स्मरणांजली:डाँ. बलदेव

स्मरणांजली
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तत्कालीन मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़ अंचल के एक सामान्य गांव नरियरा के साव परिवार में पुत्र का जन्म हुआ वह असामान्य दिन था 27 मई 1942 बालक का नामकरण हुआ बलदेव।निश्चय ही उस दिन नरियरा के पुराने तालाब में असंख्य कमल खिले होंगे तो वहीं मंदिर के पास खड़े बूढ़े पीपल ने तालियां बजाकर स्वागत किया होगा, मुहल्ले की महिलाओं ने सोहर गाकर नवजात शिशु को आशीर्वाद दिया होगा। ग्रामीण संस्कृति, परिवेश, माटी प्रेम बालक बलदेव के मन में आजीवन रचे बसे रहे।
        तत्कालीन ग्रामीण प्रथानुसार 14 साल की उम्र में ही विवाह हो गया जिसे बाल विवाह  ही कहेंगे, बालिका वधू  सत्या देवी ने आजीवन सत्य निष्ठा के साथ पति का साथ दिया सच्चे अर्थों में जीवन सहचरी बनी, बलदेव जी की शिक्षा, साहित्य रचना, शिक्षण व्यवसाय में सहधर्मिणी की भूमिका का उन्होंने सफल निर्वहन किया तभी उनकी साहित्य साधना अनवरत चलती रही। समयनुसार साव दम्पत्ति को दो पुत्र, दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई।

मैं तब जाजंगीर हाईस्कूल की छात्रा थी श्री बलदेव साव हिंदी पढ़ाते थे, डाँ. शिवमंगल सिंह "सुमन" की कविता जाग रही मरघट की ज्वाला की व्याख्या करते हुये बताते कि उज्जैन के महाकालेश्वर  मंदिर में भस्म आरती क्यों की जाती हैं।घर आकर मैंने अपने पिता शेषनाथ शर्मा "शील"जी को बताया तब उन्होंने बताया कि तुम्हारे बलदेव साव सर स्वयं कवि हैं। कुछ दिनों बाद हमारे घर की काव्य गोष्ठी में साव सर की कविता सुनी फिर तो विद्याभूषण मिश्र, डाँ श्याम सुंदर त्रिपाठी, नरेंद्र श्रीवास्तव के साथ उन्हें कई बार सुनी। शायद चार साल बाद ही जांजगीर  स्कूल से दो  हिंदी शिक्षकों का चयन प्राध्यापक पद पर हुआ प्रथम डाँ. बलदेव साव , द्वितीय जन थे आनंद कुमार श्रीवास्तव इस तरह साव सर धरमजयगढ़ फिर रायगढ़ चले गये.....। समय अपनी चाल चलता रहा, तकरीबन पच्चीस सालों बाद रायपुर के एक साहित्यिक आयोजन में भेंट हुई, वे मंचस्थ थे, मैं श्रोता वर्ग प्रथम पंक्ति में बैठी थी, ध्यान आकर्षित हुआ  मेरे बाजू में परिचित सी सौम्य महिला बैठी थीं याद करने लगी कहां देखी हूं? धीरे से मन ने कहा ये तो साव भाभी हैं उत्सुकता चैन तो लेने नहीं दे रही थी, तभी मुझे मंच पर बुलाया गया मेरा नाम सुनते ही भाभी ने बड़ी आत्मीयता से मेरा हाथ पकड़ कर कहा "सरला"! उन्हें नमस्कार की आयोजन की समाप्ति पर साव सर के साथ भाभी से फिर स्नेहाशीष हमारी रचनाओं सहित स्थान दिया। याद आ रहा है ऐसो को उदार जग माहीं....।
डाँ. बलदेव साव की कृतियों में "वृक्ष में तब्दील हो गई औरत" कविता संग्रह हैं जो छन्दबद्ध न होते हुए भी लयात्मकता से भरपूर है। विदग्धता हर कविता में प्रगट होती है स्त्रियों के प्रति जो पारम्परिक सोच है उससे अलग सृजनकत्रीं स्त्री की क्षमता को नई सोच, उदारतावादी दृष्टिकोण के साथ कविताओं में ढाला है कवि ने तो दूसरे ओर स्त्री के आंतरिक सौंदर्य को अग्निशिखा सी तेज,ओज से उद्भासित बताया है।
        "छायावाद और पंडित मुकुटधर पांडेय"पुस्तक पाठक के समक्ष न सिर्फ मुकुटधर पांडेय की रचनाधर्मिता को रेखांकित करती है, पाठकों को उनके प्रदेय से भी परिचित कराती है वस्तुतः पाठक इस पुस्तक के जरिये छायावाद को भी जानने समझने का सुयोग प्राप्त करता है।
          "छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल"अपने भीतर सौ सालों का इतिहास छिपाये हुए हैं, शोधार्थियों के साथ साथ अध्ययनशील , जिज्ञासु पाठक के लिए भी यह महत्वपूर्ण पुस्तक है। अनमोल ऐतिहासिक ग्रंथ भी कह सकते हैं।
          " छत्तीसगढ़ के कुछ महत्वपूर्ण कवि" इस पुस्तक में तत्कालीन और आधुनिक कवियों की कविताएं और जीवनी महत्वपूर्ण टिप्पणियों के साथ उपलब्ध है यह भी सर्वकालिक रचना है जो पाठक का उचित मार्गदर्शन करती है। सहज,सरल,प्रवाहमयी भाषा, पूर्वाग्रह मुक्त लेखन है लेखक की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है।
          लोकाक्षर में डाँ. साव की छत्तीसगढ़ी रचनायें पढ़ती  रही हूं हिंदी के समान ही छत्तीसगढ़ी भी सशक्त भावाभिव्यक्ति का माध्यम रही विशेषकर उनकी समीक्षाएं, स्वतंत्र निबंध छत्तीसगढ़ी गद्य की धरोहर हैं। समीक्षक, कवि, गद्यकार के रूप में उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
          शास्त्रीय संगीत ,नृत्य पर लिखे उनके विचारों ने पाठक को नई दृष्टि दी तो राजा चक्रधर सिंह के योगदान, कथक घराने पर पाठक का ध्यान आकर्षित किया।
        विचारों की दृढ़ता ,अध्ययनशीलता, अभिव्यक्ति क्षमता उनकी कतिपय विशेषताएं उल्लेखनीय हैं तो बेबाक कथन उन्हें आजीवन अपनी राह खुद बनाना और उस राह पर चलना के विचार का प्रतिनिधित्व करती हैं सम्भवतः गुरूदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा है....

"जदि तोर डाक शुने केउ ना आसे
         मिला, गुरु शिष्य के नाते मैं एक नव अध्याय जुड़ा, बड़े भाई, भाभी का स्नेह मिला। फोन पर बातें होती तो दोनों का स्नेह मिलता, साहित्यिक आयोजनों में भेट होती अपनी  अपनी कृतियों का आदान प्रदान भी होता, विगत कुछ सालों से बलदेव भैय्या की अस्वस्थता के कारण उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी पर सम्पर्क बना रहा, विधि का विधान 6 अक्टूबर 2018 को डाँ बलदेव साव यशःशेष  हो गये, साहित्य जगत ने प्रवीण समीक्षक,माटी के गीत रचने वाला कवि, सशक्त लेखक प्रखर वक्ता खो दिया, हिंदी और छत्तीसगढ़ी दोनों साहित्य की अपूरणीय क्षति हुई है।
          "छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल' के रचनाकार में बलदेव जी का फोन मिला शील जी की और अपनी कवितायेँ भेजो यह पुस्तक आगामी साहित्य अध्येताओं के लिए ऐतिहासिक कृतियों में शामिल होगी, यथासमय आदेश का पालन हुआ, रायगढ़ जाना फिर भी नहीं हो सका जिसका मुझे आजीवन खेद रहेगा पर गुरूजन की गुरुता देखिये..... वे किसी आयोजन में भाग लेने जांजगीर गये तो यह अमूल्य पुस्तक मेरे भाई प्रेमचंद शर्मा के घर शील सदन में एक प्रति मेरे लिए छोड़कर आये अभी पुस्तक मेरे पास उनके स्नेहाशीष स्वरूप है ,जो इसलिये और भी मूल्यवान है कि उन्होंने हम दोनों पिता, पुत्री को इसमें
      तबे एकला चलो रे..... तुमि एकला चलो गो...
             अपने इन विचारों के माध्यम से मैं अपने शिक्षक, अग्रज, मूर्धन्य साहित्यकार डाँ. बलदेव साव को सादर स्मरणांजली देती हूँ।

         इत्यलम   
शब्दांकन
सरला शर्मा
पद्मनाभपुर (दुर्ग) मो.नं.9826167502

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