फूल नागफनी का (कहानी) बसन्त राघव
कहानी:- फूल नागफनी का
बसन्त राघव
मुझे अपनी बेखुदी पर बड़ी हैरानी होती है । शहर में और भी कई कपड़ों की दुकानें हैं, लेकिन ताज्जुब है मैं यही क्यों चला आया , जबकि मैं यह बिल्कुल नहीं चाहता था। यंत्रवत्....
- जिस कार ने मुझे इस शानदार दुकान के आगे ला खड़ा किया उसका नाम है क्रेटा cg13hP 00113 सेठ जी ने तपाक से मेरा स्वागत किया। उसकी मुख मुद्रा प्रश्नवाचक की तरह हो गई थी ।मैंने कार, सड़क किनारे लगा दी,और सीना ताने , सीढ़ियां चढ़ने लगता हूँ प्रभावोत्पादक अंदाज में ।
मैंने सरसरी निगाह से मुआयना किया - ग्राहकों को सम्मोहित करने वाली सज्जा रंग-बिरंगी साड़ियों का अंबार और कीमती कपड़ों का उपवन पूरी रंगत बदल गई है दुकान की। सब कुछ बदल गया है नौकर बदल गए हैं स्वयं सेठ जी बदल गए हैं और मैं भी तो कितना बदल गया हूं परिवर्तन ही जीवन है । समय सब कुछ बदल कर रख देता है पुराने घाव भर जाते हैं नए घाव उभर आते हैं ।
"गौंटिया जी तशरीफ रखिये। हमारे अहोभाग्य इतने लंबे अरसे बाद आपने रुख रौशन किया"। विस्फारित नजरों से देखते हुए सेठ जी ने कहा, फिर अपने एक कर्मचारी की ओर मुखातिब होकर आदेशात्मक लहजे में कहा " दिनेश गौंटिया जी के लिए फर्स्ट क्लास लस्सी जरा जल्दी...... लाना" फिर उन्होंने मुझे सोफा पर बैठने के लिए आग्रह किया।
मेरे होठों पर अर्थपूर्ण मुस्कान नाच गई , यह मैं आदमकद शीशे पर देख रहा था। मैंने कहा मेरे लिए उचित संबोधन गौंटिया जी नहीं आप 'मास्टर' जी संबोधित करें मुझे यही अच्छा लगता है। हालाकि मास्टरी की नौकरी के कुछ साल बाद ही लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर चिरमिरी में नगर पालिका आयुक्त के पद पर कार्यरत हूँ। और रिटायर्ड होने में अभी कई साल बाकी है.....
सेठ जी बौखला से गए, चेहरे पर प्रतिक्रिया स्पष्ट दिख रही थी। मेरे कहने का ढंग भी तो बेबाक था। एक रंग झिलमिलाया, आकर डूब गया है । उन्होंने सहज होने की असफल चेष्टा करते हुए कहा " आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूं?
" सेवा की जरूरत नहीं तकल्लुफ के लिए धन्यवाद.... मुझे दस बारह अच्छी साड़ियां चाहिए.... बेहतरीन, कृपया सेलेक्ट कर बांध दीजिए ....कीमत की कोई परेशानी नहीं" मैं केश पेमेंट करूंगा।" मुझे महसूस हो रहा था मेरे शब्दों में चुभन है।
" क्या आपको जल्दी है सेठ जी ने पूछा"। " नहीं मुझे कोई जल्दी नहीं है आप इनसे निपट कर साड़ियों का चुनाव कर सकते हैं"।
सेठ जी काउन्टर टेबल की ओर चले गए ,उस समय बहुत सारे ग्राहक इकट्ठे हो गए थे।
मैं दूर.. बहुत दूर ... दृष्टि परास की दूसरी छोर पर अतीत के क्षितिज तक नजरे दौड़ाने लगा, आठ साल पूर्व मैं इसी 'अनूप एम्पोरियम' से बेइज्जत बेदखल कर दिया गया था। गरीबी अपने आप में एक बहुत बड़ा अभिशाप होती है मैंने उस दिन यह शिद्दत से महसूस किया और खून का घूंट पीकर वापस लौट गया था।
बहन की शादी थी । पन्द्रह सोलह हजार के कपड़े नगद ले गया था। बाद में और भी कपड़ों की जरूरत पड़ गई.... नगद पैसे नहीं थे अतः मैंने इन्हीं सेठ जी को कुछ साड़ियां कपड़े उधारी पर देने के लिए कहा था , वह भी सिर्फ पन्द्रह दिन के लिए।
मैंने दीन होकर कहा था - सेठ जी ,बड़ी जरूरी है.... सिर्फ पन्द्रह दिन वायदा करता हूँ,जल्द लौटा दुंगा.."।
उनके माथे पर बल पड़ गए थे, मेरा कलेजा धक-धक करने लगा। थोड़ी देर के मौन के बाद उन्होंने स्पष्ट शब्दों में सफल व्यापार का तकाजा समझाते हुए इनकार कर दिया । मैं पानी पानी हो गया और अवाक उनका मुख देखता रहा.... विश्वास नहीं हो रहा था कि इतने स्पष्ट रूप से कोई इंकार कर सकता है,भला वह भी अनूप .....?
" बिल्कुल सोलह आने सच "मास्टर"...। उसने मास्टर पर कुछ अधिक ही जोर दिया था। मेरे घुटने कांपने लगे थे। मुझे लगा जैसे मैं शर्म से गड़ा जा रहा हूं बड़ी अजीब विवशता थी मैंने सब कुछ समाप्त कर देने के स्वर में कहा था " अनूप क्या कभी लेनदेन में गड़बड़ी हुई है मुझसे ?" लिहाज छूट गया अपने आप। वह चुप था
"फिर विश्वास न करने का कारण ?.... यह मत भूलो यहां सिर्फ यही एक दुकान नहीं है।"
"....और न ही तुम्हीं एक ग्राहक जिसकी बदौलत यह दुकान चलती है .....यार अब माथापच्ची ना करो, कह दिया सो कह दिया।" और वह खाता बही में कुछ लिखने लगा था ।
मैं अपमानित उपेक्षित बाहर चला आया था। अस्तित्व -हीनता की स्थिति में गरीबी का एहसास कितना विघटनकारी होता है यह मन इस वक्त जाना ..बहुत दिनों तक घाव हरा रहा एक अव्यक्त पीड़ा मेरी आत्मा को तर किए जा रही थी। खैर तूफान समय के साथ थम गया अंधड़ शांत हो गया । कसकते घावों में समय ने मरहम लगा दिया, बस एक पीड़ा एहसास अवचेतन के किसी कोने में दफन होकर रह गया था।
लेकिन मैं अक्सर सोचा करता। आखिर क्या बात थी जिसके कारण अनूप ने मेरे साथ अप्रत्याशित व्यवहार किया? कुछ बातें समझ में आती थी भ्रामक और निराधार ही सही किंतु इसी से मैंने अपनी प्रतिशोधी मन को समझा लिया था।
अनूप मुझसे चार-पांच साल बड़ा होने के बावजूद छुटपन से मेरा लंगोटिया यार था । हमारे परिवारों के बीच कभी सौहाद्रभाव था लेकिन समय के फेर ने कुछ हेरफेर कर दिया और यह सौहाद्र भाव धीरे धीरे कम होते होते बिल्कुल समाप्त हो गया था। सच बात तो यह है कि हमारे पुरखों ने उनके पुरखों को बसाया था। कहते हैं अनूप के परदादा सिर्फ एक लोटा लेकर हमारे गांव में आए थे। उन लोगों ने अपना कारोबार बढ़ा लिया था जबकि हम लोग लगातार आकाल के प्रकोप से बचने के लिए पुरखों की जमीन जायदाद बेचते चले गए, विघटन की क्रिया निरंतर चलती रही यहां तक अपनी परिस्थिति नाजुक हो चली पिताजी दूसरों के खेतों में काम करने जाने लगे थे। बाद में मैंने भी आंख मूंदकर मास्टरी कर ली थी । परिवार की डूबती नैया किनारे लग चली ।
उन्हीं दिनों अनूप ने अपने इकलौते लड़के आलोक जो आठवीं जमात में पढ़ता था को ट्यूशन पढ़ाने के लिए मुझे तैयार कर लिया। मैं रोज शाम को एक घंटा आलोक को पढ़ा दिया करता।
उनका व्यवहार से पुराना बंधुत्व लौटता प्रतीत हुआ। धीरे-धीरे उस मारवाड़ी परिवार में मेरे लिए जगह बन गई। अनूप की पत्नी मृदुला मेरे साथ स्नेह पूर्ण बर्ताव करती। वह उदार हृदय की महिला थी गहरी आंखों में उदासी की हल्की बदली छाई रहने के बावजूद होठों पर जीवित मुस्कान रची रहती।
उधर अनूप के मन में खोट उत्पन्न हो गया । मृदुला जब मेरे हाथों में चाय देती होती तो अनूप की नजरों में एक अजीब सा भाव होता । अनूप मुझे समझ नहीं सका था। मेरे अंदर कोई पाप नहीं था - कोई चोर नहीं था अतः मैं निश्चिन्त अपने काम से काम रखता। अब मैं सतर्क रहने लगा, मुझे अपनी औकात का और भी ज्यादा ख्याल रहने लगा । अनूप की आंखों का भाव मैं बड़ी आसानी से पढ़ सकता था। परंतु मृदुला सीधी-सादी महिला थी । पति की गूढ़ नजरों को पढ़ पाना उसके वश की बात नहीं थी। अतः उसके व्यवहार में कोई अंतर नहीं आया । बल्कि वह और ज्यादा खुलती चली गई।
एक दिन हमेशा की तरह मृदुला स्टडी रूम में आयी और चाय का कप टेबल पर रख दी । उसका चेहरा तमतमाया हुआ था । आंखें सूजी हुई थीं। मैं आलोक को गणित समझा रहा था । वह कुछ क्षण खड़ी रही फिर लौटने लगी तब मैंने कहा-" भाभी जी"
" हाँ" वह ठिठक गई। उसका मुख द्वार की ओर था अगर मैं यह कहूं मैंने अब चाय छोड़ दी है तो क्या आप विश्वास कर सकती हो?"
यह चाय का कप आप ले जाइए पीने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं।
वह एक बारगी मुड़ी थी। उसकी आंखें सुर्ख हो रही थी उसके होंठ कांपे थे। उस भाषामय कंपन का अर्थ उस समय मैं समझ नहीं सका । वह मुझे असमंजस की स्थिति में छोड़ कर चली गई
फिर मेरा भी मन उचट गया समय से पहले मैंने ट्यूशन समाप्त कर दिया । जीना उतर ही रहा था कि नौकरानी ने आवाज दी, मैंने पूछा "क्या बात है ?" तब उसने बताया 'मालकिन' बुला रही है।
दिसंबर का महीना था शाम का वक्त और मेरे माथे पर पसीने की बूंदें चू रही थी । नौकरानी ने एक कमरे की ओर संकेत कर दिया और वह अपने काम में लग गई।
मेरे पैरों में थरथरी सी रेंग रही थी.... दिल की धड़कन और सांसे तेज हो गई थी ।
वह (मृदुला) अपने कमरे में मेरे लिए प्रतीक्षित बैठी थी । मुझे आया देखकर उसने सोफे पर बैठने के लिए इशारा किया । पलंग के सिराने एक चौकोन स्टूल पर एक गुलदस्ता रखा हुआ था उसमें रंगबिरंगे फूल थे। मृदुला पलंग पर मूढ़े से टेक लगाए बैठी थी । कुछ देर की चुप्पी के बाद भर्राए गले से बोली - "आज ठंड कुछ तेज है न?"
" हां, कुछ तो है ....मैंने गले पर रिस रहे पसीने को रुमाल से पोछते हुए कहा । वह मुस्कुरा रही थी।
"हर्ष" उसने लाड़ से कहा, "चाय बना देती हूं.... जानती हूं तुमने पी नहीं .....
" कहा न भाभी, रोज-रोज चाय की औपचारिकता ठीक नहीं, मैंने सचमुच चाय छोड़ दी है । आपने मुझे यहां पर किसलिए बुलाया मैने पूछा?
वह पलंग पर इस तरह निढाल बैठी कि मैं कुछ उछल सा गया। वह बुदबुदायी ..."विश्वास".....हर्ष अगर तुम पर या तुम्हारी बातों पर विश्वास न होता तो तुम्हें यहां शायद कभी नहीं बुलाती। मैं जानना चाहती हूँ कि तुम्हें क्या हक है - दूसरे का अधिकार छीनने का या दूसरे पर अधिकार जमाने का? मैंने कहा मैंने कब किसी का अधिकार छीना है या किसी पर अधिकार जताया है..... भाभी जी यह आप कैसी पहेलियां बुझा रही हो" मैंने करीब करीब रूआँसा होकर कहा था। वह विचित्र नजरों से मुझे घूरे जा रही थी। वह गंभीर थी, पहेली बुझाने या मजाक करने जैसा कोई लक्षण नहीं था चेहरे पर। मैं उनसे आंख नहीं मिला पा रहा था।
उसने सीने पर से ढलते पल्लू संभाला और ...."हर्ष" , तुम्हें अपने विश्वास का बड़ा घमंड है न ..... मैं अगर कहूं कि मैं बहुत दुखी हूँ.. बहुत दिनों से दुखी हूँ... मुझे प्यार की जरूरत है, मुझे प्यार करो....उसके स्वर में अतिरिक्त आक्रोश उतर आया था। मैं सिर्फ तुम्हारे प्यार की भूखी हूँ..... तो , क्या तुम विश्वास कर सकते हो? वह सब एक ही सांस में बोल गई थी।
मैं अवाक उसके चेहरे की बदलती हुई रंगत देखता रहा। मेरे अंदर अनजाना भय सिर उठा रहा था। हम दोनों एक दूसरे को देख रहे थे।अचानक वह ठठाकर हँस पड़ी और हंसती रही बहुत देर तक। उसकी कोमल सी देह बेतरह हिल रही थी और जब वह सामान्य हुई उसकी आखों में आंसू भरे हुए थे। जी चाहा कि उसका माथा छू लूं और पूछूं 'भाभी' आपकी तबीयत तो ठीक है न?' पर ऐसा कुछ करना शायद मर्यादा का उल्लंघन करना होता।
मैं चलने के लिए जैसे ही उठना चाहा,वह तेजी से आगे आकर मेरा हाथ थाम ली। मैं एकदम सिहर उठा। बिलकुल गर्म हाथ। "यह क्या भाभी, आपको तो तेज ज्वर है... कुछ दवा वगैरह ली या नहीं.....
" मुझे कोई ज्वर-वर नहीं है- तुम्हारा भ्रम है 'हर्ष'
.....मुझे तो लगता है ज्वर तुम्हें है इतनी ठंड में पसीना छूट रहा है।" मैं झेंप गया था।
तभी बाहर किसी का पदचाप सुनाई पड़ा। मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी...मेरी हालत चोरों जैसी हो रही थी..। मृदुल ने मेरी मनस्थिति भांप कर कहा..."घबराओं नहीं..... आलोक है, और उनके पिता अभी बंबई में मौज करते होंगे" सुनकर मुझे बड़ा सुकून मिला था। तब तक आलोक बाहर से ही बोला - मम्मी मैं मैदान जा रहा हूँ थोड़ी देर से आऊंगा' और वह दौड़ता हुआ चला गया।
"अरे हां, आज तो बहुत अच्छा प्रोग्राम है वहां,मुझे भी इस वक्त वहीं होना था" अचानक खिसकने का मुझे बहुत अच्छा बहाना मिल गया ।हालाकी प्रोग्राम के बारे में मुझे कुछ भी जानकारी न थी। मृदुला बालों पर कंघी फेर रही थी । कुछ मुस्कुरा कर बोली - वाह, इसको कहते हैं संयोग! मैं भी तो वही चल रही हूँ..."
मुझे पैरों तले जमीन खिसकती नजर आयी। मैं मन ही मन ईश्वर का सुमिरन करने लगा । मैं उसकी तरफ विवश नजरों से देख रहा था।
'बुजदिल' फुसफुसा कर उसने कहा था।यह शायद उसके भीतर की आवाज थी जो अनायास कंठ तक आ गई थी। और उसे पता न था कि उसने क्या कहा है पर उसका विस्फोट मेरे अपने मस्तिष्क में हुआ। मैं अत्यधिक नर्वस हो रहा था. । वह कह रही थी " मेरे प्रिय हर्ष, कहीं तुम यह तो नहीं समझ रहे हो कि मैं तुम्हें प्रेम करने के लिए बुलाई हूँ।
मैंने उसकी बातों पर गौर न करते हुए पूछा- किसलिए बुलाया था मुझे?
"ऐसे ही अकेली बोर हो रही थी,सोचा तुमसे गप्पे मार जी बहला लूँ..."
हम दोनों मौन थे बाहर से परन्तु भीतर तेज शोर ...
शायद हम दोनों इकट्ठे उस लमहा हम समान आयामों वाले विचार तरंगों से गुजर रहे थे।
"अच्छा भाभी अब मैं चलता हूँ"
"हर्ष", जानती हूँ, तुम्हें जाने की बड़ी जल्दी है। यह भी कि अगर मैं तुम्हें यह पूछूँ टाउनहाल में दरअसल क्या हो रहा है आज,तो शायद तुम न बता सको। तुम इस घुटन से मुक्त होना चाहते हो, न? ,वह अपने ही झोंक में कह गई उसने जैसे मेरे अंदर झांक लिया था......
" जल्दी मुझे भी है" उसने कलाई घड़ी पर नजर डालते हुए कहा" हर्ष, मुझे डॉ.सहगल की क्लीनिक में 6 बजे पहुंच जाना है। मैं सचमुच बीमार हूँ....."
"मैं भी चलूं साथ में"
"मुझे कोई हर्ज नहीं, परन्तु तुम्हारी प्रतीक्षा में संगीता भी तो बैठी होगी" पैनी निगाहों से उसने मुझे देखा।
कुछ देर वातावरण शान्त बना रहा। कहीं दूर से रेडियो में मीना कुमारी की हलकी मधुर आवाज आ रही थी। "चाँद तन्हा है आसमान तन्हा /चाँद तन्हा है आसमान तन्हा/ दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा /बुझ गई आस छुप गया तारा/ थर - थराता रहा धुंआ तन्हा/ ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं/ जिस्म तन्हा है और जान तन्हा...." पौने सात बज गए थे। मृदुला अचानक मेरे बिलकुल सामने आकर बोली..."हर्ष" ,मैं तुम्हें कुछ देना चाहती हूँ, तुम इंकार कर दोगे तो मेरा दिल टूट जाएगा....."
"मगर वगर कुछ नहीं" वह ड्रेसिंग टेबल की दराज से एक बंडल निकालकर मेरे हाथों में जबरदस्ती थमा दी। मैं बौखला गया । वह कह रही थी "पूरी ठंड बीत गई और तुम्हारे पास एक अच्छा सा स्वेटर तक नहीं... इसमें तुम्हारे लिए शूट के कपड़े हैं ...मैंने कहा न, इंकार बिलकुल नहीं चलेगा - बिलकुल ...अगर संगीता का डर है तो तुम मर्द हो हजार बहाने ढूंढ लोगे.. विश्वास है।" मेरे न नुकुर करने के पहले उसने कहा था।
मैं मूर्खों की तरह उसे देख रहा था। उसने अंतिम शब्दों पर 'स्ट्रेस' किया था। फिर उसने अपने पर्स से एक लिफाफा निकाल कर मेरी ओर बढ़ा दिया यह हिदायत देते हुए कि मैं उसे घर में जाकर एकांत में खोलूं। मुझे लगा जैसे उस लिफाफे के अंदर नोट हैं। मेरे पूछने पर वह कुछ न बोली। मेरे रक्त में अचानक उबाल सा आ गया- मैंने उत्तेजना में बंडल और लिफाफा पलंग पर पटकते हुए कहा- भाभी, आप मेरी गरीबी का मजाक उड़ा रही हैं..... ओह भाभी.....
मृदुला चुपचाप कपड़ो का बंडल और लिफाफा उठाकर पुनः मुझे देती हुईं बोली- हर्ष , अगर तुमने और इंकार किया तो मैं सच कहती हूं ठीक नहीं होगा... और वह तेज कदमों से बाहर निकल गई थी।
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में कमरे से बाहर आ गया। बरामदे में नौकरानी मुझे कौतूहल पूर्ण निगाहों से देख रही थी । उस लिफाफे में सौ सौ के दस नोट थे और साथ में कागज का मुड़ा हुआ पुर्जा।
" हर्ष, मैं चाहती थी आज तुम मेरे हाथों की आखरी चाय पी लेते, जाने तुम्हें क्या सूझी कि न पीने की ठान ली । तुम्हारी अंतरात्मा का यह विरोध अर्थहीन नहीं था , उसका एक जबरदस्त सार्थक परिप्रेक्ष्य है जिसे तुम चंद लकीरों के बाद समझ जाओगे .....
हर्ष मै बड़ी मुश्किल से लिख पा रही हूं। मेरे हाथ कांप रहे हैं आलोक को तुमसे दूर रखना पड़ रहा है उसके लिए हमने एक दूसरा ट्यूटर ठीक कर लिया है एक रिटायर्ड बूढ़ा शिक्षक , तुम्हारी किमती शाम तुम्हें मुबारक।
तुम्हारी
भाभी
दिनेश लस्सी का गिलास सेन्टर टेबल पर रख गया था। मेरा ध्यान बंट गया, ग्राहकों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। फैशनेबल महिलाओं का आना जाना जारी रहा। अनूप ने मुझे संबोधित करते हुए कहा.... बस थोड़ी देर और ....प्लीज , आराम से बैठे रहिए......हर्ष भाई"
मैंने मुस्कुरा कर लस्सी का ठंडा गिलास होठों से - जो जल रहे थे लगा लिया। दो परस्पर विरोधी चीजों में सामंजस्य स्थापित कर पाना बड़ा रिस्की होता है। मैं सोच ही रहा था।
मृदुला भाभी से वह आखिरी मुलाकात नहीं थी। आखिरी मुलाकात तब हुई थी, जब वह इस मुलाकात के चार महीने बाद मेरी बहन की शादी में विवाह गीत गाने के लिए आयी हुई थी -।
उससे अचानक सामना हुआ था। मैं कतई उसके लिए तैयार नहीं था। उसकी आंखों में ढेरों 'शिकायतें' थी। वह मंडप की ओर जा रही थी। मेरे नमस्ते कहने पर उसने गुमसुम ,हाथ जोड़ लिए थे। मैंने पूछा "कैसी हो भाभी ! "
उसके पतले होठों पर बीमार सी मुस्कान उसका जवाब थी । अनूप कैसे हैं ? " मैं उसे बिना रुके ही पूछा था और वह ' मुझे नहीं पता' कहकर औरतों की भीड़ भी ओर बढ़ गई उसके कहने के अंदाज में वेदना थी, तड़प थी आक्रोश था । मैंने महसूस किया मृदुला स्वयं से विद्रोह कर रही थी। बुझे हुए मुख पर तनाव की पुरानी रेखाएँ भासित हो रही थी । चार महीने में वह अपनी उम्र से बहुत बड़ी लग रही थी। मुझे यह भी लगा वह बहुत कुछ कहना चाहती थी लेकिन भभ्भड़ में कुछ न कह पायी।
उसी रात , बहन विदा हो गई । हम लोग स्टेशन से करीब 12 बजे लौट आए थे । उत्सव के विगत हो जाने की खामोश रिक्तता और बहन के ताजा विछोह की अनुभूति से मन विषाद युक्त था । माँ लगातार रोए जा रही थी । मैं भरे मन से बैठक जाकर आराम कुर्सी में निठाल पड़ गया
संगीता मेरी पत्नी ने आकर कहा - " दीदी घर जाना चाहती हैं , उन्हें पहुंचाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी...." मैं प्रश्न युक्त दृष्टि से उसको निहारने लगा और वह हौसला बढ़ाने के एवज में मेरे अस्त व्यस्त बालों को संवारने लगी थे । मैंने रुन्धे कंठ से कहा- अभी कैसे जाएगी? जब आ ही गई है तो थोड़ी देर और ठहर जाए - सुबह चली जाएगी ... "
मैंने तो बहुत कहा पर माने तब न ?" तो अमृत बाबा (नौकर) से कहो छोड़ आए" ' लेकिन अमृत बाबा तो बहुत पहले घर जा चुका है मैंने ही जाने के लिए कहा उसे
' ओह ! " मैं परेशान हो उठा |
मृदुला बाहर तैयार खड़ी थी- "मैं तो चौंक से रिक्शा लेकर जा सकती हूं लेकिन संगीता माने तब न?"
"भाभी ,तुम्हीं अगर उसकी बात मान लेती तो क्या हो जाता.... आखिर...... अच्छा ठीक है चलो..."
मैंने संगीता पर एक नजर डाली, जो स्निग्ध भाव से मृदुला को विदा कर रही थी।
हम लोग चौंक तक पैदल गये। वह मेरे साथ साथ चल रही थी, चुप चुप। मैं भीतर ही भीतर बहुत असहज हो रहा था। शायद उसकी भी हालत मेरे जैसी थी। असमंजस पूर्ण यह स्थिति और भी अधिक असमंजस पूर्ण हो गई थी, जब मेरे व्दारा अलग अलग रिक्शा लेने की बात पर झुंझला उठी थी। विवशतः एक ही रिक्शे में उसकी बगल में बैठने का रोमांच मैं संवरण नहीं कर पाया।
मैं किनारे की ओर सिमटा सिकुड़ा उसकी देह से कुछ दूरी बनाए रखने की यथा संभव कोशिश कर रहा था लेकिन जगह जगह से उखड़ी हुई सड़क पर रिक्शा दौड़ रहा था मैं पी.डब्ल्यू .डी .वालों को कोसने लगा जिनकी वजह से मेरी कोशिश बेकार हो रही थी।
बहुत देर तक हम दोनों खामोश रहे। मुझे तो कोई बात सूझ ही न रही थी। एक जगह शायद सड़क अधिक उखड़ गई थी झन्नाटेदार हिचकौले से मौन स्वमेंव टूट गया-"दो रिक्शे ले लेने थे भाभी, यह ठीक नहीं.... वह मुझे बेबाक देखने लगी। मौन टूटने के बजाय और भी मुखर हो गया था। अपनी ही बात पर मैं झेंप गया। वह उफन कर बोली थी-" हर्ष , अब तुम वापस लौट जाओ मैं अपने मुहल्ले के करीब आ गई हूँ.... मैं तुम्हारी शुक्रगुजार हूँ जो मैं यहां तक सुरक्षित लौट आयी हूँ...।"
" यह तुमने क्या कहा भाभी? " मैंने उव्देलित होकर पूछा था। तब वह और भी रहस्य पूर्ण ढंग से बोली- " तुम सभी पुरुष एक समान हो, एक ही थैले के चट्टे बट्टे -समाज के सामने भीरू लेकिन भीतर से बिलकुल वहशी ।उसने बहुत ही धीरे कहा था। -मेरे कान के पास। मैं तिलमिला कर रह गया था। इतने बेलाग तरीक़े से उसने पुरूषों के बारे में कहा था कि कोई भी पुरूष बर्दाश्त नहीं कर पाता। हो सकता है उसका यह आरोप उसकी अनुभूत त्रासदी का परिपाक हो,लेकिन न जाने क्यों वह मुझे तब भी बड़ी सहिष्णु लग रही थी। उसकी बातों से जो विरोधाभास टपक रहा था, वह उसकी आंतरिक पीड़ा का सहज उच्छलन था। संवेदना में मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर लाड़ से कहा था जो कि मुझसे अनजाने में ही हो गया था।
"सच बताओ भाभी,क्या बात है?"
"एक बात हो तो बताऊँ..... और हर्ष , मैं तुमसे विनती करती हूँ मुझे भाभी न कहो....जब तुम मुझे भाभी कहते हो तब लगता है मैं किसी की अमानत हूँ। जबकि मैं किसी की अमानत नहीं- यह सिध्द हो गया है..... जानते हो आज शाम जब आलोक मेरे मुह में पेड़ा जबर्दस्ती ठूंस रहा था तब मैंने कस कर उसके गाल पर थप्पड़ जड़ दिया था..... मैं सुबह से कुछ नहीं खायी थी.... वह मुझे मना रहा था....... वह ....वह मुझे अपनी माँ समझता है......मैं किसी की माँ नहीं, मैं किसी की कुछ नहीं.....मैं....."वह सुबकने लगी थी। उसकी बात सुनकर मैं सक्ते में आ गया था।मैं उसके जलते हाथों को धीरे धीरे सहलाने लगा । संवेदना के उन चरम क्षणों में सामाजिक मान्यताएं तमाम शर्तें एवं मर्यादा के सारे मानदंड ध्वस्त हो गए थे।
वह बहुत अधिक टेन्शन में थी। मैं उसके बारे में यह सोच भी नहीं सकता था कि वह इस कदर विद्रोही हो सकती है।
केवड़ा बाग के सामने दो राहे पर रिक्शे की चाल कम करके रिक्शा वाला पूछ रहा था-"किधर जाना है साब?"
मैंने कहा - दाहिने मुड़ना है- ओ पीली बिल्डिंग के सामने।
" रिक्शा की चाल पुनः तेज हो गई। कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने उसे संबोधित किया "मृदु" यह उसके लिए नया और मेरे मुह से पहली बार निकला हुआ अनोखा संबोधन था- वह एकाएक जैसे उद्बुद्ध हो गई थी-" मृदु?" क्या कहा तुमने? मृदु!! फिर से कहो तो....ओह,
उसने मेरा हाथ अभिभूत होकर दबा दिया। वह भीतर ही भीतर पिघल रही थी- अंधेरे में भी उसकी आंखें चमक रही थी।
मैंने कहा-"हाँ भाभी ,मृदु-तुम भीतर से भी मृदु होने की कोशिश करो....इतनी कटुता लेकर कहाँ जाओगी?"
"शायद तुम ठीक कहते हो..... मैं अब बहुत 'कटु'हो गई हूँ । कड़वाहट मेरे व्यक्तित्व में फैलने लगी है.. मैं चाहती हूँ कि सारी कड़वाहट आज उगल दूँ.....एक पुरूष के साक्ष्य में कम से कम वह देख ले कितनी कड़वाहट मैंने पी रखी है।" मृदुला ने एक दीर्घ निःश्वास लिया था।
"मृदु,न जाने क्यों ,तुम पुरुषों से खार खाए बैठी हो-भगवान करे अगले जन्म में तुम पुरूष ही हो..
" मैं - खुदा न खास्ता अगर अगले जन्म में मर्द हो गई तो देख लेना तुम औरत पैदा होगे.... और मैं तुम्हें पृथ्वी के किसी भी कोने से ढूंढकर - तुमसे शादी कर लूंगी....." वह खिलखिला कर हंस दी फिर स्वयं लाज से सुर्ख हो गई।
मैंने देखा वह अपना मानसिक संतुलन बड़ी मुश्किल से बनाए रखी थी। वह बहुत कुछ बोलना चाहती थी।
"बंधन सिर्फ हमारे लिए होते हैं हर्ष, हम चाहें लाख बगावत करें- पुरानी सभ्यता के बंधन टूट जाएंगे तो नई सभ्यता के बंधन इजाद कर लिए जाएंगे..... हर्ष तुमने तो हमारे घर आना बंद कर छुट्टी पा ली लेकिन जानते हो तुम्हारे नाम पर मैं कितनी बार कलंकित हुई हूँ-अपमानित एवं लांछित हुई हूँ। मुझे संदिग्ध निगाहों से देखा गया.... न जाने कितनी बार मुझे तुम्हारे नाम के साथ जोड़ा गया। मैं सच कहती हूँ कभी कभी तो मुझे भ्रम हो जाता कि मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ...... तुम समझते होगे मैं कितनी निर्लज्ज हूँ-कैसी बेतरतीब बातें कर रही हूं.... बिलकुल अमर्यादित .....हर्ष तुम चाहे जो भी समझना मैं आज पूर्णतः बरस जाना चाहती हूँ.. एक बूंद भी शेष न रहे.. हर्ष , मैंने संगीता से झूठ कहा था कि अनूप नामधारी व्यक्ति मेरा इंतजार कर रहें होगें..... तब मुझे बड़ा अजीब लगा था- जानते हो आज सुबह ही वह बंबई चला गया है....अक्सर बंबई जाता रहता है। सफल व्यपारी है न, जो नोटों का अंबार तो लगा सकता है लेकिन अपनी बीबी को खुश नहीं कर सकता- जो स्वयं तो हीन भावना का शिकार हो गया है, अपनी बीबी को भी शिकार बनाना चाहता है, जो अपनी ईष्या की आग में तो जल रहा है, अपनी बीबी को भी ईष्या की आग में झोंक देना चाहता है.......
" बस भाभी,ईश्वर के लिए यह सब बंद करें कम से कम रिक्शावाले का तो खयाल करो....." मैंने उसे टोका- वह संतुलन खोती जा रही थी।
"भाभी मत कहो मुझे, हर्ष! उसका गला भर्रा गया था।
"हाँ,हाँ, मृदु ही सही..... मैं सब कुछ जानता हूँ-समझता हूँ.... धीरज रखो-"
"धीरज, कैसे रखूं धीरज! हर चीज की सीमा होती है और मैं बहुत पहले सीमा लांघ चुकी हूँ। अब तो जरा सी बात मुझे...... मैं टूट चुकी हूँ शरीर से लेकर आत्मा तक।
वह चुप हो गई। एक तिमंजिले मकान के सामने रिक्शा रुक गया था। वयोवृद्ध नौकर अपनी मालकिन की प्रतीक्षा में जाग रहा था। उसने दरवाजा खोल दिया। मृदुला अपना उत्तप्त हाथ खींचकर उतर गई और बिना कुछ कहें व्दार की ओर बढ़ गई थी।
रिक्शा मुझे लेकर वापस लौट आया। रास्ते भर मैंने अनूप को जितनी भी गालियां दे सकता था, दिया।
अनूप निपट 'बनिया' सिद्ध हुआ। आदर्श, सिध्दांत और मानवीय गुणों का कोई औचित्य नहीं था, उसके सामने। सिर्फ पैसा ही सब कुछ है उसके लिए। पैसे के वजन पर वह दोस्त और पत्नी को तोलता है।पैसा क्या सचमुच इतना वजनदार होता है?
मैं सोचता था, मेरी मालीहालत ,अच्छी होती तो क्या उस दिन दो-तीन सौ रुपयों के लिए व बेइज्जत करता। मृदुला ही अगर भूतपूर्व राइस किंग '-की लड़की होती तो क्या उसके साथ भी वह अमानुषिक बर्ताव करता?
घर आते आते दो बज गए थे। बिस्तर पर पड़ते ही मैं लम्बी तान गया। सुबह संगीता ने झंझोड़ कर मुझे उठाया। बड़ी मुश्किल से मेरी आँख खुल पायी। संगीता ने मुझे रुक रुक कर जो कुछ बताया उससे मैं एकदम से उठ बैठा, मेरे हाथ पैर सुन्न हो गए। पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ चेतना शून्य हो गई। मृदुला ने नींद की गोलियां खाकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली थी।
शरीर से आत्मा तक का टूटन समाप्त हो गया था। सारे बंधन -सारे तनावों से मुक्त हो गई थी। सच्चाई बहुत कड़वी होती है और मैंने *पुरूष होने के नाते) देख लिया था। मृदुला ने कितनी कड़वाहट पी रखी थी.....सब कुछ तो उगल दिया था उसने मेरे सामने....
मृदुला की मृत्यु के दूसरे वर्ष अनूप ने अपनी तीसरी शादी कर ली थी।
इस घटना को आठ वर्ष हो गए हैं लेकिन मैं अब भी अपने को मृदुला की मृत्यु का मुख्य कारण मानता रहा हूँ। मुझे आज भी लगता है उसकी आवाज उसकी सुगन्ध- उसका स्पर्श मेरे आसपास तैर रहे हैं।
विगत और वर्तमान की सन्धि रेखा पर मैं खोया हुआ बैठा हूँ। शानदार अनूप क्लाथ एम्पोरियम मेरे कदमों पर झुका हुआ आज मुझे लग रहा है। मेरे सामने सेन्टर टेबल पर लस्सी का खाली गिलास रखा हुआ है। दूकान का कर्मचारी कपड़ों का बंडल बांध चुका है। सेठ जी मुझे बिल दे रहें हैं। 35 हजार चार सौ रूपये मात्र 11 साड़ियों की कीमत। मैंने फोन पे किया है। सेठ जी चिरोरियाँ करता है। कहता है कि यह दूकान मेरी है। मेरे होठों पर बड़ी अर्थपूर्ण मुस्कान नाच रही है। मैं इसे अपनी कलाई में बंधे कीमती डिजिटल घड़ी के काले फ्रेम पर बखूबी देखता हूँ।
0 0 0
बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396
Comments
Post a Comment