सम्यक दृष्टि सम्पन्न आलोचक रामविलास शर्मा:-डाँ. बलदेव

सम्यक दृष्टि सम्पन्न
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आलोचक डॉक्टर रामविलास शर्मा डॉ . रामविलास:
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डाँ. बलदेव

                शर्मा मेरे गुरू तुल्य थे । वे सम्यक दृष्टि सम्पन्न समालोचक थे , उनके इतिहास लेखन और मार्क्सवादी चिन्तन से हिन्दी साहित्य काफी समृद्ध हुआ । उन्होंने मुझे कई बार अनेक तरह से उपकृत किया । डॉ . साहब के नाम और काम से मैं सन् 1980 के आस - पास ही परिचित हो चुका था । सन् 73 से 79 के बीच जब मैं रिसर्च कर रहा था तो उनके सद्ग्रथों से मुझे बड़ी सहायता मिली , खासकर भारतेन्दु युग , म.प्र . द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण , भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद , निराला की साहित्य साधना आदि से , लेकिन स्मृति में उन्हें चिर स्थायी रखने लायक परिचय छायावाद के प्रवर्तक . पद्मश्री पंडित मुकुटधर पाण्डेय की कृतियों के संदर्भ में ही हुआ ।

      रायगढ़ में मैं 1977 से पाण्डेय जी के सम्पर्क में मृत्यु पर्यन्त अर्थात् 89 तक रहा । पाण्डेय जी का मैं पड़ोसी था । सुबह शाम मुलाकात होती थी । शताधिक शोधार्थी कवि लेखक हरेक साल उनसे मिलने आते थे , उन्हें आए दिन पत्र भी मिलते रहते थे , जिनमें उनकी रचनाओं की मांग होती थी , किन्तु पाण्डेय जी के पास उनकी स्वयं की रचनाएं 8-10 को छोड़ और अधिक नहीं थी । उन्हें हिन्दी साहित्य लगभग भूल ही गया था , यह बात मेरे लिए अखरने वाली थी , क्योंकि 1924 के बाद उनकी कोई कृति प्रकाशित हुई नहीं थी । जबकि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास में उनका नाम दर्ज हो चुका था और शांतिप्रिय द्विवेदी तथा रामनाथ सुमन जैसे आलोचक उन पर लेख प्रकाशित कर चुके थे , यह सन् 1930 के पहले की बात है । मैने इलाहाबाद , बनारस और दिल्ली के ग्रन्थालयों से उन पर कुछ सामग्री एकत्र की और सन् 1984 में उन्हें प्रकाशित करवा दिया , साथ ही विश्वबोध ( कविता संग्रह ) और छायावाद तथा अन्य श्रेष्ठ निबन्ध की एक - एक प्रतियाँ हिन्दी के करीब 200 विद्वानों , विश्व विद्यालयों और साहित्यिक संस्थानों को रजिस्ट्री डाक से समर्पित कर दी । कुछ सज्जनों ने इसकी नोटिस तो ली पर अधिकांश ने पत्र देना भी जरूरी नहीं समझा , और कुछ चालाक किस्म के लोगों ने उसकी सामग्री ज्यों की त्यों छापकर मोटी कमाई कर ली | मेरे द्वारा संपादित पुस्तकों का जिक्र करना भी उन्होंने उचित नहीं समझा , जैसे बताना चाह रहे हों कि पाण्डेय जी की रचनाओं का शोधपूर्ण संकलन उन्होंने ही सबसे पहले किया ।

                मैंने किताबों की एक - एक प्रति दिनांक 15.03.1984 को पत्र सहित डॉ . रामविलास शर्मा जी को प्रेषित की । उदार मना डॉ . शर्मा ने तुरन्त 26.03.1984 को प्राप्ति सूचना दी । उसमें आशीषों की वर्षा थी और पत्र लेखन का सिलसिला चल पड़ा । पत्रों के द्वारा मैने उनसे प्रश्न पूछे . शंकाएं प्रकट की थी , उन्होंने भी बिलानागा तुरंत जवाब दिया , शंकाओं का समाधान किया था । उन्होंने कतिपय स्मारिका और पुस्तकों के लिए भी लेखन के प्रति मुझे उत्प्रेरित किया , कई गोष्ठियों में उन्हीं के कारण मुझे भाग लेने
का अवसर भी मिला । प्रत्युपकार करौ का तोरा " के लिए असमर्थ मुझ पर उनकी अहेतुक कृपा थी । 26 . 03.1984 के पत्र में उन्होंने सूचित किया " निराला की साहित्य साधना खंड 3 के दूसरे संस्करण की भूमिका में मैने पाण्डेय जी और छायावाद पर एक टिप्पणी जोड़ दी है । छपने पर उन्होंने उसकी एक प्रति भिजवा दी । उनके पत्र से मैं कृतकृत्य हुआ था । पुस्तक में अपने संपादन और प्रकाशन का नामोल्लेख देखकर रोमांचित सा हो गया , लगा , मुझे मेरे परिश्रम का भरपूर लाभ मिल गया ।

                              ( 2 )
              पंडित मुकुटधर पाण्डेय पर हिन्दी के तीन आचार्यों ने सारगर्भित महत्वपूर्ण टिप्पणी की है । डॉ . शर्मा की सम्यक आलोचना दृष्टि को जानने के लिये अन्य दो आचार्यों की टिप्पणियों के साथ डॉ . शर्मा के विचार संक्षेप में यहां  दिये जाते हैं , इससे पाठकों को भी सुखकर अनुभूति होगी । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-

                               ' हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य शुक्ल ने पंडित मुकुटधर पाण्डेय पर कई बार महत्वपूर्ण टिप्पणी की है । कुछ इस प्रकार , " गुप्त जी तो जैसा कि पहले कहा जा चुका है , किसी विशेष पद्धति या वाद में न बंधकर कई पद्धतियों पर अब तक लिखते चले आ रहे हैं । पर मुकुटधर जी बराबर नूतन पद्धति पर ही चले । ( पृ . 352 )

           .हिन्दी कविता की नई धारा का प्रवर्तक इन्हीं को- विशेषतः मैथिलीशरण गुप्त और मुकुटधर पांडेय को समझना चाहिये । ( पृ . 352 )

   .. तृतीय उत्थान के आरंभ में मुकुटधर की रचनाएँ छायावाद के पहले किस प्रकार नूतन , स्वच्छंद मार्ग निकाल रही थी , यह भी हम दिखा आए हैं । मुकुटधर जी की रचनाएँ नरेतर प्राणियों की गतिविधियों का भी रहस्यपूर्ण परिचय देती हुई स्वाभाविक स्वच्छंदता की ओर झुकती मिलेगी । " ( पृ . 358 ) हिं.सा. का इतिहास संस्करण सं . 2047 |

डॉ . नामवर सिंह
        अपने प्रसिद्ध ग्रंथ " छायावाद " की शुरूवात नामवर जी प्रथम रश्मि , शीर्षक से डॉ . मुकुटधर पाण्डेय से करते हैं । मुकुटधर पाण्डेय ने 1920 की जुलाई , सितम्बर , नवम्बर और दिसम्बर की श्री शारदा ( जबलपुर ) में ' हिन्दी में छायावाद ' शीर्षक से चार निबन्धों की एक लेख माला , छपवायी थी । जब तक किसी प्राचीनतर सामग्री का पता नहीं चलता , इसी को छायावाद संबंधित सर्व प्रथम निबन्ध कहा जा सकता है । डॉ . नामवर सिंह ने लेखमाला के कलेवर के सत्र में कवि स्वातंत्रय मिस्टिसिज्य , सांकेतिक चिन्ह , अधोदृष्टि आदि का विश्लेषण करते हुए कहा है- मुकुटधर जी ने सूक्ष्म दृष्टि से छायावाद की मूल भावना , आत्मनिष्ठ अन्तर्दृष्टि को पहिचान लिया था । आगे उन्होंने लिखा है पाण्डेय जी की कल्पना प्रियता  आध्यात्मिकता तथा धर्म भावुकता का मेल सांकेतिक रूप चित्रकारी और संगीत के एकीकरण और अस्पष्टता की चर्चा करते हुए आगे लिखा है " मुकुटधर पाण्डेय के इस निबन्ध की विस्तृत चर्चा इसलिये की गई है कि यह छायावाद पर पहला निबन्ध होने के कारण अत्यन्त सूझ - बूझ भरी गंभीर समीक्षा भी है । इस निबन्ध का ऐतिहासिक महत्व नहीं बल्कि स्थायी महत्व भी है । ( पृ . 13 , 14 , 15 ) छायावाद तृतीय संस्करण 1979 ।

डॉ . रामविलास शर्मा
          निराला की साहित्य साधना खंड 3 के दूसरे संस्करण में डॉ . शर्मा ने मुकुटधर जी का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है- मुकुटधर पाण्डेय ने 1920 में छायावाद पर जो निबन्ध लिखा , उसका विशेष महत्व यह है कि उसमें रीति और शास्त्रीय नियमों से मुक्त करने पर खूब जोर दिया गया है । ऐसी बातें महावीर द्विवेदी और रामचन्द्र शुक्ल भी कह रहे थे । मुकुटधर पाण्डेय का रीतिविरोध अधिक व्यापक है । उन्होंने प्रतिभा और भावावेश की बात को मौलिकता और उसके व्यक्तित्व से जोड़ा है । प्रतिभा भावावेश , मौलिकता इन सबका घनिष्ठ संबंध व्यक्तित्व प्रकाशन से है । यह व्यक्तित्व प्रकाशन स्वतंत्रता की भावना से जुड़ा हुआ है । भावावेश की यह विशेषता छायावाद को रीतिसाहित्य से ही नहीं , समाज सुधारक , उपदेशात्मक समकालीन कविता से भी अलग करती थी , साथ ही उसे भक्ति साहित्य से जोड़ती थी । भावादेश अनिवार्यतः कवियों को लिरिक अथवा प्रगीत की ओर ठेलता है । छायावादी कविता का अन्य गुण उसे रीतिकाव्य से अलग करता है वह है , चित्रकारी और संगीत का अपूर्व एकीकरण । छायावादी कविता के चित्र भाषा और छंद का संगीत सांकेतिक व्यंजना के माध्यम से बनते हैं । पाण्डेय जी ने छायावाद की कुछ ऐसी प्रवृत्तियों का समर्थन किया है जो नकारात्मक है , वे उसे कमजोर बनाती थी और उनका विरोध हुआ तो यह उचित ही था । छायावादी कविता का कमजोर पलायनवादी रूझान है । उसका ऐसा स्पष्ट उल्लेख अन्य छायावादी लेखकों के यहां दुर्लभ है । इस कमजोर रूझान का सम्बन्ध पाण्डेय जी ने अध्यात्म चिन्तन से जोड़ा है ।

         पाण्डेय जी छायावादी धारा के प्रवर्तकों में है । कवि मुकुटधर पाण्डेय को भक्ति साहित्य जिस तरह द्रवित करता है उस तरह नई रहस्यवादी कविता नहीं । निराला और मुकुटधर पाण्डेय का सम्बन्ध ' समन्वय ' काल का है । उसके प्रथम वर्ष के पहले अंक में मुकुटधर पाण्डेय की कविता छपे यह तथ्य रोचक है । प्रथम वर्ष ( 1920 ) के ग्यारहवें और बारहवें अंकों में भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई थी । पाण्डेय जी ने बहुत तरह की कविताएं लिखी है । उनमें शैली की विविधता है । " पृ . 12 , 13 , 14 , 15. 16 ( निराला की साहित्य साधना खंड तीन दूसरा संस्करण )

                      उपर्युक्त टिप्पणियों के अंश से स्पष्ट है आचार्य शुक्ल उन्हें नई धारा का प्रवर्तक कवि मानते हैं । नामवर सिंह उन्हें छायावाद का प्रथम समीक्षक मानते हैं जबकि डाक्टर रामविलास शर्मा ने उनके समीक्षक और कवि दोनों रूपों को उभारते हुए मुकुटधर जी को छायावादी धारा का प्रवर्तक मानकर अपनी सम्यक दृष्टि का परिचय दिया है । उन्होंने उनके गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर प्रकाश डाला है ।

डॉ . रामविलास शर्मा के प्रथम एवं अंतिम दर्शन :-
                                 (3)
              मैं ठहरा गंवई गांव का सूधो , बड़े लोगों से कब , कैसे मिलना चाहिए . इस शिष्टाचार से लगभग अपरिचित , गुरुजनों के दर्शन की पिपासा में विकल मति ।
             सन् 1909 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने की घोषणा होते ही यहां के बुद्धिजीवी , नेता , पत्रकार अपने अपने नेताओं की लाबिंग के लिए दिल्ली की ओर प्रस्थान कर रहे थे । युवा नेता जगदीश मेहर , गणेश कछवाहा और मनहरण सिंह , इन तीनों कलाकारों के साथ मैं भी 10-15 दिनों तक दिल्ली में रहा । हम लोग युवा सांसद चरणदास महन्त के फ्लैट में ठहरे थे और नामी गरामी नेताओं से मिल रहे थे । एक दिन बलवती इच्छा हुई कि डॉ . रामविलास शर्मा से मिल लिया जाए . समय - कुसमय का ख्याल न कर मैं टैक्सी लेकर सीधे विकास पुरी स्थित उनके बंगला ( सी 358 ) में पहुंचा । मैने अपने देवताओं का स्मरण करते हुए डरते - डरते काल बेल दबा दी । दो - तीन मिनट बाद दरवाजा उधाड़ कर एक दुबले पतले वृद्ध सज्जन ने झांका- " कहिए " ।
85-86- पार करने के बाद भी उनके चेहरे में तपश्चर्या की चमक थी । उन्हें पहिचानने में देरी नहीं हुई । मैंने अपना परिचय देते हुए उनके चरणों का स्पर्श किया । उनकी आंखों में वात्सल्य उमड़ पड़ा । चश्में से झांकते हुए उन्होंने दरवाजा पूरा खोलते हुए कहा- आइये आइये ! फिर भी मैं ठिठका खड़ा रहा । उनकी अभ्यर्थना में हाथ जोड़कर मैने कहा क्षमा करें , मैने भरी दोपहरी में आपको कष्ट दिया । यह तो आपके आराम का समय है । शर्मा जी की शीतल वाणी कानों में गूंज उठी । कोई बात नहीं । अभी तो मैं लिख ही रहा था , आराम कम ही करता हूँ । अन्दर आइये, देखिये बाहर लू चल रही है । सचमुच कड़ी दोपहरी थी , तेज हवा अपने साथ गर्दे उड़ा रही थी । जून का महीना ठहरा । मैं सहमते - सहमते भीतर पहुंचा वहां देखा कमरे में एक पलंग पर सफेद साफ - सुथरी चादर बिछी हुई है । बगल में एक मेज और एक लकड़ी की कुर्सी । मेज पर कागज कलम । एक दूसरी कुर्सी खींचकर उन्होंने सामने रखी , बोले बैठिये । फिर बोल पड़े दिल्ली कैसे आना हुआ । मित्रों के साथ यूं ही घूमने - घामने
कब पहुंचे ?
तीन - चार रोज हो गये -
मैने संकोच के साथ उनके हाथ में दशहरी आम की पॉलीथीन रख दी ।
अरे इसकी क्या जरूरत थी ?
मैंने कहा- पंडित जी ... फिर अटक गया ...
        डॉ . साहब पोटली लेकर भीतर गये और जग में पानी ले आये । फिर गिलास के लिए दुबारा गये । मेज पर जग रखकर ग्लास में पानी डालने लगे । मैंने देखा वे थरथरा रहे थे । मेरी ओर ग्लास बढ़ाने के बाद अपने लिए दूसरा ग्लास भरने लगे । हथेली में ग्लास का पाया रखे दूसरे हाथ से ग्लास थामते समय वे फिर थरथरा गये । मैने मदद करनी चाही तो बोले- नहीं - नहीं , मैं अपना काम स्वयं करता हूँ और पानी पीने लगे । ग्लास खाली करते हुए बोले- असल में आज मैं घर में अकेला हूँ । हां अब बताइये पांडेय जी कैसे है ? मैने कहा पांडेय जी अब नहीं रहे 97 वर्ष की उम्र में दिवंगत हो गए । मैने तो पत्र दिया था । उन्हें कुछ याद आया । बोले- हां हां मैने भी उनके परिजनों को शोक संदेशा भेजा था । अच्छा बताइये . इस समय आप चाय पसंद करेंगे कि ठंडा लेंगे ? मैने विनम्रता से कहा- पंडित जी कुछ भी नहीं लगेगा , आप कष्ट न करें । डॉ . साहब ने पूछा- आप भी तो कुछ लिखते होंगे । मैंने कहा- हां कविता , कहानी , समीक्षा कुछ - कुछ लिख लेता हूँ " हाँ , आपने तो पाण्डेय जी पर बड़ा महत्वपूर्ण कार्य किया है , आपकी दोनों पुस्तकें मेरे पास सुरक्षित हैं , मैंने उन पर टिप्पणी भी लिख दी थी । हाँ पंडित जी आपने निराला की साहित्य साधना मेरे पास भिजवायी थी । आपकी मुझ पर बड़ी कृपा हैं । अरे इसमें कृपा की क्या बात , आपने तो एक बड़े अभाव की पूर्ति की है । सामग्री के अभाव के कारण समय पर उनका सही मूल्यांकन नहीं हो सका । उन्होंने कुछ सोंचते हुए कहा विजय गुप्त तो साम्य निकाल रहे हैं , उसका अच्छा स्तर है । मुझसे भी उन्होंने 38 पेज का लेख लिखवा लिया है । उसमें छत्तीसगढ़ी का भी जिक्र है । मैने कहा- विजय गुप्ता मेरे मित्र हैं । मैं रायगढ़ में वे 210 किलोमीटर दूर अम्बिकापुर में रहते हैं , फिर भी कभी - कभार भेंट हो जाती है । डॉ . साहब बोले- देखिए भारत की बोलियाँ अत्यन्त समृद्ध हैं । उसमें हमारी संस्कृति बसती है । आपकी छत्तीसगढ़ी भी समृद्ध बोली हैं ? उसमें मध्यकालीन संत साहित्य का प्रभाव होना चाहिये । उसमें संस्कृति के बीज बिन्दुओं को खोजा जाना चाहिये । मैनें कहा- हाँ छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में कबीर , तुलसी , मीरा आदि संत कवियों के पर्दो का खासा प्रचार है । डॉ . साहब का जोर शब्दों के सांस्कृतिक विश्लेषण से था , उसमें काम होना चाहिये । शब्द हमारी सांस्कृतिक विरासत का जीवन्त प्रतीक है और धर्मदास जी ने तो छत्तीसगढ़ को ही अपनी साधना का केन्द्र बनाया था । कबीर पंथ की गदि्दयाँ स्थापित की थी , उनके पदों में पूर्वीपन है । मैं सहमति में सिर हिला रहा था ।

            इसके बाद उन्होंने भारतेन्दु और द्विवेदी युग पर भी विस्तार से चर्चा की मैं मूरख मति - मंद बिना तैयारी के गया था । अस्तु नोट नहीं कर सका और ज्ञान का प्रवाह यूं ही आया और बह गया ।

            शाम के करीब चार बज रहे थे , मैं कृतज्ञता ज्ञापित करता हुआ . उनसे विदा लेने लगा , तो बोले- अभी कुछ देर और बैठिए मौसम कुछ ठंडा हो तब जाइये और फिर आम उसका क्या होगा ? ऐसा कहते हुए वे उठे और पीतल की बाल्टी में भिगाए आम लाकर दोनों के बीच रख दीए - बोले खूब पका हुआ है और सुगंधित भी है . खाइये मैं भी खाता हूँ । हम दोनों ने तीन - तीन चार - चार आम चूसे । बीच - बीच में डॉ . साहब आम की वेराइटियों पर चर्चा करने लगे , दशहरी , फजली , लंगड़ा आदि आदि । आम को रसाल क्यों कहा जाता है , उन्होंने यह भी बतलाया । मैं चकित भाव से उनके प्रशस्त उन्नत ललाट को देख रहा था , जो तपश्चर्या से प्रदीप्त था , शर्मा जी का वह ओजस्वी रूप आज भी मेरे हृदय में यथावत है । शाम घिर आई थी , मैने उनको चरण स्पर्श किये और अपने लेखक होने को सराहते हुए डेरे पर लौट आया । लेकिन रात भर नींद नहीं आई . शर्मा जी के एक - एक शब्द अंधेरे में जुगनुओं के मानिंद चमकने लगे । मनोचेतना में आज भी उनकी आवाज गूंज रही है । खूब लिखते रहिये । जब भी दिल्ली आवें , इधर जरूर आवें निःसंकोच ।

' और अन्त में
           मैंने हरि ठाकुर कृत छत्तीसगढ़ी खंड काव्य अमर शहीर वीर नारायण सिंह की एक प्रति जनवरी 2000 के आसपास भेजी थी . उनसे कोई पत्र नहीं मिला तो दूसरा पत्र लिखने ही वाला था कि समाचार पत्रों में पढ़ा हिन्दी के महान आलोचक डॉ . राम- विलास शर्मा नहीं रहे । धक से मेरा दिल बैठ गया । विषाद ने कुछ क्षणों के लिये मुझे घेर लिया , लगा मैंने अपना एक महान शुभचिन्तक खो दिया ।

          हरि ठाकुर की चर्चित कृति डॉक्टर साहब को समर्पित करने की एक वजह यह थी- उसकी भूमिका लिखने के पूर्व मैंने डॉक्टर साहब से मार्ग निर्देशन चाहा था कि सन सन्तावन की पृष्ठभूमि पर खंडकाव्य हिन्दी में क्यों नहीं लिखा गया । मेरे द्वारा प्रेषित 19.02.1996 के पत्र के उत्तर में उन्होंने एक कार्ड भेजा जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा यह है " मेरी जानकारी में सन् सन्तान पर हिन्दी में खंडकाव्य नहीं लिखा गया । भारत के और हिन्दी प्रदेश के इतिहासकारों को जितना काम सन् सन्तावन पर करना चाहिये था उन्होंने नहीं किया । उसकी सही तस्वीर लोगों की आंखों से ओझल है . शायद उसके घटनाक्रम को खंडकाव्य में संजोना आसान नहीं था । हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में उस पर उपन्यास , ही अधिक लिखे गये । " इतना अंश मैंने कथित खंडकाव्य की भूमिका में चस्पा कर दिया है इससे स्वर्गीय हरिठाकुर कृतकृत्य तो हुए ही खंडकाव्य का महत्व भी बढ़ गया और मेरी भूमिका में मुहर भी लग गयी ।
 
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प्रस्तुति:- बसन्त राघव

Comments

  1. डॉ रामविलास शर्मा जी के सरल सहज स्वरूप को आपने अपने शब्दों में बड़ी शालीनता से उजागर किया। हिंदी आलोचना के नक्षत्र शर्मा जी का जीवन सादगी से परिपूर्ण था। निराला की साहित्य साधना के तीनों खंड अपने आप में "मील के पत्थर" हैं, एवं निराला की साहित्य साधना भाग-3 की भूमिका में बलदेव जी की सामग्री प्रकाशित होना अभूतपूर्व संयोग है।

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