जेनुइन कवि और उनके विचारों का विस्तार
जेनुइन कवि और उनके विचारों का विस्तार
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डाँ. बलदेव
' वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह ' , कविता पुस्तक का यह प्रदीर्थ शीर्षक कषि के शैलीगत वैशिष्ट्य के आग्रह को सूचित करता है । नया गरम कोट - रबर की चप्पल , सूखी झोल - हरा विचार , मुरमी तपती जमीन - हरियाली के विश्वास का विस्तार , मोटी अँधेरी रात की चट्टान - सूरज को चिनगारी जैसे वाक्य - बंध , विनोद कुमार शुक्ल के कविता - संसार को स्वायत्त करने के लिए काफी हैं , इनसे यदि एक तरफ समाज का अंतर्विरोध प्रकट होता है तो दूसरी ओर संभावित युद्ध जिसमें समूह की ताकत अन्याय का खिलाफत करेगी । उपर्युक्त वाक्य - बंधों में अंश के लिए संपूर्ण या संपूर्ण के लिए अंश का आशय प्रकट करने वाला उपलक्ष्य अलंकार या मेटॉनिम का प्रयोग हुआ है , इसके लिए शब्द का अध्ययन अपेक्षित होता है । संकलन की सैंतीस कविताओं को 29 और 8 के आँकड़े में दो वर्गों में रखा जा सकता है । छोटे से आलेख में कंप्यूटराइस्ड नहीं करना चाहूँगा , अतः इस समीक्षा - पद्धति के व्यावहारिक पक्ष पर ही आपका ध्यान केंद्रित करना चाहूँगा । पहले वर्ग की कविता में सामान्य का सामान्यीकरण हुआ है , जिसके लिए अनन्वय अलंकार प्रयुक्त हुआ है -
1/सुबह छः बजे का वक्त , सुबह छ : बजे की तरह
2/ बतख का झंड।बतख की तरह था ।
विनोद कुमार शुक्ल और चंद्रकांत देवताले की जमीन कमोबेश एक ही है , दोनों ही कस्बाई परिवेश के समकालीन कवि हैं , किंतु देवताले जैसे चीजों को छूकर नहीं देखने जैसी कोशिश विनोद कुमार में नहीं है , बल्कि वस्तु को छूकर ही नहीं , उलट - पुलट कर देखने जैसी कोशिश है , ताकि चीजों की असंदिग्धता बरकरार रहे । दूसरे वर्ग की कविता में सामान्य का असामान्यीकरण हुआ है , इसका मतलब सामान्यी-
करण छूट नहीं गया है । इनमें उपमा और उदाहरणों का आधिक्य है , ये अलंकार शब्दगत न होकर दृश्यगत हैं । इसका रेटॉरिक भी अनेक जगह प्रगीत - रचनाधर्मिता के करीब है । यहाँ , है सिर्फ सिर्फ , मुझे है फिक्र फिक्र जैसे शब्दों , वाक्यों की पुनरुक्ति से लेकर सहेतुक वाक्यों की टेकनुमा आवृत्तियाँ हैं । उदाहरण के लिए - मरी हुई चिड़िया पीली । एक पत्ती गई , एक पत्ती की छाया गई । इस तरह कारटोरिक नई कविता के लिए नया नहीं है । जल गया । जलयान गया या कहीं आग लग गई । कहीं गोली चल गई जैसी पंक्तियाँ बहुत बार प्रयुक्त हुई हैं ; और इसके प्रयोग से एलर्जी आखिर क्योंकर । यहाँ विचारों को स्पष्ट करते चलने के लिए ही शायद दृश्य - खंडों की परतदार चटान बिछाई गई है और चरम ऊँचाई के बाद , ढलान में कविता समाप्त हो जाती है । यानी यहाँ कविता में सहज विकास न होकर सोची हई परिणति होती है । विरोधी या समानांतर बिंबों के संगुंफन से रचना - प्रक्रिया लंबी होती गई है ठीक नेरुदा या मुक्तिबोध को फैटसी की तरह । इसीलिए ये कविताएँ बुनावट के स्तर पर उनके बिलकुल करीब लगती हैं । पहली किस्म की कविताएँ ( जिनमें दस कविताएँ लगभग ' जयहिंद ' कविता - संग्रह में भी यहाँ संकलित हैं ) सातवें दशक में लिखी गई हैं , विनोदकुमार शुक्ल ने सन् 60 के आसपास लिखना शुरू किया था , इस वर्ष की चार रचनाएँ भले ही बहुत छोटी हैं , किंतु स्पष्ट और प्रतिबद्ध हैं -
1 - न मैं कौवा हूँ ।
न मेरी चोंच है
आखिर किस नाक नक्शे का आदमी हूँ जो
अपना हिस्सा छीन नहीं पाता
2- दौड़ते हुए समुद्र को ।
इतना छोटा कर देना है कि उसके चारों तरफ
चौकस नजर रहे
दोस्तों की संख्या बढ़ाकर । दुश्मन को घेर
लेना है।
यहाँ कवि की जनवादी विचारधारा और मानवीय संवेदना को अंकुरित होता देखा जा सकता है-
3- काश ! मैं दस रुपए का नोट बनकर
उसकी झोली में पनाह पाता
4- कोई चिड़िया । मेरी बाँहों की हरियाली
में घोसला दे । अंडे दे इन्हीं दो
विचारधाराओं का विस्तार उनमें उत्तरोत्तर दिखाई पड़ती है ... खासकर दूसरी किस्म की कविताओं में तो और भी स्पष्ट रूप से । लेकिन चौंसठ से अड़सठ के बीच की अधिकांश रचनाएँ जो छोटी हैं वे अस्पष्टता और अपूर्णता के बीच किसी लंबी कविता का टुकड़ा लगती हैं । दोस्त से मैंने कहा कि सूखी झील पर बसे हुए शहर की तरह था , जैसी पंक्तियाँ चौंकाती ही नहीं भ्रम पैदा करती हैं । यहाँ यदि शब्द - चयन में सतर्कता और मितव्ययिता बरती गई है तो वाक्य - संरचना में विचलन या विपथन का आधिक्य है गद्य रचना की नीरसता या अनन्वय के कारण लय बार - बार बाधित दिखाई देती है , जिससे अर्थ की एकतानता खत्म - सी हो जाती है और कविता इतनी धूसर हो जाती है कि उसके वास्तविक को पकड़ना वाकई दिमागी कसरत जान पड़ती है । इसके विपरीत आठवें दशक में लिखी गई अधिकांश कविताएँ लंबी हैं और वे अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट व संवेदनशील हैं । एक तरह से सोचें तो वे काफी विस्तृत होती गई हैं । इस तरह की कविताओं से ही समकालीन कविता की शक्तिमत्ता और संभावनाओं की पहिचान होती है । घुमावदार प्रतीकों के बाबासूट में घूमने का मन करता कवि तथ्य को यथावत् संवेदनशील भाषा में तब्दील करने में भी सक्षम है । यह सबके बस की बात नहीं है , लेकिन हम इस तरह सोचने के आदी नहीं हैं , इसीलिए ये कविताएँ हमें सादी , नीरस या कभी - कभी प्राणहीन भी लग सकती हैं । कवि की राय में -
हरे भरे पेड़ को । हरा - भरा पेड़ सोचने का
अभ्यास होना जरूरी है ।
परन्तु इतना नहीं कि कविता कोई आकार न पा सके और अमूर्त हो जाय - जैसा कि यहाँ अनेक बार हुआ है ।
आगे चलकर विनोद कुमार शुक्ल ने शब्दों का सधा हुआ प्रयोग किया है । उनके चयन में एक निश्चित क्रम है , जिससे कविता परत - दर - परत खुलती जाती है । यहाँ एक ही कविता काफी होगी । फूल यहाँ तक मुरझाया कि विशिष्ट शब्द क्रम इस प्रकार हैं-
फूल - पंखुरी सूखी - खुशबू ( कितनी और कब थी ) से तिनके ;
नदी - सूखी गहरी रेत - गर्म रेत - मँझधार - पतला गड्ढा लहरदार - भँवर - शंकू गड्ढा - सुई की नोक और अंत में सहेतुक शब्दों का प्रत्यावर्तन कविता को पूर्णतया पंखुरी - दर - पंखुरी खोलकर रख देता है , फिर छोटा - सा फूलिस्टाप ... इतना पानी - मोगरे का पौधा - पत्ती - पत्ती कलियाँ - नीम का पेड़ हरा - भरा ब्रह्मांड में ठहर गया ...
अंतर्वस्तु को बिना नुकसान पहुँचाए यदि उसे करीने से सजा दिया जाए तो उसका मूल्य बढ़ जाता है । अब नव्यरूपवाद का आक्षेप लगाकर उसे खारिज करना चाहें , तो आप स्वतंत्र हैं । और यदि कोई उसे जनवादी कविता कहने के लिए ही दृढ़ संकल्पित है तो वह भी स्वतंत्र है । दरअसल विनोद कुमार शुक्ल में अनुभूति का जैसा तीखापन है वैसा ही अभिव्यक्ति में पैनापन है । इसीलिए उनमें व्यथा की चीख चौखलाहट या शोरगुल जैसा कुछ नहीं है और न बतौर फैशन ठंडापन या सपाटबयानी । उनकी कविता सधी हुई शांत गंभीर और असरदार है , ठीक इस व्यक्ति की तरह - भुजाओं की मांसपेशियाँ / पसीने से चमकती हुई बंधे हाथ खुलते हुए / झुका सिर / उठता - सा / चेहरे पर शांति / पर निश्चय दृढ़ / सप्त ऋषि तारों की चारपाई से उठाकर व्यापारी को / जमीन पर फेंक देने की मुद्रा ...
यह गद्य के करीब , अनगढ़ भाषा की ताकत है । कसी हुई और दमदार । विनोद कुमार यह बात अच्छी तरह जानते हैं , चिखने - चिल्लाने से बात नहीं बनती उल्टे शक्ति क्षीण हो जाती है और इसी रचनाधर्मिता के होते विनोद कुमार शुक्ल युवा - कवियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं । रोजमर्रा की यथातथ्यता का ऐसा जेनुइन कवि वे अकेले हैं , और यदि अशोक वाजपेयी अन्यत्र उनका उदाहरण नहीं देख पाते या प्रयाग शुक्ल " विनोद कुमार शुक्ल , विनोद कुमार शुक्ल की तरह हैं , कहते हैं तो गलत नहीं होता । अलबत्ता घूम - फिरकर अशोक वाजपेयी अभिव्यक्ति की चर्चा करते हैं तो शिल्पगत वैशिष्ट्य ही सामने आता है और यदि शंभूनाथ जैसे प्रतिबद्ध आलोचक को नव्यरूपवादी कहने का अवसर मिलता है तो अंतर्वस्तु ओझल हो जाती है । सहानुभूति के लिए कोई भले ही " धमनी में फँसी कविता का एहसास कर अखबार लिख दे , पर उससे कविता के साथ न्याय नहीं हो जाता ।
विनोद कुमार शुक्ल में परिवेश को खंडित कर देखने की आदत नहीं है , इसीलिए उनकी कविता में राजनीतिक , सामाजिक या आर्थिक दबाव स्पष्ट नहीं हो पाता । इनके समवेत का दबाव अवश्य तिलिस्मी है । सूखे पर राजनीतिक बहस चलती रहती है और चिड़ियों का एक झुंड उड़ जाता है । जंगल कटता है शहर बसता है , बड़े - बड़े मकान बनते हैं , लेकिन लकड़हारे , बढ़ई , मिस्त्री आदि मेहनतकश लोगों का इनमें कोई घर नहीं , गोली चलती है , लेकिन लोग अपनी सुरक्षा में बंद , कोई किसी को नहीं बचाता , समूची धरती तराजू पर तुल जाने को है , फिर भी व्यापारी का पेट नहीं भरता । सेठ - साहूकारों की जमात खड़ी है । लोग बेदखल हो रहे हैं । गौटिया का अलग आतंक है । जिसके पास सबका रिकार्ड है , वह मालामाल है । खुसुर - फुसुर करते मजदूर शहजादे के सामने मुँह लटकाकर खड़े हो जाते हैं । नया गरम कोट पहनकर रौबदार आदमी विचार की तरह चला जाता है , उसे नौकर के सुख - दुख की कोई फिक्र नहीं । इन्हीं के बीच पली है , दस रुपए के नोट का खो जाना , उसका खाना न खाना । पत्नी की आकृति है खाली बाल्टियाँ लेकर आती हुई । लड़की की छोटी इच्छा है , कितनी छोटी वह स्वयं नहीं जानती । गरीब का लड़का है चोर , गुंडा , उचक्का , बदमाश । क्योंकि वह गरीब का लड़का है । औरत है दबी , सताई , सूर्य के कब्जे में रही सुबह की तरह काम पर जाती हुई , सीमेंट से भूरी दिखती खाल , खाल में गहरी दरारें , ईंट की ठोकर से पैर के नीचे घाव में रास्ते की मुरूम और मिट्टी भरी हुई । पहाड़ी को लाँघता दो रुपए में पहाड़ उठाए मजदूर है , उसकी ताक में कठिन खूखार जानवर दुबका हुआ - यानी आज की समस्याओं के प्रति कवि विमुख नहीं प्रतिबद्ध है , लेकिन बँधे - बँधाए अर्थ में नहीं ।
विनोद कुमार शुक्ल ने अपने अग्रज कवियों की खूबियों और कमजोरियों - दोनों का फायदा उठाया है । और उसे अपने अनुभव के ताप में गलाकर इस कदर बेलाग पेश किया है कि उसका उदाहरण कम ही दिखता है । विनोद कुमार शुक्ल की कविता का कैनवस मुक्तिबोध के करीब होता हुआ भी उनके जैसा विस्तृत और व्यापक नहीं है और न ही केदारनाथ सिंह जैसा साफ - सुथरा है , किंतु सीमित और प्रसारित होता हुआ भी प्रभाववादी है , ठीक स्वामीनाथन की पेंटिंग की तरह । प्रसंगवश पंखनुमा पत्तीवाला पेड़ जिसमें फूल और जड़ क्रमशः अस्पष्ट हैं , या चिड़िया ही है और विनोद कुमार की पहली कविता तथा बहुत बड़ा पहाड़ , नमूने बतौर रखे जा सकते हैं । विनोद कुमार शुक्ल के दृश्यों में धूसरता की अपेक्षा हरापन अधिक है , सर्वत्र उसी का आग्रह भी है-
चटियल मुरमी मैदान पर , हरियाली के विश्वास का विस्तार ... इसीलिए उनके दृश्य - खंड भव्य , उदात्त और कहीं - कहीं रुक्खड़ आकर्षक और एकदम खतरनाक तिलिस्मी है , ये यथार्थ के अत्यधिक निकट हैं -
1. मजबूत विशाल संगठन की ताकत से / धीमे - धीमे / बढ़ती हुई बैलगाड़ी / परंतु भविष्य अच्छे समय को लादकर / पहुँचने के लिए वाली गति ।
2. गोल मिट्टी / लगेगा / तराजू से होकर स्वतंत्र पृथ्वी ऊपर से गिरती हथेली पर ठहर गई / शांत सुरक्षित ।
3. दिन - भर की धूप में पुरानी जंग खाई लोहे जैसी मुरमी तपती जमीन
4. मोटी अँधेरी रात की चट्टान पर कुल्हाड़ी की मार से / छिटकी चिनगारी है ।
5. उस तरफ धूल पर लोटकर चीता / तनकर खड़ा हो जाता है तो उसके शरीर पर अभ्रक कण धूप में बहुत चमकते हैं आदमखोर आकर्षक और आदमी चमत्कृत है । नंग - धडंग का मूंछों भरा चेहरा / मजबूत उभरी हड्डियों का कठोर चेहरा / जमीन से निकल आया । स्वस्थ पथरीला चट्टानी सड़क की कोलतार का रंग / चेहरे पर तनाव जैसे छाती पर अभी रोड रोलर चला है / लोह - पत्थर को हाथ भट्टी से गलाकर निकाले लोहे से / कानों में लोहे के कुंडल / कंधे में कुल्हाड़ी ....
इसी तरह भारी - भरकम छुट्टा बैल - सा पसारा हुआ आकाश , काँसे की घंटी यानी तारा , जो गले के हिसाब से छोटा है , चंद्रमा ठीक है / बुरे दिन अड़ियल बैल से / मजबूत पुट्ठे और सींग तेल से चमकते , विस्थापित मजदूर अस्थि - पंजर से बिखर गए । रायपुर - बिलासपुर संभाग मर गया एक जोड़ी बैल की तरह , और चन्द्रमा को देखने पर छानी छप्पर का सफेद खड़िया याद आना , सादृश्यता को ही स्पष्ट करते हैं । मेहनतकश इन्सान को लोहा , सूर्य और हिमालय बनाने का काम किसी सृजनशील जनवादी कवि के हिस्से में ही आ सकता है । विनोद कुमार शुक्ल का सादृश्य - विधान शिल्प को नहीं अनुभव जगत को प्रस्तुत करता है । वस्तु को उसके समूचे परिवेश में देखना उनकी आदत है । एक चिड़िया उड़ती है तो उसका विस्तार पेड़ ही नहीं आकाश भी होता है । एक पत्ती का ब्रह्मांड पूरा नीम का पेड़ होता है । उसके आस - पास की चीजें होती हैं । यहाँ चिड़िया और हरा - भरा पेड़ सर्वाधिक प्रयुक्त हुआ है , चिड़िया प्रसन्न मन का और पेड़ जीवन्तता का प्रतीक है । इसी तरह क्षण को पत्तियों से तूलित किया गया है । विनोद कुमार शुक्ल कस्बे के मध्यमवर्गीय मानसिकता के कवि हैं , इसीलिए उनके प्रतीक और बिम्ब या फोटोग्राफी भी उनके आस - पास के होते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल देश की आजादी को सत्ता का मात्र हस्तांतरण मानते हैं , उनके हिसाब से देश एक पक्षी था , जो पिंजड़े सहित पेड़ पर बैठ गया था और वह अब खजूर पर बैठा है हजूर के पेट पर बैठा है । जेल के अंदर जो कुछ है उससे भी ज्यादा तकलीफ़देह और खौफनाक जेल के बाहर है । यहाँ रईस थोड़े और गरीब करोड़ो हैं , समूची कविता में जैसे दो पात्र हैं , दो व्यक्ति - एक नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह चला जाता है , दूसरा रबर की चप्पल पहन पिछड़ जाता है एक मालिक है दूसरा नौकर , एक दाढ़ी बनाकर पहले से भी ज्यादा रौबदार है दूसरा ब्लेड रखने मात्र से षड्यंत्रकारी मान लिया जाता है , पिट जाता है । एक पेट भरा होने पर भी खाते रहने वाला जानवर है जो आदमखोर से भी ज्यादा भयानक है , दूसरा निरीह है , अपना हिस्सा भी नहीं छीन सकता । एक कर्ज देकर ब्याज में झोपड़ी ले लेता है , जमीन हड़प लेता है , समूची धरती तराजू पर चढ़ा लेता है दूसरे विस्थापित होने को मजबूर , भोले , निष्पृह , निष्कपट और डरे हुए ऐसे कि जगह रहने पर भी रेल में उखरू बैठे रहेंगे , अपने बीच फेंके गए कचरे को जगह देते हुए ।
लेकिन दूसरा ज्यादा ताकतवर है । कवि को निरीह आदमी की ताकत का पूरा अंदाजा है , इसलिए वह उसे लोहा , सूर्य और हिमालय में तब्दील करता है । मेहनतकश आदमी के ताकतवर हाथ जंग खाई मुरमी तपती जमीन को खोदकर हरियाली का विस्तार कर सकते हैं । जंगल काटते उसकी कुल्हाड़ी की चमक और आवाज की कड़क गूंज समूचे पहाड़ को चील के पंजे से बचा सकती है । सर्द हवा में भी हथेली की गर्मी से दबी बर्फ पिघल सकती है , गंगा - यमुना बन सकती है । जैसा कि मैंने आरंभ में कहा है शुरू में कवि में जो जनवादी स्वर और मानवीय संवेदना अंकुरित दिखाई देते हैं उसी का उत्तरोत्तर विकास होता गया है । कवि यहाँ निजी दुनिया और बाहर की दुनिया के द्वैत से मुक्त है , वह उन्हीं के बीच है । यहाँ कवि हर कहीं नेतृत्व की मुद्रा में होता है साक्ष्य बतौर निम्न पंक्तियाँ रखी जा सकती हैं-
1. कोशिश करूँगा और बचूंगा
2. समूह की ताकत बढ़ाने का हिसाब है
3. डंक मारने वाले विचारों को फैलाना है
4. दोस्त ! अपने को बचा / इनको भी बचा । जो कवि बीच में नाके के पास की हरकतों को अनदेखा कर बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधित्व करता है वही अपनी सुरक्षा की परवाह न कर निस्पृह , उदास , निरीहों का नेतृत्व करने को तैयार है
5. अरे ! रोक दो ! मजदूर विस्थापितों को / कहाँ है लाल झंडा / लालबत्ती / गाड़ी रोकने क्यों नहीं आ जाता सामने सूर्योदय सिगनल - सा । कवि को अपने अंचल से अपनी बोली से बेहद प्यार है । इसीलिए वे खेतों के बीच कुएँ के अंदर झरने - सा फूट जाने का इच्छुक है । सही मायने में वे दबी सताई जनता की आशा - आकांक्षाओं और विश्वास के कवि हैं । मेहनत की कथा ही उनके काव्य का उपजीव्य है
1. और बैलगाड़ी में होंगे / हँसते अपने सब मुस्काते गरीब बुलबुल / गरीब खंजन मैना / गरीब गौरैया औरत बच्चे बूढ़े ...
2. दिन सुरक्षित होंगे / नगदी के दिन से ऐसी बेफिक्री / कि जिंदगी जीने की सँवारी मेहनत से दया और माँगे हुए वक्त से / बाहर कूदकर / अपने कारखाने बगीचे / अपने घर / अपनी घास / तिनके तक निकल पड़े शामिल होने / उनमें / जो इकट्ठे हैं नदी को साथ लाने / चटियल मुरमी मैदान पर
इस तरह विनोद कुमार शुक्ल मुक्तिबोध की परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर हैं । उनके कैरियर में भी गरीब लड़का है , भूखा भविष्य है , वर्तमान में पैदा हुआ लेकिन - ललकारते हुए बैलों को / ताकत से पूछ मरोड़ हई / हई / बईला सम्हल / गड़बड़ करने से डर / जल्दी चल / आगे बढ़ / अपनी जमीन से जुड़ा हुआ कवि सूखे के उजाड़पन में भी हरा मुलायम ललछौंह चमकते नए पत्तों के बीच वनखंडियों को लौटा देने का स्वप्न देखता है - एक बीज अंकुर/ एक पेड़ है /उसी पेड़ पर जिस पेड़ की फुनगी को सारे आकाश का निमंत्रण !
हरा मुलायम / हरा ललछौंह चमकते
नए पत्तों के बीच / बस उसी पेड़ पर ।
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