गुलमोहर

गुलमोहर
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जब भी निहारता हूं
गुलमोहर
न जाने क्यों
चिपक जाती हैं आंखें
ठीक वैसे ही
जैसे निहारा था तुम्हें
पहली बार
और
निहारता ही रह गया था
अपलक
मेरी आंखें समा गयी थीं
तुम्हारे भीतर
भला कैसे भूल सकता हूं
गुलमोहर तरु तले का
वह अनिर्वचनीय दृश्य
उन पलों की साक्षी चिडिया
आज भी दुहराती है
वही ऋचा बार- बार
गुलमोहर की टहनियों में
बैठकर
तुम नहीं बांच पायी
उसके कंठ की भाषा
उसमें छपी है
तुम्हारी ही तो अनाम गाथा ।

बसन्त राघव
पंचवटी नगर,बोईरदादर, रायगढ़
छ.ग. मो.नं.बसन्त की कविता

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