाया जा सकता है..... लेकिन आपके लिए मेरी नेक सलाह है- "आप अपने भीतर झांक कर देखें कि आप कहाँ तक ठीक हैं और कहाँ तक गलत अब भी वक्त है, उनका दिल जीतने की कोशिश कीजिये, शायद ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे दे और शुरू की स्थितियां वापस लौट आएं....... यह जिम्मेदारी दूसरों पर डालने के बजाय आप स्वयं संभाले..... प्रेम में बड़ी शक्ति होती है.....
           उसकी आंखें सजल हो आई थी। मुझे महसूस हुआ मुख पर कठोरता की जगह लाज और नम्रता ले रही थी । सहसा वह जाने के लिए उठ खड़ी हुई।
          सलमा के जाने के बाद मधू ने मीठा ताना मारा-
       " भई वाह ! मान गए - अगर यही सब कुछ 'नारी जागरण अभियान' में उन सारी तलाकशुदा और उपेक्षिता औरतों के बीच-  बोलते तो खूब वाहवाही लूटते"
        मैंने कहा," देखो मधू, मजाक मत करो । मेरा मूड काफी सीरियस है अभी...... तुम नारी होकर एक नारी की  दुख नहीं समझती।
              "अरे साव जी, ये सुख-दुख  कुछ नहीं सब त्रिया चरित्तर है .....आप क्या समझेंगे इसे-  देख लेना देवी जी अपनी आदत से बाज नहीं आएंगी और न ही देवता... सुधारेंगे.......
             मुस्तफा मियां के पीने का दौर और बढ़ गया। पोस्ट ऑफिस में बहुत पहले जमा की गई रकम करीब  तीस हजार रुपये निकालकर धुआंधार खर्च करने लगे। कहना असंगत ना होगा जितनी शराब एक माह में पीते थे उतनी एक सप्ताह में पी गए ।
        सलमा और भी चिंतित हो गई । उसका एकमात्र तीर भी चूक गया । अर्थाभाव से ग्रस्त होकर वह एक दिन गायब हो गई
     कहाँ?  खुदा जाने !
  इधर मुस्तफा मियां की हालत गंभीर हो गई। सिर्फ वह थे और शराब थी। पड़ोसी रात में भोजन की थाली छोड़ जाते -  जो सुबह ज्यों  की त्यों पड़ी मिलती।
एक दिन
दो दिन
तीन दिन।
उस रात कड़ाके की ठंड पड़ी । देर सुबह तक मास्टर साहब के मकान का दरवाजा नहीं खुला । आसपास के लोगों ने यह देखा तो उन्हें कुछ शक हुआ । दस बजे के आसपास गांव के कुछ जिम्मेदार लोग एकत्रित होकर टीन का दरवाजा पीटने लगे । अंदर से कोई उत्तर कोई  आवाज नहीं, तब  दरवाजा तोड़ दिया गया।
       देखा गया कि मुस्तफा मियां पर्छी  में-  जमीन पर औंधे पड़े हैं।  एक व्यक्ति ने डरते डरते उनके शरीर को छुआ- बर्फानी शीतलता थी। दाहिने हाथ की तर्जनी को चूहे ने कुतर डाला था । जांघ के नीचे उनकी चिर सहचरी अधभरी टाइगर छाप बोतल पड़ी थी ।
            सब कुछ खत्म हो गया था।
" संत्रास "का देवता चला गया था । अपने पीछे पीड़ा। आक्रोश और न जाने कितने दुर्दान्त ज्वलन्त प्रश्न चिन्ह छोड़कर........
       मैं आज भी सोचता हूँ दोष किसका था? कभी लगता कि मियां दोषी हैं तो कभी लगता कि उनकी बेगम।
          क्या पता, ईश्वर की लीला अपरम्पार है- उसकी अवघठ माया से मि. मुस्तफा हुसैन की निष्क्रिय शुक्र- कीट सक्रिय हो गए हों और उनकी बीवी का गर्भ ठहर गया हो ...
           क्या पता- डॉक्टर (द्वारा दी गई रिपोर्ट ही गलत हो .......)
          पति के बार-बार कि आक्षेप से वह (सलमा) एकाएक तिलमिला गई  हो और अपने पतिव्रत का  प्रभाव न दे सकने की स्थिति में (इसका प्रमाण भी  कौन दे सकता है ?) उलटे विद्रोहिणी हो गई हो......

                       ***      *** *
बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396

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