एक कटी हुई मनस्थिति (कहानी) बसन्त राघव
एक कटी हुई मनस्थिति (कहानी)
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बसन्त राघव
भोर से ही धारासार वर्षा होने लगी थी।आठ बजते कुछ थमी। साढ़े सात से क्लास लगती थी। और इस तरह मैं आधा घन्टा लेट हो गया था। मैं धर्मसंकट में पड़ा रहा, कालेज जाऊं कि नहीं।अक्सर ऐसा होता है जिस दिन अधिक बारिश होती उस दिन शहर से तीन किलोमीटर दूरस्थ महाविद्यालय बंद होता।
पहाड़ियों से घिरी हुई कालेज की बिल्डिंग थी। वहां सिर्फ स्नातकोत्तर कक्षाएं ही लगती थी।सिर्फ दो विषय थे अर्थशास्त्र और हिंदी। बहरहाल कुछ सोचकर मैंने कालेज जाने की तैयारी कर ली। रेनकोट डाले और साईकिल बाहर निकाल ली.
कालेज पहुंचते पहुंचते नौ बज गए। कालेज के सामने कुछ लोग फुहार का आनंद लेते हुए दिखाई दे गए। बड़ा सुकून मिला। यद्यपि मुख्य व्दार तक पहुंचने वाला इकलौता मार्ग जलमग्न था इससे मन थोड़ा खिन्न हो गया। ऐसी स्थिति में छात्राओं को विशेष परेशानी यह होती है-कि अगर वे साड़ियों में होती ,तो पिंडली तक साड़ियां उठानी पड़ती है। बगल में कापी किताब दाबनी पड़ती है और एक हाथ में चप्पल उठानी पड़ती है।
कभी कभी ऐसा भी होता है जब लगातार चार पांच दिनों तक झड़ी का आलम होता! बिल्डिंग की चारों ओर पानी भर जाता और तब कन्याकुमारी में बने विवेकानंद-स्मारक की याद ताजा हो जाती।
पिछले दो सालों से संस्था के सामने यह बात उठायी जा रही थी कि कालेज के सामने वाले भाग को मिट्टी से पाटकर मुख्य व्दार तक पक्का रास्ता बना दिया जाय। पर न जाने क्यों किसी का ध्यान इस जरा सी बात पर नहीं आया। उल्टे लोग नजारा देखने के लिए चले आते थे। खैर,
मैं रिससे के वक्त पहुंचा था। जैसे ही मुख्य व्दार में प्रविष्ट हुआ ,एम.ए. पूर्व (अर्थशास्त्र) के छात्र तनय घोष ने धीरे से कहा- " अरे परमार जी , आप कैसे चले आए भई! मैंने मुस्कुरा कर कहा -"क्यों ,मैं आने का अधिकार नहीं रखता क्या?"
वह और भी पास आ गया और करीब करीब कान के पास मुह संटाकर बोला-परमार जी आप लौट ही जाय तो अच्छा है।"
'परन्तु क्यों'? मैंने झल्लाकर कहा।
वह भी उसी तर्ज में बोला-"मैं पूछता हूँ क्या आप दाल-भात में मूसलचंद बनना पसंद करेंगे?"
घोष वहीं पर रूक गया। मैं उसकी तरफ देखने लगा। घोष कह रहा था - " अब भी नहीं समझे?" और वह जोर से हंस दिया। मैं उससे पिण्ड छुड़ाकर आगे बढ़ना ही चाहता था कि वह मेरा हाथ पकड़कर बोला "परमार जी, डिपार्टमेंट में मजनू साहब अपनी लैला को मोहब्बत का पाठ पढ़ा रहे हैं।"
मैं क्लास रुम की ओर बढ़ गया परन्तु मेरे कान में तनय घोष के ईष्या और आक्रोश में जलते हुए शब्द बज रहे थे।
मदन चपरासी क्लास रुम में ताला लगा रहा था। मुझे देखकर रूक गया और बोला-" आज कोई नहीं आया परमार जी....आप फालतू चले आए।"
मदन बड़ा मसखरा और मुहफट था। उसने दरवाजा खोल दिया और कुर्सियां को झाड़ते हुए कहा-" ये हिन्दी वाले होते ही हैं बहानेबाज जरा सा पानी गिरा नहीं कि कालेज आना छोड़ देते है।"
मैंने उसे कुछ डपटकर कहा- "मदन, तुम सच बोल रहे हो?कोई नहीं आया?"
वह कुछ सकपका गया फिर बाई आंख दबाकर बोला-"परमार जी इनकी बात छोड़िए। वो तो इतवार को भी चले आते हैं। इनका वश चले तो ये लोग गर्मी की छुट्टी में भी क्लास लगा दें.....।"
मदन चपरासी बाहर चला गया।
खिडकियों से हवा का आर्द्र झोंका अंदर आ रहा था। दूर क्षितिज धुंध में डूबा हुआ था। उधर बारिश अब भी हो रही थी। इधर अब धूप खिलने लगी थी।चिड़ियों के पर जैसे नर्म नर्म...।
मेरे भीतर कुछ गडमड होने लगा था। लैला-मजनू! यानी ऊषा माथुर और धनजंय वर्मा। मि. धनजंय वर्मा हाल ही हिन्दी विभाग में व्याख्याता नियुक्त हुए थे। इसी शहर के रहने वाले। और मिस ऊषा माथुर -डी.एफ.ओ नरेन्द्र माथुर की बहन,एम.ए.अंतिम की छात्रा। ये दो नाम शहर में बड़े मशहूर हो रहे थे। लड़के लड़कियों के बीच इनके तथाकथित रोमांस की चर्चा आम थी। कालेज की दीवारों पर ये नाम खुदे हुए थे।पेशाब घरों में इनके कार्टून बनाए गए थे।
उनकी आत्भौवता का स्वरूप चाहे जो हो,लोग उसे प्रणयमूलक ही समझते थे। इतना तय था, मि. वर्मा का उठना बैठना माथुर परिवार में होता था।अतः उनके संबंधों में यदि प्रगाढ़ता आ गई तो कोई बावेला नहीं खड़ा होना चाहिये। हो सकता है लोगों की धारणा गलत हो।
सोचा कि घर वापस लौट जाऊं। परन्तु यह सोचकर कि इतने प्रयत्न से यहां तक आने और चुपचाप लौट जाने में कोई तुक नहीं था। बल्कि उल्टे कर्तव्य परायणता को ठेस ही पहुंचती। मैं डिपार्टमेंट की ओर अपने आपको ढकेलता हुआ चला गया।
चिक हटाकर अंदर का मुआयना किया। मि. वर्मा मध्दिम स्वर में कुछ फरमा रहे थे और मिस माथुर बड़ी तन्मयता से सुन रही थी। मैं उलटे पांव लौट जाता परन्तु मि. वर्मा ने शायद 'मार्क' कर लिया था।अतः कहना पड़ा- "मे आई कम इन सर?"
बातचीत का क्रम टूट गया था। हल्की सी खीज उनके चेहरे पर उभर गई। इसके बावजूद फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने स्वीकृति दे डाली-"कम इन...."
जंगली हवा का एक अल्हड़ झोंका खिडकियों के रास्ते आया और दरवाजे पर लटकी चिक को धकियाते हुए बाहर चला गया।
मि. वर्मा और मिस माथुर आमने सामने बैठे हुए थे मिस माथुर की बगल में कुछ कुर्सियां खाली पड़ी थीं। मैं एक कुर्सी के हत्थे पर हाथ रखकर खड़ा रहा।
लेक्चरर महोदय खिड़की से पार देख रहे थे.. शायद अनन्त आकाश की ओर! और मिस माथुर किताब के पन्ने उलट पुलट रही थी। मुझे अखर रहा था-नाहक चला आया। साला वातावरण ही तन गया।कुछ देर तक कमरे में चुप्पी छायी रही। आखिर चुप्पी तोड़ने के लिहाज से मि.वर्मा जी ने कहा- जैसे अपने आप से कह रहे हों-" कम्बख्त बादलों का भी कोई टाइम टेबल नहीं, जब जी चाहा ,बरस लिया।"
ऊषा माथुर ने कुछ कहना चाहा पर होठ भींचकर रह गई।वातावरण थोड़ा और तन गया। मैं बोर होने लगा था, इसलिए वहां से निकल भागने का बहाना ढूढ़ने लगा,परन्तु मि.वर्मा ने तभी दार्शनिक मुद्रा में कहा-" मि. परमार, मुझे आपसे खाश बात करनी है...."
"खाश बात और मुझसे सर?" एकाएक मेरे मुंह से निकल गया। मैं उनके चेहरे पर कुछ खोजने लगा। इस बीच मिस माथुर ने मेरी तरफ देख लेने का रस्म पूरा कर लिया था। वर्मा जी कह रहे थे-"मैंने तुम्हारी कहानी पढ़ी है- "माधुरी" में!" वह कुछ देर चुप रहकर बोले " मैं सोचता हूँ, तुम्हारी अन्तदृष्टि सत्य को पहचानने में धोखा खा गई है। माफ करना मुझे स्पष्ट कहने की आदत है- भई तुम्हारे पात्र बिलकुल अस्वाभाविक लगते हैं और जिन विचारों को तुमने उनके माध्यम से संवेदित किया है, वे मूलतः असंगत हैं.... तुम्हें नहीं लगे?"
मैं मुस्कुरा भर दिया। मुझे लगा जैसे वर्मा जी किसी आलोचना की किताब से कोई उद्दरण सुना रहे हैं- रटे रटाए।
मैं और भी उनसे कुछ सुनने की आशा करता उससे पूर्व वे चुप होंकर निर्निमेष मेरी ओर देखने लगे। न जाने क्यों वे उस समय बड़े निरीह से लग रहे थे। मैंने उन्हें सहारा दिया-"हो सकता है सर,आपकी बात सच हो। तो मैं समझ लूं,इस आक्षेप में आपकी वह खाश बात अन्तर्निहित है? या और कुछ आपको कहना है?"
मैंने देखा उनकी आखों में एकाएक चमक आ गई है वह कुछ कहते उसके पूर्व ही मैंने कहा-"देखिए सर, जहाँ तक मेरे पात्रों के अस्वाभाविक होने का प्रश्न है तो आप समझ ले मैंने उन्हें अस्वाभाविक ही प्रस्तुत किया है। अस्वाभाविकता उनकी विशेषता है! आप तटस्थ होकर यह देखें कि उनकी सृष्टि स्वाभाविक ढंग से हुई है या नहीं?
मैं चुप हो गया था। वर्मा जी के माथे पर बल पड़ने लगे थे।लगा कि वह कुछ सोंचने लगे हैं।शायद उनको किसी ऐसे छिद्र की तलाश थी जिसमें से होकर उनकी आलोचना निकल सकती!
मुझे वहाँ रुका रहना बेहद अखर रहा था। बाहर धूप उग आयी थी। हलका हलका धुवां उठ रहा था।कितना सुंदर परिदृश्य था बाहर।काश कि धूप का एक टूकड़ा हमारे अंदर आ जाता और हम अपने अंदर की अंधेरी गुफाओं का रहस्य समझ पाते। कई अनदेखी खोहों के भीतरी भागों में छुपे हुए अनदेखे चेहरे को देख पाते ।
वर्मा जी कुछ कहने लगे तो मैं चौंक गया-" देखिए मि. परमार ,मेरा उद्देश्य ,आपकी कहानी की आलोचना करना नहीं है। मैं तो सिर्फ यह कहना चाहता था कि आप एक लेखक हैं ,किसी भी तरह की घटना और पात्रों की रचना करने के लिए स्वतंत्र है फिर भी आपको नहीं भूलना चाहिए कि आपके पात्र किसी के जीवन और कार्यों से पूर्णतः सम्बद्ध न लगे। ....किसी को यह न लगे कि यह कहानी मेरी है- मुझसे संबंधित है.......।"
वह मेरी तरफ देखने लगे जैसे मैं उनकी बात सुन रहा हूँ या नहीं। इस बीच मैं ऊषा माथुर के बगल की खाली कुर्सी पर बैठ गया था। वर्मा जी थके से नजर आने लगे थे। और मैं सिर्फ उन्हें सुनना चाहता था। मुझे यों चुप देखकर वे बोले-" मि. परमार आप बुरा न माने तो एक और बात स्पष्ट कह दूँ" उनके स्वर में आवेश आता जा रहा था। बदलते हुए संबोधनों से भी यह जाहिर था।
" क्या यह सच नहीं कि आपने कथा नायक के रूप में जिस लेक्चरर को चित्रित किया है और कोई नहीं मैं ही हूँ- मैं- सिर्फ मैं- मि. वर्मा ....जिन घटनाओं का उल्लेख आपने किया है वे सीधे सीधे मुझसे संबंधित है मि. परमार मैं सब समझता हूँ- सलेक्शन कमेटी को रिश्वत देकर इस पोस्ट को झटक लेना..... अपनी स्टुडेंट के साथ रोमांस का जो आपने विद्रूप चित्रण किया है....इन सबके मूल में क्या लेखक की कुन्ठा और प्रतिशोध भावना नहीं है?....."
मैंने देखा वह हांफ रहे थे।लगता था जैसे वह पूर्णतः रीत गए हैं और ऊषा माथुर मुझे इस तरह देख रही थी जैसे मेरे व्दारा (तईं) कोई अनिष्ट हो गया हो। वह बहुत देर से कुछ कहना चाहती थी परन्तु कह नहीं पाती थी। होंठ भींच कर रह जाती। भला वह क्या बोलती? मैं सोचता था- यदि ऐसा होता तो क्या मैं बर्दाश्त कर पाता? मैंने कहा- " एक्स्क्यूज मी सर , कहानी कहानी होती है, पेपर में छपने वाली न्यूज रिपोर्ट नहीं। जाने अनजाने पात्र किसी व्यक्ति के रुबरु हों तो इसमें लेखक का क्या कसूर? इतनी बड़ी दुनिया है । आप लाख असाधारण कैरेक्टर की कल्पना कीजिए किसी न किसी व्यक्ति में मिल जाएगा।
वैसे भी लेखक अपने चतुर्दिक से कटकर नहीं रह सकता। वह जो कुछ अपने आसपास देखता है, उसे अनुभव करता है, उसे जीता है और उसे ही लिखता है। जिन घटनाओं और दृश्यों को वह देखता है- उन्हें यथावत प्रस्तुत नहीं कर सकता। उसकी कल्पना उन्हें कई रंगों में बदलकर रख देती है."
'सर, मुझे खुशी है कि मेरे पात्र पाठकों को अपनी दिशा में क्रिया शील करने में समर्थ है- उन्हे कुछ सोचने के लिए मजबूर करते हैं!- वर्ना आप कैसे कहते कि कथा नायक आप ही हैं......।"
मि.वर्मा लगातार सिगरेट पिए जा रहे थे। फैलता हुआ धुवां मैं सिर्फ देख नहीं रहा था- बल्कि सुन भी रहा था। मि. धंनजय वर्मा के मन पर पड़ने वाले प्रभाव और तज्जन्य प्रतिक्रिया शाब्दिक न होकर धुवें के रूप में बाहर निकल रही थी।अंत में मैंने कहा-" सर गुस्ताखी माफ हो,आप मेरे उम्र से कुछ साल ही बड़े है। - दोस्त से हैं अतः मैं भी बिना लाग लपेट के कहना चाहूंगा कि संभव है उस कहानी के नायक को रुपाकार देते समय आप मेरे 'सर्जक' के सामने रहे हो पर आप जरा सोचिए मैंने पेशाब घरों में, शंडास में..या कामन रुम के दीवारों पर आपका कार्टून तो नहीं बनाया न? आपके नाम के साथ किसी गलत नाम को तो नहीं जोड़ा न?मैं आशा करता हूँ कि आप, मुझे अन्यथा नहीं लेगें सर .....।"
सामने की दीवाल पर लगे हुए बेल्जियम के दर्पण पर ऊषा माथुर बदस्तूर प्रतिबिंबित हो रही थी- मैं न चाहते हुए भी उस तरफ देखने के लिए विवश था। उस अक्स में कुछ ऐसा था जो बरबस खींचता था। मैं इस लाघव के साथ उसे देख रहा था कि मेरे देखने को न मिस माथुर देख रही थी और न ही मि.वर्मा। चूंकि मिस माथुर सर झुकाए हुए थी और मि. वर्मा खिड़की से बाहर कहीं दूर देख रहे थे। बिलकुल अपने में खोए हुए। मुझे लगा जैसे मिस माथुर मुस्कुरा रही है।.टेबल पर रखी हुई वीनस के कटे हाथ वाली संगमरमर की अधनंगी मूर्ति को मिस माथुर इस तरह घूर रही थी गोया उसके अवचेतन की कोई ग्रंथि उछलकर बाहर आ गई हो- उस वीनस की मूर्ति के रूप में....।
हम तीनों मौन थे। परन्तु हमारे मौन में इतनी मुखरता थी कि लगता था वातावरण में शब्दों की गड़गड़ाहट हो रही हो.... लगता था कान के परदे फट जाएंगे। मिस माथुर की दृष्टि धीरे धीरे उठी और प्रश्नयुक्त होकर दर्पण पर केन्द्रित हो गई और हम दोनों की नजरें गुत्थमगुत्था हो गई- सहसा समझ नहीं आया यह दृष्टि -सृष्टि थी या सृष्टि-दृष्टि! हम चाहकर भी अपनी अपनी नजरें झुका लेने या अलग कर लेने में असमर्थ रहे। माना कि वे हमारे प्रतिबिंबों की नज़रें थी आईना के मार्फत।
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बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396
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