निराला की 'राम की शक्ति पूजा' समीक्षक डाँ. बलदेव
राम की शक्ति पूजा
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डाँ. बलदेव
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(1973)
ऐसा नहीं है कि राम की शक्ति पूजा के आकार - प्रकार की रचनाएँ उस युग में नहीं लिखी गईं , लिखी गईं , अकेले मैथिलीशरण गुप्त ने इस प्रकार की कम - से - कम दस लम्बी रचनाएँ लिखी है , किन्तु उनमें वर्णन और किसी वृत्ति की प्रधानता है । इन रचनाओं के बीच राम की शक्ति पूजा जैसी प्रौढ़ आत्मपरक रचना आई , तो विभ्रम होना स्वाभाविक है । किसी ने इसे महाकाव्य कहा तो किसी ने खण्डकाव्य और किसी ने वीर गीत या लम्बी कविता कहा । जानकी वल्लभ शास्त्री के अनुसार ' राम की शक्ति पूजा ' के समान स्वरूप आकार - प्रकार का परम प्रौढ़ प्रबन्ध काव्य विश्व की किसी भाषा में नहीं लिखा गया है । निराला के लिए भी यह नया प्रयोग था । उनके शब्दों में , “ इसका विषय तो पुराना है पर अदायगी और अनुबन्ध एकदम नया है । "
“ महाकाव्य में जहाँ जीवन की सम्पूर्णता पर ध्यान होता है , वहाँ यह जीवन का एक खंड चित्रण है , लेकिन इस घटना में ही महाकाव्य की गरिमा लाने का प्रयत्न भी निष्फल नहीं कहा जा सकता । डॉ . रामविलास शर्मा और धनंजय वर्मा ने इसीलिए इसे पश्चिमी शैली का महाकाव्य ही माना है । डॉ . रामविलास शर्मा के अनुसार ' राम की शक्ति पूजा ' पश्चिमी महाकाव्यों का अधिक स्मरण दिलाती है , प्राच्यों का कम । वस्तुतः यह प्राचीन महाकाव्यों की शैली पर एक नये प्रयोग का उपक्रम है , जो सांस्कृतिक पक्ष का भी अनुकरण करता है । एक जगह डॉ . धनंजय वर्मा ने लिखा है - ऐसे अल्प कथांश और आख्यानक को काव्यबद्ध कर महाकाव्य की प्रवृत्ति बायस की कही जाती है , लेकिन इस दृष्टि से निराला को ब्राउनिंग के अधिक निकट मानना चाहिए । " राम की शक्ति पूजा का मूल स्वर विद्रोहात्मक है । विद्रोह के स्वर तीव्र और संक्षिप्त होते हैं । इसमें उदात्त भावनाओं , सूक्ष्म घटनाओं , अलौकिक कल्पनाओं आदि का अद्भुत समावेश हुआ है । यहाँ प्रकृति के विराट फलक पर , ध्वन्यात्मक चित्रों , सादृश्य विधानों और हिरोइक छन्द के द्वारा एक नये मिथक का निर्माण हुआ है , इसमें व्यक्ति , जाति , समाज और राष्ट्र के पतनोत्थान का भी एक विराट चित्र है । इसमें स्वरूप आकार के रहते हुए अर्थ विस्तार और चिन्तन की गहराई है और यही तत्व इस रचना को महाकाव्य की गरिमा से मंडित करता है । फिर भी यह रचना महाकाव्य नहीं है । चरित्र चित्रण और वीर शृंगार तथा शान्त रसों की अवस्थिति के कारण ही इसे महाकाव्य नहीं माना जा सकता , क्योंकि इसमें न तो महाकाव्य का - सा वर्णन विस्तार है और न ही घटनाओं का विस्तृत विकास , न ही बन्ध का निर्वाह । एक देशीयता होते हुए भी डॉ . पी . जयराजन इसे दीर्घ प्रगीत मानते हैं । जीवन दर्शन निराला जी के दीर्घ प्रगीत काव्य ' राम की शक्ति पूजा ' की विशेषता है । राम की शक्ति पूजा में आत्मपरकता है , इसलिए निश्चय ही यह प्रगीत है किन्तु इसमें कवि निराला और इतिहास पुरुष राम की संश्लिष्ट कथा भी है । इसमें जन - विश्वास के अनुरूप अलौकिक घटनाओं का समावेश भी है और बैलेड के स्वर का अप्रतिहत आवेग भी । अस्तु राम की शक्ति पूजा को विशुद्ध रूप से आख्यानक प्रगीत या रूढ़ अर्थ में बैलेड ही कहा जायेगा । डॉ . शान्ति स्वरूप गुप्त के शब्दों में ' राम की शक्ति पूजा ' आख्यानक गीति की कसौटी में पूरी तरह खरा उतरता है ।
" राम की शक्ति पूजा का आख्यान देवी भागवत , शिव महिमा स्तोत्र और पंडित कृतवास ओझा कृत बंगला रामायण पर आधारित है । इसकी उपासना पद्धति पर स्वामी विवेकानन्द कृत अम्बा स्तोत्र और तान्त्रिक साधनाओं ( हठयोग ) का भी यथेष्ठ प्रभाव है । देवी भागवत में रावण वध के अंतिम दिन के पूर्व नारद के आदेश पर निराश राम प्रवर्षण पर्वत पर नवरात्रि पूजन करते हैं । दुर्गा को प्रसन्न कर रावण वध करने और पृथ्वी पर ग्यारह हजार वर्ष तक राज्य करने का वरदान प्राप्त करते हैं । यह कथा देवी भागवत के तृतीय स्कन्ध के 30 वें अध्याय में इस प्रकार वर्णित है-
उपायं कथ्यामास तस्यनाशाय राघव
व्रतं कुरुष्व श्रद्धावानाश्विने मासि सांप्रतम्
नव रात्रोपवासं च भगवत्याः प्रपूजनम्
सर्वसिद्ध करं राम जपहोम विधानतः
विधिवतपूजनं तस्याश्चकार व्रतवान हरिः
संप्राप्तते चाश्विने मासे तस्मिन् गिरिवरे तथा
अष्टम्यां मध्या रात्रे तु देवी भगवती हिसा
सिंहारुढ़ा ददौ यत्र दर्शनं प्रतिपूजिता
गिरशृंगे स्थितो वाच राघवं सानुजं गिरा
हत्वाय रावणं कुरु राज्यं यथा सुखं
एकादश सहस्राणि वर्षाणि पृथिवीतले
दूसरा आधार ग्रंथ शिव महिमा स्तोत्र है , जिसमें शिव को प्रसन्न करने के लिए पुंडरीकाक्ष विष्णु एक कमल की कमी होने से एक नेत्र चढ़ाते हैं और शिव प्रसन्न होकर उसे पुनः स्थापित कर देते हैं -
हरिस्ते साहस्रं कमल बालिमाधाय पढ़यो ।
यदेकोने तस्मिन्निजमढ़ह रन्नेत्र कमलम् ॥
गतो भवत्युद्धव परिणति तमसौ चक्रवपुषा ।
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्तिजगताम् ॥
यही घटना कवि के अवचेतन में आकर मानवीय धरालत पर आसीन राम को पुनः ' अतुल बल शेष शयन ' के रूप में प्रतिष्ठित करती है । फर्क यही है कि यहाँ शिव की नहीं , राम शिवा की आराधना करते हैं । इन दो कथाओं के अतिरिक्त कालिका पुराण और वृहद्धर्म पुराण तथा अनेकों लोक कथाओं में कुछ इसी प्रकार की मिली - जुली घटनाएँ वर्णित हैं , जो शायद कृतवास की जानकारी में रही हों । यह निर्विवाद सत्य है कि राम की शक्ति पूजा के आख्यान का मुख्य आधार बंगला रामायण ही है । यह बड़े संयोग की बात है कि मुगल शासन के मध्य युग में राम और कृष्ण दो महापुरुषों को आधार बनाकर यहाँ के सन्त कवियों ने अपने - अपने सम्प्रदाय के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है । वे इसी माध्यम से सांस्कृतिक जागरण कर रहे थे , क्योंकि शस्त्र भोथरे हो गये थे और जंग लगे हथियारों से जन - क्रान्ति असम्भव हो गयी थी । वैष्णव और शैव धर्मों के समन्वय का कार्य उत्तर भारत में तुलसी ने किया , वही कार्य उसी समय के आसपास पं . कृतवास ओझा ने बंगला रामायण द्वारा पूर्वी भारत में किया । एक में वैष्णव भक्ति की प्रधानता है , तो दूसरे में शाक्त की उपासना का आग्रह यहाँ भी है । राम की शक्ति पूजा में भी तुलसी और कृतवास की उपासना पद्धति का प्रकारान्तर से प्रतिपादन हुआ है । यहाँ अतुल बल शेष शायी विष्णु के अवतार राम के चरणारविन्द को देखते हुए सच्चिदानंद की अनुभूति से गद्गद् हनुमान की वैष्णव उपासना तथा राम द्वारा दुर्गा के गुण - ग्रामों की जाप से शाक्त उपासना द्दष्टव्य है । यह भी इसी सांस्कृतिक जन - जागरण का अंग है , जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जनक्रान्ति के रूप में इस्तेमाल हो रहा था । निराला युग द्रष्टा थे , वे भला युग की आकांक्षाओं से अलग कैसे हो सकते थे । दूसरे महाकवि निराला स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद की शक्ति की उपासना और दर्शन से प्रभावित तो थे ही , हिन्दी और बंगला पर भी उनका समान अधिकार और प्रेम था , अस्तु बंगला रामायण से अनुप्राणित हुए हों , तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । निराला साहित्यिक संसार की अच्छी चीजों का समावेश अपने साहित्य में करते हैं । पन्त और पल्लव में भी वे इसी तरह के विचार रखते हैं । उत्तमोत्तम भावों के ग्रहण करने की शक्ति रसग्राही कवि हृदय में ही हुआ करती है , वे चाहे दूसरे के भाव हों , उसकी सहृदयता से धुलकर नवीन रश्मि से चमकते हुए उसी के होकर निकलते हैं । बंगला रामायण में कथा इस प्रकार वर्णित है -
सभी सेनापतियों के मारे जाने के बाद अन्त में रावण स्वयं युद्ध स्थल में आता है । वह राम को देखते ही भक्ति भाव से पूरित हो उनकी स्तुति करने लगता है । इससे राम के दयार्द्र हो जाने पर देवलोक चिन्तित हो उठता है । दैवी मन्त्रणा से सरस्वती रावण की जीभ पर बैठ जाती है और वह राम को गाली देने लगता है । राम उस पर प्रहार करते हैं । आहत और असहाय रावण रक्षार्थ अम्बिका को पुकार उठता है । इससे महाकाली विद्युत - सी प्रकट होकर उसे गोद में लेकर निर्भय कर देती है । इससे राम सहित सभी योद्धा निराश होकर रोने लगते हैं । इससे सभी देवता सशंकित हो जाते हैं । तब ब्रह्मा ने इन्द्र को सहायतार्थ भेजा । इन्द्र की प्रेरणा से राम ने दुर्गा की पूजा की । देवी छिपकर उनका पूजन स्वीकार करने लगी , परन्तु प्रकट नहीं हुई , तब दुःखी राम को विभीषण ने एक सौ आठ नील पद्म चढ़ाने की सलाह दी । देवी दह से हनुमान द्वारा लाये गये 108 नील कमल एक - एक कर राम द्वारा विधिवत मन्त्रोच्चारण के साथ अर्पित किये जाने लगे । अन्तिम दिन मध्यरात्रि को दुर्गा ने छिपकर एक पद्म हर लिया । इससे राम हताश हो गये । वे सेना को लौटाकर समुद्र में डूबकर प्राण देने के लिए उद्यत हो गये । सहसा ही अपने को लोगों द्वारा राजीव - लोचन कहे जाने की स्मृति से प्रफुल्लित हो गये । वे तरकश से एक आँख निकाल कर देवी को अर्पित करना ही चाहते थे कि देवी प्रकट हुई और हाथ थाम ली । राम की स्तुति कर वह रावण वध का आदेश दे अन्तर्ध्यान हो गई । यही कथा राम की शक्ति पूजा में निम्न प्रकार से वर्णित है-
सूर्यास्त होते ही कोलाहल से परिपूर्ण राम - रावण का अपराजेय समर अनिर्णित रह गया । आज का युद्ध अत्यन्त भयानक था । प्रत्येक क्षण नई व्यूह रचना की जाती रही और दूसरे क्षण प्रतिपक्षियों द्वारा भेद दी जाती , क्रुद्ध वानर राक्षसों पर टूट रहे थे । राम और रावण दोपहर भर लड़ते रहे । अपने बाणों को रावण द्वारा विफल होते देख राम की आँखों से चिंगारियाँ निकल रही थीं । दुःसाहसी रावण के प्रहार से उनका शरीर विंध गया था और खून बह रहा था । आश्चर्य और क्रोध से राम की मुट्ठियाँ बंधी हुई थीं । उद्धत रावण के दुर्वार प्रहार से वानर सेना त्रस्त हो रही थी । प्रमुख वीर मूर्छित हो गये थे । आगे बढ़ती हुई राक्षस सेना को लक्ष्मण और जाम्बवंत रोकने का प्रयत्न कर रहे थे । अकेले हनुमान ही प्रबोध थे और भयंकर पर्वत में भड़कती हुई ज्वालामुखी जैसे चार घड़ी तक रावण का मद मर्दन करते हुए भयभीत सीता के हृदय में आशा का संचार कर रहे थे ।
युद्ध के बन्द होने पर दोनों सेनाएँ अपने - अपने शिविरों को लौटने लगीं । राक्षस सेना के विजयोल्लास से पृथ्वी काँप रही थी और सान्ध्य कमल नमित मुख श्री राम के चरण चिन्हों को देखती हुई निराश वानर सेना लौट रही थी । राम का कमरबन्द ढीला पड़ गया था । मुकुट के अस्त - व्यस्त हो जाने से जटाजूट कंधों पर वक्षस्थल पर पृष्ठ पर अंधकार जैसे फैल रही थी । राम की जलती हुई आँखें दूर चमकते हुए तारों सी दिखाई दे रही थीं । शिविर में लौटने पर हनुमान राम के चरणों के प्रक्षालनार्थ जल ले आए । सान्ध्यक्रिया एवं पूजा से निवृत्त होकर योद्धागण सरोवर के तट से लौट आये और आज्ञा को तत्पर श्रीराम को घेरकर यथा स्थान बैठ गए । उस समय राम का जित - सरोज - मुख - स्याह हो गया था । अमावस्या की रात्रि में आकाश घना अंधकार उगल रहा था । पवन का संचरण बन्द था । विशाल और अप्रतिहत सागर गर्जना कर रहा था । प्रवर्षण पर्वत ध्यानमग्न योगी - सा दिखाई दे रहा था । वहाँ केवल मशाल जल रही थी । एक युद्ध सूर्यास्त के साथ समाप्त होता है और दूसरा युद्ध गहन होते अंधकार के साथ ही राम के मन में शुरू हो जाता है । लाखों में दुराक्रान्त श्रीराम को जीते जी रावण का जय - भय और संशय हिला था , वे कल लड़ने को तत्पर होते हुए भी मन से हार - हार जा रहे थे ।
ऐसे घने अंधकार में विद्युत जैसे जनक तन्या की निर्निमेष देखती हुई छवि राम की आँखों में झाँक गई । पुष्प वाटिका में सीता - मिलन , नयनों का नयनों से गोपन संभाषण , पलकों का उठना - गिरना , बासन्ती पवन लदा सुमन , झरते परागकण प्रतिबिम्बित होने लगे । जानकी की ज्योति प्रपात के प्रथम स्पर्श से राम का तन - मन सिहर उठा , उनकी भुजाएँ पुनः धनुर्भंग को उठ गईं । सीता के ध्यान में मग्न राम के अधर मुस्कान से खिल उठे । विश्व - विजय की भावना से हृदय प्रफुल्लित हो उठा ! उन्हें मंत्रपूत बाण याद आने लगे , जिससे ताड़का , सुबाहु , विराध , त्रिसरा , खरदूषण आदि का बध हुआ था । फिर अचानक समग्र नभ को आच्छादित किये हुए रावण की भीमकाय मूर्ति सामने ही अट्टाहास करने लगी , जिससे विष्णु के अवतार श्रीराम शंकाकुल हो गये । सीता की आँखों में अंकित श्रीराम के नयनों से आँसू की दो बूँदें मोतियों से टूट पड़ीं । वैष्णव भक्ति में लीन , सच्चिादानंद की अनुभूति में तन्मय हनुमान तारा दल से चमकते हुए अश्रुओं को देखकर उद्वेलित हो उठे । जल - थल में प्रलय मचाकर वायु के प्रबल झकोरों के साथ एकादश रुद्र हनुमान आकाश में अट्टहास कर पहुँच गये , जहाँ रावण की महिमा श्यामा विभावरी का अंधकार फैला हुआ था । समस्त आकाश को ग्रस्त होते देख शिव क्षण भर को चंचल हो गये और पार्वती को प्रतिकार के लिए रोक दिया । उनकी प्रेरणा से देवी ने अंजना का रूप धारण कर हनुमान को समझा बुझा दिया , जिससे वे नम्र हुए दीन - हीन से आकाश से उतरकर प्रभु - पद पकड़ लिए ।
विषाद में डूबे हुए को विभीषण ने अनेक प्रकार से समझाया , परन्तु कोई प्रभाव न पड़ा , वे बोले - मित्रवर युद्ध में विजय नहीं होगी , क्योंकि यह नर - वानर का राक्षस से युद्ध नहीं है , महाशक्ति ही अन्यायी रावण की ओर से युद्ध में आ उतरी है । राम की आँखों में आँसू छलछला उठे , सभा कसमसाकर रह गयी । राम ने कहा - दैवी - विधान समझ में नहीं आता , क्योंकि अन्यायी रावण को वे अपना रही हैं और मैं धर्मरत होकर भी अन्य समझा जा रहा हूँ । यह शक्ति का ही चमत्कार है , अन्यथा इन मन्त्रपूत बाणों से सम्पूर्ण सृष्टि विजित हो सकती है । परन्तु महाशक्ति ही रावण को अंक में ली हुई हैं और लक्ष्य बार - बार भ्रष्ट हो रहे हैं । विचलित सेना को देखकर मैं ज्यों - ज्यों क्रोधित होकर युद्ध को तत्पर होता था , त्यों - त्यों उनकी आँखों से आग निकलती थी । इसके बाद वे मुझे एकटक देखने लगी , जिससे मेरे हाथ बंधे ही रह गये । धनुष खींचा न जा सका और मैं त्रस्त हो गया । राम के मौन होने पर जाम्बवंत ने विश्वास के साथ कहा - तुम भी शक्ति की दृढ़ अराधना से आराधना का उत्तर दो यदि रावण अशुद्ध होकर त्रस्त कर रहा है , तब तो तुम पूर्ण रूप से शुद्ध हो , तुम भी शक्ति की मौलिक कल्पना करो । विजय निश्चित मिलेगी । जब तक सिद्धि न मिले , युद्ध छोड़ दो , तब तक लक्ष्मण सेना का संचालन करेंगे और हम सब उनकी सहायता करेंगे । जाम्बवंत के परामर्श से सभी प्रसन्न हो गये और राम ने वृद्ध के परामर्श को आज्ञा समझ कर मान लिया । इस विचार का चिन्तन करके वे प्रफुल्लित हो गये और महाशक्ति का ध्यान करते हुए बोले - हे माँ , महिषासुर मर्दिनी , ज्योतिर्मयी मैं तुम्हारा आश्रित हूँ , हे जनरंजन करने वाली माँ , तुम्हारे पाँव के नीचे सिंह गर्जना कर रहा है , मैं स्वयं सिंह - भाव से तुम्हारी पूजा करूँगा । सभासदों ने देखा , राम का मुख प्रसन्नता से खिल गया है । राम ने मेघमन्द्र वाणी में कहा बन्धुओ देखो , वह हरीतिमा से परिपूर्ण भूधर के मकरन्द बिन्दु ही पार्वती है और गरजता हुआ सागर सिंह है । दशों दिशाएँ हाथ हैं , माथे पर शिव अंकित है । शक्ति के इस मंगल महाभाव से मानव मन का असुरत्व नष्ट हो रहा है । फिर हनुमान को देवीदह से उषाकाल होते ही 108 नील कमल लाने का आदेश देकर सबको विश्राम के लिए राम ने विदा किया । उस समय उनका हृदय विजय की आशा से भर उठा ।
सुबह होते ही साधक राम ध्यानस्थ होकर देवी की विधिवत पूजा करने लगे । वे प्रगाढ़ साधना में लग गये । पाँचवें दिन उनका मन उर्ध्वमुखी हुआ । अगले दिन महाकर्षण होने लगा , उनकी भृकुटि देवी के पाँव पर लगी हुई थी । महाकर्षण से मुक्त होने में दो दिन लग गए । उनके मन्त्र जाप से आकाश काँपने लगा । आठवें दिन उनका मन ब्रह्मा , हरि , शंकर के स्तर को अतिक्रमण कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को विजित कर गया । जब एक नील पद्म बचा और मन सहस्राधार पर पहुँच गया , तब आधी रात दुर्गा छिपकर वह प्रिय इंदीवर उठा ले गई । अंतिम जाप के लिए जब राम ने कमल हेतु हाथ बढ़ाया , तो कुछ न मिला । वे चंचल हो गए । आँखें खोलकर देखने पर वे विकल हो उठे । आँखें आँसुओं से भर गईं । आसन छोड़ने से असिद्धि हो जाती , वे अपने जीवन तथा साधना को धिक्कारने लगे । सोचने लगे - अब जानकी का उद्धार नहीं हो सकता । परन्तु राम का एक और मन था , जो अब तक न थका था , जो दीनता या विनय नहीं जानता था । उन्होंने बुद्धि से माया पर विजय प्राप्त कर ली । उन्हें तुरन्त विचार आया कि माँ उन्हें राजीव - लोचन कहती थी , अस्तु वे एक नयन देकर पुरश्चरण पूरा करेंगे । यह सोचकर वे ब्रह्म शर लेकर दायें हाथ से दाईं आँख निकालने को तत्पर हुए कि ब्रह्माण्ड काँप उठा और देवी ने प्रकट होकर ( साधुवाद करती हुई ) उनका वह हाथ थाम लिया । देवी दुर्गा का एक चरण महिषासुर के कंधे पर और दूसरा सिंह पर था । उनका स्वरूप ज्योतिर्मय था और संसार के समस्त सौंदर्य को लज्जित करने वाला था । दसों हाथ अस्त्र - शस्त्र से सुसज्जित था । दाई ओर लक्ष्मी और गणेश , बाँयी ओर सरस्वती और रण रंग राज कार्तिकेय सुशोभित थे । माथे पर शंकर विराजमान थे , राम श्रद्धा से उनकी वन्दना करते हुए प्रणत हुए । " हे पुरुषोत्तम तुम्हारी जय होगी ” कहती हुई महाशक्ति राम के वदन में लीन हो गईं ।
इस प्रकार राम की शक्ति पूजा की कथा पौराणिक आख्यानों का नये संदर्भो में पुरावर्तन है , पिष्ट - पेषण नहीं । हनुमान का उर्ध्वगमन कवि की नवीन उद्भावना है , यह अन्तरकथा पूर्ववर्ती काव्यों में नहीं है ।“ कनक भूधराकार शरीरा , समर भयंकर अति बल वीरा " वाले तुलसी के हनुमान जिन्होंने “ बाल समय में रवि को ग्रस लिया था , यहाँ एकादश रूद्र में समाहित हो जाते हैं । " आधुनिक हिन्दी कविता के अत्यन्त ओज पूर्ण स्थलों में से यह एक है । ' कतिपय आलोचक हनुमान के उर्ध्वगमन को प्रक्षेप मानते हैं , उनके अनुसार यह अन्तर्कथा आधिकारिक कथा के विकास में किसी भी प्रकार से सहायक नहीं है । ' मेरे विचार से इस अन्तर्कथा का औचित्य निर्विवाद है । इसके माध्यम से निराला ने राम की अधीरता , आशा - निराशा के संघर्षों को और प्रगाढ़ तथा जटिल बनाकर नाटकीय योजना की सिद्धि की है । उर्ध्वगमन के अवसर पर पाठक भी धैर्य छोड़ने - सा लगता है । अपने चरित नायक के संत्रास से वह विकल हो जाता है , क्योंकि जब सभी प्रमुख सेना नायक घायल हो जाते हैं , स्वयं राम दयनीय स्थिति में पहुँच जाते हैं , तब एकमात्र हनुमान ही प्रबुद्ध रहते हैं । ये एकादश रूद्र जो एक मात्र विजय की आशा के चिन्ह थे , वे प्रवुद्ध होकर भी अंजना रूपा महाशक्ति को नहीं पहचान सके और उन्हें परेशान करने के स्थान पर स्वयं दीन - हीन हो गए । इससे राम और अधीर हुए होंगे , तो क्या आश्चर्य है । वस्तुतः राम की अधीरता और ' सूक्ष्म बुद्धि ' को प्रस्तुत करने के लिए यह उपक्रम किया गया है । यहाँ हनुमान शारीरिक क्षमता के प्रतीक हैं और बिना सूक्ष्म बुद्धि के शारीरिक बल अकेला क्या कर लेगा ? इसके अतिरिक्त निराला ने इसे तर्क - संगत बनाने के लिए पूर्ववर्ती कथाओं में भी परिवर्तन किया है , जो उनकी उदात्त कल्पना का स्वयं परिणाम है । यहाँ नारद या विभीषण की जगह जाम्बवंत शक्ति की आराधना की सलाह देते हैं , क्योंकि वे सबसे वृद्ध हैं , जिसके सामने राम सिर झुकाते हैं , और भी .... राम नवीन पुरुषोत्तम हैं , यथा - वे शक्ति की मौलिक कल्पना करते हैं , यह मौलिक कल्पना क्या है , विराट प्रकृति ही महाशक्ति है । भारत माँ ही महाशक्ति है । निराला की महाशक्ति मात्र महाकाली अम्बिका नहीं है , बल्कि वे शुद्ध मन में अधंकार से प्रकाश में परिवर्तित होने वाली महाशक्ति हैं । कतिपय आलोचक इस कृति को कृतवासी
रामायण की नकल मानते हैं , कुछेक पंक्तियों में प्रभाव साम्य दिखाकर उनकी मौलिकता पर प्रश्न लगाते हैं । यद्यपि राम की शक्ति पूजा बंगला रामायण पर आधारित है , तथापि इसमें और उसमें जमीन - आसमान का अन्तर है । राम की शक्ति पूजा का अन्तस्संघर्ष और सूक्ष्म मनोविश्लेषण कृतवास की कल्पना के बाहर की बात है । एक बात और ध्यान देने योग्य है , इसमें स्थूल कथा को कोई स्थान नहीं मिला है । रामायण की अनेक छोटी - छोटी घटनाएँ फ्लैश बैक में आकर इस रचना को सघन बनाती हैं । यद्यपि ये अधिकांश में वर्णनात्मक ही हैं । इस प्रकार राम की शक्ति पूजा वास्तव में एक विशेष कोटि की रचना है और इसमें नाना पुराणों - निगमागमों के बिखरे हुए कणों का संगठन हुआ है ।
राम की शक्ति पूजा में राम , हनुमान , विभीषण , शिव और महाशक्ति प्रमुख पात्र हैं । इसके अतिरिक्त पर्दे के पीछे दो और पात्र हैं , रावण और सीता । अन्य रामायण के पात्रों में लक्ष्मण , अंगद , नल , नील , सुग्रीव और विपक्ष में खर - दूषण , सुबाहु , ताड़का , विराध , त्रिसरा आदि का उल्लेख है और अत्यन्त प्रभावोत्पादक शैली में अनेक कार्य- कलापों का संक्षिप्त छायांकन है । परन्तु राम और हनुमान की मनोदशाओं का ही इसमें अधिक चित्रण हुआ है । हनुमान राम की अर्चना के मूर्तिमान अक्षय शरीर हैं । राम के दूसरे रूप हैं । वैसे मुख्य पात्र राम ही हैं । नायक के चरित्र के सामने शक्ति का प्रतिरुप रावण है । इस द्वन्द्व का जोड़ तुलसी के ही समकक्ष है । निराला के हनुमान तुलसीदास के ही महावीर हैं , जिन्हें निम्न पंक्तियों में महाकवि ने नमन किया है-
अतुलित बल धामं हेम शैलाभ देहम्
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकल गुण निधानं वानराणामधीशं ,
रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि ।
तुलसी के यही हनुमान राम की शक्ति पूजा में उद्गरित बह्नि भीम पर्वत बनकर रावण के मद का मर्दन करते हैं । यही हनुमान सीता के हृदय में आशा का संचार करते हैं । मात्र यही प्रबुद्ध है युद्ध में । यहाँ महावीर महाशक्ति से सम्पन्न हैं और राम में सच्चिदानंद के स्वरूप का दर्शन करते हैं । परन्तु राम के व्याकुल मुख - चेतन को देखते ही सूर्य को बचपन में निगल जाने वाले हनुमान इस बार सम्पूर्ण आकाश को ग्रसने लगते हैं । इससे शिव भी चंचल हो जाते हैं । वे एकादश रूद्र हैं , राम पूजन के प्रताप से तेजस्वी हैं , ब्रह्मचारी हैं , मर्यादा पुरुषोत्तम के सर्वोत्तम लीला सहचर हैं । ये भले - भोले भी हैं , अंजना स्वरूपा पार्वती के छल को नहीं समझ पाते , इसीलिए मीठी झिड़की से दीन होकर उतर आते हैं । इस प्रकार यहाँ माँ और राम के प्रति उनके आदर की भावना ही अभिव्यक्त होती है ।
इस शारीरिक शौर्य का ही दूसरा मानसिक सौंदर्य रूप दूसरे और प्रमुख चरित्र हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम । भारतीय भाषाओं में ही नहीं बल्कि संसार की अनेक भाषाओं में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र का निरन्तर काव्यात्मक विकास होता आ रहा है , जिसमें निराला ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान किया है । शक्ति पूजा में श्रीराम नवीन हैं , वे अतुल बलशाली होते हुए भी रावण के जय - भय से शंकाकुल हैं । एक प्रकार से हिन्दी काव्य धारा में तुलसी ने राम के चरित्र को एक संभावित ऊँचाई पर ले जाकर स्थिर कर दिया था और अन्य कवि उस ऊँचाई की तलहटियों में ही घूमते रहे । परन्तु यहाँ आकर देवत्व से युक्त होते हुए भी मानवीय दुर्बलताओं से ग्रस्त होकर विजय के प्रति शंकाकुल होकर पूर्ण मानवीय हो उठे हैं । आज के वैज्ञानिक युग में यह कथान्तर अधिक विश्वसनीय , अधिकतर्क संगत एवं मनोवैज्ञानिक है । राम की शक्ति पूजा के राम वाल्मिकीय और कृतवासी राम के अधिक करीब हैं । तुलसी और अन्य वैष्णव भक्त - कवियों के कम । कहना न होगा , उन्होंने संभावित ऊँचाई का उल्लंघन किया है । आरंभ में उनकी आँखों से आग की लपटें निकलती हैं । क्रोध की विफलता से भय उत्पन्न होता है और भय से फिर चिन्ता । यह भय जीते - जी रावण विजय का है , यह चिन्ता जनक तनया के उद्धार न होने की है । देह से रुधिर की धारा बह रही है । अस्त - व्यस्त जटाएँ सघन अंधकार फैला रही हैं , आँखें दूर कहीं चमकने लगती हैं ... जानकी प्रिया के लिए ... चिन्ता गहन हो गई है और चमकने वाली आँखें प्रज्ज्वलित होकर मशाल बन गई हैं रावण के लिए । निराशा के ऐसे ही चरम क्षणों में शक्ति का प्रथम रूप पृथ्वी - तनया ज्योतिर्मयी हो आँखों में झूल जाती है और वे प्रफुल्लित हो उठते हैं । विश्व - विजय की कामना जाग उठती है , फिर विजित राक्षस समुदाय एक - एक आहत होते हुए उनकी क्रोधाग्नि में जलने लगते हैं , दूसरे ही क्षण राक्षस समुदाय का ठोस रूप उद्धत रावण की भीमा मूर्ति अट्टाहास करती हुई उनके सामने आ जाती है और भावित नयनों से दूसरे ही क्षण दो सजल मुक्ता - दल गिर पड़ते हैं । मित्रों की सान्त्वना उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाती , क्योंकि यह युद्ध नहीं शक्ति का खेल है । इसीलिए वे मन से हार - हार उठते है , परन्तु निराशा से वे ऊपर भी उठते हैं । वृद्ध जाम्बवंत के परामर्श से कठिन योग साधना करते हैं । सिद्धि के अन्तिम क्षणों में वे जब सांसारिक राग - द्वेष से मुक्त हो जाते हैं , तभी विजय उनके हाथ आ जाती है । महाकाली का छल इस बार खाली जाता है । पुरुषोत्तम नवीन क्षण भर की उद्विग्नता से मुक्त हो जाते हैं । उनका सूक्ष्म मन मायावरण पार कर जाता है । शक्ति कौशिल्या के रूप में दुबारा स्मृति में आती है । राम का अन्तर्मन सक्रिय हो जाता है । पुरश्चरण के लिए वे अपने राजीव - नयन को अर्पित करने हेतु उद्यत हो जाते हैं और तब महाशक्ति को तीसरी बार सम्पूर्ण रूप में उदय होना पड़ता है । राम की संकल्पशक्ति ही यहाँ महाशक्ति के रूप में परिणत होती है । इस प्रकार निराला की सर्जनात्मक प्रतिभा में ढलकर वाल्मीकि और तुलसी के राम आधुनिक स्वाधीनता संग्राम के संवेदनशील मानव के रूप में मूर्तिमान हो उठते हैं । यहाँ जातीय संस्कार का एक मिथक नये अर्थ में दीप्त हो गया है और परम्परा का पुनः सृजन हुआ है ।"10
वस्तुतः राम की शक्ति पूजा के पात्र त्रय में निराला ने अपने आपको प्रक्षेपित किया है , वहीं राम , जिनके लिए कवि ने लिखा है -
धिक साधन जो पाता ही आया है विरोध ।
धिक साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध ॥
यहाँ निराला के जीवन भर का संघर्ष , वैषम्य और पराजय स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित हो उठे हैं । सरोज स्मृति में यही आत्म चरित्र दूसरे शब्दों में इस प्रकार आया है -
दुःख ही जीवन की कथा रही ।
क्या कहूँ , आज जो नहीं रही ।
वनवेला में भी यही बात है । कवि के जीवन भर की कटुता , निराशा , हीनता और विद्रोह का स्वर जो उसके अवचेतन में था , अनायास ही यहाँ राम के चरित्र में प्रक्षेपित हो उठा है , इतना ही नहीं राम में कई बार स्वयं कवि इस रूप में प्रवेश कर गया है कि दोनों को अलग कर पाना कठिन है । शक्ति साधना के प्रति आग्रह वास्तव में निराशा की अघोर - साधना है । हनुमान का उदात्त - चरित्र निराला ने अपने महाप्राण व्यक्तित्व के अनुरूप ही प्रस्तुत किया है । राम की निराशा उनकी निराशा है । क्योंकि राम निराला के आराध्य हैं , अस्तु अपने आराध्य के दुःख की अनुभूति से कई बार स्वयं वे काव्याकाश में उर्ध्वगमन करते हैं , तो कोई अनहोनी नहीं है । निराला स्वयं बल और बुद्धि में श्रेष्ठ थे । कभी स्नेह न पाने वाले निराला थोड़ा - सा स्नेह पाकर अत्यधिक द्रवित हो जाते थे । प्रेम से झिड़कने पर वे भी ' कपि हुए नम्र उतरे धीरे - धीरे प्रभु पद हुए दीन ' की स्थिति में पहुँच जाते थे । जामवंत के रूप में वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में विजय प्राप्ति के लिए राम की शक्ति पूजा द्वारा यही सन्देश देते हैं-
हे पुरुष सिंह , तुम भी यह शक्ति करो धारण ।
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर ।
तुम करो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर ।
शक्ति की आराधना यह वाक्य खण्ड ही सैनिक पक्ष को सतत् दृढ़ किये जाने का संकेत करता है । इसका यह अर्थ हुआ कि राष्ट्रीय मुक्ति के लिए निराला गाँधीवादी सिद्धान्तों में विश्वास नहीं रखते । " वास्तव में राम की शक्ति पूजा के प्रणयन के समय स्थिति कुछ ऐसी ही थी ।
छंद के बंधन तोड़ने वाले निराला छन्द विन्यास में भी पारंगत थे , उनकी छन्द साधना अत्यन्त दुरुह है , इसका प्रत्यक्ष उदाहरण राम की शक्ति पूजा के मौलिक छन्द हैं । दो - दो पंक्तियों के ये तुकांत छंद 8-8 मात्राओं की तीन - तीन यतियों पर आश्रित हैं । अर्थात् चौबीस मात्राओ के लध्वन्त छंद है , जो कि रोला का स्मरण दिलाते है । अनेक स्थलों में घनाक्षरी का भी सुन्दर प्रयोग हुआ है , जो कि अंग्रेजी के एम्वेजमेंट के अधिक निकट है । इसी के अनुरूप चरणान्त पर ही वाक्यान्त न कर उसे दूसरे चरण में विस्तरित कर दिया गया है । कहीं - कहीं तो वाक्य चरण के मध्य से ही प्रारम्भ होते हैं और कहीं चरण के मध्य और अन्त दोनों में तुक है , फिर भी छन्द के प्रवाह में कहीं भी बाधा उत्पन्न नहीं होती , बल्कि यति के साथ एक झटके में वाक्य छंद आगे बढ़कर निरन्तर गति पैदा करते हैं । रोला की शास्त्रीय परम्परा के अनुसार अर्थात् 11-13 पर यति नहीं है , बल्कि आठ - आठ मात्राओं पर है । इसी प्रकार घनाक्षरी के वर्णों का भी कोई निश्चित नियम नहीं है । राम की शक्ति पूजा की भाषा उदात्त भावनाओं , विराट कल्पनाओं एवं अद्भुत नाद सौन्दर्य का त्रिवेणी संगम है , गंभीर स्थलों में क्लिष्ट और पुरुष संयुक्ताहारों एवं तत्सम समास बहुल विशिष्ट पद विन्यास वाली यह अभिजात्य भाषा इतनी चित्रात्मक एवं ध्वन्यात्मक हो गई है कि गिरा और अर्थ का भेद यहाँ समाप्त हो जाता है । ओज की कान्ति से दीप्त नाद सौंदर्य से ही रसानुभूति होने लगती है । क्षणान्त ऐन्द्रिय बिम्बों के सक्रिय होते ही व्यंजना और अधिक गहरी एवं तीक्ष्ण हो जाती है । निराला की इस रचना कौशल को कतिपय आलोचक शंका की दृष्टि से देखते हैं । उनका विचार है कि पांडित्य प्रदर्शन के लिए ही उन्होंने क्लिष्ट - पद - रचना की अघोर साधना की है , परन्तु सच्चाई यह है कि निराला भाव के अनुरूप ही भाषा प्रयोग के कायल थे , भाषा को वे भावों की अनुगामिनी मानते हैं । इसलिए गहन और संश्लिष्ट भावों के लिए उसी वजन में भाषा को वे तौलते थे । उनके शब्दों में , “ जो गहन भाव सीधी भाषा , सीधे छंद में चाहता है , वह धोखेबाज है ।
उसे भाषा का ज्ञान नहीं है , वह भाव क्या समझे । " वास्तव में भावानुसारिणी भाषा कुछ मुश्किल होने पर भी समझ में आ जाती है । निराला की भाषा दुरुह अवश्य है , पर अस्पष्ट नहीं । क्लिष्टता के कारण भी अनेक हैं । निराला के वैयक्तिक जीवन का संघर्ष और उससे बनने वाले अवचेतन के काव्य संस्कार उनमें से एक हैं । दूसरा उस समय ( प्रसाद को छोड़कर ) छायावाद अत्यधिक माधुर्य के कारण अपना आकर्षण खो रहा था । इसके विरोध में जो प्रगतिवादी धारा सरल भाषा में प्रयुक्त होने लगी थी , वह अभिधेयार्थ को भी ढंग से प्रस्तुत करने में कमजोर साबित हो रही थी । इसका एहसास निराला को था । इसके निदान में वे कड़ी आलोचना सहते हुए भी भाषा से जूझते रहे । उनके अनुसार “ हिन्दी को मधुरता के साथ इस समय एक विशेष ओज की भी जरूरत है । विश्व साहित्य के कवि समाज पर इसी तरह के कवि का प्रभाव पड़ सकता है जो भावना के द्वारा मन को आकर्षक रीति से उन्नत से उन्नत विचार कला के मार्ग में चलकर दे सके । " और इसकी पूर्ति उन्होंने बादल राग , राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास की रचना करके की , निराला के साहित्य संबंधी धारणा के प्रकाश में यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने भाषा के लिए हठयोग साधना की है , क्योंकि कोमल एवं मधुर भावनाओं के क्षणों में , करुणा की एकान्त अनुभूतियों में , माधुर्य गुण से द्रवित गौड़ी रीति पर लघु - लघु वर्गों से प्रतिष्ठित उनकी ऐन्द्रिजालिक भाषा उदात्त बिम्ब लोक का निर्माण करने में अत्यन्त समर्थ है । उसका नाद सौंदर्य सहज ही हमें आविर्भूत कर लक्ष्यार्थ को स्पष्ट कर देता है । इसी प्रकार प्रसाद गुण से सम्पन्न सम्वादी स्वर - संरचना बातचीत की लय मे सहज ही अभिधार्थ को अनुभव गम्य बना देती है । वैसे भी कविता में भाषा कठिन है या सरल , संस्कृत निष्ठ है या बोलचाल आदि के प्रश्न अप्रासंगिक हैं । इसमें सन्देह नहीं राम की शक्ति पूजा की भाषा जटिल अनुभूतियों के अनुरूप ही श्लिष्ट है । वास्तव में निराला हिन्दी के पद विन्यास की गड़बड़ी से जो उर्दू के ढर्रे पर चली जा रही थी , सतर्क थे । दूसरी बात उनके सामने अंग्रेजी की शक्ति साहित्य और रवीन्द्र आदि के शब्द निनाद चुनौती के रूप में थे । वे इसी स्तर पर हिन्दी को समृद्ध करना चाहते थे । इसीलिए वे अनवरत साधना करते रहे । आचार्य बाजपेयी के अनुसार , उन्होने हिन्दी पद - विन्यास को भी अधिक प्रौढ़ तथा प्रशस्त बनाने का सफल प्रयास किया है । अत्यन्त सार्थक शब्द सृष्टि द्वारा निराला जी ने हिन्दी की अभिव्यक्ति को विशेष शक्ति प्रदान की है । शब्द संगीत परखने और व्यवहार में लाने में वे आधुनिक हिन्दी के दिशा नायक हैं । राम की शक्ति पूजा में वीर , रौद्र , शृंगार , शान्त , अद्भुत करुणा रसों की सुन्दर और संक्षिप्त नियोजना है । इसमें हास्य एवं वीभत्स रसों को स्थान नहीं मिला है , कारण वे रस न तो राम जैसे उदात्त चरित्र की अनुभूतियों के अनुकूल हैं और न ही निराला की प्रकृति में फूहड़पन की गुंजाइश है । राम की शक्ति पूजा दृश्य और श्रव्य दोनों का सम्मिश्रित नया काव्य है , इसलिए उसमें नाटकीयता और रसों की संस्थिति अनिवार्य - सी हो गई है । रसों की अनुभूति में सौंदर्य विशेष सहायक होता है । उसके द्वारा ऐन्द्रिय बिम्बों का निर्माण होता है और रसानुभूति भी तीक्ष्ण हो जाती है । अलंकार सौंदर्य के कारण हैं । शब्दालंकारों में निराला को अनुप्रास विशेष प्रिय है । “ अनुप्रास के तो वे आचार्य ही हैं ।16 अर्थालंकारों में उपमा , रूपक और उत्प्रेक्षा , बिम्ब और प्रतीक योजना में इस तरह अन्तर्भूत हो गये हैं कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व रस का बाधक बन जाता है । पाठक अलंकारों की दीप्ति से चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता , अलंकारों की लड़ियाँ एक सक्षम बिम्ब को दृश्यमान बना देती है । इस रचना में व्यतिरेक , अपहुति , संदेह , रूपक अतिशयोक्ति , प्रतीप , बीप्सा आदि अलंकारों का भी सुन्दर प्रयोग हुआ है । राम की शक्ति पूजा की सभी घटनाएँ प्रकृति के विराट फलक पर सम्पन्न होती है , क्योंकि वे जीवन को प्रकृति से दूर रखने के आदी नहीं हैं । निराला प्रकृति के मानवीकरण के कुशल चितेरे हैं । उनके अनुसार , “ अप्रतिहत मूर्तिप्रेम ही कला की जन्मदात्री है , जो भावनापूर्ण सर्वांग मूर्ति खींचने में जितना कृत विद्य है , वह उतना ही बड़ा कलाकार है । " काव्य में साहित्य के हृदय को दिगन्त व्याप्त करने के लिए विराट रूपों की प्रतिष्ठा करना आवश्यक है । " उपर्युक्त आदर्शों के लिए निराला अन्त तक सजग रहे हैं । इस आख्यानक प्रगीत का आरंभ ही बड़ा नाटकीय है । वह ऐसे आरम्भ होती है , जैसे मृदंग पर थाप पड़ते ही कोई नाटक आरम्भ होता है । प्रारम्भ वीर रस से होता है । लगता है परुष ध्वनियों के सौन्दर्य से पाठक युद्ध के भयावह इलाके में पहुँच गया है । -
आज का तीक्ष्ण-शर-विद्युत-क्षिग्र-कर, वेग-प्रखर
रात-शैल-सम्वरण-शील , नील-नम-गर्जित स्वर
प्रतिपल परिवर्तित व्यूह , भेद-कौशल समूह
राक्षस - विरुद्ध प्रत्यूह , क्रुद्ध कपि विषम हूह
विच्छुरित - वह्नि - राजीव - नयन - हत्लक्ष्य वाण
यहाँ संयुक्ताक्षरों का चयन इस प्रकार किया गया है कि वे श्वास को भरकर छोड़ते ही दूसरे वाक्य खंडों को धक्का देकर उछालते हुए चलते हैं , जैसे काले अक्षर ही गर्जना करते हुए एक - दूसरे पर टूट पड़ने वाले सैनिक हो , यहाँ छ , छ , क्ष , ज और ह की परुषावृत्ति की कठोर ध्वनियाँ युद्ध की भयावहता , सेनाओं के रण कौशल का अहसास कराती है । यहां छेका और वृत्यानुप्रास की छटा दर्शनीय है । राजीव नयन , गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध - हनुमत तथा उद्गीरित वहिन भीमपर्वत कपि में रूपक अलंकार दृष्टव्य है ।
सन्ध्या होते ही एक युद्ध समाप्त होता है और अंधकार के साथ ही दूसरा युद्ध राम के अंतर में शुरू हो जाता है । सादृश्य - विधानों के द्वारा राम के अन्तर्मन में उनके रक्तस्रावित विद्यांग डूब जाते हैं। -
दृढ़ जटा - मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल
फैला पृष्ट वर , बाहुओं पर , वक्ष पर , विपुल
उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार ,
चमकती दूर ताराएँ ज्यों हों कहीं पार
यहाँ पर बिखरे हुए केश राशि पर अंधकार को और चमकती हुई आँखों पर ताराओं को उत्प्रेक्षित कर घिरती हुई निराशा और हल्की - सी आशा की किरणों को बिम्बित किया गया है , ये ही बिम्ब आगे और सघन होकर प्रतीकार्थ में परिणत हो जाते हैं , राम की शक्ति पूजा में सर्वत्र युग्म चित्र हैं जो क्रमशः पहले हल्के रंगों में फिर गहरे रंगों में तरंगित हो मन के प्रत्ययों को परिपुष्ट करते हैं -
हे अमा - निशा , उगलता गगन घन अंधकार
खो रहा दिशा का ज्ञान , स्तब्ध है पवन चार
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल
भूधर ज्यों ध्यान मग्न , केवल जलती मशाल
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय
यहाँ भयानक रस का स्पर्श है और वह ऐन्द्रिय बिम्बों की भाषा में और गहन होता चला गया है । यहाँ लुप्तोपमा है , उपमान , ध्यान मग्न साधक है जो कि उपमेय भूधर से तुलित है , यहाँ आकर दुर्गम पर्वत वाला नैशान्धकार और प्रगाढ़ हो गया है लगता है आकाश घनाअंधकार उगल रहा है , दिशाएँ लुप्त हो गई है हवा थम गई है विशाल सागर दुर्विचार गरजने लगता है और दुर्गम भूधर किसी ध्यान मग्न योगी - सा दिखाई देने लगता है , चलते हुए शलथराम वहाँ स्थिर हो गए हैं उनकी तारों सी चमकने वाली आँखें मशाल - सी प्रज्ज्वलित होकर भयानकता को और बढ़ा देती हैं । यहाँ अंधकार घोर निराशा का , रुकी हवा , अवरूद्ध सांसों का , भूधर राम का , मशाल चमकती हुई दूर तारों अर्थात् आँखों के प्रतीक हैं । रात्रि के साथ ही आसुरी शक्ति बढ़ जाती है और घोर निराशा से हतप्रभ राम ध्यान मग्न भूधर हो जाते हैं । ऐसे विशाल हृदय वाले राम को संशय का हिलाना कितना भयानक हो सकता है । यह अनुभव की वस्तु है ।
राम के अंतद्वंद को प्रस्तुत करने वाले , नाटकीय चरमोत्कर्ष को अंतिम सीमा में ले जाने का रहस्य यहाँ विरोधी चित्रों का आद्यन्त संघर्ष है । यहाँ वीर और भयानक रस के अंतराल में शृंगार की अच्युत छवि का प्रथम कंप पाठक के मन को तुरीयावस्था में ले जाता है , ऐसा उदात्त बिंब हिंदी साहित्य में कम ही हैं-
ऐसे क्षण अंधकार धन में जैसे विद्युत
जागी , पृथ्वी-तनया-कुमारिक-छवि अच्युत
देखते हुए निष्कलंक , याद आया उपवन
विदेह का , प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
नयनों का नयनों से गोपन - प्रिय संभाषण
पलकों का नव पलकों पर प्रथामोत्थान पतन
काँपते हुए किसलय , झरते पराग - समुदय ,
गाते खग नव जीवन-परिचय,तरु मलय-वलय ,
ज्योति , प्रपात स्वर्गीय , ज्ञात छवि प्रथम स्वीय ,
जानकी नयन कमनीय प्रथम कंपन तुरीय
उपुर्यक्त पंक्तियों में श्रृंगार के उद्दीपन - उद्दीपक , स्थाई रीति और संचारी भावों का शास्त्रीय निर्वाह तो हुआ ही है साथ ही ये स्मृतिचित्र इतने प्रतीकात्मक हैं कि वे निराला की लेखनी से ही निसृत हो सकते थे । यहाँ प्रथम दो पंक्तियों में कालिदास जैसी उच्चकोटि की उपमा है , अंतिम चार पंक्तियों में रूपकातिश्योक्ति के साथ ही प्रतीक चित्र है । काँपते हुए किसलय अधरों का , गाते खग , जीवन - परिचय - इच्छाओं का , ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय - देह की पवित्र कांति का प्रतीक चित्र है । यहाँ शृंगार शुद्ध काम का प्रेरक है । विलास का नहीं और अचानक ही भय संशय ज्योतिः प्रपात के स्पर्श से क्षीण हो जाते हैं । राम यहाँ संत्रास से सहसा ही मुक्त होकर मुस्कान से आलोकित हो उठते हैं । हाथ पुनः धनुर्भग को उठ जाते हैं , यही , इस शृंगार की विशेषता है , किंतु घना अंधकार दूसरे ही क्षण जिसे आकाश ने उगल रखा है , राम को ग्रस लेता है , रावल के अट्टहास से वे संपूर्ण रूप से कुछ क्षण को ही सही विजित हो जाते हैं । यही संशय राम को मानवीय धरातल पर उतारता है । सीता के राममय नयन राम की आँखों में खींच जाते हैं । दूर चमकने वाले तारे भावित - नयनों से मुक्तादलों के रूप में आंसुओं से रूप में प्रकट होते हैं और पुनः तारे बनकर टूट पड़ते हैं । ये दो बूंद अश्रु वैष्णव भक्ति में लीन चरणाविन्द को निहारते हुए मारूति को भी संशयित कर देते हैं । शांत रस में निर्वद की भूमि पर एक साथ तीन - तीन अलंकारों की लड़ियाँ झिलमिलाने लगती हैं-
जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो रामनाम ,
युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु - युगल
देखा कपि ने , चमके नभ में ज्यों तारा दल
ये नहीं चरण राम के , बने श्यामा के शुभ
सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ
यहाँ उत्प्रेक्षा , उपन्हुति और संदेह क्रमशः अंतिम तीन पंक्तियों में अभिव्यंजित है , अलंकारों में व्यंजित राम के ये आँसू इतने उत्तेजक हैं कि वे रौद्र रूप को जागृत करा देते हैं । ये प्रभु के आँसू हैं , इसे भक्त शिरोमणि हनुमान कैसे सह सकते हैं ? प्रबल उद्वेग से वे आकाश में शिव को भी विकल कर देते हैं , यहाँ सर्वत्र महाप्राण ध्वनियों का प्रस्फुटन है -
शत धूणावर्त , तरंग भंग उठते पहाड़
जल राशि - राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़
तोड़ता बंध - प्रति संध धरा , हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय - अर्थ प्रतिबल समर्थ बढ़ता समक्ष
शतुवायु वेग - बल , डूबा अतल में देश भाव
जल - राशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव
बज्रांग तेजधन बना पवन को महाकाश
पहुँचा , एकादश रुद्र क्षुब्ध कर अट्टहास
इस बाणभट्टीय पद - रचना में रौद्र रस की अनुलनीय अनुभूमि के बाद वात्सल्य रस की झिड़की है , जिससे वेचारे हनुमान को दीन - हीन बन जाना पड़ता है , इसी प्रकार राजीव नयन , नामित मुख - सान्धकमल में रूपक , चन्द्र मुखनिन्दित तथा जित सरोज में व्यातिरेक और ' धिक धिक ' आदि शब्द में वीप्सा है । अंत में एक और स्वीर्गीय छवि का आरोहण होता है । मध्यांतर में यह चित्र प्रकृति के माध्यम से अस्पष्ट रूप में आया था - महाशक्ति का चित्र है । शत - हरित - गुल्म - तृण लताओं से भूधर की मकरंद बिंदु पार्वती की कल्पना है सागर सिंह है । दशों दिखाएँ हाथ है । अंबर में दिगंबर अचित शशिशेखर विमान है । इस महाभाव से मन का असुरत्व नष्ट हो रहा है । अंत में यही चित्र और भव्य एवं संपूर्ण रूप में प्रकट होता है -
देखा राम ने , सामने श्री दुर्गा , भास्वर
वामपद असुर - स्कंध , पर रहा दक्षिण हरि पर
ज्योतिर्मय रूप हस्तदश , विविध शस्त्रसज्जित
मंद स्मित मुख , लख हुई विश्व की श्री लज्जित
है दक्षिण में लक्ष्मी , सरस्वती वाम भाग
दक्षिणगणेश , कार्तिक बाएँ रण - रंग राग
मस्तक वर शंकर ,
संक्षेप में निराला प्रकृति और कल्पना के अलंकरण में उदात्त रस की सृष्टि करने वाले प्रथम कवि हैं । उनकी कल्पनाएँ उनके भावों की सहचरी है । “ वे सुशीला स्त्रियों की भाँति पति के पीछे - पीछे चलती है । इसलिए उनका काव्य पुरुष काव्य है । " उनके चित्रों में इतनी रंगीली नहीं जितनी प्रकाश है । अथवा यों कहें कि रंगों के प्रदर्शन के लिए चित्र नहीं हैं । चित्र के लिए रंग हैं । राम की शक्ति पूजा में नाटकीय वैचित्रय की अपूर्व सिद्धि हुई है । नाटक के संपूर्ण कार्यावस्थाओं का यहाँ अपने ढंग से विकास हुआ है । यह इसीलिए नव क्लासिक टाईप की रचना मानी जाती है । युद्ध के वातावरण की उत्तेजना और उसकी भूमिका में राम की सभा का विषाद पूर्ण चित्रण प्रारंभ है । राम की निराशा , हनुमान और उत्तेजना और विभीषण के द्वारा उद्बोधन प्रयत्न है , जाम्बवंत के द्वारा राम की शक्ति पूजा का परामर्श प्रत्याशा है । राम के द्वारा पूजा का विधान नियताप्ति और अंत में शक्ति का प्रकट होकर राम को विजय मंगल का वरदान फलागम है । जैसा कि कहा जा है राम की शक्तिपूजा शव्य भी है और दृश्य भी है । यद्धपि वह रचना समाख्यानक है तथापि इसमें संवाद योजना का यथास्थान प्रयोग हुआ है । ये संवाद कथा को रोचक बनाते और नाटकीय वैचित्रय की सृष्टि करने में अत्यंत सार्थक हैं ।
इस तरह राम की शक्ति पूजा में निराला ने राम के साथ अपने और सम्पूर्ण मानव जाति की सबसे प्रबल अनुभूतियों को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया है । जीवन - मूल्यों की विवेचना की दृष्टि से यह आख्यानक प्रगीत हिन्दी साहित्य की ही नहीं विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृति है । आसुरी शक्ति के विनाश के लिए आत्मिक शक्ति आवश्यक है , यही राम की शक्ति पूजा का मूल प्रतिपाद्य है । जब तक मानव मन के असुरत्व का विनाश नहीं हो जाता , तब तक व्यक्ति राग - द्वेष से मुक्त नहीं हो सकता और तब तक आत्मा की वास्तविक शक्ति भी प्रकट नहीं हो सकती । गीता का भी यही संदेश है । यहाँ के वैष्णव महाभाव के अवतार राम को भी शक्ति के लिए संयम और साधना की आवश्यकता होती है और वे इसी मार्ग से भौतिक आकर्षण से मुक्त होकर उर्ध्वमुखी होते हैं , तभी वे रावण जैसे दुर्दम शक्ति को विजित करने की शक्ति पाते हैं । शक्ति पूजा में यह भी दृष्टव्य है कि महाशक्ति राम के वदन में ही विलीन होती है , कृतवासीय रामायण जैसे वरदान देकर देवी अदृश्य नहीं हो जाती , संकल्प और संयम के द्वारा ही मनोबल प्रबल हो सकता है ।
यहाँ शाश्वत जीवन मूल्यों की उद्भावना में युगबोध की भी अवहेलना नहीं हो पाई है । संवेदनशील कवि की युग - चेतना या युगीन मानव व्यापक अनुभूति और युगीन मूल्यों में अनुस्यूत शाश्वत मूल्यों का उद्घाटन इन काव्य की विशेषताएँ हैं । क्रूर कुटिल और शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य के सामने गाँधी जी की अहिंसात्मक लड़ाई क्रान्तिकारियों द्वारा शंका की दृष्टि से देखी जाती थी । निराला भी उग्र विचारधारा के थे और वे अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही शक्ति का उत्तर महाशक्ति से देना चाहते थे । दूसरी ओर वे असंयत जनक्रांति पर भी विश्वास नहीं करते थे , क्योंकि बिना नैतिक अनुशासन के प्रवल शत्रु से नहीं लड़ा जा सकता । अनेक क्रांतिकारी कदम विफल हो रहे थे । हनुमान एक ओर तो प्रबुद्ध हैं , फिर भी भावावेश में सम्पूर्ण आकाश में हड़कम्प मचा देते हैं , परन्तु छल के सामने वे हार जाते हैं । दूसरी ओर राग द्वेष से मुक्त संयमित राम का दुर्जय अविनीत मन बुद्धि के दुर्ग में पहुँचकर मायावरण का भेदन कर जाता है । अनासक्त व्यक्ति ही ब्रह्मशर से अपनी आँखें निकालने का कठिन काम कर सकता है । निराला के अनुसार दुस्साहसी और लम्पट आसुरी शक्ति से न तो अहिंसा के द्वारा टक्कर लिया जा सकता और न ही विवेकहीन क्रान्ति से , उसके लिए आवश्यक है नैतिक आत्मबल ।
संदर्भ
1. जानकी वल्लभ शास्त्री - अवन्तिका , जुलाई 1954
2. गंगा प्रसाद पाण्डेय - महाप्राण निराला , पृ .- 179 3. प्रो . धनंजय वर्मा- निराला का काव्य और अस्तित्व , पृ.क्र -157
4. ओंकार शरद - निराला , पृ . - 185 लेख रामविलास शर्मा ।
5. डॉ . पी . जयराजन - धर्मयुग 4 जनवरी 1989 , पृ . - 191
6. डॉ . शान्ति स्वरूप गुप्त - हिन्दी के आलोक स्तम्भ ।
7. निराला - पन्त और पल्लव , पृ . - 70 |
8. ओंकार शरद - निराला , पृ . - 150 लेख डॉ . राम विलास शर्मा ।
9. विशेष रूप से - डॉ . धनंजय वर्मा एवं डॉ . निर्मला जैन ।
10. साप्ताहिक हिन्दुस्तान – फरवरी 1968 , पृ . - 25 डॉ . निर्मला जैन ।
11. दूधनाथ सिंह - निराला आत्महंता आस्था , पृ . 140 |
12. निराला का पत्र - जानकी वल्लभ शास्त्री के नाम 1278/9371
13. पन्त और पल्लव , पृ . - 82 |
14. नामवर सिंह - कविता के नए प्रतिमान , पृ . - 244 |
15. आचार्य वाजपेई - हिन्दी साहित्य वीसवीं शताब्दी , पृ .134 ।
16. वही
17. निराला - प्रबंध प्रतिमा , पृ . - 151 ।
18. वही
19. डॉ . शान्ति स्वरूप गुप्त - हिन्दी काव्य के आलोक स्तम्भ , पृ . 216 ।
प्रस्तुति:- बसन्त राघव, रायगढ़, छत्तीसगढ़
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