बचपन कहीं पीछे छूट गया (कविता)
बचपन कहीं पीछे छूट गया
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कंकरीट का जंगल शायद रास आ आया
कागज का गुलशन और भी पास आ गया
कमल तलैया, अमरैया स्वप्न हुए
मेरे गांव में बसने शहर आ गया
बचपन के सभी साथी लगते हैं पराए
कोई नहीं पूछता अब क्या हाल बताएं
चल देते हैं करीब से जैसे जानते नहीं
छुटपन की जिद्दी यादों को कैसे समझाएं
बचपन बहुत बहुत पीछे कहीं छूट गया
सपनों वाला इन्द्रधनुष भी, लो टूट गया
उसकी भोली सावली सूरत भूला नहीं हूँ
जीवन ही अब तो शायद हमसे रूठ गया
गोबर से लिपा पुता वह मिट्टी का आंगन
छुही पुती भित्तियों में गैरिक चित्र मन भावन
उन धूल धूसरित गलियों में कहीं खोया है
आज भी मेरा प्यारा सा नटखट बचपन
होती तेज दुपहरी में व्यस्त आवाजाही
तालाबों की ओर निकलते हम उत्साही
पीकी,ढेस,कमलगट्ट - चट करती टोली
खेल खेल में मचती -कितनी वहां तबाही
अमराई के पेड़ आज दे रहे गवाही
रखवालों की कब चलने दी तानाशाही
खट्टे मीठे आमों का वह रसिया बचपन
अक्सर आ जाता है अब देने गलबाहीं
अन्तहीन आपाधापी और शोरगुल के बीच
यादों की कोयलिया मिस्री घोल रही है
बसन्त राघव
पंचवटी नगर,कृषि फार्म रोड,बोईरदादर
रायगढ़, छत्तीसगढ़, मो.नं. 8319939396
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