डाँ. बलदेव साव:एक शुध्द बहाव:-सुरेश उपाध्याय

डाँ. बलदेव साव: एक शुध्द बहाव :- सुरेश उपाध्याय
----------------------------------------- 

हिन्दी में जो भी मेरे फ्रैंड , फिल्मकार या गाइड हैं, उनमें डाँ. बलदेव साव जितने मेरे आत्मीय, अंतरंग और अभिन्न मित्र हैं, शायद कोई दूसरा नहीं और इसका सबसे मुख्य और मूल कारण यही है कि उनके भीतर का समपर्ण का भाव शिद्दत और संजीदगी के साथ घर कर गया है। वे जिसके विरोधी है, तो विशुद्ध और पूर्ण रूप से विरोधी ही हैं और इसके विपरीत वे जिसके प्रति समर्पित और सेवा भावी हैं, वहाँ पर उन पर कोई भी और कभी भी उंगली उठाने में सर्वथा असमर्थ है, और असहाय अनुभव करता है।
छत्तीसगढ़ में रायगढ़ शहर में रचे बसे जनकवि श्री आनंदी सहाय शुक्ल जी जो रिश्ते में मेरे रिश्ते में श्वसुर हैं, उनके प्रति जो श्रध्दा और आस्था डाँ. बलदेव साव में है, संभवतः किसी अन्य में नहीं। और यही कारण है कि आनंदी सहाय शुक्ल के जो तीन-चार छोटे-मोटे संकलन प्रकाश में आये हैं, वे डाँ. बलदेव साव ने ही अपनी अचानक और अनायास मेहनत मशक्कत से जलाये हैं।श्री शुक्ल जी के प्रति जो जिम्मेदारी का अहसास उन्हें है, उसे महसूस कर मैं उनके प्रति आभार, धन्यवाद और अहोभाव से भरा पूरा हूँ।"ढ़ाई आखार" शीर्षक से श्री शुक्ल जी पर उनकी जो किताब आयी है, उस किताब में श्री शुक्ल जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के कई अनछुए पहलू भी अनायास ही उजागर हो गये हैं, जिनके बारे में संभवतः स्वयं श्री आनंदी सहाय शुक्ल भी सर्वथा अंजान और अपरिचित हैं।
उदाहरण के तौर पर यहाँ पर मैं एक भी उदाहरण इसलिए पेश नहीं करुंगा, क्योंकि इससे किताब को पढ़ने की मानसिकता में कुछ न कुछ व्यवधान तो आता ही है और किताब को एक नये और ताजे पाठक से महरूम या वंचित रह जाना पड़ता है। "ढ़ाई आखार' किताब के बारे में मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि यदि कोई भी पाठक इसे शिद्दत और संजीदगी के साथ पढ़ेगा तो उसे अनायास ही ढेर सारे ऐसे नायाब मोती मिलते चले जायेंगे जो न केवल पं. श्री आनंदी सहाय शुक्ल को बेपर्दा करेंगे बल्कि डाँ. बलदेव साव भी बिल्कुल निर्वस्त्र और निरावरण स्थिति में पाठकों को नजर आयेंगे। और यही वह तथ्य है जो किताबों को बार बार पढ़ने को मजबूर कर देता है और जैसे जैसे समय बीतता है वैसे वैसे वह किताब और भी अधिक पुख्ता और मजबूत होती चली जाती है।यही वह कारण है, जिसके तहत सूर, तुलसी, कबीर, मीरा, रहीम, रसखान या घनानंद पर समय की गर्द गुबार का रत्ती या रंचमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि जैसे जैसे समय बीतता जाता है, वैसे वैसे कवियों में छिपा मू तत्व को पहचानना और पकड़ना आता हो। डाँ. बलदेव साव ने उस मूल तत्व को पहचानकर और पकड़कर ही अपनी कलम चलाई है, जिसके फलस्वरूप किताब तो निर्बन्ध होती चली गयी है लेकिन उसे पढ़ने वाले उससे बंधकर रह गये हैं। यहाँ पर एक बात का उल्लेख विशेष रूप से कर देना चाहता हूँ कि लिखने वाला हमेशा यह समझता है कि वह किसी अन्य पर प्रकाश डाल रहा है, किन्तु वस्तुस्थिति और वास्विकता इसके विपरीत होती है, जहाँ लिखने वाले की मानसिकता और प्रवृत्ति पर ऐसी टार्च चमकती है कि स्वयं लिखने वाले को भी उसका पता नहीं चल पाता।
प्रेम और समर्पण से भरे हुए व्यक्ति का लिखा हुआ एक एक वाक्य, एक लंबी कहानी को भी अपने आप में छिपाये रखता है, लेकिन उसे समझने का अवसर या सौभाग्य सिर्फ उसी को प्राप्त होता है, जो स्वयं भी उतने ही प्रेम और समपर्ण से भरा हुआ है, जितना कि स्वयं रचनाकार या लेखक। इतिहास के पन्नों में ऐसे समर्पित और सेवाभावी हस्ताक्षरों को न्यून से भी किंचित जगह मिल पाती है, क्योंकि इतिहास उन्हीं के व्दारा लिखा जाता है जो स्वयं विक्षिप्तता की हद तक विचारग्रस्त या अहंकारी होते हैं। समर्पित और सेवाभावी लेखकों को इतिहास में भले ही जगह न मिले, लेकिन जन-जन की जुबान और दिलों पर वे खुशबू के शिलालेखों की मानिंद ऐसे खुद जाते हैं कि खुदा खुद उन पर कुरबान होने के मौके को नहीं चूकता। डाँ. बलदेव साव ऐसे ही समर्पित और सेवाभावी लेखक हैं कि अशोक वाजपेयी जैसे इतिहासकारों की जमात उनका एक भी बाल बांका नहीं कर पायीं, लेकिन आनंदी सहाय जैसे पुराण पुरुष ने उन्हें अपने सर आँखों पर स्वीकार कर कंधों पर बिठाकर तीनों लोकों की सैर करा दी।
समर्पित का सिजदा स्वयं खुदा करता है क्योंकि इसके अलावा उसके पास कोई दूसरा चारा या उपाय ही नहीं है। एक स्थिति ऐसे भी आती है, जब समर्पित और सेवाभावियों का भागना और भटकना तो बिल्कुल ही बंद हो जाता है लेकिन अब उसके पीछे भागने और भटकने का गोरखधंधा उसी को शुरु कर देना पड़ता है, जिसके लिए सारी खोज बीन चल रही थी। कबीर दास जी जब इस स्थिति को उपलब्ध हुए तब उन्हें अपनी इस उपलब्धि को इन शब्दों में रेखाकिंत करना पड़ा कि-
"कबीर मन निर्मल भया,जैसे गंगा नीर।
पाछे पाछे हरि फिरे, कहत कबीर कबीर।"
अभी बलदेव साव की स्थिति ऐसी है कि उनके विचार, उनके दुख , उनके पूर्वाग्रह, धारणायें, मान्यताएं इत्यादि तो विसर्जित या समर्पित हो चुके हैं किन्तु आनंद, शांति का उमंग-उत्सव के मूल-स्त्रोत पर चोट पड़ना अभी बाकी है। इस बात को मैं कबीर के ही दो दोहों के माध्यम से बखूबी और वजनदारी के साथ अभिव्यक्त करना चाहता हूँ, जब कबीर ईश्वर की खोज में बोर बैराए पगलाये से भाग भटक रहे होंगे, तब उन्होंने लिखा होगा कि-
"हेरत हेरत रे सखी, रहा कबीर हिराय।
बूँद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाय।।"
अभी डाँ. बलदेव साव को शायद यही अनुभूति हो रही है कि शायद बूँद समुद्र में समाहित हो चुकी है।लेकिन अब वह दिन भी ज्यादा दूर नहीं है, जब खुद खुदा को उनकी खोज में निकल पड़ने को बाध्य होना पड़ेगा, और कबीर की मानिंद बलदेव को भी अपने लिखे में थोड़ा सा सुधार यूं करना पड़ेगा, जैसे कि कबीर ने किया था कि-
" हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराय।
समुद्र समाना बूँद में, सो कत हेरो जाय।।"
भक्त जब तक दुविधा, व्दंव्द या व्दैत से ग्रस्त रहता है तभी तक वह हैरान, परेशान और अस्त-वयस्त सा भागता भटकता रहता है, लेकिन जैसे ही उसका समर्पण और सेवा भाव कम्पलीट या पूर्ण रूप से घट जाता है वैसे भगवान को. उसकी खोज खबर लेते रहने को मजबूर हो जाना पड़ता है, उस दिन से भक्त की सारी दुविधा रूपांतरित होकर सुविधा और सहूलियत में कन्वर्ट, रूपांतरित या तब्दील हो जाता है।
इसी भाव में मैंने अपनी प्रसिद्ध कविता अवसरवादी लिखी थी, जिसकी कुछ पंक्तियाँ कोट करना चाहूंगा-
" आखिर आप विव्दान हैं किस विधा के?
हमने धीरे से कहा, सुविधा के,
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो किसी के भी नहीं होते
मगर सबके होते हैं।
हम उन्हीं में से हैं।
हमारी लच्छेदार या मजेदार बातों से
आप कभी भी नहीं ऊब सकते।
कितने ही गहरे समुंदर में ले जाकर,
हमें पटक आइए आप,
मगर हम कभी नहीं डूब सकते।
हाँ मगर किसी को डुबोना हो, तो हमें बताओ
डुबोने की कला में हम इतने माहिर हैं
कि आपको पता भी नहीं चलेगा
और आप डूब जायेंगे।
वो सरकार भी हमीं ने डुबोई थी,
और ये सरकार भी हमीं डुबोयेंगे।"
वह दिन अब समझिए आ ही गया है, क्योंकि कभी भी न डूबने वाले कवि व्यंग्यकार श्री सुरेश उपाध्याय को डाँ. बलदेव साव के व्यक्तित्व या कृतित्व पर प्रकाश डालने को बाध्य होना पड़ा है। अब डाँ. बलदेव साव भी मेरी तरह नमक के पुतरे बन कर खारे आँसूओं के महासागर में ऐसे तिरोहित होंगे कि सभ्य सुसंस्कृत तयशुदा पाखंडियों की भीड़ हाथ में टार्च लेकर उन्हें ढ़ूढ़ती और मार्च करती रह जायेगी और डाँ. बलदेव साव की रूह उन्हें सदा सदा को भागते और भटकते रहने को मजबूर कर देगी। एक शुध्द और सूक्ष्म बहाव बन चुके डाँ. बलदेव साव को सुरेश उपाध्याय की अशेष शुभकामनाएं।

Comments

Popular posts from this blog

पुनर्पाठ:डाँ. बलदेव:सृजन और सरोकार :-लेखक-रजत कृष्ण

डाँ. बलदेव महत्व:- लेखक राजू पांडेय

बल देने वाले डाँ. बलदेव भैय्या:-डाँ. देवधर महंत