अभी अभी तो (कविता)बसन्त राघव
अभी अभी तो....
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अभी- अभी तो
दौडना शुरू किया था उसने
कृतसंकल्प
जनपथ से राजपथ की ओर
तुमने तोड दिये
उसके दोनों मजबूत पैर
अभी- अभी तो
निहारना शुरू किया
उसकी सपनीली आंखों ने
अनंत असीम की ओर
अभी- अभी तो
विहार कर रहा था
सुरम्य अरण्य में वह
अपनी सद्य: परिणीता
संगिनी सह
क्या बात हो गयी
कि
सहसा
तुमने पोंछ दिया
एक मांग का सिंदूर...
पुनरावृत्त हो गया
एक नृशंस क्रौंच वध
जी चाहता है
चस्पा कर दूं
तुम्हारे चेहरे पर
निर्दय ,निर्मम का
गर्हित संबोधन ...!
बसन्त राघव, पंचवटी नगर
बोईरदादर, रायगढ़, छत्तीसगढ़
मो.नं.8319939396
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