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छायावाद और पं.मुकुटधर पांडेय(समीक्षा ग्रंथ)डाँ. बलदेव

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रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव(संगीत ग्रंथ)डाँ. बलदेव

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वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत,डाँ. बलदेव की कविताएं

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वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत(काव्य संग्रह)डाँ. बलदेव

वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत(काव्य संग्रह)डाँ. बलदेव pdf वृक्ष में तब्दील हो गयी औरत,डाँ बलदेव की कविता संग्रह। pdf

डाँ. बलदेव की काव्म भाषा

डाँ. बलदेव की काव्य भाषा --------------------------------- बसन्त राघव मैं स्वयं स्व.डाँ. बलदेव की रचनाओं का पहला पाठक ही नहीं, कुछ कुछ उनकी रचना प्रक्रिया और उसकी पृष्ठभूमि का साक्ष्य रहा हूँ इसलिए उनकी काव्य-भाषा पर कुछ कहने कुछ लिखने की कोशश की है।उनकी छत्तीसगढ़ी भाषा की चिंता को स्पष्ट करने के लिए यह मुझे जरूरी भी लगा अन्यथा उनकी कविताएं स्वयं बोलती है, विशेष व्याख्या की जरुरत नहीं....              भारत कृषि प्रधान देश है, आज भी देश की कुल आबादी का पचास प्रतिशत परिवार कृषि पर ही निर्भर है, और पच्चीस प्रतिशत परिवार कृषि-मजदूरों का है, याने भारत की कला-संस्कृति, श्रम-सौंदर्य का ही पर्याय है।डाँ. बलदेव कृषक-पुत्र थे,उनकी समस्त रचनाओं के केंद्र में प्राणस्वरूप यही कृषि-संस्कृति या श्रम-सौंदर्य है।उनका यह विषय नया नहीं है, पर उनका शिल्प ,उनकी शैली एकदम नयी है।इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के विव्दान ,नंदकिशोर तिवारी की टिप्पणी गौरतलब है, उनके शब्दों में "सन् 1950 से आजतक की छत्तीसगढ़ी कविता में बिल्कुल अलग प्रयोग के दर्श...

रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-लेखक:-डाँ. बलदेव

लेख रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-- --------------------------------------------  लेखक:-डाँ. बलदेव  राजा चक्रधर सिंह को कथक नृत्य के विकास के लिए योग्य शिष्यों की तलाश थी। अक्सर गणेशोत्सव के समय जो गम्मत या नाचा पार्टियां आती, उन्हीं में से बाल कलाकारों का चुनाव किया जाता था। बाकायदा इन बाल कलाकारों का खर्चा , आवास व्यवस्था समेत 25 रूपये माहवारी छात्रवृति भी दी जाती थी। दरबार में प्रथम नृत्य गुरु जगन्नाथ प्रसाद थे और उनका पहला शिष्य थे अनुजराम मालाकार । वे रायगढ़ के पूर्व नेपाल दरबार में नियुक्त थे। कालांतर में पं. कार्तिकराम, कल्याणदास, फिरतू महाराज एवं बर्मनलाल जी इस घराने से दीक्षित होकर चार कीर्ति स्तंभ के रुप में सामने आये।  पं. कार्तिकरामः-   अपने जीवन में कथक.नृत्य का पर्यायवाची बन गये कार्तिकराम का जन्म चांपा-जांजगीर के एक छोटे से गाँव भंवरमाल में सन् 1910 में हुआ था। वे अपने चाचा माखनलाल की गम्मत नाचा पार्टि में बतौर बाल कलाकार के रुप में हिस्सा लिया करते थे। एक दफा गणेश मेला के दौरान परी के रूप में राजा चक्रधर सिंह ने उन्हें देख लिया। बालक जितना सुन्...

रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर:डाँ. बलदेव(शभूलाल शर्मा"बसन्त")

*रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर .. - डॉ. बलदेव* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ कृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साथ मेरा पाँच दशक से अधिक समय तक घनिष्ठ एवं घरेलू संबंध रहा है । वे जीवन पर्यन्त नवोदित रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देते रहे। गीत , कहानी , निबंध , आलेख , आलोचनात्मक लेख आदि साहित्य के हर विधा को निरंतर पोषण दिया। जिनकी प्रतिभा ने नवोदित रचनाकारों को खूब प्रभावित किया । ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी बलदेव भैया आज स्मृतिशेष हैं ।  उनके हिन्दी व छत्तीसगढ़ी साहित्य में शिल्प सौन्दर्य का एक सहज रूप ---- दृष्टिगोचर होते हैं , इसमें बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग सुन्दर बन पड़ा है । भाषा सरल है , पढ़ते ही आत्मसात हो जाते हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ आज साहित्य जगत के राष्ट्रीय फलक पर जगमगा रहे हैं ।  भैया जी के इस साहित्यिक यात्रा में आदरणीया भाभीश्री जी ने उनको सदैव प्रोत्साहित किया । वे हमेशा उनकी ख्याल रखतीं थीं । भैया जैसे जीवन साथी पाकर अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानतीं हैं । बलदेव भैया जी भी यही कहते थे कि , "आज मैं साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ भी हूँ , तुम्हारी भाभीश्री ज...