(लघुकथा) वरदान: बसन्त राघव

 

(लघुकथा)
वरदान
--------                                 बसन्त राघव
                         पंचवटी नगर, बोईरदादर, रायगढ़
                                       मो.नं. 8319939396

आखिर मुख्यमंत्री दौरे से अपने निवास को लौटे,वे प्रसन्न थे। गेट पर उन्होंने एक दुबले, फटे पुराने कपड़ें में रिटायर्ड मास्टर को देखा। वह तम्बू उखाड़ कर बैनर लपेटकर जाने को तैयार हो चुका था,तभी उसके कानों में कार की आवाज सुनाई दी और वह ठिठक गया।मुख्यमंत्री ने गेट पर ही कार रुकवा दी। उन्होंने दयाद्र होकर मास्टर साहब को उसी प्रकार देखा जैसे यमराज ने अपने दरबार पर भूखे- प्यासे नचिकेता को देखा था। कार से उतर कर हाथ जोड़े मुख्यमंत्री ने मास्टर साहब के आगे खड़े होकर पूछा-कैसे आना हुआ , मास्टर साहब, कब से पधारे हैं। मुख्यमंत्री के विधान सभा-क्षेत्र से ही वे मास्टर साहब आए थे।अतः उन्हें पहचानने में कठिनाई नहीं हुई।
        परिचित मुख्यमंत्री को सामने पाकर मास्टर साहब ने उलाहना के स्वर में कहा "क्या कहें साहब ,हमें रिटायर हुए तो ,दो साल हो गए, लेकिन अभी तक न तो ग्रेच्युटी मिली और न ही पेंशन केस बना, इधर-उधर बहुत लिखा-पढ़ी की,कोई सुनता ही नहीं, तब आपके पास गोहराने आए हैं।तीन दिन से भूखे-प्यासे आपके दरवाजे पर पड़े हैं।
       लज्जा का अनुभव करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा-क्षमा कीजिए आप तीन दिन से यहां भूखे-प्यासे पड़े हैं, तो तीन वरदान मांग लें।
       मास्टर साहब को विश्वास नहीं हुआ।वे अवाक देखते रहे।मुख्यमंत्री ने वरदहस्त की मुद्रा में कहा आपके पेंशन पर शीध्र विचार किया जायेगा।
       इसे सुनकर मास्टर साहब खुश हुए।मुख्यमंत्री ने आगे कहा-"जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जायेगी।
      दूसरे वरदान से मास्टर साहब और अधिक खुश हो रहे थे, तीसरा वरदान मुख्यमंत्री दें,इसके पूर्व ही सन्तरी ने सलाम बजाकर कहा,"हुजूर यह बूढ़ा यहां तीन दिन से अनशन कर रहा था"।
      अचानक ही मुख्यमंत्री की आँखें लाल हो गई।उन्होंने यमराज जैसे घोर गर्जना की,"इस मनहूस को मेरे सामने से दूर करो और जेल में ठूसवा दो"- यह उसका तीसरा वरदान था।
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