उसके बाद (कहानी) बसन्त राघव

उसके बाद  (कहानी)
--------------
बसन्त राघव

श्रीमती सिंह लेटे लेटे कोई पुस्तक पढ़ रही थी लेकिन सच पूछा जाए तो वह सिर्फ  छोटे छोटे अक्षरों की बारीक पगण्डियों में अपनी आखों को मात्र भटका रही थीं । मस्तिष्क का वह केन्द्र जो शब्दों के निहितार्थ को पकड़ता है और उससे संवेदित होता है , कुछ और ही कर रहा था ।
    मि . लोकनाथ सिंह भीतर ही भीतर कुढ़ रहे थे और जब कुढ़न पराकाष्ठा पर पहुंच गई तब उन्होंने बती बुझा दी।
  "यह क्या मजाक है एल?"  पढ़ने दो डिस्टर्ब न करो ....प्लीज..." श्रीमती सिंह झुंझलाकर बोली।
      "रोशनी आंखों में चुभ रही है रमा बाद में पढ़ लेना" मि. सिंह ने अनुनय किया और अपनी पत्नी की बगल में आकर लेट गए। मिसजे सिंह झट करवट बदल ली तब मि. सिंह ने फुसफुसा कर कहा-"यह क्या रमा?इतनी उपेक्षा...."
मिसेज सिंह झटके से उठी और अपने पति के पैर दबाने लगी। मि.सिंह ने तुरन्त पैर खींच लिए मानों बिच्छू ने डंक मार दिया हो- "क्या कर रही हो तुम?"
   "वही ,जो एक मर्द को अपनी बीबी से अपेक्षा होती है"  मि.सिंह ने फ़िक्र करने के अंदाज में कहा-"तुम अब भी नाराज हो न?"
  "नहीं -एल ,कर्तव्य को तुम नाराजगी कहते हो, सो जावो,मैं पैर दबा देती हूँ.... नींद जल्दी आ जाएगी"
मिसेज सिंह अपने पति को पीठ के बल पूरी शक्ति से ढकेलती हुई बोली। मि.सिंह ने बेड लैंप का स्वीच दबा दिया। कमरे में नीली रोशनी बिखर गई।
मि. सिंह के अहं को ठेस पहुंची लेकिन वह अपने आप को जब्त कर गए और छेड़ने के अंदाज़ में बोले....."माई लव, मुझे तुम्हारी दुलर्भ सेवा नहीं, तुम्हारी देह चाहिये.....कम आँन डार्लिंग...."
     कलाई  पर हाथ और भी कस गया।
"देखो रमा , अब मेरे सब्र का बांध टूट रहा.. प्लीज...."
" क्या मैं तुम्हारी वासना पूर्ति का मात्र साधन हूँ एल? क्या तुमने मुझे बच्चा पैदा करने वाली मशीन समझ लिया है... कि जब जी चाहा हैंडिल कर लिया?...."
मिसेज सिंह की सांसे तेज हो गई। वह हांफ रही थी। मि.सिंह अपनी बीबी को आविष्ट देखकर चिंतित हो गए।जानते थे जब पारा चढ़ जाता है तब फिर कई दिनों तक चढ़ा ही रहता है। वह बोले-" वाह! क्या डायलॉग है, किस फिल्म का है रमा ?......हाँ याद आया वो जो शादी के बाद हमनें पहली फिल्म देखी थी , क्या नाम है....... उसी में था यह डायलॉग....."।
    उन्मीलित नेत्रों से मिसेज सिंह अपने पति की ओर देख रही थी। वक्रोक्ति के प्रहार से वह उत्तेजित सी हो गई थी। बोली-
"तुम्हें तो यह भी याद नहीं प्राणेश्वर कि हमारी शादी को केवल एक ही साल हुआ है और हम एक दूसरे पर कितना विश्वास करते हैं -है न?"
" ओफ, विश्वास, विश्वास विश्वास -बंद करो डार्लिंग -बहुत हो गया- देखो मैंने अपना मन बिलकुल साफ कर लिया है- दर्पण की तरह.....चाहो तो तुम अपना अक्स देख सकती हो"
       मिसेज सिंह के अधरों पर अर्थपूर्ण मुस्कान थिरक गई। मि. सिंह ने अपने आपको संयत रखा और कोहनी के बल उठते हुए, किंचित ग्रीवा उठाते हुए, कुछ सांकेतिक भाषा में कहा, जिसका अर्थ मिसेज सिंह बखूबी समझती थी।
     उसकी आखों में स्पष्ट इनकार के भाव थे। मि.सिंह ने विवश किया तो वह झल्लाकर बोली-
"तुम बहुत स्वार्थी हो एल तुम्हें मेरी इच्छा और महत्वाकांक्षा की जरा भी परवाह नहीं। अपने पर जब आती है जबर्दस्ती पर उतर आते हो। तुमने हमेशा मेरा उपयोग नींद की गोलियों की तरह किया है....."।
  "देखो रमा, तुम खामखा बात का बतंगड़ बना रही हो..... तुम मुझ पर बहुत आरोप लगा रही हो.... कल मैंने तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध काम किया? मैं पूछता हूँ तुम्हारी कौन सी इच्छा पूरी नहीं हुई?? तुम्हारी क्या महत्वाकांक्षा ....जरा सुनूं तो।"
"तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे न मेरी कोई इच्छा है और न महत्वाकांक्षा । तुम्हारी इच्छा मेरी इच्छा है और तुम्हारी महत्वाकांक्षा मेरी महत्वाकांक्षा.....।"
"ओ हो,हद हो गई- इच्छा -महत्वाकांक्षा ....कुछ कहोगी भी या यों ही सारी रात पहेलियां बुझाती रहोगी" मि. सिंह ने झल्ला कर कहा और हताशा में अपनी गर्दन झुका ली।
     कुछ क्षण बाद मिसेज सिंह ने कहा-" मैं सर्विस करना चाहती हूँ एल....मेरी बड़ी  इच्छा है"
   "आई से शट अप...खबरदार अगर आइन्दा ...ओह
नो," मि. सिंह अपने आवेश को नियंत्रित करते हुए बोले-" रमा ,तुम्हें सर्विस करने की क्या जरुरत? क्या मेरी तनख्वाह पर्याप्त नहीं है?...."
  "इसका मतलब है तुम नहीं चाहते कि मैं सर्विस करुं। और मैंने फैसला कर लिया है चाहे कुछ भी हो मैं अपने पैरों पर जरूर खड़ी होऊंगी, मिसेज सिंह ने निश्चयात्मक स्वर में कहा।
"रमा ,तुम समझती क्यों नहीं..... औरतों को नौकरी क्या शोभा देती है?"
    "शोभा दे या न दे , लेकिन मैं जरूर करूंगी। तुम क्यों नहीं समझते एल आखिर मेरी डिग्री कब काम आएगी। और फिर क्या दुनिया में मैं ही अकेली नौकरी शुदा औरत होऊंगी?"
"तुमको मुझ पर विश्वास नहीं है न? कि कब बीच राह में तुम्हें छोड़ दूं--"
   "नहीं एल, ऐसी बात नहीं है" रमा अपने पति के ऊपर झुकती हुई बोली- अपनी ठुड्डी को हथेलियों से थामे हुए थी वह।
   " तो फिर और क्या बात है?"
रमा  चुप रही। उसकी नज़रें लम्बवत मि. सिंह के मुख पर पड़ रही थी। और मि.सिंह उन नजरों की चुभन महसूस कर रहे थे। कुछ देर बाद रमा ने कहा-"मान लो कभी ऐसा मौका आ जाए कि तुम्हारा मन मुझसे भर जाए और तुम अपना मुह फेर लो तब मेरा क्या हश्र होगा एल?"
    " मैं वचन देता हूँ - ऐसा कभी नहीं होगा" मि.सिंह ने दृढतापूर्वक कहा तब रमा अंगुलियों से अपने पति के बालों को छेड़ती हुई बोली-" तुम्हारे वचन पानी की लकीरें हो सकते हैं......"।
     "यह समय ही बताएगा.... लेकिन ऐसा कहकर तुम मेरा अपमान ही कर रही हो..... वैसे मैं हरगिज पसंद नहीं करुंगा कि मेरी बीबी नौकरी करें..... चार मर्दों के बीच अपनी नुमाइश करे"
     " क्या कहा -नुमाइश? मिसेज सिंह की आखों में एक चमक सी पैदा हुईँ।
  " हाँ- हाँ ,नुमाइश" मि. सिंह का जवाब था। उसने कहा- " तुम क्या जानों रमा, कमाऊ औरतों की क्या कद्र होती है। लोग कैसी कैसी धारणाएं रखते हैं।"
   "कैसी कैसी धारणायें?"
मि.सिंह चुप रहे। रमा बोली-" आज तुम पर्त दर पर्त उघड़ रहे हो एल, तुम इतने शंकालु होगे, मैं नहीं जानती थी- शंकालु ही नहीं मतलबी भी...."
" और कुछ !" मि.सिंह ने कहा।
मिसेज सिंह अपलक अपने पति को घूरने लगी, क्रोध था लेकिन विवश।
     इस जद्दोजहद में कुछ क्षण बीत गए। मि.सिंह अपनी उत्तेजित बीबी की तीखी नजरों से बचने के लिए दूसरी ओर देखने लगे। मिसेज सिंह कहीं पर धुधंवा रही थी। जैसे गीली लकड़ी जल नहीं पाती तुरन्त। फिर जैसे एकाएक पकड़ लेती है आग भक्क से- मिसेज सिंह ने कहा-
"कालेज की तमाम रंगीन तितलियां तुम्हारे ईर्द गिर्द मंडरावें,यह मैं बर्दाश्त कर लूं, अंजू चतुर्वेदी, मेनका माथुर, कीर्तिलता मलहोत्रा, रेखा सांवरिया और विनीता भटनागर.... न जाने कितनी दिलफरेब लड़कियां हमारे घर आते रहें , यह मैं बर्दाश्त करती रहूं- तुम मेरे ही सामने उनसे घंटों बतियाओ, जरूरत पड़े तो अपनी छोटी प्रयोगशाला में उन्हें ले जाकर माइक्रोस्कोप के ऊपर घंटों झुके झुके सूक्ष्मजीवों का लैंगिक जनन समझाओं.... यह सब मैं बर्दाश्त कर लूं लेकिन तुम मेरा कोई रिश्तेदार ही  मुझसे मिलने आ जाय यह तुम्हें गंवारा नहीं हो सकता.... फिर मैं सर्विस करुं यह तुम्हें क्यों बर्दाश्त होगा।"
     "ओह, आई से..चुप रहो ।" मि.सिंह एकदम से उबल पड़े। उनका उबाल पूरे बेडरूम को कंपा गया।
मिसेज सिंह की आँखें आर्द्र हो गई। सिसकियों के बीच वह बोली -"ठीक है एल .अब मैं कुछ न कहूंगी- कभी नहीं..... सो जावो...शुभरात्रि और मिसेज सिंह ने चादर तान ली।
   " गुड ना..इ..ट" मि.सिंह ने बुदबुदाया। चुप्पी के समुद्र (निस्तरंग) में जैसे इन शब्दों को उछाल दिया गया हो।
      वह निनिर्मेष अपनी पत्नी के निढाल शरीर को देखता रहा जो चादर के कवच में सुरक्षित था...लेकिन आखें आठ आठ आसूं बहा रही थी।
     समय मध्य रात्रि की ओर बड़ी तेजी से भागता जा रहा था। उन दोनों के शरीर एक दूसरे को छू रहे थे लेकिन उन दोनों के बीच जैसे मीलों का फासला था। मौन उस फासले को और भी बढ़ा रहा था।
        टाउन हॉल के 'घड़ियाल'ने बारह बजाए। टन टन से अर्ध रात्रि का मौन भंग हुआ। कृष्ण पक्ष के पंचमी का चांद कुछ क्षण के लिए रुका पीलिया के रोगी की तरह धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा।
     मि.सिंह, लाँन की ओर खुलने वाली खिड़की में से आकाश के आयताकार टूकड़े को घूरने लगे..निरर्थक । फिर 'विल्स सिगरेट'के अधजले टुकड़े को अंगूठे और मध्यमा की सहायता से झटकार दिया  और फटाक से खिड़की के पट बंद कर लिए। थकान भरे कदमों से पलंग की ओर फिर लौट आए।
     श्रीमती सिंह निढ़ाल पड़ी हुईं थी। जिस चादर की छोर को बलपूर्वक अपनी मुठ्ठी में भींचकर उसमें सिमट गई थी। निद्रावस्था में उसके अवचेतन मस्तिष्क को उसकी यह हठधर्मिता पसंद नहीं आयी। मुट्ठी ढीली हो गई थी और चादर एक ओर सरक गई थी।
   सिल्क गाउन की सारी सीमाओं को लांघकर नारी देह के अधिंकाश अवयव अपनी स्वामिनी की अपरुपता को प्रमाणित कर रहे थे।
        आखें उस मांसल सौंदर्य को संभाल नहीं पा रही थी। अचानक मि.सिंह झुके और अपनी नवोढ़ा बीबी के रसीले होठों पर अपने जलते होंठ रख दिए।
  " ऊं...ऊं...क्या है, छोड़ो ...सोने दो तंग न करो ऊं ...." टूटती नींद में मिसेज सिंह ने गिंगियाकर करवट बदल ली। मि. सिंह उसके कूल्हे और कन्धे पर
हाथों का दाबव देते हुए उसकी करवट अपनी ओर बदलने लगे। "ऐ रमा, ओफ्ओ, इतनी नींद ...लगता है पिछली 'चार रातें जागकर बितायी है...." लेकिन मिसेज सिंह की नींद टूटकर पुनः जुड़ गई, तब मजबूरन उसकी कमर पर गुदगुदाने लगे। मिसेज सिंह कसमसा कर उठ बैठी- " यह क्या मजाक है एल ?...ओह ,सोने में भी बंदिश.... हद हो गई.... सच है औरत कितनी पराधीन और मजबूर होती है...."।
     "तुम अजीब औरत हो, इतने दिन बाद वापस लौटा हूँ और तुम हो कि घोड़े बेचकर सो रही हो?"
  "कितने दिन बाद?"   वह जम्हाई लेती हुई बोली- "चार दिन क्या बहुत होते हैं?  मुझे सोने दो  एल . बड़ी जोरों की नींद आ रही है.... ऊंss..कल ..."
    और वह मि.सिंह की गोद में ही लुढ़क गई। तब मि.सिंह अपनी पत्नी के सिर को दोनों हाथों से थामकर गंभीर स्वर में बोले-
    " रमा , तुम ठीक हो न ?" मिसेज सिंह हड़बड़ा कर उठ बैठी। उसकी बड़ी बड़ी निद्रिल आखों में एक अनोखी चमक कौंध गई-"क्या मतलब?"
गर्दन झटककर वह बोली।
    " मतलब साफ है, तुम इतनी ठंडी कब से हो गई  रमा....। मैं सोचता हूँ....।"
फन कुचले नागिन की तरह वह आहत अपने पति को घूरने लगी फिर बोली- मैं भी अगर गुस्से में आकर तुम्हारी तरह कह दूं "चुप रहो" तो तुम थप्पड़ मार दोगे न एल.? तुम पुरूष हो न ,तुम्हारे अहं को कोई ठेस पहुंचाए...तुम यह सहन नहीं कर सकते....."
   "रमा ,माई लव, तुम कभी कभी ,अजीबो गरीब बातें करती हो"  मि. सिंह ने कहा।
"अजीबोगरीब?"
" हाँ, सचमुच"
"ताज्जुब है, मेरा यह विशिष्ट गुण तुम्हें विवाह पूर्व कैसे नहीं मालूम हुआ...."
   "तुम शादी के पहले ऐसी कहाँ थी- डार्लिंग?"
"काश कि हम शादी न करते और वैसे ही आवेश भरा प्यार करते चले जाते" वह अत्यंत भावुक होकर बोली और पलंग से हचमचा कर नीचे उतर गई।
      मि. सिंह की शंकालु नजरें ,बाथरूम की ओर जाती हुई रमा का अनुसरण करने लगी पग संचालन और कुल्हों की गत्यात्मकता में जानलेवा सांमजस्यता  थी।
      " क्या अब भी नाराज हो?"
ज्योंही वह बाथरूम से वापस आई मि.सिंह का मक्खन युक्त प्रश्न तैयार था।
   "हाँ बहुत, कल आने वाले थे- क्यों नहीं आए?"
"क्या स्पष्टीकरण जरूरी है?"
"नहीं ,तुम्हारे लिए कुछ भी जरुरी नहीं, और फिर मैं कहाँ स्पष्टीकरण मांग रही हूँ, हाँ ,मैं स्पष्टीकरण दे सकती हूँ कि आज मुझे नींद क्यों आ रही है । तुम कह गए थे न, 'प्रेक्टिकल इक्जाम' तीन दिनों तक चलेंगे, उस हिसाब से मैं तीन रातें खूब सोई, परन्तु कल सारी रात जागकर बितायी- अब आवोगे, अब आवोगे.... खैर, सुनाओं, अम्बिकापुर कैसा लगा? एक्स्टर्नल के रूप में तुम्हारी खूब खातिरदारी हुई होगी....क्यों?"
"क्यों नहीं, वैसे अम्बिकापुर बड़ी 'अच्छी' जगह है रमा ,मुझे अफसोस है तुम्हें साथ क्यों न ले गया।"
"कुछ बौध्दिक मजबूरियां होंगी, वर्ना तुम  ले भी जाते.... अरे हाँ, वह बाघाम्बर की बात बतला रहे थे..।बड़ी मजे की बात ....क्या नाम बताया उस लड़की का जिसने तुम्हें यह बाघाम्बर भेंट दिया?"
  "ओह रमा मेरा शरीर टूट रहा है.... मुझे भी जोरों की नींद आ रही है.... मैं सिर्फ तुम्हारी वजह से जाग रहा हूँ...."
  "मेरी वजह से?"
  " हाँ,सच मानों तुम्हारे खर्राटे के दौरान मैं लगातार चहल कदमी करता रहा हूँ.... इतना तड़पाने से तुम्हें क्या मिलता है प्रिये ?'
"  तुम्हारी तड़प सच है न?"
"हाँ,शादी के पहले की तड़प,बिलकुल ओरिजनल"
"तुम्हारी यह आदत बुरी है एल. , पहले झड़प फिर तड़प"
मि.सिंह ने अपनी कलाई घड़ी रमा को बताकर कहा-'पहले देख लो कितना बजा है-'
"सिर्फ एक" उसने कहा।
"'सिर्फ एक', तुम तो ऐसे कह रही हो, जैसे अभी अभी रात शुरू हुई है"
और मि.सिंह ने मिसेज सिंह को एक बारगी अपनी बाहों में भींच लिया। मिसेज सिंह कसमसाकर परे छिटक गई। मि.सिंह आश्चर्य चकित अपनी ब्याहता पत्नी की ओर देखने लगे।
मिसेज सिंह का मुख एकदम लाल हो गया।  रमा -"अकेली देह मैं तुम्हें नहीं सौप सकती एल. मन और आत्मा तो रह जाएंगे...।"
" मन और आत्मा तुम अपने पास ही रक्खो.... मुझे सिर्फ तुम्हारी देह की आवश्यकता है... अगर तुम सीधे तैयार न होगी तो मैं बलातः....।"
"भूखे भेड़िये की तरह?.....आदमखोर शेर की तरह..??.."
"हाँ , भूखा भेड़िया...आदमखोर शेर....."
मि.सिंह गरजे! रमा एक क्षण के लिए कांप गई- हिरणी सी। उसे अकस्मात खयाल आया, एक अमोघ अस्त्र उसके पास है।उसने साहस बटोरकर कहा -"सिर्फ शरीर ही मिलेगा, तुम्हें एल. मन और आत्मा तो उसी दिन मर चुके,जिस दिन तुमने महाराजिन को यह कहा -" देखना ,मैं कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हूँ - मेम साहब पर नजर रखना' मैं पूछती हूँ, तुम कौन होते हो मुझ पर किसी गैर को गुप्तचरी के लिए नियत करने वाले?"
    मि.सिंह अवाक रह गए। चेहरा फक्क सफेद। काटो तो खून नहीं। तीर निशाने पर लगा।
   वह कह रही थी-" एल, तुमने अभी अभी कहा था - "तुम ठीक हो न? '-  इस प्राणान्तक कथन के मूल में तुम्हारा वही शक्की पुरूष बैठा हुआ है जिसकी एक आँख हर वक्त मुझ पर लगी रहती है ...."।
वह आवेश में कांपने लगी,इधर मि.सिंह पानी पानी हो गए।....उनका अहं कुन्ठा की जटिल ग्रंथियों में उलझ कर रह गया।
   मिसेज सिंह भी उत्तेजना की लहर को झेलते झेलते पस्त हो चुकी थी। विद्रोह पुराना था- न जाने कब से पूर्ववत् घनीभूत होता चला आया था और अचानक विस्फोट हो गया।
न जाने कितनी देर तक दोनों मौन प्रतिमुख लेटे रहे।उनकी विचार तरंगें भी जैसे एक दूसरे की विपरीतगामी हो गई थी। पुरुष भविष्य की दुर्गम चढ़ाइयाँ चढ़ रहा था तो स्त्री अतीत की मनोरम घाटियाँ उतर रही थी। दोनों के बीच कितने चेहरे उग आए थे। कितने दृश्यों का अनदेखा आयाम चेतना को झनझना कर चला गया था।
      मि.सिंह को याद आ रहा था वह विशिष्ट दिन जब उसके जीवन में पहली बार एक क्रांति घट गई। उस दिन - एक बड़े से हालनुमा कमरे में बी.एस.सी फाइनल की क्लास लगी हुई थी। डेढ़ सौ से भी ऊपर स्टुडेंट्स बैठे थे। फुसफुसाहट से सारा कमरा भरा था।
      एक युवा लेक्चरर नए नए नियुक्त होकर आए थे- मि. लोकनाथ सिंह । उनका इन्ट्रोडक्शन लेक्चर होना था। वातावरण में गहमागहमी थी- विद्यार्थियों में उत्सुकता थी।  थोड़ी ही देर में वे आए और टेबिल के पास आकर खड़े हो गए। सभी छात्र और छात्राएं खड़ी हो गई।
  चेहरे पर हल्की सी घबराहट के बावजूद होठों पर लुभावनी मुस्कुराहट तारी थी। उन्होंने सबको बैठने का संकेत किया और अपना परिचय देने लगे। फिर सभी छात्र-छात्राओं को बारी बारी से अपना नाम बताने के लिए आग्रह किया।
    पहली और दूसरी पंक्ति छात्राओं की थी और करीब पचास के आसपास छात्रों की संख्या थी। लड़कियां खड़ी होकर अपना अपना नाम बताने लगी। दूसरी पंक्ति में रमा बैठी हुई थी ज्यों ज्यों उसकी बारी करीब आने लगी त्यों त्यों उसकी धड़कन बढ़ती जा रही थी। आखिर उसकी बारी आयी। पैरों में हल्का सा कम्पन होने लगा था जब उसने खड़ी होकर कहा - रमा ठाकुर...."।
मि.लोकनाथ सिंह अचानक पूछ बैठे थे-"क्या आप ठाकुर साहब (हेड आँफ द डिपार्टमेंट जूलाँजी) की सिस्टर हैं?.....दरअसल आपका फेसकट....।'
और पूरी क्लास एक बारगी -हंस पड़ी थी- मि.सिंह हैरान से हो गए। उनको समझ ही नहीं आया- हंसने की क्या बात हो गई। इधर रमा ठाकुर का चेहरा शर्म से लाल हो गया।
          वह बैठी तो बगल वाली मिस रेखा ने कोहनी मारकर फुसफुसाया - "हाय रे मेरी जान "अन्डर लाइन्ड हो गई..।
     तब रमा को क्या पता था ये ही उक्ति उसके जीवन के एक महत्वपूर्ण अध्याय की प्रस्तावना बनकर रह जाएंगे।
   वह सोंचे जा रही थी अतीत - इन्द्रधनुषी अतीत। कितने रोमांचकारी क्षण-कितनी मोहक शतरंगी स्मृतियां - कितने आकर्षक चित्र-अतीन्द्रीय रूप-रस -गन्ध- स्पर्शों वाला अतीत.....
   सहसा मि.सिंह का एक हाथ आदतन मिसेज सिंह के कटि प्रदेश में आ गया, लेकिन जैसे ही उन्हें अपनी विस्मृति का बोध हुआ,झट अपना हाथ खींच लिया - 'आ... एम सारी'
     मिसेज सिंह अपने वर्तमान में लौट आयी। दोनों की आंखें चार हुईं। एक जोड़ी आंखों में क्षमा याचना के भाव थे तो एक जोड़ी आँखों में विगत का उल्लास।
    'एल!' मिसेज सिंह सम्मुख होकर बोली -
"एक बात तुमसे पूछूंगी , जवाब दोगे?'
"अवश्य" जिज्ञासा तैर गई आखों में!
"मान लो थोड़ी देर के लिए तुम मेरी जगह में हो, यानी तुम एक औरत हो...."
"क्या? मैं और औरत"?? क्या कह रही हो......"
"बस कुछ देर के लिए..........समझ लो कि यह मेरी परिकल्पना है...... तुम मेरी जगह ......तो तुम - मैं हूँ  और मैं - तुम .....और मैंने अपने अधिकारों (?) की रक्षा के लिए तुम्हारी अवमानना की है...... तुम्हारे दिल के सौ टुकड़े कर दिए हैं और उसके बाद अगर मैं तुमसे समर्पण करने के लिए कहूँ तो क्या तुम समर्पण कर दोगे? बोलो एल?"
  मि.सिंह एकटक सवालियां निगाहों से उसे देखने लगे और रमा उनके मुख पर प्रतिक्रियाओं की धूप छांव को गौर से देखने लगी। मि. सिंह अपनी बौखलाहट को दबाने की कोशिश करते हुए बोले- "रमा मुझे लग रहा है तुम बहुत सीरियस मूड में हो.....थोड़ा ढहलो,मैं  तुम्हारी ' परिकल्पना ' को ठीक से समझ लूं...... फिर जवाब दूंगा.... अभी मेरा 'ईगो' जागा हुआ है और जब तक वह मूर्छित होकर गिर नहीं जाता मेरे अंदर की नारी .....अर्धनारी ....चेतन नहीं हो पाएगी....  इस लिए जवाब के लिए थोड़ा समय दो.....'"
      उसके बाद मि. सिंह एकाएक खामोश हो गए। दोनों हाथों की अंगुलियां सीने पर आपस में फंसी हुई थी। ....और आखें छत की ओर ऊर्ध्वाधर निर्निमेष देख रही थी..... जैसे समाधी लग गई हो।
  मिसेज सिंह ने उनकी यह मुद्रा देखी तो कुछ सख्ते में आ गई।
  "तुम चुप क्यों हो गए एल."
क्षण एक एक कर चूकने लगे। वह अपने पति के बालों को अंगुलियों से छेड़ने लगी। मौन इतना गहरा था कि वह अपनी कलाई घड़ी की टिक टिक स्पष्ट रूप से सुन सकती थी। ब्रह्मा मुहूर्त के आते आते वातावरण इतना पवित्र और शान्त हो गया था कि शांति सिर्फ बाहर ही नहीं बल्कि प्राणों की गहरायी में बरस रही थी- कि वह न सिर्फ अपनी बल्कि अपने पति की भी धड़कन सुन सकती थी। उनके हृदय जैसे एक साथ ही स्पन्दित हो रहे थे, एक ही लय में - एक ही रिद्म में।
   "एल!"  मिसेज सिंह ने अपने पति की ओर देखा और यह देखकर कि पुरुष -आँखों से धारसार अश्रु झर रहे हैं, उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा!
    "यह तुम्हें क्या हुआ एल?" ...तुम रो रहे हो?
एल...एल..." वह झरते हुए अश्रुकणों को अपने हाथों से समेटने लगी। मि.सिंह अपने भीतर किसी बिन्दु पर बुरी तरह पिघल रहे थे। एक विचित्र सी भावना का सैलाब बढ़कर सारे केन्द्रीय विचारों को ढांप लिया था।
    वह रुन्धे कण्ठ से कहने रगे..." मुझे क्षमा कर दो रमा ,मैंने सचमुच तुम्हें बहुत दुख दिया है..... आज ,अभी  पहली बार अपने से तटस्थ होकर
....तुम्हारी जगह अपने को विस्थापित करके देखा है...... महसूस किया है....."
"एल!"
"हाँ रमा, कितनी बार, कितने सूक्ष्म हथियारों से तुम पर वार किया है मैंने .....आज जबकि नारी चेतना संक्रान्ति की दौर से गुजर रही है...... रमा , ..."तुम मुझे क्षमा कर दो"
"ओह एल, ."तुम पहले से कितने बदल गए हो....!
   मिसेज सिंह थूक निगलकर बमुश्किल बोल पायी। फिर अपने पति के माथे, गर्दन, गाल और होठों पर चुम्बन की बरसात सी कर दी। उसे होश ही न रहा, समर्पण  के उन आविष्ट क्षणों में किस कदर वह प्रबल चुम्बकीय क्षेत्र में स्वयमेव खिंच गई थी।
                         000
बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396

Comments

Popular posts from this blog

पुनर्पाठ:डाँ. बलदेव:सृजन और सरोकार :-लेखक-रजत कृष्ण

डाँ. बलदेव महत्व:- लेखक राजू पांडेय

बल देने वाले डाँ. बलदेव भैय्या:-डाँ. देवधर महंत