राजा साहब

(कहानी)
राजा साहब
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डाँ. बलदेव

                खास उम्मीदवार के लिए एक दल , दूसरे दल के लिए एक एक की जगह दो दो सीट छोड़ने को तैयार हो जाता है । इसके लिए वह कमजोर व्यक्ति को डमी के रूप में खड़ा कर देते हैं । चुनाव या सरकार बनाने के समय कुछ इस तरह के गोपनीय समझौते करने होते हैं । ये उच्चस्तरीय होते हैं । डमी को इसका पता नहीं रहता । वह बड़े उत्साह मे खर्च करता है । आम जनता इसे नहीं समझ पाती । इसीलिए वह बार बार धोखा खाती है । जातिगत समीकरण के चलते मूर्ख से मूर्ख को टिकिट देनी पड़ती है । 
             इस बार राजघराने के दो शूरवीर मामा और भांजा चुनाव मैदान में हैं । कॉटे की टक्कर है । गाँव में धूल उड़ने लगी है । जीप और कारों की धूल आसमान को बदरंग कर रही है । इस चुनाव में आपसी स्वार्थ टकराने लगे हैं । भाई - भाई का दुश्मन चुनाव प्रचार में हैं । चाचा भतीजे खून के प्यासे बने हुए हैं । गली - खोर में मुड़ी - झंडी फरफरा रहे हैं । तिराहे - चौराहे पर नेताओं के कट आउट लगे हुए हैं । .... मुर्गे और बकरे ऊँचे दामों पर कट रहे हैं। दारू बोतलों में नहीं हंडियों में बाँटे जा रहे हैं । शीर्ष नेताओं के आने की खबर है । लाउडस्पीकर से एक दूसरे को काटती कन फोड़वा आवाजें उठ रही थीं । 
                   चुनाव प्रचार का अन्तिम दौर है । राजा साहब गाजे - बाजे फौज पट्टके के साथ सुबह ही अपने प्रचार में निकल पड़े हैं । चार - पाँच गाँवों के बीच लम्बा - चौड़ा मैदान है । भारी संख्या में लोग इक्ट्ठे हुए हैं । राजा साहब की बस्ती से इंतजार है । दूर से धूल उड़ती दिखाई दी । छोटे - बड़े बच्चे हाथों में झंड़ियाँ लिए जय जयकार करते उधर ही दौड़े । मंच के पीछे कार रुकी , जीपों का काफिला रूका । ऊँचे और विशाल मंच पर राजा साहब दूसरे सूर्य से प्रकट हुए । तालियों की गड़गड़ाहट हुई । आस्वस्ति में हाथ उठे । हर कहीं खामोशी शान्त वातावरण । राजा साहब को मालाओं से लाद दिया गया । भांजे की भारी भरकम सभा देखें , मामा साहब का काफिला पीछे लौट गया । कुछ लोग उधर ही दौड़े पर राजा साहब हताश नहीं हुए । उनका भाषण शुरू हुआ । मेरी प्यारी जनता । मैं आपको जी जान से प्यार करता हूँ । आप लोगों के दुख से मैं हैरान हूँ । आप लोगों के उद्धार के लिए ही मैं खड़ा हूँ । खड़ा क्या हुआ हूँ खड़ा कराया गया | आपने पिछले शासन में हमारे मामा साहब को मंत्री के रूप में देखा । उन्हें तीन - तीन बार जिताया । लेकिन आप लोगों का क्या भला हुआ । क्षेत्र का क्या विकास हुआ ? ऐसे निकम्मे मामा को इस बार हराना है । जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट हुई । मेरा मामा कंस है । वह  ऐय्याश नम्बर बन  है , भाईयों वह दिन रात रंडी और भड़यों से घिरा रहता है । इस हरामजादे को पिछले चुनाव में बुथ केप्चर कर मैंने ही जिताया था । लेकिन नीचता की भी हद होती है । यह मेरे ही खिलाफ चुनाव में खड़ा है।इसलिए आप लोगों से गुजारिश है इस हराम खोर को आप एक भी वोट मत दें । चुनाव के बाद मैं इसे सरे आम कोड़े लगवाऊँगा , देख लेना मेरी प्रजाजनों , आप को आगे मेरा खवास कुछ जरूरी बात बतावेगा । इतना कहकर राजा साहब ऊँची कुर्सी पर बैठ गए ।  अब खवास साहब माईक के सामने खड़े हुए । चूड़ीदार पाजामा , शेरवानी और टोपी में ख्यास साहब मुन्नीबाई के तबलची जैसा दिख रहे थे । उन्होंने माइक पकड़ते ही राजा साहब की तीन - तीन बार जय बोलाई । जय जयकार और लुभावने नारों से गगन मंडल गुंजायमान हो गया अब उसने बोलना शुरू किया- भाइयों , हमारे राजा साहब महान उपकारी है . धार्मिक हैं । दुर्गा माता को इन्होंने एक हजार बकरे का बदना दिया है । ये जीतेंगे ही । और आप देखना अगला मुख्यमंत्री ये ही होंगे । दूसरी ओर इनके मामा साहब को देखिए । वास्तव में वे कंस मामा है । कंस मामा क्या साला रावन है । रावना राजा साहब की भवें तनी । मामा को इस बार राजा साहब धूल चटा देगें । तालियों की फिर गड़गड़ाहट हुई । खवास साहब और उत्साहित हुए बोले मामा हराम खोर है , और नीच कोम है । भाइयो ..... ख्यास कुछ आगे बोलता कि राजा साहब तनतना कर उठे गर्दन पकड़ी और जूते उतार कर सात - आठ जूते गिन दिए । तालियाँ फिर बजी । इस बार जब तक बजती रही जब तक भीड़ तितर - बितर न हुई । क्या जाने राजा साहब किसके छत ऊपर बंदूक तान दें । जान सबको प्यारी होती है । राजा साहब का मूड ऑफ हो गया । मार खाने के बाद भी खवास साहब विचलित नहीं हुए । उल्टे उत्साह से ड्राइव्हर की बगल में बैठ गए । अब का काफिला आगे बढ़ा । रास्ते में घनघोर जंगल पड़ा । शेर - चीते बाघ - भालुओं से भरा जंगल । राजा साहब का सहसा ही आदेश हुआ । “ रोको " कार रुक गयी । जीप का काफिला रूका । बोले- इस साले को ..... गरदनिया देकर उतारो । ड्राइव्हर ने वैसा ही किया और कार आगे बढ़ गयी , खवास साहब गिड़गिड़ाते रहे , किसी भी को दया नहीं आई । काफिला उसके ऊपर ढेर सा गर्द उड़ाता अदृश्य हो गया । ?

प्रस्तुति:- बसन्त राघव

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