अज्ञेय जी के साथ कुछ क्षण********************** डॉ . बलदेव
अज्ञेय जी के साथ कुछ क्षण
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डॉ . बलदेव
अज्ञेय जैसा सुदर्शन और शालीन व्यक्तित्व का कवि मैंने अब तक नहीं देखा था , शोध प्रबन्ध की सामग्री जुटाने अक्टूबर 1975 के पूरे महीने मै दिल्ली प्रवास पर था । जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मानस चतुष्शताव्दी समारोह चल रहा था । वहाँ डॉ . विजयेन्द्र स्नातक , डॉ . भोलानाथ तिवारी , डॉ . रामदरश मिश्र , निर्मला जैन आदि से मुलाकात हुई।डॉ. भोलानाथ तिवारी तथा डॉ . मिश्र ने चर्चा के लिए मुझे काफी समय दिया डॉ . तिवारी ने समारोह के लिए व्ही . आई.पी. कार्ड भी दिया , जिससे मुझे प्रथम पंक्ति में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मैंने डॉ . सिद्धेश्वर वर्मा ( ऊर्जा मंत्री ) रमा प्रसन्न नायक डॉ . नगेन्द्र और डॉ.भगीरथ मिश्र जी जैसे बड़े साहित्यकारों के वहीं दर्शन किए । हम उम्र के आलोचक चंचल चौहान , नाटककार रमेश उपाध्याय आदि साथ ही बैठे थे । सभा समाप्ति के बाद जलपान हुआ । इसी दौरान मैने डॉक्टर तिवारी से अज्ञेय जी के विषय में पूछा , मिलने की इच्छा भी व्यक्त की उन्होने उनके बंगले का सेचुएशन बतलाया ही नहीं बल्कि फोन पर अज्ञेय जी को मेरे आने की सूचना भी दे दी ।
शाम को मैने अज्ञेय जी के यहाँ फोन लगाया । इलाजी ने फोन उठाया मैने पूछा अज्ञेय जी है ? उन्होंने प्रति प्रश्न किया - आप कौन है ? मैने कहा - छत्तीसगढ से बलदेव आदरणीय से मिलना है । उन्होंने दूसरा प्रश्न किया आप किस प्रयोजन से मिलना चाहते है , मुझे जरा रंज हुआ मैने कहा आपसे अज्ञेय जी हैं या कि नहीं पूछा क्या आप बतला सकती है ? ऊंची आवाज सुनकर उन्होंने बडी विनम्रता से जवाब दिया - नहीं है , बाहर गये हैं ।
कब तक लौटेगें
रात तक
उन्हें बता देने का कष्ट करें , उन से ही मै मिलने आया हूँ ।
उन्होंने कहा आप कल दस बजे आ जाइये आपके आने की बात उन्हें मालूम है और यह समय उन्होंने ही दिया हुआ है ।
कनाट -प्लेस में रात को आदरणीय विष्णु प्रभाकर डॉ . विनय सुधांशु हमारे रायपुर के प्रफुल्ल झा आदि से इंडियन कॉफी हाउस में भेंट हो गयी । बाहर टेबिल से मैंने युग परिबोध नामक एक पत्रिका उठाई . इसे रमेश उपाध्याय ने देख लिया भाई साहब , युग परिबोध हमारी ही पत्रिका है , एक प्रति आप रख लें । इसके बाद हम दोनों विष्णु प्रभाकर जी के अगल बगल बैठ गए नई कहानी पर जमकर चर्चा हुई , फिर सुधांशु जी ने छेड दिया आपको चौथे सप्तक में लिया जा रहा है । मैने अनभिज्ञता प्रकट की तो वे थोडा मजाक के मुड में आ गए बोले आप तो नया प्रतीक में छप चुके है । बातचीत के दौरान मालूम हुआ कि इलाजी अज्ञेय जी की धर्म पत्नि है । सोचा इसीलिए वे साधिकार पूछ रही थी मैं भी ठसके से जवाब दे रहा था , उसका भी कारण था । अज्ञेय जी मुझे नया प्रतीक के दूसरे ही अंक में छाप चुके थे और उस कविता ( साँवला दिन ) की काफी चर्चा भी हुई थी । प्रख्यात आलोचक नेमीचंद जैन ने पूर्व ग्रह के दूसरे अंक में तीखी आलोचना कर उसे बहुचर्चित कर दिया था , उन्होने कविता की कम अज्ञेय जी के ' शौक की अधिक खिचाई की थी , आशय था अज्ञेय जी कहाँ कहाँ से ' प्रतिभाओं की खोज करते हुए अपनी सुरुचि का परिचय देते रहते है । अज्ञेय जी से मेरा पत्र व्यवहार था , इसलिए मेरी गर्वोक्ति भी स्वाभाविक थी ।
दूसरे दिन मै टैक्सी लेकर गोल फील्ड जा पहुंचा । पास ही अज्ञेय जी का बंगला था फेंस के बीच निकला रास्ता पारकर लॉन पर पहुँचा , देखा एक छरहरी बदन की ऊंची पूरी नारी आभूषणों से लदी लक्ष्मी की प्रतिमूर्ति सी द्वारा पर खडी है मुझे देखते ही उन्होने पूछा - बलदेव जी हैं न , आइए आइए । इस आवाज और उस आवाज में काफी फर्क था । ड्राईग रूम में ले जाकर बोली , आप बैठिए मै अंदर खबर करती हूँ , मैंने देखा अज्ञेय जी का ड्राईंग रुम बेश कीमती उपहारों , प्रतीक चिन्हों से दमक रहा था । तीन और दीवारों से सटी हुई भारी भरकम आलमारियाँ थी , जिसमें पुरानी किताबें और फाइलें करीने से सजी हुई थी । दो - तीन मिनट बाद ही अज्ञेय जी प्रकट हुए । पहली ही झलक में मंत्र मुग्ध उन्हे देखता रह गया मैं । देखा अलाव में औटे दूध सा प्रशान्त मुखमण्डल , ट्रीन की हुई सुफैद दाढी , शीतल प्रकाश फेंकती चश्मे के भीतर से झांकती आँखे सर से पांव तक शुभ्रवसन भरे पूरे देव पुरूष अज्ञेय जी , अत्याधिक विनम्रता से बोल बैठिए मैने उनके पैर छुए उन्होने मस्तक पर हाथ रखकर आशीष दिया बोले बैठिए बैठिए । लगा पूर्व जन्म के पुण्य प्रकट हो रहे हैं , उन्होंने कुशल क्षेम पूछा । मैंने कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए कहा - आपकी बडी कृपा है , आपने मुझ जैसे नये कवि को नया प्रतीक में स्थान देकर काफी उत्साह बढाया है मैं उसके लिए धन्यवाद ज्ञापन करता हूँ। अज्ञेय जी ने बड़ी शालीनता से कहा - आपकी कविता में कुछ नयापन दिखा , मैंने छाप दिया इसमें अहसान जैसी कोई बात नहीं । उन्होंने दिल्ली आने कारण पूछा । मैंने कहा- यहाँ हिन्दी के आप जैसे विद्वानों से मिलने ही आया था । आदरणीय डॉ . नगेन्द्र जी से मिल चुका हूँ , उन्होंने अपनी निजी लायब्रेरी पहले देख लेने को कहा , इन दिनों पं . भागीरथ मिश्र जी भी उन्हीं के यहाँ रूके हुए हैं । तीन दिनों के बाद वे मुखातिब हुए । आशय जाना और डॉ . निर्मला जैन के पास भेज दिया । अच्छा निर्मला जी से भेंट हुई , बड़ी विदूषी महिला हैं । मैंने कहा- हाँ उन्होंने काफी समय दिया , उन्होंने अपने आफिस में बैठाकर मुझे काफी प्वाइन्ट लिखाया है । निर्मला जी से भी पूर्व में मेरा पत्राचार हुआ था और उन्होंने पत्र से उत्तर देने को अव्यवाहारिक बतलाया था , इसलिए भी मुझे दिल्ली आना पड़ा ।
अज्ञेय जी बहुत कम बोलते थे , सुनते अधिक थे , वे बड़ी शालीनता से बीच - बीच में एक दो वाक्य ही बोलते थे । सहसा ही में मुख्य प्रयोजन से हटकर , अपनी उत्सुकता न दबाने के कारण पूछ पडा - पूर्व ग्रह ने तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर नया प्रतीक पर कडा प्रहार किया है , आपने देखा हे क्या ?
उसमें देखने जैसी बात ही क्या है ? नेमीचंद जी विद्वान आलोचक हैं , जो लिखा होगा ठीक ही लिखा होगा , अज्ञेय जी की वाणी संयत और संक्षिप्त थी , मैंने कहा - मैंने उसका कड़ा जवाब भेजा है , लेकिन पूर्वग्रह उसे शायद ही छापे । अज्ञेय जी चुप रहे , उनके प्रशान्त चेहरे पर कोई भाव नही उभरा उन्होंने मेरी बात पर कोई दिलचस्पी न लेते हुए पूछा- आपका विषय क्या है ? मैंने कहा -
आख्यानक प्रगीत काव्य , रायपुर और सागर विश्वविद्यालय में कोई विशेष सामग्री नही मिली , तो इधर आना पड़ा , उन्होंने फिर पूछा आपने विषय क्या बतलाया । मैंने दुहराते हुए कहा - उसमें असाध्य वीणा , राम की शक्ति पूजा तथा प्रलय की छाया की मुख्य रूप से विवेचना है । मैंने असाध्य वीणा के अख्यान में प्रगीत तत्व की चर्चा की तो अज्ञेय जी ने उसकी विशिष्ट लय की बातें बीच बतलायीं बीच - बीच मैं असाध्य वीणा की कुछ पंक्तियों की चर्चा कर लेता था । खासकर इन पंक्तियों पर अज्ञेय जी अधिक सजग हो गए ।
ओ शरण्य / मेरे गूंगेपन को तेरे सोये स्वर सागर का ज्वार डुबा ले / आ मुझे भुला तू उतर बीन के तारों पर अपने से गा / अपने को गा / अपने खग कुल को मुखरित कर / अपनी छाया में पले मृगों की चौकड़ियों को ताल बद्ध कर / अपने छाया तप , वृष्टि पवन , पल्लव कुसुमन की लय पर / अपने जीवन - संचय को कर छन्द युक्त अपनी प्रज्ञा को वाणी दे / तू सन्निधिपा - तू खो / तू आ / तू हो / तू गा तू गा ......
अज्ञेय जी मुखर हुए " हाँ यह महामौन के साथ एक संवाद ही है " , महाशून्य / वह महामाना अविभाज्य , अनाप्त अद्रवित , अप्रमेय / जो शब्द हीन / सब में जाता है । " अज्ञेय जी से ये पंक्तियाँ सुनते हुए मैं अपार शान्ति का अनुभव कर रहा था । पूछने का उद्वेग एक प्रकार से समाप्त प्राय था । जब मैंने प्रगीत शब्द पर उनकी टिप्पणी चाही तो उन्होंने मैथिलीशरण की कई रचनाओं को सुनाकर , उसमें अबाधित लय की बात कही मैंने कहा , गुप्त जी की रचनाएँ तो वस्तुमुखी हैं , उनमें वैयक्तिकता की कमी है , अस्तु क्या उनकी लघु आकार के खंडकाव्य जैसे- रंग में भंग विकटभट्ट बकसंहार को आख्यानक प्रगीत की श्रेणी में ले सकते हैं ? तो अज्ञेय जी बोले आप उनका पंचवटी काव्य क्यों नही देखते , देखिए उसमें अबाधित लय के साथ ही वैयक्तिक चेतना अधिक मुखर हुई है , और उसमें आख्यानक की बारीक बुनावट भी है । फिर वे पंचवटी के कई छंद सुना दिए । अज्ञेय जी ने उसमें निहित प्रगीत तत्व को विस्तार से समझाया । इलाजी आतिथ्य सेवा में लगी हुई थी , डँटकर नाश्ता के बाद काफी लेते मैंने असाध्य वीणा के कई स्तरों की चर्चा की तो उन्होंने कहा - आपने असाध्य वीणा को खूब पढ़ा है । उत्साहित होते हुए अपना लेख जो असाध्य वीणा पर केन्द्रित था मैंने उन्हें दिखा दिया । कुछ पंक्तियों पर उन्होंने दृष्टि डाली फिर सरसरी निगाह सें देखते हुए कहा - आपने खूब मेहनत की है , आपका लेख संतोष प्रद है । खूब लिखते रहिए यह काम आप जल्दी पूरा कर लीजिए - कृतज्ञता से मै भर चुका था , बोला पंडित जी आपका बहुत समय ले लिया है , क्षमा करेंगे । चल रहा हूँ , हम दोनों बैठक से उठ गए । अज्ञेय जी और इलाजी लॉन तक छोड़ने आए । इलाजी ने मुझे नमस्कार किया और एक बार फिर अज्ञेय जी के मैने चरण छुए और आगे बढ़ गया ।
प्रस्तुति:- बसन्त राघव,रायगढ़
तार सप्तक के विधानपुरूष अज्ञेय जी और इलाजी से मुलाक़ात के क्षणों को साझा करके आपने बहुमूल्य कार्य किया है। एक समय डॉ.बलदेव जी का नाम चौथे तार सप्तक में शामिल होने की चर्चाएँ तेज थी,जब उनकी रचना "साँवला दिन" को अज्ञेय जी ने चुना था।
ReplyDeleteप्रख्यात् आलोचक नेमीचंद जैन जी ने 'पूर्वाग्रह' में इस कविता की आलोचना की थी। ऐसे मूर्धन्य समीक्षक,जीवनी लेखक,कवि,आलोचक,कहानीकार, संस्कृति के पुरोधा स्व. डॉ. बलदेव जी का अभी तक उचित मुल्यांकन न हो पाना,उन्हें उचित सम्मान न मिल पाना हमारे छत्तीसगढ़ के लिए और छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए अपमान जनक प्रतीत होता है।