साहित्य के सहृदय, निष्पक्ष समीक्षक:डाँ. बलदेव साव :-लेखक रामेश्वर वैष्णव
संस्मरण
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साहित्य के सहृदय, निष्पक्ष समीक्षक; डाँ. बलदेव साव
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(रामेश्वर वैष्णव)
डाँ. बलदेव साव एक मुकम्मल साहित्यकार थे। साहित्य की शायद ही कोई विधा छूटी हो जिस पर डाँ. साव जी की कलम न चली हो। नई कविता के तो वे श्रेष्ठ हस्ताक्षर थे ही, मगर भारतीय साहित्य जगत में छायावाद के प्रवर्तक के नाम पर प्रायोजित विवाद शुरू हुआ तो डाँ. साव ने पं. मुकुटधर पाण्डेय जी को स्थापित करने के लिए सप्रमाण, तर्क एवं समीक्षा शास्त्र के अनुरूप लेखन का एक अभियान छेड़ दिया तभी उनकी छवि समीक्षक के रूप में स्थापित हो गई।इतना ही नहीं "शारदा प्रकाशन"के नाम से पाण्डेय जी की रचनाओं व अपनी समीक्षा का प्रकाशन कर पूरे भारत में प्रचारित करने का गंभीर दायित्व भी निभाया। संभवतः पं. मुकुटधर पाण्डेय जी रचित "छत्तीसगढ़ी मेघदूत" के प्रकाशनोपंरात उनकी दृष्टि छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत की ओर गई।
छत्तीसगढ़ी साहित्य का वह तुतलाता युग था। जिसमें तमाम अभिव्यक्तियां प्रयास के स्तर पर ही थी। लेकिन छत्तीसगढ़ी साहित्य का दु्र्भाग्य रहा है कि उन्हीं दिनों कुछ अति महत्वाकांक्षी , प्रतिभाविहीन व तिकड़मी साहित्यकार समीक्षा के क्षेत्र में टूट पड़े और स्वयं को "छत्तीसगढ़ी साहित्य के आचार्य रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद व्दिवेदी"आदि घोषित करने लगे। उन्हें मालूम था कि उनकी घटिया रचनाओं को साहित्य जगत स्वीकार नहीं करेगा, लिहाजा उन्होंने यह काम स्वयं शुरू कर दिया और अपने तथा अपने परिवार के रचनाकारों को स्थापित करने के चक्कर में छत्तीसगढ़ के अच्छे खासे रचनाकारों को "रिजेक्ट"करने लगे। संभवतः इन्हीं दिनों डाँ. साव जी ने छत्तीसगढ़ी साहित्य के निष्पक्ष मूल्यांकन की जिम्मेदारी महसूस की और उसे खूब निभाया भी। पूर्व समीक्षकों की तुलना में साव जी इतने उदार थे कि छंद, बहर,काफिया की बैगर परवाह किए लोकप्रिय रचनाकारों (या कहना चाहिए गायकों )को ऊंचा स्थान दिया। उनकी खामियों को भी खासियत की तरह उभारा। इस मामले में छत्तीसगढ़ी साहित्य जगत में केवल दो ही निष्पक्ष समीक्षक प्रतिष्ठित हुए। डाँ. विमल कुमार पाठक एवं डाँ. बलदेव साव जी। यद्यपि डाँ. नरेंद्र देव वर्मा भी समीक्षक के रूप में चर्चित रहे मगर उन्होंने साहित्यिक गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया एवं तथाकथित नामधारी रचनाकारों की कटु शब्दों में आलोचना कर दी। दु्र्भाग्य से उन्हें बहुत छोटी जिन्दगी मिली जिसमें उनके व्दारा उठाए गए बड़े बड़े कार्य अधूरे रह गए लिहाजा एक प्रखर समीक्षक की कमी इक्कीसवीं सदी में भी बनी रही। डाँ. बलदेव साव जी की उदारता का लाभ उठाते हुए कुछ दरिद्र किस्म के रचनाकार साहित्य में सम्मानजनक स्थान बनाने में कामयाब रहे। कुछ पुरूषार्थियों ने तो डाँ. साव की मानवीय कमजोरी का लाभ उठाकर उनकी वर्षों की मेहनत से तैयार ग्रंथों को अपने नाम से छपा लिए। डाँ. साव उन पुस्तकों के मुखपृष्ठ को देखने के लिए तरस गए।क्या करते डाँ. साहब ने ऐसे भस्मासुरों को खुद ही पैदा किया था।
डाँ. बलदेव साव पूर्णतः एक छत्तीसगढ़ी व्यक्ति थे लिहाजा उनकी मेहनत का श्रेय उनके तिकड़मी शिष्य ले उड़े। डाँ. साव मूल्यांकन वृत्ति में जितने सक्षम थे, उनके अपने मूल्यांकन काल में उतने ही अक्षम सहयोगी छोड़ गए। शासन भी उनके योगदान का कोई मूल्यांकन नहीं कर पाया। उनसे कमजोर व अपर्याप्त योगदान वाले लोग पं. सुन्दरलाल शर्मा पुरस्कार पा गए पंरतु सर्वथा योग्य होते हुए भी डाँ. साव वंचित रहे। लेकिन पं. मुकुटधर पांडेय जी पर किया हुआ काम उनकी गरिमा गिरने नहीं देगा। राजनीतिक जोड. तोड़ में डाँ. साव माहिर होते तो कोई बड़ा पुरस्कार इनके नाम के साथ जुड़कर छोटा ही लगता।
रामेश्वर वैष्णव
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