स्मृतिशेष:डाँ. बलदेव:-लेखक रमेश शर्मा
स्मृति शेष : डॉक्टर बलदेव
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डॉक्टर बलदेव एक प्रबुद्ध साहित्यकार थे । एक साहित्यकार होने की वजह भर से ही मेरा संबंध उनसे नहीं था बल्कि वे मेरे लिए एक संरक्षक की तरह भी थे । वे मेरे प्राचार्य रहे । एक अध्यापक के रूप में उनके अधीन काम करने का कुछ दिनों तक मुझे अवसर भी मिला, फिर बाद में जाकर उनके घर के निकट जब मेरा भी घर बना तो एक तरह से वे मेरे पड़ोसी भी बन गए । मैं दूसरी पीढ़ी का था इसलिए उनके साथ मेरे पिता तुल्य संबंध थे । मैं उन्हें बलदेव चाचा के नाम से पुकारता था । दो अलग-अलग पीढ़ी के होने के बावजूद विचारों में खुले पन की वजह से हमारे बीच मित्रवत संबंध रहे , पर यह संबंध हमेशा मर्यादा की परिधि के भीतर ही बना रहा । वे जब भी कुछ बात कहते या कुछ करते तो सचेत रहते कि अपने पुत्र तुल्य दूसरी पीढ़ी के लड़के के साथ वे बात कर रहे हैं । वे बात-बात में कहते कि तुम तो मेरे बेटे की तरह हो, तुमसे मैं क्या कहूं ।
एक लंबे समय तक मेरा उनका साथ बना रहा । इस दरमियान मैं जब अपने पुराने मकान को बेचकर नई कालोनी में शिफ्ट हो गया तो मेरे दूर चले जाने का उन्हें थोड़ा दुख भी हुआ। तब भी समय बेसमय उनके यहां मैं आता जाता रहा । मैं जब भी पहुंचता चाचा-चाची सब काम छोड़कर मेरे पास बैठ जाते और अपना सुख-दुख साझा करने लगते । उनके जीवन में कई किस्म के पारिवारिक उतार चढ़ाव भी आए पर उनका उन्होंने डटकर सामना भी किया । उनकी सहजता का एहसास सिर्फ उन लोगों को ही हो सका जो उनके करीब रहकर उन्हें जान सके । उनकी इसी सहजता का कई लोगों ने बेजा लाभ भी उठाया और उन्हें बदनाम भी किया पर उन्होंने अंततः सबको माफ कर दिया । बाद में जाकर उनका जब स्वास्थ्य बिगड़ा तो वे घर में ही बंधे रह गए । एक घूमने फिरने वाला स्वतंत्र आदमी जब घर में बंध जाए तो उसकी हालत क्या हो जाती होगी यह आप समझ सकते हैं । आखरी दिनों में बलदेव चाचा की स्थिति भी कुछ-कुछ वैसी ही हो गई थी । मैं जब भी उनके घर जाता ,कुर्सी पर अक्सर टीवी पर पुराने पिक्चर देखते हुए वे मिलते । मेरे पहुंचते ही टीवी बन्द कर देते और चाची से कहते कि रमेश के लिए चाय बनाओ । मैं मना करता तो कहने लगते कि तुम्हारे बहाने मुझे भी एक कप चाय पीने को मिल जाएगी । चाची यह बात जानती समझती थीं । घर में रह रहकर उनका पाचन तंत्र शिथिल होता जा रहा था पर वे खान पान को लेकर अंत तक बेपरवाह रहे । उन्होंने जिंदगी को अपनी तरह से जिया और ऐसा जिया कि उनकी वजह से किसी को कोई तकलीफ न हुई ।
एक बार मैं उनके साथ सृजन सम्मान के कार्यक्रम में रायपुर गया था । उनदिनों रायगढ़ के सबसे पुराने पत्रकार अनुपम दास गुप्ता एमएमआई रायपुर में भर्ती थे और अपने जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे थे । तत्कालीन शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा की पहल पर सृजन सम्मान के मंच से अनुपम दास गुप्ता के लिए कुछ आर्थिक सहायता की घोषणा हुई थी जिसे पहुंचाने के लिए मैं और बलदेव चाचा तत्कालीन राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त लक्ष्मण मस्तुरिया के साथ उनकी सरकारी गाड़ी में एमएमआई गए थे और अनुपम दास गुप्ता को वह राशि भेंट किए थे । वह एक मार्मिक और दुखद क्षण था । कुछ दिनों बाद ही पत्रकार अनुपम दास गुप्ता जी चल बसे थे । समय बीत जाने के बाद अब तो लक्ष्मण मस्तुरिया और बलदेव चाचा भी नहीं रहे । उनकी संगति की अनेक स्मृतियां भर बची रह गई हैं । उनकी पीढ़ी के ज्यादातर लोगों से जिनमें रवि श्रीवास्तव, परदेसी राम वर्मा,बसन्त देशमुख,पवन दीवान इत्यादि प्रमुख हैं ,मेरा परिचय बलदेव चाचा के माध्यम से ही हुआ था । चाहे भिलाई होटल में आयोजित दुर्ग जिला साक्षरता समिति का पुस्तक लेखन वर्कशॉप हो या एस.सी.ई.आर.टी.का बाईलिंगवल डिक्शनरी लेखन वर्कशॉप हो , मैं उनके साथ रहकर काम किया ।
अपने सम्पादित पुस्तकों के माध्यम से पद्मश्री मुकुटधर पांडेय के समूचे साहित्य को जनचर्चा में लाने का श्रेय डॉक्टर बलदेव को तो जाता ही है, साथ ही साथ लोकाक्षर पत्रिका को बतौर लेखक साझा सहयोग प्रदान कर छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्ध करने के लिए भी उन्होंने बड़ा योगदान दिया। छत्तीसगढ़ी कवियों की कविताओं को पुस्तक के रूप में संग्रहित करके भी उन्होंने एक उल्लेखनीय कार्य किया ।
इन सबसे हटकर मुझे लगता है कि वे हिंदी के एक प्रतिभावान कवि थे । सिसरिंगा की घाटी पर, समुद्र सीरीज पर , पचमढ़ी सिरीज पर लिखी गई उनकी कविताएं इसके जीवंत प्रमाण हैं ।" बृक्ष में तब्दील हो गई औरत " उनका चर्चित काब्य संग्रह है । पत्र पत्रिकाओं में अपनी कविताओं को प्रकाशित करने को लेकर अगर वे सजग रहते तो संभव है उनकी कविताओं को एक ब्यापक स्पेस मिलता और उन पर चर्चा होती पर दुखद है कि ऐसा हो न सका। छत्तीसगढ़ ग्रंथ अकादमी द्वारा प्रकाशित किताब " रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव " भी उनकी महत्वपूर्ण कृति है जिसके माध्यम से रायगढ़ की संस्कृति से छत्तीसगढ़ के कालेज के छात्र.-छात्राओं और आम लोगों का परिचय हो सका।
आदमी के जाने के बाद ही कई बातों का मूल्यांकन सम्भव हो पाता है । उम्मीद है डॉक्टर बलदेव के साहित्य के क्षेत्र में दिए गए रचनात्मक योगदानों का नई पीढ़ी द्वारा समय सापेक्ष मूल्यांकन सम्भव होगा यह उम्मीद तो की ही जा सकती है । 26 सितम्बर 2018 को उन्होंने इस दुनियाँ को विदा कहा । आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं उन्हें श्रध्दा सुमन शब्दांजलि अर्पित करता हूँ ।
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रमेश शर्मा
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