भाषा में सृजन का पक्ष लिखती कविता: समीक्षक डाँ. बलदेव
भाषा में सृजन का पक्ष लिखती कविता
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डाँ. बलदेव
प्रभात त्रिपाठी का सातवाँ काव्य संग्रह 'लिखा मुझे वृक्षों ने' वैभव प्रकाशन रायपुर की ओर से पिछले वर्ष ( 2018 ) के अन्तिम दिनों में आया है । यह किताब कला चेतना से समृद्ध कवि अशोक वाजपेयी को समर्पित है । उम्र , रचना - धर्म और रुचियों की दृष्टि से अशोक वाजपेयी और प्रभात त्रिपाठी में प्रगाढ़ मैत्री है । मेरी नजर में प्रभात जैसा अजीबोगरीब व्यक्तित्व इधर हिन्दी कविता में कम ही है । वह कहीं से लाउड नहीं , उनकी भाषा और शिल्प इधर लिखी जा रही रचनाओं से थोड़ा अलग है । इसलिए शुरु - शुरु में उसमें प्रवेश कुछ अपरिचित , कुछ जटिल सा लगता है , लेकिन अवगाहन के बाद तुरन्त - फुरत उससे बाहर निकल पाना भी सहज नहीं है । प्रभात मेरे प्रिय लेखकों कवियों में हैं , प्रभात की रचना आयातित नहीं है , पर देसी होते हुए भी वह अन्यों जैसा नहीं है ।
' लिखा मुझे वृक्षों ने संग्रह में छोटी और मझोली कद की इकचालीस कविताएं हैं , जिनमें उनका व्यक्तित्व और समय मुखर है । प्रथम दो रचनाएं पोती शामुका के लिए लिखी गयी है । वक्त की बर्बर रफ्तार में , धूल और धुंए के बीच नर्म धूप है । वह हाथ पकड़ खेल के मैदान से इहलोक के घमासान और उस लोक के सुनसान तक की यात्रा कराती है । भाषा में सृजन का पक्ष लिखती उस बच्ची के नाभिकेन्द्र में रिश्तों की एक भरी पूरी दुनिया है । प्रभात त्रिपाठी रिश्तों की इसी दुनिया के कवि हैं । मनुष्यों के आपसी रिश्तों से लेकर शब्दों के आपसी रिश्तों तक की यात्रा करती उनकी कविता प्रथमत : और अंतत : अपने अंतरंग सच को दर्ज करने की कोशिश है । प्रभात अक्सर ही इस कोशिश में इसलिए सफल है कि उनकी कविता साधारण लोगों के जीवन की कविता है । मसलन पोती में नन्हें फरिश्ते को गौर से देखते हुए प्रभात प्यार और नफरत , न्याय और अन्याय के बीच का फर्क समझने की कोशिश करते हैं । स्वभावतः उनमें बच्चों के प्रति अनन्य वात्सल्य भाव है । वही उनके उजले और पीड़ा से भरे , दोनों प्रकार की दुनियाओं से हमारा परिचय कराते हैं । ' पोखर में डुबकियाँ लगाते बच्चे , बच्चों के गुडधानी की प्रार्थना , संकरी गली में पिट्ठूल खेलते बच्चे , डार - डार कूदते बचपन के सरल विश्वास , आँखों में मुक्ति का पता , गहरी नींद की मुस्कान , कागज की नाव बहाती लड़की , कलम की नोक से घर बनाती लड़की ' , इन सारे बिम्बों से हम पारिवारिक दुनिया से बड़ी और अलग एक ऐसी दुनिया में आ जाते हैं , जो हममे प्रेम और करुणा जगाती हैं । यहीं हम वीभत्स से भी साक्षात टकराते हैं । ' संकरी गली में पिटठूल खेलते बच्चों की चीख , अग्नि वर्षा में झुलसते बच्चों के खेल का मैदान , बच्चों का भीमकाय डम्फरों के नीचे कुचला जाना , कचरे में पड़े अखबार से बहता हुआ रक्त , वृक्ष - डार से लिपटा सांप और उसके नीचे कमर भर पानी में बचे अनजान खेलते हुए , निर्जीव लटकती गौरय्या बिजली के तार पर , सभ्यता की लहरों द्वारा तट पर फेंका गया नवजात शिशु , मृत मगर फिर भी जागृत , चौदह से कम उम्र की लड़कियाँ देह - व्यापार में संलग्न , औरत के निचुड़े स्तन से चिपटे बच्चे की देह , ' बच्चों के ये चित्र हमारी क्रूर व्यवस्था की हकीकत को सामने रखते हैं ।
नरक में बदलती इस दुनिया का एक हिस्सा जो ग्राम्यांचल है , वहाँ अपेक्षाकृत कुछ शान्ति है , कुछ प्रसन्नता है , कवि के पास पक्षियों का एक स्वप्न है -
शान्त भोर के रंग में उजलते पोखर का
एक घर
पोस्वर में डुबकियां लगाते बच्चों का
घाट पर बेझिझक नहाती औरतों का
घर के बाहर सड़कों पर हाहाकार है । विषधर चौध के इस विकराल विस्तार से बचना संभव नहीं , सड़क में चमचमाते तामझाम के साथ ही कोहराम है , जो जिन्दगी को तहस - नहस किये देता है । वही घरों के भीतर घुस रहा है , एकान्त की चिन्दियाँ बिखेरता हुआ ।
वास्तव में सड़क आधुनिक सभ्यता का प्रतीक है । उत्पादन और उपभोग केन्द्रित और उसी में सीमित मुक्त व्यापार के छुट्टे प्रसार के लिए ही यह सभ्यता और उसकी सड़कें बनायी गई हैं । वे गरीबों के लिए नहीं है , ताकतवरों की सुविधा के लिए हैं । विनिमय व्यापार में वणिकों को जोड़ने का काम ही ये सड़कें करती हैं , लोगों की सुविधा इनका मुख्य उद्देश्य नहीं है । इनके केन्द्र ' माल ' है , पूंजी है ।
पर पूंजीवाद के इस तानाशाही प्रचार को किसी लफ्फाज क्रांतिकारिता से पराजित करने और क्रांति का स्वप्न देखने की सतही प्रगतिशीलता प्रभात के यहाँ नहीं है । वे अपने साधारण अनुभवों की कविता ही लिखते रहे हैं । वहां उन्होंने महसूस किया है कि दलितों और शोषितों के बीच भी प्रतिरोध और संघर्ष की भाषा मौजूद है । इसलिए ही झोपडपट्टी के एक परिवार के रोजमर्रा के संघर्ष को आंकने वाली कविता के समापन में वे ये भी कहते हैं कि शायद दड़बों जैसे घरों के भीतर यह भी मौजूद है :
पर उनके अन्दर की गुफा में
एक संभाव्य शेर की दहाड़ पर सोचना
अव्यवहारिक भले हो
अस्वाभाविक कतई नहीं
इस संकलन में पानी, आग , मिट्टी , आकाश और हवा माने पंचतत्वों पर भी कुछ कविताएँ हैं । ये कवितायें दार्शनिक कविताएँ नहीं है और न ही कवि ने इनका कोई प्रतीकात्मक उपयोग किया है । वास्तव में ये सहज भाव से कविता में कवि के दैनिक अनुभवों की तरह ही आयी हैं , लेकिन गहरे उतरने पर इनकी व्यंजकता महसूस की जा सकती है :
पानी के बारे में सोचो
तो उससे नहीं मिटती प्यास
बल्कि और खरी हो जाती है
इस प्यास के नसीब में सिर्फ एक औंधा खाली घड़ा है । पर इसी पानी को सोचता हुआ एक दूसरी कविता में कवि अपने किशोर दिनों की स्मृति में पहुंच जाता है और वहाँ उसे लगता है :
फुर्ती से चित्त लेटकर
इत्मीनान से ताकता हूँ सूरज को
मुंदी आँख में दुपहर की तेज पीली रोशनी
और बाबू के घाट में सीने तक
लहंगा चढ़ाकर तलवे माँजती औरतें
ऐसी स्मृति के बीच भी कविता के अंत तक आते - आते वह पानी नहीं बल्कि आग के बारे में सोचने लगता है । यह आग उसके अकेलेपन में सुलगती हुई आग है , जबकि पानी महज एक खयाल है और यह धुंधवाती आग उसके अपने जीवन की सच्चाई है ।
इस अन्यथा घमासान समय में
हलक तर करने सा
आँख मूंदकर उसे देखना
इस बार सचमुच अलग था
तृप्त और कृतज्ञ
.हम अपनी प्रगतिशीलता में देश दुनिया की खबर तो रखते हैं पर आस पास की घटनाओं से बेखबर रहते हैं । ठीक राजमहल के सामने एक गरीब मैकेनिक का झोपड़ी आग के हवाले कर दी जाती है और हम इतने असंवेदनशील कि इनके विरुद्ध कुछ नहीं बोल पाते । जो इस जगह को साफ करके साफ सुथरा मकान या दूकान खड़ी कर देना चाहते हैं , वे जानते हैं कि मैकेनिक अल्पसंख्यक है , मुसलमान है । साम्प्रदायिक जहर हमारे जेहन में फैल चुका है , और उसके भयंकर परिणाम हमारी आँखों के सामने है ।
पर प्रभात मूलत : अंतरावलोकन और आत्माभियोग के कवि हैं । इसलिए संहार की किसी भी दृश्य के लिए वे महज दूसरों को जिम्मेदार नहीं ठहराते । ' चीटियाँ ' नामक अपनी एक कविता में चीटियों के ढेर पर पानी डाल देने के बाद अपनी सोच में बहते हुए वे बाढ़ में हुए जनसंहार की कल्पना करते हुए एक बिलकुल दूसरी ही दुनिया में पहुंच जाते हैं । उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि अपनी कविता में वे चेतना - प्रवाह की कथात्मक शैली का इस्तेमाल करते हैं । उनकी कविता अलग - अलग विषयों पर लिखी जाने के बावजूद मूलतः उनके निजी अनुभवों की कविता ही लगती है । यह उनके अनुभव की सीमा है ।
बाढ़ , अकाल को समाज और सरकार नियति मान चुकी है । इस दुखद घटना को हम अखबार के समाचार से ज्यादा कुछ नहीं लेते । कवि आम जनता की भूख और तकलीफ के प्रति अत्यन्त संवेदनशील है । भूखे आदमी के लिए अन्न जरूरी है ।श्रीमद् भागवत के ' अन्नमय प्राण ' को भूखा आदमी भद्दी गाली में बदल देने के लिए अभिशप्त है । गाली , श्लोक का विद्रूप बन जाती है । कई जगह तो प्रभात ने ईश्वर के अस्तित्व पर भी करारा व्यंग्य किया है । और कई जगह यह व्यंग्य आधुनिक सभ्यता के निर्माताओं पर है
एक छोटे से छेद से रंगहीन हवा निकलती है और असंख्य पक्षी फडफडा कर ढेर हो जाते हैं । बेदम भागमभाग की जिन्दगी में आदमी रस्ते में खरगोश सा लुढक जाता है , इस प्रजातांत्रिक व्यवस्था में चमचमाते इश्तहार के अलावा अधिक कुछ नहीं है । व्यक्ति कुंठित है और इसलिए निष्क्रिय भी ।
गली में मगन खेलते बच्चों को
भीमकाय डम्फरों की तरह कुचलते इतिहास से
उसकी इस रोजमर्रा की निर्लिप्त मुलाकात में
निश्चय ही इस सच्चाई का स्वीकार भी है
कि जरूरी मुठभेड़ के इस अन्यथा जापरूक वक्त में
वह सोया रहा बेसुध अपनी सेज पर
और गिरता रहा अपनी हवस के गढ़े में
ऐसी पंक्तियों को पढ़ते हुए लगता है कि कवि आत्मानुभव की चौहद्दी में बंधकर ही वस्तु संसार या कि आधुनिक इतिहास द्वारा निर्मित संसार को देख पाता है और अपनी आत्मबद्धता का आत्मरति की दिशा देता हुआ भी लगता है । बेशक इस तरह की आत्मरत्यात्मक मुद्रा की कवितायें भी एक झीनी आयरनी आत्मालोचन का ही परिणाम है । पर अन्ततः यही लगता है कि कवि अपने आपसे छुटकारा नहीं पा रहा है । संभवत : यह इसलिए कि आत्मविस्तार के लिए जिस ऐतिहासिक चेतना को आयत्त करने की जरूरत होती है , वह कवि से नहीं सध सकी है । इसके बावजूद कवि का यह संकलन पठनीय और संग्रहणीय है ।
समीक्षित पुस्तक : लिखा मुझे वृक्षों ने
कवि: प्रभात त्रिपाठी
प्रकाशक: वैभव प्रकाशन , पुरानी बस्ती ,
रायपुर छ.ग. 492001
प्रस्तुति:- बसन्त राघव
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