डाँ. बलदेव और पांडेय परिवार:-शिवकुमार पाण्डेय

डाँ. बलदेव और पांडेय परिवार:- 
शिवकुमार पांडेय
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डाँ. बलदेव उन साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने साहित्य की हर विधा पर अपनी लेखनी चलाई है। कविता, कहानी,समीक्षा लेखन में सिध्दहस्त शास्त्रीय संगीत, नृत्य एवं ललित कलाओं पर भी बड़े सिद्दत से लिखना, डाँ. बलदेव के आभ्यांतरिक क्षमता से परिचय कराता है। भाषा साहित्य को समर्पित ऐसे व्यकितत्व कम देखने में आते हैं। बहुताथ साहित्यकार अपनी प्रतिभा का प्रकाशन एवं प्रदर्शन में व्यस्त देखे जाते हैं, वहीं बलदेव जी भूले बिसरे साहित्यकारों को प्रकाश में लाने का गुरूतर कार्य करते दिखाई देते हैं।
एक ऐसा साहित्यकार जिसका संबंध हिंदी के बड़े से बड़े साहित्य मनीषियों से लेकर अधुनातन साहित्यकारों से समादरित भाव हो इतना सौम्य एंव सहज हो, देखकर सुखद आश्चर्य होता है। आज साहित्य एवं साहित्यकार गुटीय भावनाओं से ग्रस्त दिखाई पड़ते हैं, वहीं बलदेव जी भूत और वर्तमान के साहित्यकारों को अभ्यांतरित क्षितिज से प्रकाशित जगत की ओर लाने संकल्प लिए दिखाई देते हैं।
डाँ. बलदेव शासकीय सेवा में स्थानांतरित होकर जब रायगढ़ आये उनका संबंध साहित्य सेवी पांडेय परिवार (बालपुर वाले) विशेषकर साहित्य वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पांडेय, पद्मश्री पं. मुकुटधर पांडेय, पं. मुरलीधर पांडेय के परिवार से रहा। पांडेय परिवार भी बलदेव जी को परिवार के सदस्य सा स्नेह देता रहा है। डाँ. बलदेव जी छायावाद के प्रवर्तक पद्मश्री पं. मुकुटधर पांडेय के विशेष स्नेह पात्र रहे हैं।
रायगढ़ के बैकुंठपुर मुहल्ला जहाँ मुकुटधर जी रहते उसी मुहल्ले में डाँ. बलदेव भी किराए का मकान लेकर रहने लगे। डाँ. साहब बराबर पांडेय जी से मिलते रहते थे, घंटों साहित्य पर परस्पर चर्चा करते थे, जितना खुलकर पांडेय जी उनसे बातें करते थे, अन्यों से उनकी चर्चा मात्र औपचारिकता होती थी। डाँ. बलदेव की साहित्य साधना एवं साहित्यानुराग को देखकर पांडेय जी काफी प्रभावित थे।
डाँ. बलदेव ने पांडेय जी विस्मृत रचनाओं को संकलित करने का जो भगीरथ प्रयत्न किया उसके बारे में पाण्डेय जी ने कहा था," जानते हो, मेरी रचनायें जब से छपनी शुरू हुई कब, कहाँ किस पत्रिका में छपी बहुतों की जानकारी नहीं थी मुझे भी नहीं जिसे मैं भूल चुका था उसे संग्रहित कर लाया है, हर स्थान को जहाँ मेरी कविताएं लेख एवं समीक्षाएँ मिल सकती थी, व्यक्तिगत संभावित स्थान जाकर महीनों वहाँ रहकर ढूंढवाया है। असहज कार्य को सहज कर दिया है। उसने जो किया है शायद और कोई नहीं कर पाता।मैं तो बड़ा ऋणी हो गया हूँ, मेरे साहित्य यात्रा का वास्तविक उत्तराधिकारी डाँ. बलदेव हो गया है।जानते हो वो अपने वेतन से घर खर्च से कुछ पैसे बचाकर मेरी रचनाओं के संकलन में, नौकरी से छुट्टी लेकर हितकारिणी सभा (जबलपुर), नागरी प्रचारिणी सभा(काशी), नवल किशोर प्रेस(लखनऊ),नेशनल लाइब्रेरी(कलकत्ता), तथा अनेक पुस्तकालयों में जाकर तथा वरिष्ठ व्यक्तियों से पूछताछ के लिए प्राप्तव्य स्थान में जाकर उसने रचनाएं संकलित की है।
डाँ. बलदेव के ऐसे कार्य की सराहना के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। मेरी रचनाओं का उध्दारक डाँ. बलदेव बन गया है।"
मुझे एक घटना. याद आ रही है, गर्मी का दिन था, दोपहरी का समय , मेरे घर का कालबेल बजा, दरवाजा खोलकर देखा. तीन भद्र जन खड़े हैं, मैंने उन्हें घर के अन्दर आमंत्रित कर पूछा किनसे मिलना है अतिशय विनम्रता से उन्होंने कहा हम राँची(बिहार) से आए हैं और पं. मुकुटधर जी मिलना चाहते हैं। वे दो पुरूष एवं एक महिला रायगढ़ की गर्मी से पसीना-पसीना हो रहे थे, उन्हें ठंडा जल पश्चात चाय नाश्ता के लिए आग्रह किया। बड़े ही संकोच के साथ उन्होंने मेरा आग्रह स्वीकार किया और बार बार आग्रह करते रहे पांडेय जी से मिलना है। मैंने उन्हें कहा थोड़ा विश्राम कर लें फिर पांडेय जी के पास मैं आपको ले चलूंगा वे मेरे दादा जी हैं। वे यहाँ से कुछ दूरी पर रहते हैं। यह उनके विश्राम का समय है। पाँच बजे चलेंगे। समय होने पर हम वहाँ गये।
आगंतुकों ने दादाजी का चरण स्पर्श किया। मैं पांडेय परिवार की परंपरानुसार आगंतुकों की स्वागत व्यवस्था में लग गया था। आगंतुक महिला अतिशय विनम्र हो कह रही थी मैं "छायावाद"विषय पर शोध कर रही हूँ। राँची काँलेज में प्राध्यापिका हूँ।आपके श्री चरणों से कुछ सामग्री की कामना से आई हूँ, इनमें से ये मेरे गाइड हैं और आप मेरे पति हैं। दादाजी सहज स्नेह एवं विनम्रता से उनसे बतियाते रहे। उन्होंने अंत में कहा यहीं पास में डाँ. बलदेव रहते हैं मेरे बारे में एवं छायावाद के बारे में समग्रता से आपको जानकारी दे देंगे। विस्मय से भद्र महिला ने पांडेय जी की ओर देखा। पांडेय जी ने कहा घबड़ाओं नहीं। बलदेव जी मुकुटधर की रचनाओं और छायावाद को जितने सिद्दत से जानते हैं शायद मैं नहीं। दादाजी का ऐसा कथन मुझे भी आश्चर्य में डाल दिया। फिर मुझे एक बात याद हो गई डाँ. बलदेव ने पांडेय जी की रचनाओं को, छायावाद को जितने सिद्दत से आत्मसात किया है यह उसी की स्वीकृति है। डाँ. बलदेव ने विश्वबोध में पांडेय जी की प्रतिनिधि कविताओं का संपादन किया है। यह काव्य संग्रह हिंदी साहित्य जगत की धरोहर बन चुका है। अर्थाभाव की संकरी जटा में कैद गंगा को मुक्त कराने में डाँ. बलदेव का भगीरथ प्रयत्न सफल हो गया है। डाँ. बलदेव की स्वयं की काव्य साधना भी परिपूर्णता के भास्वर है।
"वृक्ष में तब्दील हो गई औरत" समकालीन कविता की किताब है जो पिछले दो दशक में काफी चर्चित रही है। "धरती सबके महतारी" छतीसगढ़ी कविता का मनोहारी संग्रह है। "ढ़ाई आखार" जन कवि श्री आनंदी सहाय शुक्ल पर केन्द्रित एक सर्वहारा कवि के अद्भुत संघर्षों की सार्थक प्रस्तुति है। डाँ. बलदेव जी लेखनी साहित्य साधना में सतत् प्रवाहमान है।अतिशय साहित्य ने उनकी एक आँख की बलि भी ले ली। फिर भी वे अनवरत लिख रहे हैं। मैं डाँ। बलदेव का बड़ा आदर करता हूँ। डाँ. बलदेव के संदर्भ में मुझे दो बार अतिशय आनंद का अनुभव हुआ।एक बार उस समय जब डाँ. बलदेव ने गुरुघासीदास विश्व विद्यालय व्दारा आयोजित छायावाद पुनर्मूल्यांकन में आधार लेख पढ़ा, दूसरी बार जब उन्होंने छायावाद और पं. मुकुटधर पांडेय पर समीक्षाग्रंथ लिखा। कथित ग्रंथ के बारे में विनय मोहन शर्मा जी ने लिखा है समकालीन साहित्य आलोचना का भी मुकुटधर पांडेय की रचनाओं से परिचय इतना नहीं रहा। मैं भी इतना परिचत नहीं था जितना कि अब डाँ. बलदेव के इस कृति से गुजरने के बाद ज्ञात हुआ। "पांडेय जी आधुनिक हिंदी कविता के जीवित इतिहास हैं।" व्दिवेदी युग, छायावाद युग, प्रगतिवाद युग, आज की नयी कविता युग पांडेय जी की रचनाओं में विद्यमान है।
अतः हम बेबाक रूप से कह सकते हैं कि हिंदी साहित्य और छायावाद के संदर्भ में मुकुटधर पांडेय जी की चर्चा एवं स्वीकृति में डाँ. बलदेव के योगदान को कतई भुलाया नहीं जा सकता। डाँ. बलदेव के पास अन्य
साहित्यकारों के रचना संसार अनोखी सामाग्री संकलित है।
डाँ. बलदेव श्रीशारदा साहित्य सदन , राष्ट्रीय स्तर के सम्मान की अधिकारिक साधना है, जिसे समय भूल गया है। देंखे समय कब जागता है, और साहित्य को गौरवान्वित करता है।


शिव कुमार पांडेय, बैकुंठपुर, रायगढ़, छत्तीसगढ़

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