एक छंद प्रेम का************महाकाल के क्रूरतम व्योम में निस्पंद *****************************डाँ.बलदेव
एक छंद प्रेम का
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महाकाल के क्रूरतम व्योम में निस्पंद
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डाँ.बलदेव
कविता प्रभात के लिए एक ऐसी दोस्त है , जो उसके अनुभव संसार को अधिकाधिक प्रामाणिक और व्यापक बनाती है । बाहरी दुनिया को उसकी भाषा निजता में तब्दील करती है । ताकतवर और अद्वितीय , अद्वितीय इसलिए कि उसकी नकल संभव नहीं गद्यानुवाद से भी नहीं । आत्मा के पड़ोस की इस बच्ची को कवि अपनी रचना में रूपक की तरह पिरोता है । उसके बायें सिर छिपाकर उसकी धुकधुकी सुनता है और दाएं के स्पर्श से उसके बालारुण का रंग भी जानता है । कविता शब्दों का खेल है , जिसमें मिलन के लिए पूरा - पूरा समय है । मृत्यु की दस्तक के बावजूद अधरात को घर उसकी सुगंधि से भर जाता है ।
. प्रिया की व्याप्ति उन्मत्त इच्छाओं में बहती हवाओं में है । वह अपने मुक्त समर्पण के बेसुध विलास में निमम्न है । मिलने के बाद बिछुड़ने की क्रिया से कवि औरत की बेवफाई में अपनी करुण भूमिका को समझता है । प्रणत और भावुक कवि दुनिया की बर्बरता को , उसके झटककर गायब हो जाने के बाद ही महसूस करता है :
एक नफरत
धरती के आखिरी छोर तक दौड़ती
तहस - नहस करती हरे सुनहरे संसार की
बची खुची छवियाँ
एक वहशत
मिटने और मिटाने को आतुर
एक बर्बरता भर बची रह गयी है
धारासार बारिश में नहाने के सपने के बाद
लाल लपटों में सुलगते जलते राख होते
संसार की कल्पना सी
इस उद्धरण में , पूर्व उद्धृत पंक्तियों की तुलना में , अप्रतिदानित प्रेम की पस्ती है । दरअसल प्रभात की प्रेम कविता , इस अनुभव को प्रखर लौकिकता और ऐन्द्रिकता में लिखती है , और प्रेम के साथ , मृत्यु की उपस्थिति इस अनुभव को जीवन की पूर्णता से जोड़ देती है । बसंत की भरपूर चांदनी में प्रथम चुम्बन की स्मृति - कथा अकेलेपन में अदृश्य ओस की तरह झरती है , फिर सुख तो आसमानी हो गया उड़कर , इसके बावजूद कवि की आकांक्षा है " कोशिश करो तो यहाँ भी शुरु हो सकता है खेल बिल्कुल वही का वही । " फिर स्मृति नहीं रह जायेगी।धड़कते वास्तविक जीवन में बदल जायेगी । समूचा विश्व युगल का है , दो मन का है , जिनके भीतर पलाश का लाल दहकता है । नदियां जिन्हें अपने अतल में डुबोने लगती है । इसका साक्ष्य एकान्त ही हो सकता है :
जहाँ
दो मन , उड़ रहे थे अपने अलहदा खयाल में
दो देहें जुड़ रही थी बेखबर
दो बच्चों की नींद में
स्वयं ईश्वर लिख रहा था अपना प्रेमातुर स्वप्न
इन पंक्तियों को ऐसा भी पढ़ा जाना चाहिए -
" तोमार इच्छा कर दे पूर्ण
आमार जीवन माझे "
प्रभात आस्तिक कवि हैं । प्रेम की पूर्णता भी तो इसी में है । अपनी आस्किता के चलते ही वे प्रेमानुभूति को भाव - गतियों की विविधता में लिखते हैं । आस्तिकता के कारण ही उनके यहाँ सर्वस्वीकार की भाषा है । प्रेम संतप्त संसार में मलयानिल का झोंका है । दिन के जलते भयानक शून्य का असीम नीला विस्तार जब चारों ओर से दबोचने लगे , तो ऐसे कठिन समय में प्रिया का स्पर्श मलयानिल का झोंका नहीं तो और क्या है?
तब आयीं तुम
माथे पर चुम्बनों की फुहार सी
लेकिन इनका क्षणिक वियोग भी , हाथ भर की दूरी भी , अनन्त विरह का आभास करा देती है | कवि मानता है कि दरअसल पृथ्वी असंभव इच्छाओं का स्वप्न मात्र है । इसलिए आकाश की कामना भी असंभव है । इसके बावजूद वह आकाश होना चाहता है , ताकि उसकी देह से लिपटकर , वह आखिरी नींद तक सो सके ।
अनुभूतियों की तीक्ष्णता के कारण उसका अतीत साकार समय में कब तब्दील हो जाता है , पता नहीं चलता। पहली बूंद से प्रिया के स्पर्श की अनुभूति, उसकी छुवन , उसकी चुभन , प्रत्यक्ष है इस साकार समय में :-
बादलों से बरसता
तुझे सराबोर करता
जो सुख तेरे करीब आयेगा
तू उसे छूना
मुझे लगेगा
मैं तुझे छू रहा हूँ
यह उमगा हुआ स्मरण है प्रिया का
कि पहली बूंद टपकी
मैंने तुम्हे बांधा आलिंगन में
हम देखते हैं कि इसमें निहायत निजी स्मृति को सार्वजनिक करने की यह शैली अक्सर ही प्रकृति के बिम्बों और रूपकों से रची गयी लगती है । इसी कारण वह महज आत्मकथात्मक स्मृति नहीं है ।
प्रभात की लिखत में चाहत के अजीबोगरीब रंग है , उजाड़ पहाड़ की उतराई में अधरस्ते पर एक नंगा दरख्त है , अचानक छोटी - छोटी पत्तियाँ निकल आई हैं , उसमें प्रार्थना के शब्द उच्चारित हो रहे हों जैसे । लाल किनारी की साड़ी में लिपटी साष्टांग प्रणति की मुद्रा में मां है । वहाँ चलने पर माथा चूमकर और अकोरती माँ । पकती सब्जी की गंध में बेशुमार , बेतरतीब चित्र उभर आते हैं ।उस सुन्दरतम मौन की अभिव्यक्ति है , प्रभात की प्रेम कविता | हम महसूस कर सकते हैं कि यह प्रेम का परकीया रूप भर नहीं है । मां की उपस्थिति , इस अनुभूति को , निरी ऐन्द्रिक यौनता की सीमा से बाहर ले जाती है । एक विम्ब कथा में पहाड़ी के उतार पर साइकिल से गिरता है बच्चा और चोट खाकर मां के लम्बे बालों में सिर छुपाकर रोने के बाद नींद के अनंत में खो जाता है । दूसरी बिम्ब कथा चाय पीने के बाद बिटिया को जगाने की है । बिटिया के दुख के बारे में सोचना कि अभी जो बच्ची थी वह तेज हवा में फरफराते बालों के साथ बड़ी हो गयी है । दुख है -
इस दूसरी दुनिया में जाकर
मुझ से दूर हो जाती है बिटिया
सहसा उसका आना मां की गोद में दस अप्रैल की दोपहर निजी संस्मरण है । इस प्रेम लीला का दूसरा चित्र वात्सल्य से भरा हुआ लगता है . जैसे उनकी प्रेमानुभूति की जड़ें , पारिवारिक प्रेम के अनुभवों में ही है । वैसे मुक्त प्रेम के प्रसंग भी यहाँ देखने को मिल सकते हैं ।
प्रकृति की लीला के बगैर कवि का प्रेम व्यापार संभव ही नहीं होता । कवि के इस प्रणय गीत की कुछ पंक्तियाँ बेहद स्निग्ध और चमकीली है , उसमें बचपन से लेकर बुझती हुई लौ के अनूठे शब्द चित्र है :
.." अथाह नीले को चीरती नाव पर दो की दुनिया का गीत गाती लहरों की लीला देख रही है समुद्र में , एक लड़की गुपचुप खा रही है . हवा उसके केशों से खेलती है । श्यामांगी की आँखों में अभिसार है ।चश्मा पहने लड़की के कंधों पर केश लहराते हैं , वह फूलों के बीच अकेले उदास पुष्प की तरह है । एक लड़की पेड़ पर गिलहरी सी चढ़कर जामुन कुतर रही है । एक लड़की नन्ही पहाड़ी से मेमनो के झुंड के साथ उतर रही है । वह अजनबी और सुन्दर है । एक लड़की अकेले तारे सा हवा में अपना पहला प्रेम पत्र लिख रही है । एक लड़की मैदान में खेलते लड़के का माथा चूम रही है । "
" एक कली अचानक खिली , उसके अथाह अजब अंतरंग में , एक संक्षिप्त द्रुत के पोर - पोर में , उसके शरीर में एक स्पंदित छंद गूंज उठता है । एक युवती जमीन पर पट लेटी हुई है , अमराई के सुख की दोपहरी में , थोड़ी देर उसके साथ मरा जा सकता है । यह कवि की स्वीकृति है । छज्जे पर सद्य : स्नाता झुकी युवती के उरोज आमंत्रण के मंत्र बुदबुदा रहे हैं । एक युवती पेड़ से टिककर बांसुरी सुन रही है । कवि उसका चित्र बना रहा है । एक भरी पूरी औरत रेत पर निवर्सन लेटकर सूर्य स्नान कर रही है , आकाश उसके स्तनों में उजास भर रहा है , उसके केश हवा में उड़ रहे हैं । एक औरत पहाड़ पर चढ़कर नदी के जल तक पत्थर की तरह लुढ़कना चाहती है । वह औरत बसंत के रक्तिम वृक्ष में आदिम पलाश की आग देखना चाहती है । एक दुबली पतली देह की लय में आँखें मूंदकर दीप्त समय को भुजपाश में भरती , आत्मरति को संभोग की तरह महसूस करती है । पास बैठी स्त्री के स्तनों के बीचों बीच अदृश्य पुष्पराग बज रहा है । छलछलाती आँख , उम्र भर की थकान के साथ सोयी वह औरत जिस शहर में है कवि को उसकी तलाश है । कितनी सारी स्त्रियाँ है प्रभात की इन कविताओं में , और यह भी कि कोई एक ही स्त्री जैसे विविध रूप धरकर इन कविताओं में स्वयं अपना बहुरूप रच रही है । शायद इसी कारण इन कविताओं को एक लंबे सिलसिले की तरह प्रस्तुत किया गया है ।
नारंगी लपटों से घिरी । सघन हरियाली की दर्री जमीन पर । बेसुध सोयी थी औरत , घुटने मोड़कर , एक बूढ़े वृक्ष की उभरी जड़ों का तकिया , करवट किये । उसके केशों में ढंपा था मुख , लपट में चमकती बुंदकी की ओर | एकटक देख रही थी चारों तरफ की आग ! ..... दुःस्वप्न यहीं से शुरु होता है , राख के पहले का ज्वलन्त पूर्वराग निस्पंद आनंद का अछोर | .......
अशोक वाजपेयी ने इस प्रेम कविता पर बेहद सुन्दर पंक्तियाँ लिखी हैं " उजली दमकती कितनी ही पंक्तियाँ और बिम्ब इन कविताओं को उनका अद्वितीय उजास देते हैं,बिरह,अधूरापन,अतृप्ति, कहे - अनकहे की गोधूलि , सब कुछ इन कविताओं में है । स्वच्छन्द उल्लास और अमिट अवसाद। प्रेम सिर्फ इन कविताओं का अभिप्राय नहीं , वह इनका काव्य शास्त्र है । "
तेज घाम की तपिश
और सूखते गले की प्यास के बावजूद
विस्मय की विभोर लिपि में
कोई लिख रहा है मेरा मन
और उसका बचपन
वास्तव में प्रायः हर कविता में , चिंतन के बावजूद एक तरह की शिशुता है । यही इन कविताओं को शारीरिक संपर्क की लालसा और कामना की फुरफुराती उत्तेजना से मुक्त करती है । पर उनकी कविता में प्रेम उस नन्हें शांत चेहरे के बाजू से लेटकर भविष्य के बारे में कुछ इस तरह भी सोचता है :-
सोच रहा हूँ।एक दिन / बिना कहीं दस्तखत किये चुपके से निकल जाऊँगा बाहर /कोई पुकार भी नहीं पायेगा / लेकिन अभी यहीं हूँ / सोये हुए नहीं शान्त चेहरे के बाजू में लेटकर / अचानक सोचने लगा हूँ । इस पृथ्वी का भविष्य ।
प्रेमानुभव की एक खासियत यह है कि उसमें अन्य ही महत्वपूर्ण होता है । पर इस अन्य को शारीरिक कामना की वन्या में डूबते उतराते भी देखता है कवि और उसे दर्ज करते हुए भी अपनी मूल्यपरक उदारता बनाए रखता है । "अनेक पुनर्जन्मों की इच्छाओं से स्वर्ग में ईश्वर के जर्जर मकान को तोड़कर हम अपना घर बसायेंगे ।"
देखें तो यह समूचा संग्रह एक लम्बी पूरी प्रेम कविता है जिसमें उल्लास है , वेदना है , स्मृति है , दुःस्वप्न है । इस दुखद अन्त की कथा को कवि अपनी अनुभूति के साकार समय में विविध रंगों में लिखने की कोशिश करता है : -
लम्बी सूनी सड़क पर हांफते दौड़ते
जिसके पास जा रहा हूँ
वह कहीं नहीं है इस चमचमाते मायालोक में
कहीं नही कोई ऐसी जगह
जहां बेवक्त बिना वजह रह सकूँ
अगोर सकूँ धेर्य से , शान्ति से
पंच तत्वों की लीला का आखिरी दृश्य
और तब घर के आंगन में खिलखिलाते
किस्म किस्म के फूलों को देखने सी सुबह हो ।
उस वक्त जब धीरे धीरे मुंद रही हो आँख ।
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