हिंदी साहित्य के दुलर्भ रत्न:-डाँ. बलदेव (जयन्त कुमार थोरात)

हिन्दी साहित्य के दुलर्भ रत्न-डाँ. बलदेव
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(जयन्त कुमार थोरात)

            उन दिनों मैं रायगढ़ जिले में पदस्थ था। पदस्थापना के बाद साहित्यिक अभिरुचि के कारण वहां के साहित्यकारों से मेरा जल्दी ही परिचय हो गया। वहाँ के ख्याति लब्ध साहित्यकार डा. आनन्दी सहाय शुक्ल जी से मेरी अच्छा खासा मित्रता हो गयी थी। वे प्रतिदिन शाम चार बजे मेरे कार्यालय में आते थे व आधे घंटे बैठ कर चले जाते थे।उनके अधिकतर साहित्य की बात होती थी। चुंकि वे उम्र में मुझ से काफी बड़े थे इस कारण मेरी इच्छा के अनुसार मुझे 'जयन्त जी'  ही कहा करते थे। एक दिन उनके साथ एक अपरिचित व्यक्ति भी आये। जब वे दोनों मेरे कमरे के भीतर आये उस समय में किसी जरूरी फाईल में उलझा था। इस कारण मैंने शुक्ल जी को बैठने को कहा व एक एक उड़ती नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर डाल कर काम में लग गया। अपने कार्य से मुक्त हो कर मैंने शुक्ल जी की ओर देखा।
         तभी मेरी नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर पड़ी। वे कद से छोटे, थोड़ा भारी बदन,सर पर खिचड़ी बाल,आँखों पर मोटे फ्रेम का चश्मा। पैजामा कुर्ता पहने आ। मैंने शुक्ल जी से पूछा "कैसे है आप"?
        वे बोले "मैं बिल्कुल ठीक हूँ। इनसे मिलये , ये हैं डाँ. बलदेव। रायगढ़ निवासी तथा प्रदेश व देश के ख्याति प्राप्त साहित्यकार।" मैंने उन्हें ध्यान से देखा।उन्होंने मुझे नमस्कार
किया मैंने भी उन्हें जवाब दिया। वे अपने बारे में बताते रहे। वैसे मैंने उनका नाम जो बहुत सुना था। पर रूबरू  मुलाकात पहली बार हो रही थी।उनसे काफी देर तक चर्चा होती रही। कुछ देर बाद फिर मिलने की बात कहकर दोनों ने विदा ली। ऐसी हुई थी मेरी डाँ. बलदेव जी से पहली मुलाकात।
           इसके बाद समय समय पर मेरी डाँ. बलदेव जी से मुलाकात होती रही।उनसे साहित्य व अध्ययन के बारे में ही चर्चा होती थी। वे रायगढ़ कि नव साहित्यकारों को ले कर बड़े चिंतित रहते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि रायगढ़ के नये साहित्यकारों को ऐसा कोई मंच नहीं मिल रहा जो उनके दिशा व सही  मार्गदर्शन दे सके। वे इस दिशा में कोई ठोस समाधान चाहते थे।एक दिन मैं शुक्ल जी और डाँ. बलदेव बैठे इसी  बात पर चर्चा  कर रहे थे।तभी यह सुझाव आया कि क्यों न एक पत्रिका प्रकाशित की जाय जो इन नव साहित्यकारों को मंच प्रदान करेगा। सभी इस प्रस्ताव पर सहमत हुये। इसकी जिम्मेदारी डाँ. बलदेव जी को दी गई। वे इसके लिए तैयार भी हो गये। उसी दिन से वे इसकी रूप रेखा बनाने में जुट गये। इस दिशा में उन्होंने काफी काम भी किया। पर किसी कारणवश योजना पूर्ण नहीं हो  सकी। और उनकी इच्छा अधूरी रह गई।
           2008 में मेरा रायगढ़ से तबादला हो गया। फिर मेल मुलाकात का सिलसिला कम हो गया। पर फोन से सम्पर्क बना रहा। मैं जब भी रायगढ़ भ्रमण को जाता तो, दो व्यक्तियों से जरूर मिलता। एक आनन्दी जी दूसरे डाँ. बलदेव । डाँ. बलदेव बड़े ही सौम्य ,सरल व धीरे बोलने वाले व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व से सादगी झलकती थी। हिन्दी साहित्य में उनकी गहरी पैठ थी। हिन्दी साहित्य जगत में उनका नाम बड़े अदब व सम्मान से लिया जाता है। उनकी जितनी अच्छी पकड़ गद्य में थी उतना ही नियंत्रण उनका पद्य में भी था। मेरी जानकारी के अनुसार उनकी करीब सत्रह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं में भाषा की सरलता, गति में निरंतरता मिलती है। शैली मौलिकता लिये हुये है। शब्दों के चयन में क्लिष्टता से बचते थे। इन्होंने हिंदी व छत्तीसगढ़ी दोनों में साहित्य सृजन किया है।
          उनकी कृति 'रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव"  बेमिसाल है। इसे पढ़ने से ज्ञात होता है कि इसे लिखने में उन्होंने काफी मेहनत व शोध किया है।वे रायगढ़ के साहित्य जगत के एक रत्न थे। उनके जाने से साहित्य क्षेत्र में एक अपूर्णीय रिक्तता आई है। उनका नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में विशिष्टता से लिया जाता रहेगा। अपनी हार्दिक श्रध्दाजंलि के साथ बात यहीं समाप्त करता हूँ।


                               जयन्त कुमार थोरत(भा.पु. से)
                                    सेवा निवृत्त डी.आई.जी.
                                           रायपुर छ.ग.

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