गये तब से कितने युग बीत:- डाँ. बलदेव (संस्मरण)

गये तव से कितने युग बीत
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 डॉ. बलदेव 

महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की शीतल छाया में जेठ की भरी दोपहरी का भरपूर आनन्द उठा लेने के बाद , विदा लेते हुए मैंने उनसे महादेवी वर्मा जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की । उन्होंने तुरन्त नंबर डायल किया " देवी जी , आपके एक भक्त बिलासपुर से पधारे हैं , आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं देवी जी का उत्तर था -आज हमारे परिवार में बहुत सारे मेहमान आए हुए हैं , कल आ सकें तो इतमीनान से बातें हो सकेंगी । अगले ही दिन वापसी थी । मन की इच्छा मन में ही रह गई शायद सत्य सनेहू के अभाव में तुलसी की " तुरते ताही मिलहीं नहीं संदेहू " की भविष्य वाणी फेल हो गई ... पर इच्छा बराबर बनी रही जो सोलह साल बाद पूरी हुई ..... 
        हुआ यों मैंने देश के बडे पुस्तकालयों की खाक छानकर मुकुटधर पाण्डेय के कुछ अमूल्य विखरे रत्न बटोरे थे उसी के प्रकाशन के सिलसिले में दो बार पन्द्रह - पन्द्रह दिनों के लिए इलाहाबाद प्रवास पर रहा । सभी क्षेत्रों में यहाँ पण्डों का वर्चस्व है , अस्तु मुझ जैसे देहाती का ठगी का शिकार हो जाना , कोई बड़ी बात नही थी । मैं उत्तम गोस्वामी के मैत्रेय पथ में डेरा डाला हुआ था । बहुत भटकने के बाद पं रामकृष्ण त्रिपाठी ( निराला जो के सुपुत्र ) के निर्देश पर विश्व बोध ( काव्य संग्रह ) तथा छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबंध बडे सज - धज के साथ एकेडमी प्रेस से प्रकाशित हुई थी । महादेवी जी को पुस्तकें भेंट करने की तीव्रतम इच्छा थी , पर योग नहीं बन पा रहा था ! अगला दिन निराला जयन्ति का था । कविवर जगदीश गुप्त और अम्बरेश्वर त्रिपाठी ( निराला जी का पौत्र , एम . ए . फायनल के छात्र ) ने कार्यक्रम में शामिल होने का विशेष आग्रह किया था , इसलिए इलाहाबाद में एक दिन और रूक जाना हुआ । शाम को 1 फरवरी 1984 को एक शोध छात्र को लेकर टैक्सी से अशोक नगर पहुँचा । देवी जी के निवास को ढूंढने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई जिससे भी भेंट हुई . उसी ने श्रद्धा की दृष्टि से हमें देखा और पेड - पौधों , बगीचों से घिरे एक बंगले की ओर इशारा किया । हमें गेट पर खडा देखकर घरेलू नौकर दौड़ा । आने का कारण पूछा हमने बताया वह बोला आइए और बरामदे में ले जाकर बोला- यहीं ठहरिये वह अन्दर गया और प्रो . रामजी पाण्डेय बाहर निकले । नमस्कार चमत्कार के बाद उन्होंने अनमनस्क भाव से पूछा क्या आपने समय ले लिया था , मैंने अपना परिचय देते हुए उन्हीं का पत्र का हवाला दिया , तो वे झेंप से गए , बोले बैठिए क्या आप रायगढ से आए हैं - हाँ । देखिए देवी जी अस्वस्थ हैं डाक्टर भीतर है ये सीढी से गिर पड़ी थीं , हाथ और पैर में मोच है . बिजली से सिकाई हो रही है । हम उठे ...... मैंने कहा कोई बात नहीं हम चलते हैं , फिर कभी भाग्य में बदा होगा तो दर्शन होंगे।हम दोनों की बातचीत शायद इलाज करा रही महादेवी जी सुन रही थीं उन्होंने पाण्डेय जी को भीतर बुलाकर जानकारी ली , फिर वहीं से बोली-- " पाण्डेय जी उन्हें बैठाइए मैं थोडी देर बाद आ रही हूँ अधीरता और नैराश्य से राहत मिली हम पुन : बरांडे में रखी कुर्सियों पर बैठ गए ....
                          पन्द्रह सोलह मिनट बाद अन्दर से बुलावा आया भीतर घुसते ही हमने देखा समूचा कमरा अलंकरणों से , प्रतीक चिन्हों और बेशकीमती उपहारों से सजा हुआ है । आलमारियों और रेक में किताबें करीने से रखी गयी है । एक बड़ी सी चौकी पर सुफेद चादर बिछी है , बगल से झूले पर स्वर्णिम गोपाल - कृष्ण अपनी मंद मुस्कान से चतुर्दिक आभा बिखरे रहे हैं । एक कोने पर वाग्देवी की कॉस्यमूर्ति , ट्यूबलाईट के प्रकाश को सुरमई उजास में तब्दील कर रही है । दो तीन मिनट बाद शुभ्रवसना महा गरीयसी महादेवी जी प्रकट हुई । उनकी एक झलक पाते ही हृदय में दीप शिखा प्रज्वल्लित सी हो गई और 'मैं नीर भरी दुख की बदली' जैसी अमर पंक्ति को ओव्हर टेक करती " प्रिय शान्त गगन , मेरा जीवन जैसी गीत पंक्ति मानस में कौंध गई । ऐसे विराट व्यक्तित्व के सामने हमारा क्या वजूद । सिन्धु को क्या परिचय दें , देव । क्षणान्त हम सम्भले उनकी चरण धूलि मस्तक पर ली . उन्होंने मस्तक पर हाथ रखकर अशीषा , हम धन्य हुए , जीवन सफल हुआ ...... .... 
              मैंने अपने द्वारा संपादित पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय की सद्यः प्रकाशित किताबें , विश्वबोध और छायावाद एवं अन्य श्रेष्ठ निबन्ध की एक -एक प्रति भेंट की । पंडित मुकुटधर पाण्डेय का नाम सुनते ही महादेवी जी बेहद खुश हुई । लगा वे क्षण भर के लिए शारीरिक कष्टों से मुक्त हो गईं । पुस्तक हाथ में लेकर मस्तक पर रखी नमन करती हुई आत्म विभोर की सी अवस्था में बोल पड़ी ये हमारे गुरुजनों में से हैं , पाण्डेय जी छायावाद के प्रर्वतक कवि हैं । जब मैं इन्टर की छात्रा थी , सरस्वती में प्रकाशित इनकी कविताएँ पढकर प्रेरणा लेती थी । आपने इन पुस्तकों को प्रकाशित कर हिन्दी साहित्य का बड़ा हित किया है , आप धन्यवाद के पात्र हैं ....... में इन पुस्तकों को जरूर पढूंगी " कहकर गोद में रख ली । फिर सेवक को आवाज लगायीं - देखो भाई ये लोग बड़ी दूर से आए हैं . रायगढ छत्तीसगढ़ से आए हैं । इन्हें जलपान कराओं , फिर हमारी ओर मुखातिब हुई , तो मेरे बगल में बैठे शोध छात्र ने डायरी निकाली और प्रश्न के ऊपर प्रश्न शुरू कर दिए । मैंन इशारा करके रोका पर सब बेकार , वह बड़ा ही वाचाल हो उठा था , अपने को सम्हाल नही पा रहा था । कहाँ बैठा है , किसके सामने बैठा है , वह समझ नही पा रहा था । महादेवीजी ताड गई बोली , बलदेव जी ये आपके छात्र हैं या मित्र , मैंने कहा दोनों हैं , ये भी पाण्डेय जी की छत्तीसगढी में अनूदित रचना " मेघदूत " छपाने आए है । " इसके बाद भी वह शोध छात्र गंभीरता छोड चंचल हो रहा था , मैंने चिकोटी काटी , चुप रहने का इशारा किया । इतनी बड़ी हस्ती के सामने बचकाना औपचारिक प्रश्न हम दोनों को रास नही आया । देवी जी इनके प्रश्नों का क्या उत्तर दें , वह भी इस उम्र में । मैं भीतर ही भीतर टूट रहा था , संकुचित हो रहा था । 
                     यह कहना कठिन है कि महादेवीजी का कवि बड़ा है या गद्य लेखक ? ( रहस्य के झीने आवरण में समूचे हिन्दी काव्य को आवृतकर लेने वाली महादेवीजी ने हिन्दी गद्य को भी अपने रेखा चित्र संस्मरण और निबन्धों से काफी हद तक समृद्ध किया है । ) लेकिन भ्रम की गुंजाइश रह जाती है कि इन दोनों से उनकी समाज सेविका का रूप बड़ा है । विराट है ..... 
                 हम लोगों के नाश्ता कर लेने के बाद अब स्वस्थ व प्रसन्न नजर आ रही थीं । देवीजी ने आज के आए हुए पत्रों में से एक पत्र उठाया । यह पत्र किसी अग्नि दग्धा से संबंधित था । देवीजी बड़ी संयत भाषा में बोली , " पुरूष बड़े निर्दय होते हैं । देखो न दहेज की लालच में परिवार वालों ने अपनी बहू को जला दिया है । पत्र - लेखक ने मदद मांगी है , ज्ञान पीठ से मिली सम्पूर्ण पुरस्कार राशि में अन्य सभी जमा पूंजी लगाकर मैने एक न्यास की स्थापना कर दी है सिफारिश सहित में यह पत्र उनके सामने रख दूंगी । उन्होंने फिर एक दूसरा पत्र उठाया नजरें दौडाई और उत्पीडित हो बोल उठी- ये बेचारी परित्यक्ता है . इन्हें भी मदद की जरूरत है । सहारनपुर से यह किसी बालिका का पत्र है , वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मदद चाहती है । " महादेवी जी पत्रों को सहेजती हुई बोली " हमारे देश में महिलाओं का बुरा हाल है , हमारे समाज ने उसे निरीह बना दिया है . अबला बना दिया है , उनके ऊपर आए दिन अत्याचार हो रहे हैं , आप लोगों को इसे रोकना चाहिए । " 
           हमें पन्द्रह मिनट का समय मिला था , पचीस मिनट हो गए प्रोफेसर पाण्डेय हमें ही ताके जा रहे थे ..... समय खत्म हो गया , यह इशारा उनका था , देवीजी इस बात को ताड गई बोली- अरे पाण्डेय जी ये लोग दूर से आए हैं म . प्र . रायगढ से आए हैं । मुकुटधर पाण्डेय जी हमारे गुरू जनों में हैं .... ये अभी और बैठेंगे . नाश्ता कब आया , नाश्ते में क्या - क्या था , कब खत्म हुआ हमें इसका भान ही न हुआ हो , हमारे आँख कान , जिव्हा से ज्यादा सक्रिय थे हम उनके शब्द पकड लेने को समुत्सुक थे । महादेवी बताने लगीं- " मैं बिलासुपर हो आयी हूँ वहाँ भारतेन्दु साहित्य समिति ने मेरा वर्षों पहले सम्मान किया था । प्यारे लाल गुप्त , द्वारिका प्रसाद तिवारी , जैसे साहित्यकारों का आयोजन था । " सहसा ही उन्हें कुछ स्मरण सा होने लगा- बोली " पाण्डेय जी कैसे हैं , अब अस्सी पार कर गय होंगे । मैंने कहा नव्ये पार कर चुके हैं । फिर वे एक - एक बातें पूछने लगी , चल फिर सकते हैं , पढते लिखते हैं ? मैंने उनकी दिनचर्या पर विस्तार से बतलाते हुए कहा - आज भी वे दो तीन घंटे पढ़ते हैं । और पत्रों का तुरन्त जबाव देते हैं । मैंने यह भी बतलाया , उनके पास भी कई याचकों के पत्र आते रहते हैं । और वे भी आप जैसे यथासंभव मदद करते रहते हैं । फिर महादेवीजी मुकुटधर पाण्डेय के अग्रज पं . लोचन प्रसाद पाण्डेय द्वारा संपादित कविता कुसुम माला के चौथे संस्करण ( 1933 ) की चर्चा करती हुई बोली यह हिन्दी का पहला काव्य संकलन था , जिसमें नये पुराने कवियों की रचनाएं एक साथ रखी गई है । मैंने कहा चौथे संस्करण में तो आपकी भी रचना है । यह बात सुनकर वे प्रसन्न हो गई । बोली " देखो बाहर वर्षा हो रही है , एक - एक काफी और पी लो , वर्षा थम जाए तब जाना " तुरन्त काफी आ गई कप उठाते - उठाते उनकी एक कविता मुखर होने को बेताब हो रही थी , मेने भीतर ही भीतर गूंजने दिया , बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी - 

       घोर तम छाया चारों ओर 
             घटाएं घिर आई घनघोर । 
      वेग मारुत का है , प्रतिकूल 
               हिल जाते है पर्वत 
      गरजता सागर बारम्बार 
               कौन पहुंचाएगा उस पार । 

         कृतज्ञ भाव से हमने महादेवी जी से विदा लेना चाही तो उन्होने अन्ततः पूछ ही लिया . " तुम भोपाल नही चल रहे हो परसों मेरी फ्लाईट है चलना चाहो तो साथ चल सकते हो । " मैने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी । दरअसल महादेवी जो मुझे कोई चर्चित लेखक समझ रही थी शायद इसीलिए यह आग्रह कर बैठी वरना अपनी क्या हस्ती उनके बगल में बैठकर हवाई यात्रा करें । संकोचवश ही मैंने असमर्थता व्यक्त की थी । दरअसल बड़ों के साथ बैठने की योग्यता पहले हासिल कर लेनी चाहिए वर्ना बड़ो के आशीर्वाद को ही जीवन का पाथेय समझ संतोष कर लेना चाहिए । महादेवी जी की रचनाएं जब भी पढता हूँ उनका सौम्य मुखमंडल आँखों में उदीप्त हो उठता है-

              गये तक से कितने युग बीत 
              हुए कितने दीपक निर्वाण 
              नहीं पर मैंने पाया सीख 
              तुम्हारा सा मन  मोहन गान 

प्रस्तुति :- बसन्त राघव

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