तुलसीदास /समीक्षक डाँ बलदेव
तुलसीदास
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डाँ. बलदेव
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(1973)
तुलसीदास महाकवि निराला की सांस्कृतिक चेतना का उज्ज्वलतम इतिहास है । यह निराला जी का ऐसा जीवित स्मारक है जिसकी तुलना कामायनी से सहज ही की जा सकती है । इसमें राष्ट्रीय भावना , ज्ञान और भक्ति से सम्पन्न कवि का लोक मंगलकारी रूप का मनोहारी चित्रण है । साथ ही प्रकृति स्वरूपा नारी की शक्ति , सौंदर्य और प्रेरणा का रहस्योद्घाटन भी । तुलसीदास की प्रेरणा का स्रोत संभवतः रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथाओ कहिनी की कथात्मक प्रलंब रचनाएँ हैं जिन्हें निराला जी बैलेड कहा करते थे । ये रचनाएँ उन्हें प्रिय ही नहीं थीं बल्कि कंठस्थ भी थीं । डॉ . रामविलास शर्मा के अनुसार , वे भी एक ऐसा वेलेड लिखना चाहते थे जो उनकी ही रचनाओं में नहीं , हिन्दी में ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य में बेजोड़ हो ।१ ' महान साहित्य के प्रणयन के महान चरित्र और पद रचना कठोर साधना की आवश्यकता होती है । महान चरित्र वह , जो देश , जाति , धर्म और संस्कृति का दिशानायक हो । रवीन्द्रनाथ ने कालिदास और सूरदास पर लिखा था । पर वे महाकवि थे , लोकनायक नहीं । अपितु निराला ने तुलसी को चुना । डॉ . हजारी प्रसाद के शब्दों में इतना बड़ा लोकनायक महात्मा बुद्ध के बाद भारत में कोई नहीं हुआ । महाकवि सन्त तुलसीदास का चरित्र रामचरित मानस के रूप में सम्पूर्ण भारत में फैला हुआ है । बीसवीं शती में तो वह देश की सीमा रेखा पार कर विश्वजनीन और सार्वकालिक हो गया है । यही तुलसी निराला के इस महत काव्य के नायक बनने में समर्थ थे , निराला अपनी ऐतिहासिक चेतना को और अन्य किसी भी महापुरुष के माध्यम से कर सकते थे । परन्तु उनके व्यक्तित्व के अनुकूल मात्र तुलसीदास थे , इसीलिए उन्होंने गोस्वामी जी को चुना । दूसरी बात वे प्रारंभ से ही रामचरित मानस पर एक अलग प्रकार की आस्था रखते थे , जिसे मनोहरा देवी ने अपने मधुर कंठ से जागृत किया था । मनोहरा देवी और रत्नावली में भी एक अद्भुत समानता है । इसी का परिणाम है तुलसीदास,निराला की काव्य चेतना का शीर्ष बिन्दु यह रचना धारावाहिक रूप में पहले सुधा में प्रकाशित हुई थी और उसी ( सन् 1938 ) वर्ष लीडर प्रेस से स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में निकली । निराला ने इतना श्रम अब तक किसी कविता में न किया था । तुलसीदास में राष्ट्र के प्रति उर्ध्वमुखी चेतना का जो लोकमंगलकारी रूप है , वह निराला के चरित्र को भी उजागर करता है । निराला आसुरी शक्तियों के विरुद्ध निरन्तर जूझते रहने वाले दुर्धर्ष योद्धा थे । वे अपनी अद्वैतवादी दृष्टि से प्रकृति को जड़ता से मुक्त कर निरन्तर चेतना प्रदान करते रहे । संक्षेप में , रत्ना के रूप में , मनोहरा देवी की उत्प्रेरक शक्ति ही मानो इस आख्यानक प्रगीत की परम अभिव्यक्ति है ।
हिन्दी के अधिकांश समीक्षक तुलसीदास को परम्परागत काव्य के अंतर्गत रखते हुए खंडकाव्य मानते हैं । डॉ . शकुन्तला दुबे और डॉ . निर्मला जैन अपने शोध प्रबंधों में इसे सर्गविहिन भाव प्रधान खंड व्य मानती है । ध्यान से देखें तो तुलसीदास की कथावस्तु मूर्त एवं भौतिक जगत की घटनाओं पर आधारित होकर अमूर्त , अन्तश्चेतन की क्रियाओं पर विनिर्मित है । यहाँ अन्तश्चेतना की घटनाओं में एकान्विति है जिससे एक सूक्ष्म कथा सतह से उभर कर आती है । वैसे इस प्रलम्ब रचना में चित्रकूट भ्रमण , रत्ना का भाई के साथ नैहर गमन , और पति की भर्त्सना आदि स्थूल घटनाओं की भी अवस्थिति है किन्तु ये भी अत्यंत कलात्मक रूप में प्रस्तुत हुई है । मूलतः तुलसीदास में मानसिक घात प्रत्याघातों का ही विश्लेषणात्मक चित्रण है । इस अन्तर्द्वन्द्व में अनुभूति की तीक्ष्णता है इसकी लय में अप्रतिहत आवेग है । कवि की रागात्मकता यहाँ हर कहीं उपस्थित है । यही आत्मपरकता इस दीर्घ रचना को प्रगीत की भूमिका प्रदान करती है । खंड काव्य में जिस प्रकार कथा का और उसके विन्यास का आग्रह होता है वैसा आग्रह इस काव्य में नहीं है और न ही कथा कहना कवि का मुख्य आशय है , इसीलिए इसकी प्रवृत्तिवर्णनात्मक नहीं है ।२ ' अस्तु डॉ . शिवकुमार मिश्र के शब्दों में कहा जाय तो इसकी निर्मित खंड काव्य की निर्मिति नहीं है । शास्त्रीय भूमिका को छोड़ भी दें तो युग के नये संदर्भो की सूचना देने वाली जो प्रबंधात्मक कृतियाँ निराला के समकालीन कवियों द्वारा सामने लाई गई हैं तुलसीदास का निर्माण उनकी बुनावट से भी अपना पार्थक्य सूचित करता है ।३ ' इस रचना में जन विश्वासों और लोक कथाओं के अनुरूप अलौकिक घटनाओं का समावेश हुआ है । आत्मानुभूति का अप्रतिहत आवेग और जनविश्वास के अनुरूप कथा की बुनावट तुलसीदास को बेलेड की भूमिका प्रदान करती है । तुलसीदास में नाट्य वैचित्र्य की भी अनुपम सिद्धि हुई है , इसमें ओजस्वी सम्वादों के अतिरिक्त नाट्य संघियां भी स्पष्ट हैं , शायद इसी कारण समीक्षक इसे खंडकाव्य मानते हैं । परन्तु बैलेड और आख्यानक प्रगीतों में भी इसकी संस्थिति हो सकती है , यह नहीं भूलना चाहिए । इस विषय पर गंभीर विचार करते हुए आचार्य वाजपेयी ने लिखा है कि वीर आख्यानक की संधियाँ और कार्यावस्थाएँ कथानक के भिन्न - भिन्न स्थलों में आकर उसके स्पष्ट विकास का निर्देश करती है । परन्तु वीर गीतों में समग्रता का पक्ष प्रधान रहता है । उसका कथानक खंडों में विभाजित नहीं होता । घटनाएँ भी प्रायः पृष्ठभूमि में रहती हैं और गीतों की कड़ी विभिन्न अनुच्छेदों में बंधी रहती है वीरगीत अध्याय या सर्गों में बंधा नहीं रहता । एक ही केन्द्रिय घटना चित्रित होती है , जबकि वीरख्यान में घटनाओं की क्रमिक प्रगति और सर्गबद्ध विकास हुआ करता है । इसके अतिरिक्त कवि की प्रकृति भी वीरगीत और वीराख्यान की रचना में भिन्न प्रकार से संयोजित होती है । इन्हीं कारणों से राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास को आख्यानक प्रगीत कहा गया है । उन्हें आख्यानक काव्य या खंडकाव्य नहीं कहा जा सकता ।४ ' आख्यान और प्रगीत के मक्खन मिसरी संयोग के कारण तुलसीदास हिन्दी काव्य धारा का श्रेष्ठ आख्यानक प्रगीत है ।
आधार
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तुलसीदास में इतिहास और जनश्रुतियों का अद्भुत समावेश है । तुलसीदास के शिष्य बेनी माधव विरचित मूल गुसाई चरित्र के अनुसार तुलसीदास का जन्म सं 1554 में रजियापुर में हुआ था । उनके पांडित्य , रूप और गुण पर मुग्ध होकर उन्हें यमुनापार के एक ब्राह्मण ने दामाद बनाया था- रसकेली में पाँच वर्ष बीत जाने पर रत्ना पति की अनुपस्थिति में भाई के साथ मायके चली गई , वे तत्काल ससुराल पहुँचे और गोहार लगाने लगे ... पत्नि के उपदेश से उन्हें वैराग्य प्राप्त हुआ और वे उलटे पाँव लौट चले । मूल गुसाई चरित अभी तक अप्रमाणित रचना मानी जा रही है ।५ तुलसी के जीवन से संबंधित लगभग यही घटना गोकुलनाथ की दो सौ बावन वैष्णव की वार्ता में वर्णित है । इसके अतिरिक्त रघुबरदास कृत तुलसी चरित्र , रघुवीरसिंह विरचित गोसाई चरित्र , घट रामायण ( तुलसी साहब ) गौतम चन्द्रिका ( कृष्णदास मिश्र ) भविष्य पुराण , भक्तमाल ( नाभादास ) पद प्रसंग माला ( नागरीदास ) आदि में गुसाई जी के चरित्र पर प्रकाश पड़ता है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस पर विशद रूप से विवेचना की है और अनेक जनश्रुतियों को स्वीकार भी किया है । ६" ' निराला ने संभवतः मूल गुसाई चरित्र और दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता को आधार माना है । इसके साथ ही जनश्रुतियों और नवीन उद्भावनाओं की सृष्टि से कथा को रोचक और स्वाभाविक बनाया है । चित्रकूट प्रसंग उनकी उदात्त कल्पना का परिचायक है । क्योंकि तुलसीदास वैराग्य के बाद ही ( संभवतः प्रमुख तीर्थ और चारों धाम की यात्रा के बाद ) चित्रकूट में बहुत दिन तक रहे । यहाँ वैराग्य के पूर्व संस्कारों की परीक्षा हेतु निराला चित्र भ्रमण की अवतारणा करते हैं । यह उद्भावना वैसे तुलसीदास के जीवन में असंभावित नहीं माना जाना चाहिए । डॉ . इन्द्रनाथ मदान के अनुसार देश में उन्हें दो स्थान विशेष प्रिय थे , एक तो चित्रकूट और दूसरा काशी । ऐसा प्रतीत है कि चित्रकूट में उनके ज्ञान चक्षु खुले थे । अब चित चेति चित्रकूट हि चलु आदि से यही ध्वनित होता है ।८ अतः यह नवीन उद्भावना कोरी कल्पना नहीं बल्कि उनके स्वभाव के अनुकूल है ।
तुलसीदास में स्थूल की अपेक्षा भावों का सुन्दर विकास हुआ है । तुलसीदास की भूमिका में रायकृष्ण दास का यह कथन इस दृष्टि से अत्यत सार्थक है । उनके अनुसार ' पद्य ' में कहानी कहने की प्रथा प्राचीन काल से प्रचलित है । कथा को प्राधान्य देने वाली कविताएँ हिन्दी में शतशः है परंतु मनोविज्ञान को आधार मान कर पद्य में लिखी जाने वाली कविताओं में यह एक ही है ।९ यहाँ कथा अत्यंत क्षीण किन्तु स्पष्ट है । वैसे भी कवि का उद्देश्य तुलसीदास की कथा कहना न होकर भारतीय संस्कृति के पतन के कारणों का सिंहावलोकन एवं राष्ट्रीय जन जागरण हेतु कवि का उर्ध्वगमन तथा अज्ञानता को दूर करने वाले सांस्कृतिक सूर्योदय का आह्वान है ।
आख्यान
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मुसलमानों के आक्रमण से हिन्दू संस्कृति का सूर्य अस्त हो गया है । इस कारण भारतीय जन जीवन भी सांध्यकालीन कमल - सा निस्तेज और प्राणहीन हो गया है । एक एक कर पंजाब , बिहार , कौशल , बुन्देलखंड , कालिंजर आदि प्रसिद्ध हिन्दू राज्य पराजित हो गये हैं । वीर राजपूत मारे गये और जो शेष बचे हैं वे सूत या बन्दी रूप में जीवन बिता रहे हैं । मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना से इस्लाम की मोहक चन्द्रिका में भारतीय जन अपने दैन्य पूर्ण पराजय को भूलकर कामिनी कुमुद के कर कलित ताल पर नाचने लगे हैं । किसी को संस्कृति की चिन्ता ही नहीं । सभी निष्क्रिय हो गए हैं । ऐसे ही सांस्कृतिक अधः पतन के समय चेतना केन्द्र , शास्त्र - समधीत , पुष्ट शरीर वाले , निर्भय प्रकाश पुंज तुलसीदास जी का अभ्युदय राजापुर नगर में हुआ , उनके चरित्र की सुगन्धि से सभी लोग मुग्ध हुए ।
एक दिन तुलसीदास मित्रों के साथ पर्यटन हेतु चित्रकूट गए और प्रकृति द्वारा उद्बोधित हुए । उन्हें लगा कि चेतना के स्पर्श के अभाव में प्रकृति जड़ होती जा रही है । दैन्य अवस्था को प्राप्त प्रकृति के माध्यम से उनके समक्ष सम्पूर्ण पराजित भारत खड़ा हो गया । प्रकृति के संदेश से उनका मन उर्ध्वमुखी हो गया । मन आकाश की कई तरंगें पार कर गया । सांसारिक आकर्षण से मुक्त होते ही उन्होंने अन्धकार से घिरा हुआ भारत को देखा , उन्हें लगा जैसे सूर्य ही राहु से ग्रस्त हो गया है । इस दुरावस्था का कारण ऐहिक ऐश्वर्यों से ग्रस्त उच्चवर्ग है । क्षत्रिय उद्धत , घमण्डी और कर्तव्यच्युत तथा ब्राम्हण चाटुकार हो गये हैं । क्षुद्रगण पशुवत जीवन बिता रहे हैं । इस्लाम संस्कृति का प्रभाव उच्चवर्ग के लोगों पर ज्यादा पड़ रहा है । इस मायावी संस्कृति के प्रसार का प्रमुख कारण भारतीयों के पार्थिव ऐश्वर्य की आसक्ति ही है । उन्होंने देखा इस्लाम संस्कृति के ऊपर भी सत्य स्वरूप भारतीय संस्कृति का सूर्य है जो कि मायावरण में इस समय लुप्त हो गया है । यही संस्कृति का सूर्य है जो मुक्ति का सत्य स्वरूप है और मुक्ति अज्ञान दूर होने के पहले नहीं मिल सकती । तुलसीदास भारत की दुर्दशा से विकल हो , उसे दूर करने को कृत संकल्प हो गए-
करना होगा यह तिमिर पार
देखना सत्य का मिहिर द्वार
तोड़ने को विषम बज्र द्वार
उमड़े भारत का भ्रम अपार हरने को
इस संकल्प के दूसरे क्षण ही बाधा स्वरूप रत्नावली तारिका के रूप में प्रकट हो गई और वे भ्रमर के समान पंखुरियों में बन्द हो गए । फिर तो वही दीनप्रकृति उन्हें स्वर्गीयाभा के लिए रत्ना के रूप में दिखाई देने लगी । उनका उद्धर्वगमित मन अपनी जगह पुनः वापस आ गया और मित्रों के साथ पंचतीर्थ, संदर्शन, कोटितीर्थ , देवांगना हनुमद्धारा, कामदगिरि,जानकी कुंड,स्फटिक शिला , अनुसूयावन , भरत कूप आदि चित्रकूट के रमणीय स्थानों का भ्रमण कर वे अपने गांव लौट आए ।
तुलसीदास रत्नावली के सौंदर्यपान करते न अघाते थे , रत्नावली उनके जीवन में सूत्रधार के समान थी , अपनी प्रियतमा के दिव्य सौंदर्य को वे बाहर - भीतर अखिल चराचर में देखा करते और उसी को मुक्ति का कारण मानते उनका तर्क था-
बन्ध के बिना कह कहाँ प्रगति ?
गति - हीन जीव को कहाँ सुरति
रति-रहित कहाँ सुख ? केवल क्षति , केवल क्षति
रत्नावली की अनेक मनोहारी कल्पनाओं से तुलसीदास का हृदय पटल प्रकाश से भरकर खिलखिला उठता था । जिस प्रकार , एक मिट्टी में अनेक प्रकार के फूल खिलते हैं , उसी प्रकार रत्नावली की कल्पना रूपी हार में वे बंधे हुए खिले रहते थे । रत्नावली करुणा , त्याग और ममता की साक्षात् प्रतिमा थी , एक दिन भाई के साथ पति की अनुपस्थिति में वह मायके चली गई । बाजार से लौटे हुए तुलसी घर को सूना देख उलटे पांव ससुराल पहुंच गए । भाभियों के व्यंग्य - वाण से रत्ना जल उठी , और रात में पति के समक्ष अग्नि शिखा - सी प्रज्ज्वलित हो उठी - प्रिया के इस नूतन रूप से तुलसीदास सहम गए । काम वासना तत्काल भस्म हो गई , उनके पूर्व संस्कार जाग जाते हैं । रत्नावली उन्हें नील वसना के रूप में दिखाई देती है । रलावली का प्रखर स्वर झंकृत वीणा - सा बज उठा -
धिक , धाये तुम यों अनाहूत
धो दिया श्रेष्ठकुल धर्म धूत
राम के नहीं , काम के सूत कहलाए
तुलसीदास भारतीय रूपा रला की दृष्टि से बंधकार ऊपर उठने लगे । इस उर्ध्वमन में उन्हें चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देने लगा । जिसमें सूर्य - चन्द्रमा नक्षत्र सभी धूसर दिखाई देने लगे । क्षणान्त , वही तरिका फिर उदित हुई और आकाश का अंधकार उसमें विलीन होने लगा । भारतीय रूप में प्रिया के इस दर्शन से उनके द्वन्द्व और बन्धन नष्ट हो गए । उनका हृदय आनन्द से भर उठा । उनके अन्तर की आंखें खुली हुई थीं । जिस कली में वे अब तक बन्द थे वह उन्हीं में खुलने लगी और उसकी सुरभि से सभी दिशाएँ भर गयीं । जब उन्हें देहात्म बोध हुआ , उस समय उनके हृदय की कली दिव्य गंध से खिलने लगी । सरस्वती की वीणा उनकी वाणी में गुजरित होने लगी । उदास ऋषियों का हदय दूने उत्साह से भर उठा । अंधकार की रात्रि बीतने लगी पूर्वांचल में प्रकाश की किरणें फैलने लगी । जड़ और चेतन का संघर्ष प्रारंभ हो गया । एक तरफ सरस्वती है और दूसरे तरफ ऐहिक सुख है । बिखरे हुए भारतीय इनकी कला में फिर एक होंगे । देशकाल के शर से बिंधे हुए तुलसी की मंगलकारी कला में भारती स्वयं मुखरित होंगी । इनकी वाणी संसार की कल्मषता को धोयेगी । अंधकार दूर होगा , प्रकाश चारों ओर फैलेगा । इस करुणा से दैदीप्यमान होने के पश्चात् सभी मनोकांक्षाएँ पूर्ण होंगी ।
कवि अपने भावों में मग्न थे , जब आंखे खुली तो उन्होंने छलछलाई आंखों वाली करुणा की रागिनी रत्ना को देखा । पर तुलसीदास तो नारी से दिव्य प्रेरणा ले चुके थे , अस्तु रत्ना की रागिनी की मूर्ति को अन्तर में छुपाये हुए बाहर निकल पड़े । उस समय उसी अलौकिक मूर्ति का प्रकाश बाहर किरणों के रूप में कमलदल को खोल रहा था -
चल मंद चरण आए बाहर
उर में परिचित वह मूर्ति सुधर
जागी विश्वाश्रम महिमाधर फिर देखा
संकुचित , खोलती श्वेत पटल
बदली , कमला तिरती सुख जल
प्राची - दिगन्त - उर में पुष्पकल रवि रेखा
स्पष्ट है तुलसीदास की अधिकांश घटनाएँ नायक के अन्तर्मन में ही घटती है , किन्तु भाई का आगमन , रला का नैहर गमन , उसके पूर्व चित्रकूट के विभिन्न स्थलों का कलात्मक वर्णन भी यहाँ उपलब्ध है । भले ही तुलसीदास समाख्यानक प्रगीत है , किन्तु मन के सूक्ष्म भावों को जिस सहज ढंग से यहाँ अभिव्यक्त किया गया है , वह कला बेजोड़ है । यहाँ मुसलमानों की विजय , इस्लाम संस्कृति का प्रसार , हिन्दू राजाओं की हार , हिन्दू संस्कृति का पतन , पत्नी की प्रेरणा , तुलसी की आसक्ति आदि घटनाएँ ख्यात और इतिहास सम्मत हैं । इसी प्रकार तुलसी की शिक्षा , पूर्व संस्कारों का उदय , प्रकृति दर्शन और उद्बोधन , ससुराल का विनोदपूर्ण वातावरण आदि के रम्य स्थल निराला की मौलिक उद्भावनाएँ हैं जिन्हें अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । निराला ने जनश्रुतियों को भी इस महत्पूर्ण ऐतिहासिक रचना में स्थान दिया है , परन्तु चमत्कार पूर्ण , या अतिरंजित घटनाओं का यहां सर्वथा परित्याग किया गया है । अर्ध्वगमन का रहस्य तो स्थिर देह में है । मन ही आकाश की अनेक तरंगें पार करता है । अन्तर्मन में ही सारी घटनाएँ घटती हैं । तुलसी का यह उर्ध्वगमन राम की शक्ति पूजा में वर्णित हनुमान के उर्ध्वगमन से समानता रखता है । फर्क इतना ही है कि यहाँ रत्नावली बाधक बनती है वहां अंजना स्वरूपा पार्वती । इस प्रकार अन्त भी प्रायः एक समान होता है । यहां वही रत्ना लक्ष्मी और सरस्वती रूप में तिरती दिखाई देती है जैसा कि राम की शक्तिपूजा में महाशक्ति अपने समाज सहित प्रकट होती है । ये दोनों स्थल इन दोनों रचनाओं की चरम सिद्धि है । दृष्टव्य है दोनों रचनाओं का आरंभ युद्ध के पश्चात् की सन्ध्या से होता है और अवसान ... या अन्त सूर्योदय से । राम की शक्ति पूजा के कथा विन्यास - सा ही इस रचना का कथा विन्यास नवक्लासिक पद्धति का आग्रह करता है । इसमें पश्चिमी और भारतीय दोनों काव्य दृष्टियों की नाटकीय योजनाएँ मिल जाती हैं । इस रचना में तुलसीदास के परिचय तक आरंभ प्रकृति दर्शन और उर्ध्वगमन तक यल , रत्नावली के मायके गमन तक प्राप्त्याशा , तुलसी को रत्ना द्वारा उद्बोधन तक नियताप्ति और रत्ना के दिव्य सौंदर्य शक्ति से साक्षात्कार और प्रकाश में बहिर्गमन तक फलागम माना जाता है इस प्रकार तुलसीदास की कथावस्तु बैलेड के पूर्ण अनुकूल है ।
चरित्र
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'तुलसीदास ' में गोसाई जी के चरित्र का मौलिक रूप हमारे सामने आता है । मध्यकालीन इतिहास से ज्ञात होता है कि मुसलमानों की शक्ति अटूट और अपार थी , उस महान शक्ति से लोहा लेने के लिए राणा प्रताप जैसे महान त्यागी , देशभक्त और योद्धा भी विफल रहे तब कर्तव्यच्युत , स्पर्धागत उद्धत क्षत्रिय और चाटुकार ब्राह्मण उनके खिलाफ क्या कर सकते थे । ऐसे संकट के समय बल से नहीं बुद्धि से लोहा लिया जा सकता था । बिखरे हुए चेतनकणों को ' ज्योतिपिंड ' के रूप में संगठित करने का विलक्षण कार्य बुद्धिजीवियों का ही है । संस्कृति के ऐसे महान संकट के समय तुलसीदास का अवतरण होता है । तुलसी भारतीय संस्कृति के दैन्य पराजय का मूल कारण यहाँ भारतीय जनों के ऐहिक सुखों की साधना को मानते हैं । इसलिए वे भौतिक सुखों की आसक्ति से मुक्त होने का प्रयत्न करते हैं किन्तु इस प्रयास में रत्नावली का सौंदर्य बाधक है । प्रथम प्रयास में वे संस्कारों के जाग उठने पर भी मोहासक्ति से ऊपर नहीं उठ पाते , इसलिए प्रकृति रूपी अहिल्या का उद्धार नहीं कर पाते और प्रिया ही उन्हें काम्य हो जाती हैं ।
निराला स्त्रियों के प्रति उच्च विचार रखते थे , यहाँ भी वे उसी पवित्रता को मूल रूप में प्रस्तुत करते हैं । रत्ला द्वारा भर्त्सना यहाँ अत्यन्त संयत भाषा में है , यहाँ इससे उनकी काम वासना ही नष्ट नहीं होती बल्कि संस्कार भी पूर्णतया जाग जाते हैं । शारदा रूपी प्रिया की दृष्टि से बंधते ही भारतीय संस्कृति के सत्य स्वरूप का दर्शन होते ही तुलसी निर्द्वन्द्व हो उठते हैं । आनंद से भरकर उनकी वाणी धनीज्योति के रूप में फूट पड़ती है । स्पष्ट है तुलसी के चरित्र में ' जीव ' का भी एक इतिहास है , जो सुख में फंसता है और फिर मुक्त होता है । परन्तु इस मुक्ति में स्वयं के कल्याण की भावना नहीं है बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार की कामना है । यहाँ तुलसी भौतिक सुखों का परित्याग करते हैं , देश - समाज और सारे मानव जाति के लिए । यही उनके चरित्र की विशेषता है । एक और बात दृष्टव्य है , वह यह कि यहाँ तुलसी भौतिक सुखों का ही परित्याग करते हैं , रत्नावली का नहीं , वे तो बहिर्गमन करते हैं , रत्ना की उसी दिव्य मूर्ति को हृदय में धारण कर । अस्तु रत्ना के प्रति उनका प्रेम आयंत हैं , किन्तु इससे भी आगे बढ़कर , वैयक्तिक सीमा लांघकर वे जाति , राष्ट्र और विश्व कल्याण की चेतना से सम्पन्न होकर कर्तव्य के प्रति कृत संकल्प है । स्पष्ट है कि उनका वैराग्य आसक्ति से है । निष्काम कर्म से नहीं । इस आख्यानक प्रगीत में जितना भव्य चित्रण तुलसीदास का है उससे भी अधिक आकर्षक चरित्र है रलावली का । रत्नावली , प्रेम , शक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी है । उसका चरित्र भारतीय नारीत्व की गरिमा से ओप्रप्रोत निराला की लेखनी में ढला एक अविस्मणीय चरित्र है ।१० वह प्रेरणा की अजम्न स्त्रोतस्विनी है । रत्नावली यदि रास्ते में नदी की भांति बाधक हो सकती है । यदि वह अपने कमल दलों में क्षण भर सुख से बैठे हुए भ्रमण को बंद कर सकती है तो अपनी सुगंधि से भ्रमर की हृदय कलिका को खोलकर प्रकाश से भी भर सकती है ... वह पुरुष के मोह जनित दुर्बलता को ज्ञान में परिणत कर देशकाल को संकट से बचा भी सकती है । इस रचना में रत्नावली का दर्शन नभ तल में चमकने वाली तारिका के रूप में होता है । फिर प्रकृति के रूप में होता है । पश्चात् प्रकृति के अनुरूप सौंदर्य के रूप में वह विस्तरित होकर वन पर्वत नदी नाले , लता - सुमन आदि में प्रतिबिम्बित हो उठती है । उसकी उच्छ्वासों से दिशाएँ सुगंध से भर उठती हैं । उसकी आंखों के ' कोए ' इंदीवर के समान विमल होते हुए भी मुख मंजू सोम में कलंक के समान है । उसकी नीली अलकें मारुत - प्रेरित गिरिशृंगों में ठहरे हुए घने नीले बादलों के समान क्रांतिमान हैं । उसकी धनी ज्योति विद्युत से भी अधिक चंचल व सुन्दर है । वह मनमोहिनी है । उसकी शोभा अक्षय पुष्प के समान है । शारीरिक सौंदर्य से ही नहीं , मानसिक सौंदर्य से भी रत्नावली सम्पन्न है । वह सत्य यष्टि है । उसका अनुराग उषारूपी फाग में आग के समान है । इतना होते हुए भी यह त्याग और करुणा की मूर्ति है । कुंकुम - शोभा रत्नावली पति की अत्यंत प्रिया होती हुई भी भाई , भाभी , मां - बाप के स्नेह की सरिता है । यह मर्यादा में सीता के समान और ज्ञान में गीता के समान पवित्र है । कामवासना के लिए अग्नि शिखा के समान है । लोक व्यवहार से च्युत तुलसी के ससुराल आगमन पर वह चंचल हो उठती है । -
धिक , आए तुम यों अनाहून
धो दिया श्रेष्ठ कुल धर्म धूत
राम के नहीं काम के सूत कहलाए
हो विके जहाँ तुम बिना दाम
वह नहीं और कुछ हाड़ चाम
कैसी शिक्षा , कैसे विराम पर आए
इस गंभीर घोष से वह पति को सन्मार्ग में लाती है । अपनी दिव्य दृष्टि से पति के पूर्व संस्कारों को जगाती है , पति को ज्ञान और कर्म क्षेत्र की ओर उन्मुख करती है । पति के वैराग्य के संकल्प से रत्ला जड़ीभूत हो जाती है । उसकी आंखें छलछला उठती है , मौन रागिनी फूट पड़ती है । वैराग्य धारण के बाद भी रत्ना तुलसी के हृदय में ज्योति - सी छिपी रहती है । प्रेम , त्याग , ज्ञान , भक्ति और सौंदर्य की इस मूर्ति को विधाता ने जैसे भारत के उद्धार के लिए ही गढ़ा था । वास्तव में रत्ना यहाँ महान है । महाकवि निराला ने उसके जीवन के अछूते प्रसंगों का चित्रण कर साहित्य का बहुत कल्याण किया है । रत्ना , सूर्य की ज्ञानदात्री किरण है जिसकी दीप्ति से सरस्वती और स्वयं लक्ष्मी आलोकिक होती है , वास्तव में वह प्रकृति स्वरूपा है ।
यह श्रीपावन , गृहिणी उदार
गिरिवर सरोज , सरि पयोधार
कर वन तरु , फैला पल निहारती देती
सब जीवों पर है एक दृष्टि
तृण - तृण पर उसकी सुधा वृष्टि
प्रेयसी , बदलती वसन सृष्टि नव लेती
यह पावन गृहिणी का एक उदात्त चित्र है रत्नावली का या मनोहरा का , दोनों महाकवियों में कहां कितना अन्तर है ? दोनों की प्रेरणासोत तो नारी ही है ।११ और प्रेरणा स्थल भी ससुराल । ' तुलसीदास ' देशकाल के शर से बिंधे हुए महाकवि निराला की आत्माभिव्यक्ति हैं । जिस प्रकार पत्नी के माध्यम से तुलसीदास को अनुपम ज्ञान मिला था उसी प्रकार निराला भी अपने लिए मानते हैं । तुलसीदास के पूर्व भी अपनी सांस्कृतिक चेतना को निराला ने अनेकों बार बदला राग , यमुना के प्रति शिवाजी का पत्र आदि लम्बी कविताओं में अभिव्यक्त किया था । यहाँ उन्हीं विखरे हुए रत्नकणों को संगठित रूप में प्रस्तुत किया गया है । विवेकानन्द राष्ट्र की मुक्ति के लिए राष्ट्रीय एकता निम्न वर्ग और नारियों का उद्घार चाहते थे । राष्ट्र के उत्थान के लिए वे ज्ञान को आवश्यक मानते थे । निराला विवेकानन्द के जीवन दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थे और इसी दर्शन के अनुरूप उन्होंने इस आख्यानक प्रगीत में दलित वर्ग के उत्थान की कामना और नारी की प्रेरणाशक्ति को प्रकट किया है । उनकी सम्पूर्ण चेतना राष्ट्र को अर्पित थी । निराला और गोस्वामी जी की प्रकृति में अद्भुत समानता है , दोनों प्रकृति प्रेमी और दर्शन के क्षेत्र में अद्वैतवादी हैं । निराला और तुलसीदास के शारीरिक सौष्ठव में भी विद्वानों के चित्रणों के अनुसार पर्याप्त समता दिखाई देती है । डॉ . बच्चनसिंह के शब्दों में निराला जी का शारीरिक सौष्ठव इस प्रकार था ' पुष्ठ लम्बा शरीर , गठी हुई मांस पेशियाँ , उन्नत ललाट विस्तृत वक्ष , गौरवर्ण , सिन्धुतट वाले आर्यों के जीवन प्रतीक आज के ठिगने कद , दुबले पतले विकृत मानव शरीर यष्टि धारण करने वाले व्यक्तियों के मध्य में आर्यों की दैहिक परम्परा के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं ।१२ कुछ इसी तरह का व्यक्तित्व मानस के हंस में नागर जी ने ' तुलसी ' का चित्रित किया है । आजानुबाहु , चमकते सीने , पीन सी देह , लम्बी सुतवा नाक , उठी दाढ़ी , पतले होंठ , सिर और चेहरे के बाल घुटे हुए । लगता था मनुष्यों के समाज में कोई देव जाति का पुरुष आ गया है । यह तुलसी के वृद्ध शरीर का वर्णन है , लगता है । नागर जी ने यहाँ निराला जी का ही व्यक्तित्व प्रस्तुत किया है । डॉ . रामविलास शर्मा के शब्दों में कैसे थे तुलसीदास ? रामायण , विनय पत्रिका में अपने बारे में कहीं कुछ विशेष नहीं लिया , पर आदर्श कवि की मूर्ति वैसी ही रही होगी , जैसे युवक निराला की थी ... वास्तव में ' तुलसीदास ' महाकवि गोस्वामी जी के माध्यम से कवि निराला के स्वयं की चिन्ता है इसलिए यह कविता के रूप में लिखा गया आत्मचरित ही है ... वर्ना निराला ढोल गंवार क्षुद्र पशुनारी के लिए ताड़न के अधिकारी , लिखने वाले तुलसी के हृदय में चलते फिरते पर निःसहाय शुद्रगण शुद्र जीवन संबल पुर - पुर में , की भावना व्यंजित नहीं करते । यहाँ निराला ने तुलसीदास को अपनी काव्यात्मक भूमि पर उतारा है जो श्लाध्य है । ' कविः प्रजापतिः ' को पूर्णतया यहाँ चरितार्थ किया गया है ।
शिल्प
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तुलसीदास निराला की सूक्ष्म और जटिल कलाकारिता का अन्तिम सोपान है। इसका प्रारंभ सूर्यास्त से होता है और अन्त सूर्योदय से , जहाँ शारदा कमल दलों के खोलती हुइ और लक्ष्मी जल में तैरती हुई उद्भाषित होती है । प्रकृति जहाँ रवि के पुष्कल रेखाओं से जगमगा उठती है । सूर्यास्त और सूर्योदय के इन्हीं दो बिन्दुओं पर यह प्रलम्ब रचना फैली हुई है । एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक पहुंचने के लिए प्रकृति के माध्यम से भारतीय संस्कृति के पतन का सांगोपांग वर्णन , प्रकृति का दैन्य निवेदन , जागरण संदेश , नारी मोह और नारी की शक्ति से मोह और अज्ञान का विनाश तथा प्रेरणामयी दिव्य दृष्टि से आनंद और ज्ञानोदय आदि अनेक मानसिक घटनाओं के घात - प्रत्याघातों से कवि को जूझना पड़ा है । ये नाटकीय वैचित्र्य की सिद्धियां अन्तः - संघर्ष के तनाव को तब तक समाप्त नहीं कर पाती जब तक तुलसी का मोहान्धकार सम्पूर्ण रूप से नष्ट नहीं हो जाता । आनन्द से आप्लावित हो जाने पर उनकी वाणी वीणा - सी झंकृत हो उठती है । उनकी कला राष्ट्र की बिखरी हुई चेतना को एक सूत्र में गुंथने को समर्थ हो जाती है और तनाव समाप्त हो जाता है।
राष्ट्र को समझने के लिए प्रकृति ही ज्ञानदात्री है , नारी रूप में वही गुरु है , क्योंकि वह निष्पक्ष है , निराला के अनुसार प्रकृति दर्पण है । इस विचार को निराला ने अन्यत्र भी व्यक्त किया है । जिस समय देश पराधीनता के पिंजड़े में वन विहंग की तरह बन्द कर दिया गया है । उस समय से लेकर आज तक उसकी अवस्था का दर्शन उससे सहानुभूति आदि जितने काम हैं , वह इनकी सीमा कवि कर्म की परिधि के भीतर ही समझी जाती है , क्योंकि प्रकृति का यथार्थ अध्ययन करने वाला कवि ही यदि देश की दशा का वर्णन नहीं करेगा तो फिर कौन करेगा । इसी विचार से निराला ने तुलसीदास जी के जन्म की चमत्कारिक , घटनाओं तथा जीवन से संबंधित और अन्य स्थूल घटनाओं को न लेकर प्रकृति का ही बिम्बांकन किया है । प्रकृति के सूक्ष्म निरीक्षण का बीजारोपण यहाँ चित्रकूट पर्यटन से होता है । तुलसी प्रकृति के माध्यम से देश - काल को समझ पाते हैं । उन्हें प्रकृति से जागरण सन्देश मिलता है-
भूले थे अब तक बन्धु प्रमन ।
इस जग के मग के मुक्त प्राण
गाओ - विहंग : सद्ध्वनित गान
सत्य को समझने के लिए प्रकृति के समान निष्पक्ष होना आवश्यक है प्रकृति की वीणा को सुनने वाला मुक्त प्राण कवि ही हो सकता है । चित्रकूट की सारी घटनाएँ कवि के अन्तर्मन पर घटती है । तुलसी के साथ वहाँ अन्य भी युवक हैं , पर प्रकृति का सन्देश उन्हें सुनाई नहीं पड़ता । क्योंकि उनमें राष्ट्र को समझने के लिए तुलसी जैसे शास्त्र समधीत सामर्थ्य या संस्कार नहीं है । निराला की यह अप्रतिम कला है कि पहले तो वे पृष्ठभूमि तैयार करते हैं फिर अपनी कोई बात शुरू करते हैं । शिक्षा और काव्यशास्त्रों के संस्कारों के बाद भी यहाँ तुलसी प्रबुद्ध नहीं हो पाते , क्योंकि प्रकृति में विरोधात्मक प्रवृत्तियाँ होती है । यदि वह मनुष्य के लिए सहायक है तो बाधक भी । बाधक उनके लिए जो उसके विरुद्ध आचरण करते हैं । यहाँ विरोधी गुणों को निराला ने अत्यन्त आकर्षक और रमणीय रूपों में प्रस्तुत किया है ।यहाँ तुलसीदास के मानस में रत्नावली को तारिका के रूप में अवतरित कराकर प्रकृति के इसी विरोधी गुण को मायाम संसार के रूप में प्रस्तुत किया गया है । रास्ते में नदी स्वरूपा रत्ना प्रकृति का ही चेतन रूप है ।
निराला की कला की दूसरी विशेषता है प्रकृति के अलंकरणों में कल्पना की उड़ान । प्रथम वे किसी एक बिन्दु को लेते हैं और उसे ' लैडस्केप ' पर गहरे रंग में फैला देते हैं । रत्ना नभ - तम की तारिका - सी कवि के उर्ध्वमुखी मनोनभ पर चमक उठती है और दूसरे ही क्षण धूल - धूसरित जड़ प्रकृति में चेतना की मूर्ति - सी फैल जाती है - वह श्री पावन उदार गृहिणी के रूप में अपने सौंदर्य सम्भार से अमृत वर्षा करने लगती है । सुरभि से भरी हुई प्रकृति कवि के रागात्मकता को झंकृत कर उसे अपने कमलदलों में आबद्ध कर लेती है । यह इसलिए कि वह तारिका कवि के मनोनभ के अधंकार को पीने में सक्षम नहीं थी , इसीलिए कवि का मोह रत्नावली के निरूपम सौंदर्य में और प्रगाढ़ हो जाता है । यह अतिमोहासक्ति ही स्वयं के विनाश का कारण है , क्योंकि बिना भोग के ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता । आगे चलकर यही बाधक प्रकृति , देशोद्धार की प्रेरणा भी बनती है । वह अनिल - शिखा बनकर कवि के सारे द्वन्द्व - बन्धन के कारण स्वरूप वासना को भस्म कर देती है । वासना को बढ़ाने वाली उदार गृहिणी अब नील वसना सरस्वती में परिणत हो गई है । प्रकृति का यह विशुद्ध मायावी आचरण विलक्षण है , इसे शब्दों में पकड़ पाने की क्षमता कवि जीवन की चरम सिद्धि है -
देखा शारदा नील वसना
है सम्मुख स्वयं सृष्टि रसना
जीवन - समीर शुचि - निःश्वसना , वरदात्री
वीणा वह स्वयं सुवादित स्वर
फूटी तर अमृताक्षर निर्झर
यह विश्व हंस , हे चरण सुधर जिस पर श्री
अपनी जादुई दृष्टि से वह कवि को पुनः उर्ध्वगामी बनाती है , देश का धूमिल क्षितिज फिर आँखों में घिर जाता है , वही क्षितिज जिसे उसने चित्रकूट में मनोनभ पर देखा था , इस बार वही नभ - तम की सुधरतारिका द्युतिमान हो उठती है और अंधकार को पूर्णतया निःशेष कर देती है । कवि निर्द्वन्द्व हो आनन्द और ज्ञान के प्रकाश से भर जाता है । देश काल के शर से बिंधा हुआ कवि देशोद्धार के लिए संकल्पित हो उठता है ... अन्त में वही प्रकृति वही तारिका आँसुओं के रूप में प्रकट होती है । रत्ना की छलछलाई हुई आंखें इस बार साधक की सहायिका बन जाती हैं । अन्तर में छिपी हुई वही ज्योति बाहर सूर्य की पुष्कल रेखाओं के रूप में प्रज्ज्वलित हो उठती है । एक ही बिन्दु का यह नानाविध विचरण भी अद्भुत है ।
प्रकृति के ये युग्मक संश्लिष्ट विम्ब और प्रतीक तुलसीदास की भाषिक संरचना को अत्यन्त जटिल बनाते हुए तीक्ष्ण अनुभूतियों का साक्षात्कार कराते हैं । प्रकृति यहाँ मात्र अलंकरण के रूप में नहीं आई है , बल्कि वह कथा में इस प्रकार गुथी हुई है कि उनका समवेत प्रभाव वस्तु और रूप का भेद ही समाप्त कर देता है । यही निराला और उनके समकालीन कवियों के प्रकृति चित्रण में मूलभूत अन्तर है।
तुलसीदास की चित्र प्रधान ध्वन्यात्मक भाषा अत्यन्त शिलष्ट होते हुए भी ओज और माधुर्य की कांति से दीप्तिमान है । ओज और माधुर्य के अनुरूप ही यहाँ पुरुषा और कोमलावृत्ति की प्रमुखता है । अस्तु यह भाषा , शृंगार , वीर और शान्त रसों के उद्दीपक विराट और कोमल चित्रों को प्रस्तुत करने में समक्ष है । तुलसीदास का प्रारंभ वीररस की अवतारणा से होता है । खूबी यह कि अपने पक्ष में नहीं है अस्तु वेदना और भय का ही वातावरण यहाँ निर्मित होता है । उत्साह या वीरत्व का नहीं । ओज पूर्ण भाषा का एक स्थल ही पर्याप्त होगा । -
मोगल दल बल के जलद - यान
दर्पित पद उन्मद नद पठान
है बहा रहे दिग्देश ज्ञान , शर - खर तर
छाया ऊपर धन -- अन्धकार
टूटता बज वह दुर्निवार
नीचे प्लावन की प्रलय धार , ध्वनि हर - हर
वर्षा का यह रूपक बड़ा ही भयानक है , मुगल से मोगल में अधिक भयावहता का साक्षात्कार होता है । ( वैसे यह बंगला उच्चारण है और रवीन्द्र की कथाओ कहिनी में अनेक बार प्रयुक्त हुआ है । यहां विरोधी पक्ष के वीरोध्दत क्रिया - कलापों से उत्पन्न भारतीय - जनों की वेदना और निराशा को मूर्तित किया गया है । इसी प्रकार नाद सौंदर्य से मंडित कोमला वृत्ति और माधुर्य गुण समन्वित निम्न चित्रात्मक भाषा और भी जोरदार है -
अस्तु रे , विवश , मारुत - प्रेरित
पर्वत - समीप आकर ज्यों रिक्त
धन - नीलालका दामिनी जित ललना वह
उन्मुक्त - गुच्छ चक्रांक पुच्छ
लख नर्तित कवि शिखि - मन समुच्च
वह जीवन को समझा न तुच्छ ललना वह
यहाँ अनुप्रास की छटा दर्शनीय तो है ही , एक साथ उत्प्रेक्षा , व्यतिरेक और रूपक की लड़ियाँ कम आकर्षक ढंग से नहीं सजाई गई हैं । विशेषता यह कि इन साद्दश्य विधानों का उद्देश्य तुलसी के मोह का सम्मूर्तन है , न कि कोरा अलंकरण । तुलसीदास में प्रयुक्त प्रतीक और बिम्ब परम्परागत अलंकारों से ही निर्मित है । किन्तु निराला की कला में वे नई आभा लेकर प्रकट होते हैं । अलंकारों से उद्दीप्त तुलसीदास की भाषा की यह सूक्ष्म विशेषता है कि वह कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट है । यह रहस्यात्मक प्रवृत्ति छायावादी भाषा का सहज गुण है । जो भाषा भाव को जगाकर अपनी माधुरी में डुबा दे और एक अनिवर्चनीय रसानुभूति का बोध करा दे वही काव्य भाषा है ... मौन मधुर हो जाय भाषा मूकता की में यही निराला का आदर्श है-
वह भाषा छिपती छवि सुन्दर
कुछ खुलती आभा में रंगकर
वह भाव कुरल कुहरे सा भर कर भाया
निराला की भाषा श्लिष्ट होती हुई भी मसृण है ।
प्रथम छंद को ही लें -
भारत के नभ का प्रभापूर्य
शीतल छाया सांस्कृतिक सूर्य
अस्तभित आज रे ... तमस्तूर्य दिडमंडल
उर के आसन पर शिरस्त्राण
शासन करते हैं मुसलमान
है उर्मिल जल , निश्चिलित प्राण पर शतदल
इस बिम्ब में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग हुआ है । चौथी और पांचवीं पंक्तियाँ बलपूर्वक घुस - सी आई है । परन्तु सांस्कृतिक सूर्य के अवसान पर ' उर्मिल जल ' और ' शतदल ' शब्दों के चयन से भाव को स्पष्ट कर दिया गया है । इसमें अनेक प्रतीकात्मक शब्द हैं जो विरोधाभास का आभास देते हैं। प्रभावपूर्ण की जगह तुक के आग्रह पर ' पूर्य ' कहकर उसे अधिक ध्वन्यात्मक और ललित बना दिया गया है । प्रकाश से पूर्ण नभ का प्रतीकार्थ है भारत सांस्कृतिक सूर्य का प्रतीक सांस्कृतिक चेतना है , दिङमंडल मुसलमानों की चारों ओर फैली हुई शक्तिशाली सेना है जो कि अंधकार रूपी तुरही बजा रही है । सूर्य के अस्त होने पर अंधकार का घिरना और कमल का निस्तेज होना , जल का चंचल होना स्वाभाविक है । यहाँ जल जीवन का और शतदल आत्मा का प्रतीकार्थक है । सूक्ष्म रूप से देखें तो पहले इसमें नेत्रेन्द्रियाँ , फिर श्रवणेन्द्रियाँ पश्चात् स्पर्शीन्द्रियाँ उत्तेजित होती हैं । पूरे काव्य में सूर्य सत्य का , कमल आत्मा का , अंधकार मोह का व्यंग्यार्थक है । इस प्रकार " तुलसीदास काव्य " भाषा का श्रेष्ठ उदाहरण भी है । निराला को अपनी भाषा पर अगाधविश्वास था । सर्जना उनके लिए कोई मुश्किल काम न थी ।
इस रचना की सबसे जटिल कलाकारिता का उदाहरण है , छंद योजना , राम की शक्ति पूजा की शब्द योजना अत्यन्त क्लिष्ट और सघन है जबकि तुलसीदास की शब्द योजना यहाँ क्लिष्ट होते हुए भी सघन नहीं है । इसकी छंद योजना राम की शक्ति पूजा की अपेक्षा अत्यन्त दुरुह और श्रम साध्य है । समास बहुल वाक्य विन्यासों की विरलता होने पर भी अर्थ कहीं - कहीं क्लिष्ट और अस्पष्ट हो गये हैं । बैसवाड़ी अवधी के ठेठ शब्द और मुहावरे उसे और भी असाध्य बनाते हैं । यहाँ छह पंक्तियों के विषम मात्रिक तुकान्त मिश्र छंद प्रयुक्त हुआ है । तीसरे और छठे चरण की 22 मात्राएँ चौपाई में षष्ठक जोड़ने से बनी है । चौपाई के दो चरण और 22 मात्राओं के चरण के योग से छंद का आधा भाग बनता है । इस प्रकार खंडों से इस छंद का निर्माण हुआ है । साथ ही 22 मात्राओं के बाद पूर्व चरणों का अन्त्यानुप्रास मिलता है । विकर्षाधार का मात्रा क्रम 16 , 16 22 ( 166 ) 16-16 , 22 ( 166 ) और अन्त्यक्रम ककख ( क ख ) गगख ( ग ख ) है ।१३ यह छंद निराला की जटिल कलाकारिता और भाषा की अद्भुत क्षमता का परिचायक है । तीसरे चरण में प्रथम और द्वितीय के अनुरूप 16 वें मात्रा पर तुक और तीसरे के अनुरूप छठवें चरण में चौथे और पांचवें चरणों की तुक की रक्षा करते हुए समवाही तुकान्त योजना निराला के कसरती दांव - पेंच से भी ज्यादा पेचीदा है । तुकान्त के दुराग्रह के कारण छंद कहीं अस्पष्ट ही नहीं कर्णकटु भी हो गए हैं । फिर भी इन छ : पंक्तियों में भाषा और छंद की एक रूपता का निर्वाह अन्यत्र दुर्लभ ही है । इसका एक कारण तो यह है कि इसके सभी छन्द एक दूसरे से विन्यस्त हैं । यहाँ तक कि एक छन्द के वाक्य दूसरे छंद में भी विस्तरित हो गए हैं।इस पदान्त प्रवाही प्रयोग से भी वस्तुविन्यास शिथिल नहीं हो पाया है । इसकी पंक्तियाँ मांसपेशियों सी कसी हुई है ।१४ प्रलंब रचना होने के बाद भी इसकी प्रभान्विति कहीं भी खंडित दिखाई नहीं देती , इसकी लयात्मक , सम्वाद योजनाओं के बाद भी अबाध और गेय हैं । समाख्यान के बीच बीच में यथास्थान सम्वादों की स्वाभाविकता इस रचना को सहज बनाने में सहायक है । तुलसीदास की पदरचना का मधुरोच्चार और स्वरों की उठा पटक मीठे संगीत की पहचान है । यही इस रचना की प्रगीतात्मकत्ता का रहस्य है ।
भावाभिव्यंजना
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महाकवि निराला ' जड़ - चेतन ' को सियाराम मय जानने वाले तुलसी जैसे ही अद्वैतवादी थे , उनकी अनेक कविताओं में अद्वैत के दर्शन होते हैं । सर्वत्र चेतना की अनुभूति करने वाले निराला यहाँ प्रकृति में चेतना का आरोप करते हैं प्रकृति तुलसीदास के दर्शनमात्र से धन्या हो जाती है और उन्हें बाहों में भर लेने के लिए आकुल हो जाती है ।-
तरु - तरु , बीरुघ - बीरुध तृण - तृण
जाने क्या हँसते मसृण - मसृण
जैसे प्राणों से हुए उऋण , कुछ लखकर
भर लेने को उर में , अथाह
बांहों में फैलाया उछाह
गिनते थे दिन , अब सफल चाह पल रखकर
कवि के विचार में चेतना के स्पर्श के अभाव में प्रकृति जड़ बनती जा रही है । प्रकृति अपने दैन्य निवेदन के पश्चात् तुलसीदास को नव - जागरण का संदेश सुनाती प्रतीत होती है । -
फिर असुरों से होती क्षण - क्षण
स्मृति की पृथ्वी वह , दलित चरण
वे सुप्त भाव , गुप्त भूषण हैं सब
इस जग के मग के मुक्त प्राण
गाओ - विहंग सद् ध्वनित गान
त्योगोज्जीवित , वह उर्ध्वध्यान , धारा स्तव
इस प्रकार इस रचना में चेतना स्रोत के रूप में प्रकृति का चरित्रांकन हुआ है । निराला एक महान दार्शनिक कवि हैं , हर जगह वे सत्य के प्रतिष्ठापक हैं उन्होंने आज की भौतिकता का हर कहीं विरोध किया है । तुलसीदास का मूल संघर्ष इसी भौतिकता के विरोध में है । निराला ने ऐहिक ऐश्वर्यों की आकांक्षाओं को ही बंधन और द्वन्द्व का कारण माना है । उनके अनुसार ज्ञान के प्रकाश से व्यक्ति निर्द्वन्द्व और मुक्त होकर आनन्द से भर सकता है , और इसी अवस्था में वह मंगलकारी कर्म की ओर अग्रसर हो सकता है । ज्ञातव्य है निराला ने पूंजी का विरोध नहीं किया है । बल्कि उसकी आसक्ति का विरोध किया है । काव्य के अन्त में इसीलिए वे सरस्वती के साथ लक्ष्मी को भी समान महत्व प्रदान करते हैं ।
तुलसीदास में मध्यकाल के राजनीतिक और सांस्कृतिक संकट का जो वर्णन है वह आज के संदर्भ में भी सटीक है । कहा तो यहाँ तक जा सकता है कि आज के संदर्भ को ही उन्होंने तुलसीदास के माध्यम से स्थापित किया है । खासकर यह रचना भी स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई का एक हिस्सा है , जो अपने किस्म का अनूठा है । किन्तु समसामयिक मूल्यों के अन्तर्गत तुलसीदास के संबंध को सीमित करना गलत होगा । इस रचना का स्थायी महत्त्व है , इसमें जीव की मुक्ति के संघर्षों की भावात्मक कथा भी है । इसके आगे बढ़ने पर मिलेगा , इसमें व्यक्ति का ही नहीं बल्कि एक विशाल देश , जाति और समाज का इतिहास है । कोई भी राष्ट्र विखंडित होने पर पराधीन हो सकता है , यह ध्रुव सत्य है । सम्राट हर्ष के बाद भारत की केन्द्रीय शक्ति समाप्त होकर अनेक राज्यों में विभक्त हो गई थी । आपसी फूट के कारण सदियों तक देश पराधीन रहा । राष्ट्र की आत्मा देश की संस्कृति होती है बिना सांस्कृतिक उत्थान के किसी भी देश की मुक्ति और उन्नति नहीं हो सकती है । उसे बनाये रखने के लिए गौरवशाली अतीत की परम्पराओं को भूल जाने के कारण हम पराजित होते रहे हैं । भारतीय स्वतंत्रता का आन्दोलन इसी सांस्कृतिक उत्थान के द्वारा सफल हुआ । देश में सूत और बंदीगण के रूप में जमींदार और राजा ही नहीं बल्कि यहाँ का बौद्धिक वर्ग भी यूरोपीय संस्कृति के लिबास में सुशोभित होकर अपने को धन्य समझ रहा था । उस समय कविगण अंग्रेज अफसरों , देशी राजाओं - महाराजाओं को जुगजुग जिलाने में लगे हुए थे । इस दैन्यपूर्ण पराजय के उन्मूलन के लिए राजा राममोहन राय , दयानन्द सरस्वती , विवेकानन्द , और गाँधी जैसे महर्पियों ने सांस्कृतिक जनजागरण को अपना शस्त्र बनाया । निराला इन्ही महर्षियों की परम्परा में राष्ट्र का संकुचित अर्थ राजनीति से न लेकर देश के सर्वांगीण विकास पर बल देते थे । उनके समक्ष सांस्कृतिक जनजागरण का यही रूप था । निराला स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में राम की शक्ति पूजा , तुलसीदास , जागो फिर एक बार , यमुना के प्रति , बादल राग आदि से सुसज्जित होकर शामिल हैं । तुलसीदास में कवि की ऐतिहासिक , सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का स्फुरण हुआ है । इसी उद्देश्य से तुलसीदास की पृष्ठभूमि सांस्कृतिक पराभव और तत्पश्चात् उसके उत्थान की लालसा को व्यक्त करती है । दूसरा कारण सामाजिक अव्यवस्था है । वर्णव्यवस्था की रूढ़ि पूंजी की असमानता , निम्न वर्ग और स्त्रियों की दुर्दशा सामाजिक अव्यवस्था के रूप हैं । शोषित वर्ग के उत्थान के बिना भारत जैसे राष्ट्र की प्रगति असंभव है । जहाँ समाज व्यवस्था निम्न स्तर की हो वहाँ पराधीनता के अतिरिक्त और क्या दूसरी कल्पना की जा सकती है , वह पराधीनता विदेशी शासन के निष्कासन के बाद भी जीवित है -
विधि की इच्छा सर्वत्र अटल
यह देश प्रथम ही था हतबल
वे टूट चुके थे ठाट सकल वर्गों के
तृष्र्णोद्धत् , स्पर्धागत सगर्व
क्षत्रिय , रक्षा से रहित सर्व
द्विज चाटुकार , हत इतर वर्ग वणों के
यहाँ क्षत्रिय और द्विज का व्यंग्यार्थ भर लेने की जरूरत है , आधुनिक संदर्भ साफ दर्पण सा झलक जावेगा । इसके विरुद्ध शोषण का एक दूसरा चित्र लीजिए -
चलते - फिरते , पर निःसहाय
वे दीन , क्षीण कंकाल काय
आशा केवल जीवनोपाय उर उर में
रण के अश्वों से शस्य सकल
दलमल जाते ज्यों , दल से दल
शूदगण शूद्र - जीवन - संबल पुर पुर में
समाज का एक अभिशापित वर्ग अब भी भारत में वर्तमान है जो मध्यकाल में था , अंग्रेजों के समय भी था और अब भी है । निराला पूंजीवादी व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे । उन्होंने शोषकों की जगह - जगह भर्त्सना की है । इस व्यवस्था पर उनका पैना व्यंग्य है-
वह रंक , यहाँ हुआ भूप , निश्चय रे
चाहिए उसे और भी और
फिर साधारण को कहाँ ठौर
जीवन के , जग के , यही तौर है जय के
हिन्दी साहित्य में छायावाद को नारी जागरण का युग कहा जा सकता है । प्रसाद , पन्त और निराला ने नारी को न तो रीतिकालीन कवियों के समान भोग की सामग्री बनाया और न ही द्विवेदी युगीन कवियों - सा तपस्विनी रूप में देखा । इन दोनों रूपों से उसे मुक्त कर प्रेम त्याग , साहस और शक्ति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व नारी को प्रदान करना छायावाद की महत्वपूर्ण और प्रमुख विशेषता है । निराला ने प्रकृति के मानवीकरण में भारतीय नारी का जो उदार चित्र खींचा है वह स्तुत्य है । यहाँ नारी प्रेयसी होती हुई भी उदार और पवित्र तभी बन सकती है जब मातृत्व , ममता और स्नेह से झुकी हुई सबके ऊपर समान रूप से सुधा - वृष्टि करती हो । नारी में शक्ति का सात्विक रूप होता है । यहाँ निराला ने तुलसी से भिन्न नारी का आदर्श प्रस्तुत किया है । पत्नी का आदर्श तभी है जब वह प्रेम , त्याग और कल्याण की त्रिवेणी से पति को निर्मल करती है । वह पति को सत्य मार्ग में लाने के लिए कठोर भी हो सकती है । निराला के अनुसार नारी अबला मात्र न होकर ज्ञानदात्री है , गुरु है इतना ही नहीं वह साक्षात् लक्ष्मी और सरस्वती भी है । -
संकुचित , खोलती श्वेत पटल
बदली , कमला तिरती सुख जल
प्राची - दिगन्त - उर में पुष्कल रविरेखा
प्रायः नारी का गृहलक्ष्मी के रूप में वर्णन तो प्राचीन ही है , सरस्वती के रूप में नारी की यह प्रतिष्ठा नवीन है। नवीन इसलिए भी है कि निराला यहाँ सरस्वती और लक्ष्मी को समान महत्व देते हैं । एक सीमा पर दोनों को एक ही मानते हैं या फिर एक ही समान महत्व देते हैं । चतुरी चमार में उन्होंने एक स्थल पर स्पष्ट लिखा है । मेरा नाम सरस्वती है पर मैं सजकर जैसे लक्ष्मी बन गई हूँ ।१५ " सरस्वती और लक्ष्मी की यह अभेद दृष्टि तुलसीदास की उपर्युक्त पंक्तियों में अभिव्यक्त होती है , उससे आत्मा निर्मल हो जाती है । मनुष्य उसकी प्रेरणा से सत्कर्म की ओर उन्मुख हो सकता है । यहाँ निराला ने रत्नावली को ' श्रद्धा ' और ' ब्रिटायश ' के समान ही प्रेरणादायिनी रूप में चित्रित किया है । उन्होंने रत्नावली के अनछुए जीवनप्रसंगों को प्रस्तुत किया है । यह उनकी गहरी कल्पना और तीक्ष्ण अनुभूति को पकड़ सकने की शक्ति का परिणाम है ।
' निराला क्रान्ति के कवि हैं , उस क्रांति के , जिसका लक्ष्य भारत को विदेशी पराधीनता से मुक्त करना ही नहीं , जनता के सामाजिक जीवन में मौलिक परिवर्तन करना भी है । उसके लिए सांस्कृतिक जागरण ही कारगर सिद्ध हो सकता है । निराला के अनुसार सांस्कृतिक चेतना का अग्रदूत कवि ही हो सकता है क्योंकि यह निःसंग और मुक्त होता है । इसलिए निराला कवि जगत को सत्गान का संदेश देते हैं-
इस जग के मग के मुक्त प्राण
गाओ विहंग सद् ध्वनित गान
कवि देश की बिखरी हुई चेतना को अपनी कला में केन्द्रित करने की क्षमता रखता है । उसकी वाणी में राष्ट्र की एकता साकार होती है । तुलसीदास की वाणी में सचमुच ही राष्ट्र की शक्तियाँ संगठित हुई थी और तभी वे इतनी बड़ी आसुरी शक्ति से हिन्दू संस्कृति को बचा सके , भारत की महिमा मय ज्योतिर्धन की रक्षा कर सके । पुष्कल रेखाओं वाली इस सांस्कृतिक सूर्योदय को निराला ने जैसे समय के पहले ही देख लिया था , उन्होंने तभी इस महान रचना के माध्यम से , इस श्रेष्ठतम आख्यानक प्रगीत के माध्यम से राष्ट्र को उद्बोधित किया था-
जागो जागो आया प्रभात
बीती वह , बीती अंधरात
भरता भर ज्योतिर्मय प्रभात पूर्वांचल
बांधो बांधो किरणें चेतन
तेजस्वी है , तमजित जीवन
आती भारत की ज्योतिर्धन महिमा बल
संदर्भ-
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1. डॉ . रामविलास शर्मा निराला की साहित्य साधना ।
2. डॉ . प्रेमशंकर - हिन्दी स्वच्छंतावादी काव्य , पृ.क्रं . - 257
3. यश गुलाटी हिन्दी के श्रेष्ठ आख्यानक काव्य , पृ.क्र -534
4. आचार्य बाजपेई - कवि निराला , पृ . क्रं- ( 78-79 ) ।
5. डॉ . उदय भानुसिंह - तुलसी काव्य मीमांसा पृ.क्र -23 ।
6. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल - हिन्दी साहित्य का इतिहास पृ.क्र- ( 121-126 ) ।
7. वही
8. विनय पत्रिका - पृ.नं -24 विशेष 264 ।
9. निराला - तुलसीदास ( परिचय पृ . ] - 5 )
10. डॉ . प्रेमशंकर - हिन्दी स्वच्छन्दतावादी काव्य पृ.क्र -- 545 ।
11. आचार्य बाजपेई - कवि निराला पृ.क्रं -121 |
12. दूधनाथ सिंह - निराला आत्महंता आस्था ।
13. डॉ . पुत्तु लाल शुक्ल - हिन्दी में छंद योजना । 14. डॉ . रामविलास शर्मा - निराला की साहित्य साधना खंड -2 पृ.क्र -278 । 15. निराला - चतुरी चमार पृ.क्र -76 ।
प्रस्तुति:-बसन्त राघव, रायगढ़, छत्तीसगढ़
मो.नं. 8319939396
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