सपनों की तलाश

सपनों की तलाश-(कहानी)
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बसन्त राघव

             मिस मोयना मिंज जब बस से उतरी तो उसे बड़ा अजीब सा लगा। नई जगह, नए लोग । सब कुछ नया और अनजाना था उसके लिए। कई अपरिचित निगाहें उसे घूर रही थीं । एक अनजाना भय उसके भीतर कुलबुलाने लगा। उसने अपना पल्ल्रू ठीक किया और कुली को सामान नीचे उतारने के लिए कह दिया । जैसे ही वह चलने के लिए तैयार हुई , एक सजीला नवजवान सामने आकर खड़ा हो गया । उसने झिझकते हुए कहा- " क्या आप ही मिस मोयना मिंज है ? ' 
     "जी हाँ , आपकी तारीफ़ ?"  मोयना मिंज ने ऐसे कहा जैसे वह बिलकुल सहज और बेधड़क हो । ... और उसने प्रश्न वाचक दृष्टि उस पर डाल दी । युवक की आँखों में एक चमक उठी, उसने किंचित मुस्कुरा कर कहा- मैं वेट्रिनरी फील्ड असिस्टेंट लक्ष्मीकांत मिश्रा हूँ । मि ०मिंज ने लिखा था कि आज आप शाम वाली बस से आ रही है । " 
      " बड़ी प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर " और उसने नमस्ते की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़ दिए। "पापा ने बताया था आपके बारे में, चलिए अच्छा है , कम से कम आप तो परिचित हैं यहाँ।" मिस मिंज ने कहा। 
               दोनो साथ-साथ ही चलने लगे । लगता था जैसे वे वर्षों से एक दूसरे को जानते हैं । बस स्टेंड से थोड़ी ही दूर पर लक्ष्मीकांत मिश्रा का क्वार्टर था । 

      शाम का  सांवला रंग फैल गया था। पानी गिरने के बाद आसमान स्वच्छ हो गया था। वातावरण में एक खास ताजगी फैल रही थी। हवा तेज चल रही थी जिससे मोयना को अपना आंचल बार बार संभालना पड़ता था । उसके घने काले बाल जो खास ढंग से कटे हुए थे ,  कन्धे पर स्वतः ही लहरा रहे थे । औपचारिक बातों के दौरान लक्ष्मीकांत, मोयना के लम्बे छरहरे, , कसे बदन को निहारकर कभी कभी बेचैनी महसूस करने लगता। 

       क्वार्टर का गेट खोलते हुए लक्ष्मीकांत ने कहा - " यह रहा हमारा डेरा । " मोयना ने अन्वेषक मुद्रा में पूरे कम्पाउन्ड को सरसरी निगाह से देखकर कहा - अच्छा है । क्या आप अकेले रहते हैं ? या ..... 

" जी हाँ, मेरे साथ और भी रहते हैं परन्तु ......" उसने
बात अधूरी छोड़ दी और अमृत  चपरासी को आवाज देकर बुलाया । उसे चाय नाश्ता के लिए कहकर, बत्ती जला दी। कुली जब सामान रखकर चला गया तब लक्ष्मीकांत ने अनौपचारिक ढंग से कहा-   मिस मिंज, उधर बाथरुम है , चाहे तो आप फ्रेश हो सकती हैं।"
              "जी धन्यवाद" 'मोयना ने लजाते हुए कहा और बाथरूम की ओर चली गई।
              कम्पाउन्ड बहुत ही बड़ा था- सामने चौरस मैदान के किनारे किनारे कचनार के पौधे उगे हुए थे। पशुओं को बांधने के लिए एक बहुत बड़ा हाल था , उसके सामने तीन कमरों वाला क्वार्टर जिसमें लक्ष्मीकांत रहता था। उसके पीछे अलग से एक और कमरा था जिसमें अमृत रहता था । 
              बाथरूम के भीतर वह लक्ष्मीकांत के बारे में ही सोचती रही ! उसका बातचीत करने का ढंग बड़ा ही निशच्छल लगा था उसे । उसके व्यक्तित्व में गंभीर ठहराव के बावजूद अभिजात्य सम्मोहन था । क्या वह अकेला ही रहता है यहाँ , या अपनी फेमिली के साथ?
            जब वह बाथरूम से निकल कर आई , शाम पूर्ण रुप से गहरा गई थी । वह यात्रा से बिलकुल थक गई थी। फ्रेश होने के बाद उसने बहुत ही हलकापन महसूस किया । 
        बरामदे में स्टूल के चारों तरफ चार गार्डन चेयर रखे हुए थे । सामने की ओर इशारा करते हुए लक्ष्मीकांत ने कहा - " बैठिए , मैं समझता हूँ इस लम्बी यात्रा से बेहद थक गई होंगी आप ! "  और लक्ष्मीकांत उसकी आखों में गहराई तक झाँकने लगा। मोयना बैठते हुए बेतकल्लुफी  से बोली- ' जी नहीं ऐसी कोई बात नहीं । " और उसने अपनी आँखों को इस तरह नचाया जैसे मुँह से नहीं बल्कि आँखों से यह कहा हो ।  "अरे हाँ , आपने बतलाया नहीं ; और बाकी लोग कहाँ है ? मेरा मतलब आपकी मिसेज- आपके बच्चे .... " 
           लक्ष्मीकांत खिलखिला कर हँस पड़ा । उसी समय अमृत ट्रे पर प्लेटों में  गाजर का हलुवा तथा पकौड़ी लेकर चला आया। लक्ष्मीकांत ने हंसते हुए अमृत की ओर इशारा करके कहा-" यही है मेरा बड़ा लड़का! एक और है इससे छोटा वो रहा- "  और उसने कोने में बंधे अलशेसियन  कुत्ते की ओर इशारा किया । मोयना को भी हँसी आ गई । अमृत मुस्कुराता हुआ चला गया । अमृत के चले जाने के बाद। लक्ष्मीकांत ने कहा- ' हमारे परिवार में एक और सदस्य है- अमृत की पत्नी सोना , जो बस्ती गई है आती ही होगी । " 
        लक्ष्मीकांत कुछ देर तक मोयना को देखता रहा फिर बोला- वैसे मिस मिंज ये रिश्ते जो मैंने आपको बताए, प्रतिवर्ती है , स्थायी नहीं । "      
        क्या मतलब! हथेलियों पर ठुड्डी रखते हुए  मोयना  बोली।  मतलब ये कि ......" लक्ष्मीकांत कह रहा था " रात को यह टीपू ( कुत्ते का नाम ) मेरा रक्षक हो जाता है । और जब कभी मैं अकेला और उदास हो जाता हूँ अमृत और सोना मेरे मां - बाप हो जाया करते हैं । " 
             ' बड़ा विचित्र परिवार है आपका । खासकर ये रिश्ते जो परिवर्तनीय हैं। " मोयना ने कहा। मोयना ने महसूस   किया - बाहर से इतनी प्रफुल्लित दिखने वाले लक्ष्मीकांत की आँखों में एकाकीपन की छाया तैरने लगी है ।
   .......      ........
                           वर्तमान में  मोयना मिंज के पिता मि॰ मिंज रिटायर्ड हो चुके थे । सात साल पहले जब वह अकलतरा में डी. एल.ओ. (विभागीय संपर्क अधिकारी) थे, लक्ष्मीकांत मिश्रा उनके मातहत के रूप में साल भर काम कर चुका था । मि०मिंज ने कभी भी आफिसर होने का रौब नहीं दिखाया, बल्कि अग्रज का घुलनशील स्नेह ही दिया । उनके रिटायर्ड होने के दो साल बाद लक्ष्मीकांत ट्रांसफर होकर रामपुर आ गये थे।  और जब मि. मिंज की एकमात्र पुत्री मोयना का रामपुर कन्या शाला में पोस्टिंग हुई तो उन्होंने सबसे पहले लक्ष्मीकांत मिश्रा को पत्र लिखा कि उनकी लाड़ली बेटी मोयना 28 जून की शाम रामपुर पहुंच रही है । उसके रहने की व्यवस्था और उसकी सुरक्षा का भार लक्ष्मीकांत पर है ।  
        लक्ष्मीकांत ने जब पत्र पढ़ा , उसे एक अजीबो गरीब जिम्मेदारी का भान हुआ । सर्वथा अकल्पित । 28 तारीख की शाम जब वह बस स्टैंड पहुंचा तो उसने एक नवयुवती को बस से नीचे उतरते हुए देखा, उसका दिल जोरों से धड़कने लगा था । उसे समझ में ही नहीं आया कि वह क्या करे। और  इसी मनःस्थिति में उसने जाकर पूछ लिया था- " क्या आप ही मिस मिंज हैं ? 
                       रात्रि के भोजन के बाद जब सोना ने लक्ष्मीकांत से पूछा-" क्या  मेम साहब के लिए बगल के कमरे में विस्तर लगा दूँ!,"  तो दोनों ने एक दूसरे की अर्थपूर्ण निगाह से देखा था । और लक्ष्मीकांत ने  पास जाकर धीरे से 'हाँ' कह दिया था । उस समय भी उसे हलकी सी झुरझुरी हुई थी। मोयना जो आधुनिक विचारों के होने के बावजूद उस निहायत ही संकुचित पल में जब लक्ष्मीकांत ने उतनी ही संकुचित 'हाँ' कही तो उसके कौमार्य के प्रस्तर शिला पर सिहरन की अनेक लकीरे दौड़ गई । 
                   इधर उधर की बातचीत करते दस बज गए।  उनके वर्तमान से लगा हुआ ताजा अतीत एक बार पुनः फ्लैश बैक की तरह सामने घूम गया । बर्तन मांजकर चूल्हा चौका करने के बाद पैंतीस वर्षीया निःसंतान सोना अपने रुखे हाथ से मोयना की हाथ पकड़ कर बोली चलिए बहिन जी , आपका बिस्तर लग गया। साहब को तो रतजगा करने की आदत है । आप थकी मांदी है "। मोयना इंकार नहीं कर सकी और एक आज्ञाकारी बच्ची की तरह उठ खड़ी हुई । 
       उसकी आँखें कसक रही थी । तथा मुरुम दार  सड़क के बार बार के घचकों से उसका सारा जिस्म टूट रहा था । उसने सफेद रंग के  गाऊन डाले और बिस्तर पर पड़ गई । देर रात तक विचारों की उहापोह में उलझी रही । वह करवट बदलती रही और ममतामयी सोना के रूखे हाथ उसके माथे का दर्द सोखते रहें । और कब वह सो गई, उसे याद ही न रहा।
        मर्करी का हलका नीला प्रकाश बाहर फैला हुआ था । हलका हलका झोंका भीतर आकर मोयना के स्वप्न चित्रों को उत्कम्पित करने लगा था । आने वाली जो भी सुबह होगी वह अत्यन्त रोमांचकारी तथा आशामयी होगी ।
                अल सुबह उसकी आंख खुली। बगल में कीचन से बर्तनों की आवाज आ रही थी । वह बिस्तर पर अंगड़ाई लेकर बैठ गई । वह सोचने लगी- जिंदगी आदमी को कहाँ से कहाँ ले आती है । जिंदगी न जाने  किस पल किससे मिला दे , किस पल जुदा कर दे ... बड़ी अजीब है जिंदगी। वह तन्मयता से सोच रही थी उसी समय सोना चाय लेकर आ गई । " बहिन जी चाय ! तबियत तो ठीक है न ! रात आप ठीक से सो नहीं सकी । शायद हाथ पैर के दर्द की वजह से...... ' 
       माथे पर से बाल हटाकर मोयना ने चाय का कप हाथो में ले लिया और चाय पीते हुए बोली- ' दर्द तो जरूर था सोना परन्तु सारा दर्द तो तुमने ले लिया । मुझे तो कुछ भी याद नहीं -कब सोई। " मोयना को याद आ रहे थे लक्ष्मीकांत के शब्द ' वैसे हमारे रिश्ते परवर्ती हैं - जब मैं नितान्त अकेला और उदास होता हूं यहीं सोना और अमृत मेरे मां - बाप हो जाया करते हैं
                   स्टूल पर कप रखने के बाद उसने सोना का हाथ थामकर असीम मौन कृतज्ञता ज्ञापित की - सोना , तुम सचमुच सोना हो, इतनी सुबह चाय भी पिला दी ..... ' । सोना मुस्कुरा दी । वह पैंतीस की नहीं पच्चीस की दीखने लगी। वह निःसन्तान है न ? सब पर अपनी ममता छलका देती है । किसी का दु:ख - दर्द सब ले लेती है वह । कितनी आकुल है उसके अंतर की माँ ! 
          सोना जब लौट रही थी , बाहर लक्ष्मीकांत ने पूछ लिया 'क्या मेम साहब जाग  गई?"
     'हाँ'
"इतनी सुबह ? "

        'इसमें अचरज की क्या बात है साहब ? सोना ने हलकी सी चुटकी ली । और लक्ष्मीकांत के लिए चाय लाने चली गई। लक्ष्मीकांत ने सोचा भीतर जाकर मोयना से ' हलो ' कर ले परंतु कुछ सोचकर बाहर चहल कदमी करने लगा। वही पुरानी झिझक - जब वह कालेज में पढ़ता था तब भी लड़कियों से बात करने में उसने पहल कभी न की । और आज जब एक लड़की उसकी  मेहमान है - तब भी वही झिझक जिससे वह नियंत्रित है ।
          कदमों की आहट पाकर मोयना  बाहर निकल आई, देखा लक्ष्मीकांत दरवाजे के पास खड़ा है । दोनों की आँखें मिली और झुक गई । पूरब आकाश में ऊषा की लाली और भी सुर्ख हो गई । 
        ' गुड मार्निंग लक्ष्मीकांत साहब"  मोयना ने कहा ।
    " गुड मार्निंग " लक्ष्मीकांत ने प्रत्युत्तर में कहा । " 
     "कहाँ चले गए थे इतनी सुबह ?" 
    " मॉर्निंग वाक की आदत है मोयना जी , भोर में अकेला घूमना - न जाने क्यों मुझे बहुत अच्छा लगता है । "बेशक " मोयना ने समर्थन किया । उसने तौलिए से अपना वक्ष ढका और कहा - ' परन्तु एक बात है लक्ष्मीकांत साहब ,  लक्ष्मीकांत की दृष्टि उठी और मोयना के अक्स पर स्थिर हो गई।   
 "क्या"
  मोयना ने कहा -
 " यही कि आपको चित्रकार या कवि होना चाहिए था - क्या नहीं ? ... " और वह खिलखिला कर हँस पड़ी - निर्मल मोती की तरह हँसी । लक्ष्मीकांत ने तब पहली बार महसूस किया - उसके चारों ओर आदर्श , उसूलों और मान्यताओं के आवरण कट कटकर गिरने लगे हैं । 
....
                           उसी दिन मोयना मिंज ने रामपुर कन्या शाला में सहायक अध्यापिका का चार्ज ले लिया ।  सब तरफ एक ही चर्चा -नई मास्टरनी आई है -
पान दुकान में -
        'क्या चीज है गुरु , हाय ! कसम ख़ुदा की ! I ' हूर है हूर । 
      " वाकई यार , ऐसा चेहरा तो इस गांव में नहीं किसी का । सचमुच कयामत है ।'
     "पर यार यह लक्ष्मीकांत मिश्रा कैसे फांस लिया उस परी को?"
घाट में-
         अरी बहू , देख लेना यह कलमुई इस गांव को बिगाड़ेगी । कुलच्छनी........"
            "अरी माई , ऐसों का तो जमाना है"।  हमारा जीवन कोई जीवन है। दिन भर चूल्हा फूँको उस पर मर्द की  गुलामी। धुँआ धुँआ धुँआ। 

    ' क्या बात करे है , बहू , राम राम । स्त्री तो चहार- दीवारी में शोभा पाती है । इस तरह शरम लाज बेचकर पराए मर्द के साथ उठना बैठना क्या अच्छा है ? राम - राम क्या जमाना आ गया ।'
 चौपाल में - - 
    हुक्के की गड़गड़ाहट - खांसी - खं खं खं " भई लड़की है तो इसाई। उनके धरम में सब माफ है पर उस ब्राह्मण छोकरे को तो देखो | खान पान जात विरादरी सब ताख में रख गया। " 
   ' अरे छोड़ो चाचा जमाना कहाँ चला गया । लोग चंद्रलोक पहुंच रहे हैं और आप है कि जात विरादरी लेकर बैठ गए ! " 
    चर्चा कहीं भी हो , कहीं से शुरू हो घूम फिर कर लक्ष्मीकांत और मोयना पर आकर खत्म हो जाती ।
         भले ही मोयना अब तक शहर में ही रही है परन्तु फिर भी कस्बा नुमा छोटे शहर की सीमाओं का ज्ञान था उसे । तत्काल मकान की व्यवस्था न हो सकी अत: फिलहाल , मोयना वहीं रहने लगी । मजबूरी थी । और लोग थे कि उस मजबूरी को प्रेमगाथा का रूप देकर ले उड़े ।
                 एक दिन- दो दिन - तीन दिन लक्ष्मीकांत और मोयना कहीं पर खुल गए , कहीं पर बंध गए । आदर्श और इच्छा के बीच एक रास्ता निकल गया था -  मित्रता का आदर्श , जो रक्षक है । इच्छा , जो आग पी लेना चाहती है । जब भी मन करता लक्ष्मीकांत मोयना की तस्वीर बनाने की कोशिश करता, मोयना कुछ दूर बैठी कनखियों से देख लेती, और  हथेलियों को घुटनों के बीच ले जाकर आपस में रगड़ने लगती।
                महीने दिन बाद जब वह ( मोयना ) स्कूल से  वापस आ रही थी। प्रधानाध्यापिका श्रीमती इन्दु वर्मा ने एक ओर बुलाकर कहा- "मोयना , एक बात कहूंगी तुझसे  "अगर तुम बुरा न मानो तो " .....मोयना चुपचाप उसके चेहरे पर अटकी ऐनक को देखती रही- जैसे वह जानती हो इन्दु क्या कहने जा रही है । इन्दु ने कहा-   " मोयना , तुम एक अलग कमरा क्यों नहीं ले लेती ! बुरा न मानना , एक टीचर को अपनी प्रेस्टीज का खयाल रखना पड़ता  है.......जमाना  खराब चल रहा है मेरी बहन ! अकेली जान औरत के लिए बाहर रहना  कितना मुश्किल है ।" इन्दु वर्मा की आखें दूर कही शून्य में खो गई । 
     " दो तीन जगह देखी है बड़ी दी , कहीं मकान  अच्छा  है तो मोहल्ला अच्छा नहीं और कही मोहल्ला अच्छा है तो मकान अच्छा नहीं है  खैर एक दो दिन  में कहीं न कहीं इंतजाम हो जाएगा । " मोयना के स्वर में आक्रोश था , विवशता थी।
           इन्दु वर्मा कुछ देर तक शून्य को घूरती रही फिर जैसे कुछ भूली हुई बात याद आ गई , उसने कहा " क्या तुम मेरे यहाँ सेट नहीं हो सकती मोयना ! है तो मिट्टी का मकान जगह बड़ी अच्छी है । " 
            " वह तो सब ठीक है बड़ी दी, परन्तु मेरे आने के बाद आप लोगों के लिए छोटा पड़ जाएगा । " मोयना नहीं चाहती कि वह किसी के एहसान में रहे । हमेशा एक दबाव सा महसूस करेगी वह । परन्तु दूसरी तरफ मोयना यह भी सोचने लगी ;  इससे अच्छा सुरक्षित स्थान उसे और कहीं मिल नहीं सकता । इन्दु साथ रहेगी जो हमेशा उसके अड़चनों का खयाल रख सकती है । मोयना पशोपेश में पड़ गई ।
       'अरे नहीं , तुम इसकी चिन्ता मत करो। तो सुबह आ रही हो न ! " 
     " जी , बहुत बहुत शुक्रिया । आपने मेरी बहुत बड़ी समस्या हल कर दी । "    मोयना के चेहरे पर आभार प्रदर्शन में भाव स्पष्ट लिखे थे। 
                    और जब वह स्कूल से लौटी तो उसकी मनःस्थिति बड़ी अजीब थी । पहली बार उसने महसूस किया- काश कि वह लड़का होती । लक्ष्मीकांत के क्वार्टर से स्कूल तक और स्कूल से लक्ष्मीकांत के क्वार्टर तक आते जाते कितना कुछ सुनना पड़ता है उसे-  अनोखे टिप्पणियों से ! कितनी भूखी नजरों को बर्दाश्त करना पड़ता है उसे ......
            अमृत पौधों को पानी सींच रहा था और सोना कीचन में  व्यस्त थी। मोयना को दरवाजे पर खड़ी देखकर , वह बोली -" अरे , कबसे खड़ी हैं, आप? मैं तो देख ही नहीं पाई । "
        मोयना खिलखिला कर हँस दी। दाहिने हाथ की कलाई में पर्स झूल रहा था । उसने कहा-' अरी मेरी सोना रानी , मैं तो यह देख रही थी कि काम के सिवाय तुझे दीन दुनिया की खबर है या नहीं ! "
          "दीन दुनिया हमारी खबर कहाँ रखती है बहिन जी, जो हम उसकी खबर रखें ।"    एक उड़ती नजर से सोना ने मोयना को देखा और आलू की चक्तियों को बेसन के घोल में डुबाकर तेल की कड़ाही में डाल दिया । मोयना को लगा जैसे सोना भीतर से अत्यन्त दुखी है । उसकी आँखों का गीलापन धुंवे की वजह से था या अन्तर की पीड़ा की वजह से -  वह समझ न सकी । उसने पास आकर कहा -" क्या बात है सोना , क्या किसी से झगड़ा हो गया?"
              " नहीं " ऐसी कोई बात नहीं बहिन जी,....  दरअसल यह गप्पू की जो औरत है न ...  आपके बारे में कुछ ऐसी वैसी बोल रही थी । सहन नहीं हुआ मुझसे। खरी खोटी सुनाकर मैं चली आई "।
       "तो तुम्हें उलझने की क्या जरूरत सोना , लोगो को अपना कम औरों का ख्याल अधिक होता है । "
       "अच्छा एक सलाह तुझसे लेना है सोना ! मैं कल यहाँ से चल देना चाहती हूँ । " 
     सोना अनसमझी मोयना को देखती रही । मोयना कह रही थी - " अपनी जो हेड मास्टरनी इन्दु वर्मा है न , उनके साथ रहने का प्रबन्ध किया है ।... वहाँ से स्कूल नजदीक भी है। ......सोचती हूँ कल सामान वगैरह भिजवा दूंगी। सिर पर तुम्हारा बहुत बड़ा एहसान रहेगा सोना ! " 
     सोना की आखें तरल होने लगी । वह निष्कम्प खड़ी देखती रही हाथ- मस्तिष्क और पलकें जैसे अपना अपना काम बंद कर दिए। 
                  कुछ देर तक वातावरण उदास बना रहा। सिर्फ स्टोव की आवाज फर्र फर्र ...जैसे समय की गति का अहसास दिला रही थी । सोना ने आखें पोंछ ली और कहा " हम तो मुरख गंवार है बहिन जी , आपको क्या समझाएं "
                               " क्या रूठ गई सोना ! आखिर रहूंगी तो इसी रामपुर में न , वहाँ सब चीज की सुविधा है ......सिवाय , सुबह शाम तुम्हारे हाथ की चाय के........" और वह स्वयं रुँआसा हो गई। 
          उस दिन मोयना का मन उचट गया था उससे कुछ खाया भी न गया । उसे बिमार पिता याद आ रहे थे। उसकी हिदायतें याद आ रही थीं - "बेटे , जब  मकान की व्यवस्था न हो , लक्ष्मीकांत के क्वार्टर में रह लेना । मुझे पता है कि वह एक सज्जन व्यक्ति है ,..... मैने उसे लिख दिया है ।"
                   " काश कि पापा नजदीक होते तो वह कहती-  ' पापा लक्ष्मीकांत मिश्रा  कितना ही अच्छा व्यक्ति क्यों न हो मेरा उसके साथ रहना समाज के लिए घोर आपत्ति जनक है।  समाज के पास इतना वक्त नहीं कि व्यक्ति के साथ साथ उसकी अच्छाइयों को समझ सके..... लक्ष्मीकांत के लिए शायद विवाहित होना जरूरी था - उसके (मोयना) के लिए विवाहित होना जरूरी है । वर्ना ये लोग , न जाने क्या समझ बैठें। वह जोरों से हाँफ रही थी । उसे लगा जैसे रगों में रक्त की  ऊष्ण धारा वेगमती  हो गई है । शब्द अन्तःकरण के द्वार खोल कंठ तक चढ़ गए हैं ।
            .सोना गिलास थामे उसे एकटक देख रही थी  मौन , प्रश्नयुक्त ।
        "सोना , सोना ! क्या मैं कुछ बोल रही थी? क्या तुमने सुना?'" उसने अपना माथा थाम लिया "ओह , सोना मुझे ले चलो भीतर, मुझे चक्कर सा आ रहा है । ..........
     लक्ष्मीकांत कब आया उसे कुछ ज्ञात नहीं । जब दीवाल घड़ी ने ग्यारह बजाए तो उसकी नींद टूट गई । उसने महसूस किया उसके माथे पर किसी ने हाथ रखा हुआ है - निहायत ही अपरिचित हाथ । उसने आंख खोलनी चाही तो माथे की नस तड़क उठी। उसे लगा जैसे लक्ष्मीकांत सिरहाने झुका हुआ है। उसे चारों तरफ लक्ष्मीकांत ही लक्ष्मीकांत दिखाई दिया । 'हे प्रभु'  वह  कराह उठी। लक्ष्मीकांत कह रहा था -"तबियत कैसी है मिस मोयना" - उसने( मोयना ने)आँखें मूंद ली । भीतर उसकी चेतना सक्रिय हो उठी - क्या हो गया है उसे ? लक्ष्मीकांत कह रहा था-  ' अमृत , माथे की पट्टी सूख गई है - बदल देना ","सोना , एक घन्टे के बाद दूसरी गोली भी खिला देना। मोयना का  अन्तःकरण कह रहा था - लक्ष्मीकांत जी, आप परेशान न हों- " मैं ठीक हूँ- आप सो जाइए........ मैं आह! 
........
       पांच दिन - छः दिन सात दिन- एक सप्ताह-  एक माह । कुछ और दिन बीत गए । कितनी रफ्तार से समय भाग रहा है । इन्दु वर्मा के साथ सेट हुए, मोयना को करीब एक माह हो गया था । शुरू शुरू में सोना सुबह केतली में चाय लेकर आती थी परंतु इन्दु ने उसे मना कर दिया । यही नहीं उसे कूटनी कह कर अपमानित भी किया । और तब से सोना ने वहाँ आना बंद कर दिया था।
      इन्दु वर्मा बड़ी दुनियादार औरत निकली तीन हजार रूपए में उसने पूरा मकान किराए पर लिया था, परन्तु मोयना से दो हजार रुपये माहवार वसूल कर लेती थी । इस एवज में उसे एक कमरा और उससे लगा हुआ रसोई घर दे दिया था बाकी लेट्रीन और बाथरूम कम्बाइंड ।
      इन्दु वर्मा का पति सुबोध साथ ही रहता था उसने किसी तरह से आर.एम.पी. की डिग्री हासिल कर ली थी । हालाकि रामपुर में शासकीय हस्पताल था फिर भी आसपास के देहातों से लोग भूले भटके इलाज करवाने के लिए उसके पास चले आते थे । इसतरह सुबोध गृहस्थी की गाड़ी खींचने में मदद कर दिया करता था । बड़ी लड़की मामा के घर रहकर शहर के कॉलेज में पढ़ती थी । दो छोटी लड़कियाँ और एक लड़का ( जो सबसे छोटा था ) इनके साथ रहते थे ।    
          मोयना धीरे धीरे इस वर्मा परिवार से कटने लगी थी । क्योंकि उसने जब भी सहानुभूति दिखाई इन्दु ने उसका फायदा उठाया है । एक दिन बड़ा हंगामा हो गया ।  हुआ यह कि सुबोध पास किसी गांव के ननकू बरेठ के छोटे लड़के का इलाज कर रहा था। महीना बीत गया लड़का की बीमारी कम होने के बजाय बढ़ गई । हारकर उसने जो इन्जेक्शन लगाया। बदकिस्मती से बच्चे की हालत और भी गंभीर हो गई जिस बाह में इन्जेक्शन लगा था वह अचानक सूज गया तथा बाद में घाव हो गया। शायद इंजेक्शन की ठीक से सफाई नहीं की गई थी जिससे इंजेक्शन विसंक्रमित हो गया था  -  ननकू सबको अपना दुखड़ा सुनाने लगा । रामपुर के कुछ हिप्पी नुमा लड़के जो कालेज की हवा खाकर  आए हुए थे और जो बेरोजगारी की वजह से बागी बने बैठे थे । वे ऐसे मौको की ताक में रहते थे कि  किसी सरकारी कर्मचारी की कोई पोल खुले और वे उससे दो - चार हजार ऐंठ कर कुछ दिन मौज मस्ती कर लेते थे । सुबोध की खोज खबर करने लगे। जिसकी भनक सुबोध को लग गई अतः वह  बाहर निकलना बंद कर दिया । 
      एक दिन- दो दिन -  आखिर तीसरे दिन शाम के वक्त चार - पांच लड़के दनदनाते हुए इन्दु वर्मा के घर पहुंच गए । मोयना का कमरा शुरू में पड़ता था । मोयना ने उनको आते देखा तो उसके होश उड़ गए।  न जाने कौन सा गुल खिलाते हैं ये लड़के । इन्दु अंदर आटा  गूंथ रही थी उसे पता नहीं था कि जमदूत आ गए हैं।  मोयना के पास पहुंचकर सबने एक  स्वर में कहा - 'बहिन जी नमस्ते ' मोयना ने सकपकाहट में दोनों  हाथ जोड़ दिए । एक लड़का मोयना के बिलकुल करीब आकर बोला- ' ईशु की कसम खाकर बतलाइए बहन जी , स्साला डाक्टर ( सुबोध ) घर के भीतर छुपा है न? " मोयना दुविधा में पड़ गई - ' ईशु की कसम " उसके होठों में रहस्यपूर्ण मुस्कान खींच गई । लड़के चालाक थे , समझ गए ।  वे आंगन में चले आए और चिल्लाने लगे- "अबे ओ डॉक्टर के दुम , निकल साले बाहर। औरत जैसे भीतर छुपा है।"
             इन्दु को खुसर - फुसर की आवाज पहले से सुनाई पड़ गई थी अत: उसने बड़ी चालाकी से अपने  खसम के ऊपर रजाई और कपड़ो के गठ्ठे रख दिए और अंदर से डरी हुई परन्तु बाहर से हौसला लिए सामने आ खड़ी हुई " क्यों भई , क्या बात है!  क्यों चिल्ला रहे हैं आप लोग।"
          " एक मनचले ने धीरे से कहा- " मुटल्ली " और समवेत स्वर में हंसी का फव्वारा फूट पड़ा । दूसरे ने कहा - "हम  डाक्टर से मिलना चाहते हैं- कहाँ छुपाया है ? " 
                       तीसरे ने कहा "यार देखता नहीं , पेट फूला हुआ है । " हँसी के एक और दौर । मोयना बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोके रखी।
               " क्या चाहते हैं आप लोग " इन्दु ने विवश होकर कहा। 
             " आपके पति का दर्शन " चौथे लड़के ने इस तरह अपनी मुद्रा बनाई जैसे वह मंदिर में खड़ा हो । 
             "या विदागरी पांच सौ के दहले की " समवेत स्वर ! "      
            "क्या ? " इन्दु आक्रोश और विवशता के चरम में पहुंच गई थी । वह नागिन की तरह फुँफकारते हुए मोयना के पास आई- " मोयना , क्या तुम्हारे पास पैसे होंगे ? इन कमीनों के मुंह में थूकना है।" गुस्से में  नथुने फड़क रहे थे तथा होंठ भींच गए थे । 
       'कितने चाहिए बड़ी दी ?'
      " सुना नहीं, कमीनों ने पांच सौ के दहले की मांग की है- यानी पांच हजार रुपये......अगले महीने लौटा दूंगी तुझे ... 
          लड़के लौट गए प्रसन्न चित्त जैसे उनको एपाइन्टमेन्ट लेटर मिल गए हों । अगला महीना भी जल्दी आ गया परन्तु रुपयों की वापसी नहीं हुई। मोयना को उसकी आशा भी नहीं थी । 
........
         मोयना ने अब सहानुभूति जताना छोड़ दिया था । बाथरूम में साबुन छोड़ना भी बंद कर दिया था । अब वह इस फिराक में रहती कि अगर कोई अच्छा मकान मिले तो इन्दु वाले मकान को छोड़ दे । मारवाड़ी मुहल्ला में त्रिलोकी का मकान खाली होने वाला था जिसमें हरिदेव  कम्पाउंडर रहता था और जिसका अन्यत्र ट्रान्सफर हो गया था ।
                         एक दिन मोयना सोना को लेकर त्रिलोकी  की बहू से मकान के बारे में बात तय कर आयी। 
           चलते चलते यह बात इन्दु वर्मा के कान तक पहुंची । थोड़ी देर के लिए वह विचलित सी हो गई। अगर वह चली गई तो मकान का पूरा किराया उसे हर महीना फिर से देना पड़ेगा । उसने सोच लिया , किसी तरह से त्रिलोकी की बहू को समझाएगी वह ।
             उसी दिन शाम को स्कूल से लौटकर सीधे त्रिलोकी के घर पहुंची । भाग्यवश त्रिलोकी  बाजार गया हुआ था , बहू अकेली थी । अत : बातचीत बेरोक टोक चलने लगी- कई घरों के कलह प्रसंग - चौधरी घरानो की लड़कियों की चारित्रिक मीनमेख के बीच त्रिया चरित्र में निष्णात इन्दु ने मोयना का प्रसंग,  कपड़े में पैबन्द की तरह ला घुसेड़ा - " सुना है बाई जी ( मोयना ) तुम्हारे मकान में आने वाली है ? जरा संभाल के रखियो अपने घर वाले को हाँ , बड़ी नखरे बाज है बहना ! मैं तो तंग आ गई हूँ उस जादूगरनी से ।"
       इंदु ने हाथों को इस तरह  से झटका दिया गोया सुनने वाले के मन में रत्ती भर सन्देह की गुंजाइश न रहे। 
            त्रिलोकी की बहू पर इन्दु का जादू चल गया-  "हाय दईया , मन्ने तो बात पक्की कर ली मास्टरनी जी,अब क्या हो?"
    "अरे तो इसमें  क्या फर्क पड़े हे त्रिलोकी की बहू , साफ साफ कह देना -- ' माफ करना बहिनजी आपसे पहले कोई जन उनसे बात पक्की कर गए हैं-   मकान खाली नहीं है '.... खतम मामला"।
      ' हूँ समझी , ऐसा ही बोलूंगी । यह तो अच्छा हुआ कि वक्त के पहले हमें पता चल गया वर्ना .. अच्छा आप तनिक बैठो मैं आपके लिए चाय ले आती हूँ । " 
      इन्दु मन से मुस्कुराती रही । इस बार सुबोध का दवाखाना  पूर्ववत चल निकला था । ननकू बरेठ का लड़का शासकीय हस्पताल में भर्ती कर दिया गया था , उसका स्वास्थ्य में भी सुधार होने लगा था। सुबोध अब पांव फूक फूक कर रखता था । परन्तु इन्दु के मन में यह बात  बैठ गई थी कि उस दिन मोयना ने ही लड़कों को उसके मर्द की मौजूदगी का राज बताया था । अतः प्रतिशोध भावना ने मोयना के  प्रति उसे कटु बना दिया था । इन्दु अपने पति के मन में भी मोयना के लिए कटुता भरने लगी । बाहर से तो सुबोध इन्दु की हाँ में हाँ मिला देता था परंतु भीतर से उसे गाली देता था । वह नहीं चाहता था कि मोयना अन्यत्र जावे ! इन्दु भी नहीं चाहती थी कि मोयना मकान छोड़ दे और इस दृष्टि से दोनों के विचार मिलते थे !  दोनों के दृष्टिकोण मोयना को लेकर स्वार्थपूर्ण थे। परन्तु दोनों के स्वार्थों में अंतर था- इन्दु का स्वार्थ आर्थिक था वहीं , सुबोध का स्वार्थ शारिरिक ! मोयना जबसे इस मकान में आई है सुबोध का इगो (अहं) मोयना के शारीरिक आकर्षण से बंधा चला आया है परंतु वह इन्दु से बहुत घबराता भी था-  जबरदस्त औरत है इन्दु ! इसके बावजूद उसकी निगाह से बचते हुए अपनी चोर निगाहों से मोयना के रूप की चोरी करते हुए वह हमेशा सावधानी बरतता । उसे लगता जैसे बदसूरत और बेस्वाद के बीच सौन्दर्य का कमल खिल गया है । सिर्फ यही नहीं जब कभी भी उसने पति का कर्तव्य निबाहा है हमेशा यह मानकर कि नीचे इन्दु का थुलथुल शरीर नहीं बल्कि मोयना का शरीर है- कसा हुआ गदराया हुआ ।
       डाँ. सुबोध आर.एम.पी. की कुन्ठा अब  घनीभूत होकर बरसना चाहती थी- समय की तलाश थी परंतु समय जैसे सुबोध को छलने लगा था । इन्दु की चौकस निगाहें सुबोध की कामना का बार बार रास्ता रोक देती । सुबोध की यह चाहत उतनी ही एक तरफा थी जितनी कि चकोर की चांद के लिए......    
           और एक रात पास में देहात से कोई आदमी उसे लेने आया। शायद उसका बच्चा बीमार था ! 
                                   देर रात वह देहात से लौटा। लौटते वक्त उसने शराब पी ली।  कहते हैं , शराब पीने के बाद शर्मो हया और डर के बंधन खुले जाते हैं । आदमी बुलन्दी पर पहुंच जाता है और किसी भी तरह के दुष्कर कार्य वह कर सकता है - शराब करा सकती है - सुबोध भी शायद यह जानता था। परंतु शराब पीने के बाद भी उसके होशो हवास दुरुस्त थे । हाँ, विवेक कुछ कुछ बहकने लगा था। 
           रात आधी से अधिक जा चुकी थी और इन्दु बेसुध सोई हुई थी । उसे क्या  पता था पति ने पेरासिटामोल (दर्द की दवा) जगह नींद की गोली खिला दी थी । अतः बेखटके उसने दरवाजे पर दस्तक दी - ' सिब्बू की माँ सिब्बू की  माँ ......सिब्बू की......'
       मोयना की नींद टूट गई । पहले तो झुंझलाकर वह चारपाई पर उठ बैठी । वह इस इंतजार  में थी कि इन्दु दरवाजा खोलेगी परंतु इन्दु नहीं उठी । ' सिब्बू की माँ .....खट.. खट '     दूर कही कुत्ते ने भौंका और चुप हो गया।  सन्नाटा क्रोधित हो उठा । मोयना  ने टेबल  घड़ी पर नजर डाली , एक बजा था ।।  "ओह , क्या मजाक है । " उसने बुदबुदाया । अपने कपड़े ठीक किए और जाकर दरवाजा खोल दिया । टूटी नींद के कारण वह आँखें मलने लगी थी अतः सुबोध के लार युक्त अधरों की , अर्थपूर्ण मुस्कान वह देख नहीं पाई । 
        "अरे मोयना तुम " माफ करना भई , खामखां तकलीक हुई तुम्हें... सिब्बू की माँ नहीं उठी.... ही ही ही ... क्या कुम्भकरण की नींद सोती है।......" 
        "कोई बात नहीं " भाई साहब , शायद देर से सोई होगीं...... शाम को कह रही थी , तबियत कुछ ठीक नहीं ... " वह लौटने लगी । गलियारें में जीरो पावर के बल्ब का मटमैला प्रकाश फैला हुआ था जो सुबोध की आंख में चुभने लगा । आंगन के आधेभाग में प्रकाश पसरा हुआ था । मोयना अलसायी हुई चल रही थी और पीछे पीछे सुबोध , कूल्हों के गत्यात्मक आकर्षण में खींचता हुआ। मोयना जैसे ही अपने कमरे की ओर मुड़ी सुबोध का विवेक साथ छोड़ गया। सुबोध दो कदम बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया । मोयना का सारा शरीर कांप गया । उसने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो सुबोध ने पूरी तरह से बाहुपाश में जकड़ लिया । वह कसमसाने लगी । उसे लगा जैसे वह स्वप्न देख रही है परंतु ज्यों ही सुबोध के मुह से शराब का तेज भभका आया और मोयना के घ्राण को उद्वेलित कर दिया  तब मोयना के स्वप्न का भ्रम टूट गया । वह छटपटाने  लगी और थक गई । उसने थूक दिया सुबोध के चेहरे पर " घोखेबाज , छोड़ दे वर्ना , चिल्लाकर सारा मुहल्ला जगा दूंगी मक्कार,नीच..... वह फिर प्रयत्नशील हो उठी ।       
                             एक बार मोयना , सिर्फ एक बार ....... मुझ पर तरस ...." और मोयना ने एक करारा थप्पड़ उसके गाल पर जड़ दिया । सुबोध बिलबिला कर परे हट गया.......और मोयना सहसा दौड़कर अपने कमरे में चली आई और दरवाजा बंद कर दिया । वह हांफने लगी थी । वह बिस्तर पर कटे हुए पेड़ की तरह गिर गई । उसने नसों को ढीला छोड़ दिया । वह फफक फफक कर रो रही थी। रुलाई में सारा शरीर हिल रहा था ।
          वे क्षण - कितने रोमांचकारी क्षण थे उसके जीवन के। आज वह कितनी बेबस , कितनी अकेली रह गई है कि कोई भी अब उसकी इज्जत पर डाका डाल सकता है । उसका सारा अस्तित्व जैसे डूबने लगा था । वह सोचने लगी , क्या सचमुच वह असुरक्षित है ? क्या नौकरी छोड़कर वह वापस चली जाय ! क्या वृद्ध पिता के पेन्शन में वह भी गुजारा करे?  किस बल से वह यहाँ आई है , कौन सा मुह लेकर वह वापस जाकर कहेगी-  ' पापा , मैं हार गई । मैंने नौकरी छोड़ दी है पापा'  कितनी बार पापा ने कहा था - ' बेटे , तुम्हें नौकरी करने की क्या जरुरत । वह भी टीचर की ? ना , तब एक बच्ची की तरह मचलकर उसने कहा था- ' "मुझे दूसरी नौकरी पसंद नहीं पापा ,मेरे जीवन का लक्ष्य, मेरे लिए ..... मैं चाहती हूँ कुछ दिन गांव के मासूम बच्चों को पढ़ाऊँ उनसे कुछ सीखूं ........" और मि.मिंज ने जैसी तुम्हारी इच्छा"  कहकर अपनी सहमति प्रकट कर दी थी ।
       आज उसके ही शब्द , उसके ही संकल्प उसे एक अज्ञात दिशा की ओर ठेल रहे थे । और मोयना जैसे दृष्टिहीनता की स्थिति में अवश बढ़ती जा रही थी ।     
        "नहीं ....नहीं , मैं यहीं रहूंगी........इसी स्थिति में...... मैं अपने लक्ष्य से हट नहीं सकती ....." एकाएक मोयना उत्तेजित हो गई ।  क्या मैं इतनी असमर्थ हो गई कि अपनी खुद की रक्षा नहीं कर सकती.......... मैं उस कमीने का खून पी जाऊंगी.....  वह हांफने लगी ।उसकी आखों में जैसे खून उतर आया । आवेश में वह एक चाकू उठा ली, जिससे वह सब्जी काटा करती थी । झटके से दरवाजा खोल लिया और आंगन में आकर चिल्लाने लगी-  "आ कमीने , हिम्मत है तो , इस उमर में जवानी सूझी है , शरम कर नीच , मुझ जैसी तेरी लड़की है ...... क्या इसी दिन के लिए तुम लोगों ने मुझे पनाह दिया था- गलीज़ कुत्ते ......' एक लम्बी चुप्पी । 
       पसीना से सारा शरीर लथपथ हो गया था । वह आवेश में थरथरा रही थी जैसे बारिश में वेतस लता थराथराती है । लगता था जैसे वह चेतना शून्य होकर गिर जाएगी । इन्दु खर्राटे ले रही थी । और सिब्बू उठकर जोरों से रोने लगा था । और सुबोध किसी कोने में समाधिस्थ हो गया था। न जाने कितनी देर तक वह आंगन को रौंदती रही-  और अश्रुबिंदु गिर गिर कर पैरों की जलन मिटाते रहे। उसने पहली बार महसूस किया , समय जैसे रुक गया है। आकाश जैसे हिल रहा है और तारे  आपस में टकरा टकरा कर  एक दूसरे से छिटक रहे हैं । 
        मोयना यंत्र चालित सी चलती रही। पैर , जो एक दिशा की ओर बढ़ रहे थे। पैर , जिनमें दृष्टि उग आई थी- पैर जो खींच रहे थे एक मिट्टी के शरीर को.....और पैर एक जगह रुक गए  तो मोयना ने देखा वह लक्ष्मीकांत मिश्रा के दरवाजे पर खड़ी है । टीपू भौके जा रहा था , उसे खयाल आया , दाहिने हाथ में लम्बे फल वाले चाकू अभी तक है । उसने चाकू एक ओर फेंक दिया। टीपू और भी जोर से भौकने लगा।  मोयना ने पुचकारा - " चुप रह टीपू " "मै हूँ.... टीपू.... चुप रहो'
         दो कमरों के दरवाजे एक साथ खुले , एक कमरे से अमृत और सोना और दूसरे कमरे से लक्ष्मीकांत।  सभी आश्चर्य चकित थे । मोयना दौड़कर सोना के वक्ष से लग गई और विदा होते दुलहन की तरह धारसार रोने लगी । सोना उसे चुप कराने की कोशिश करने लगी । मोयना को भीतर , बिस्तर पर बिठाकर वह बोली -" मैंने कहा था न,  बहिन जी , दुनिया बहोत खराब है।......खराब लोग ही यहाँ रह सकते हैं । अच्छे लोगो की दुनिया नहीं है बहिन जी ",  उसने मोयना की डबडबाई आखें पोंछ ली ।
        ऐसी बात नहीं है......( हिचकी ) सोना , सिर्फ चंद राक्षसों के कारण दुनिया बुरी नहीं हो सकती। कुछ देवता लोग भी रहते हैं यहाँ ......वर्ना यह पृथ्वी रसातल पहुंच गई होती।"
        मोयना हालाकि आश्वस्त हो गई थी परंतु आखों में पराजय की स्थिरता थी ! मोयना खिड़की से बाहर आकाश की ओर देख रही थी जिस पर शुक्र तारा ऐसे चमक रहा था जैसे आखों के कोर में अश्रुकण रोशनी में चमक उठता है । वह निर्निमेष अज्ञात शून्य की ओर घूर रही थी । 
              सभी चुप थे परंतु अन्तर्द्वन्द् की पीड़ा सभी किसी न किसी स्तर में भोग रहे थे । मोयना ने गहरी चुप्पी तोड़ते हुए कहा - " मुझे क्या पता था सोना , आदमी इस कदर नीचे गिर सकता है - जिसे मैं बाप के समान समझती  थी हे......हे प्रभु' उसके स्वर में थकान थी । 
         "आप कुछ भी कहें बहिन जी , उस आदमी पर पहले ही मुझे शक था ..... तो क्या उस पापी ने ......" शब्द जैसे सोना के गले में फंस गए । 
          "अरे नहीं सोना , उसके लिए कलेजा चाहिए , वो तो शराब के नशे में बहकना शुरू किया था .... ठिकाने लगा आई हूँ।" मोयना के बुझे हुए चेहरे पर स्वाभिमान दमक उठा।
       बाहर अमृत बीड़ी पीते हुए किसी को गाली दे रहा था । टीपू एक चमकती हुई चीज को देखकर अनवरत भौंक रहा था । लक्ष्मीकांत ने उस चाकू को उठाकर अंदर रख दिया। 
           भिनसार होने में कुछ देर बाकी थी । तीसरा प्रहर चल रहा था और यह समय ऐसा होता है कि सृष्टि में अजीब सी अकुलाहट  - दृश्य बदलने की अजीब सी छटपटाहट की अनुभूति होती हैं। और लक्ष्मीकांत के रोम रोम में हिंसा जगने लगी थी । वह  आवेश में चिल्ला उठा। " मैं देख लूंगा स्साले हरामखोर  को अगर जिन्दा भून नहीं दिया तो बात नहीं ....... " स्वर में भयानक आक्रोश था । मुट्ठी भींच गई। टीपू , कम आन टीपू........"   वह तेज कदमों से  बाहर जाने लगा। सोना और मोयना ने घबराहट में एक दूसरे को देख लिया मोयना दौड़कर लक्ष्मीकांत के सामने जा खड़ी हुई और उसकी कलाई पूरी शक्ति के साथ पकड़कर बोली-"नहीं लक्ष्मी बाबू आप मत जाइए वहां ..... -मेरी कसम, रुक जाइए ....... क्या आप चाहेंगे कि लोगों में मेरी बदनामी हो ..... प्लीज . " 
           लक्ष्मीकांत किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में मोयना को घूरता रहा । आवेश जैसे थम गया था । भर्राये स्वर में लक्ष्मीकांत ने  कहा- ' मोयना , ऐसे लोगों को सबक मिलना चाहिए । तुम नहीं समझोगी मोयना जब कभी मैं उस व्यक्ति को देखूंगा- मैं कहीं न कहीं आहत जरूर होऊंगा ... तुम छोड़ दो मुझे ......."
            "कुछ नहीं होगा आपको , आप पहले भीतर चलिए" और मोयना उसे खींचती हुई अंदर ले आई।  बड़ी जिद्दी है मोयना । जब जिद्द करती है तो बच्ची बन जाती ।
....   
          सुबह, लक्ष्मीकांत के न चाहने पर भी मोयना सोना के साथ साथ वापस चली आई । उस समय इन्दु मोहित ग्वाला से दूध ले रही थी । दोनों को एक साथ आते देख कर उसका माथा ठनका । उठते ही वह मोयना का कमरा झांक आई थी जो खुला हुआ था । पहले तो उसने समझा शायद शौचादि के लिए गई हो परंतु जब देर तक वह नहीं आई तो वह अपने मन की आशंका से स्वयं ईर्ष्या दीप्त होकर घरु काम में उलझ गई थी । मोयना भी यही समझती रही कि रात्रि के षड्यन्त्र में जरूर इंदू का हाथ है । यह असंभव है कि बिना उसकी प्रेरणा के सुबोध घर्षण प्रयत्न करने का दुस्साहस करे । 
          जब इंदू ने कुछ नहीं कहा तो मोयना का मन बगावत करने के लिए व्याकुल हो उठा । ' चोरी और सीना जोरी' वह बुदबुदाकर भीतर चली आई । इन्दु ने  पहली बार मोयना के बदले हुए तेवर देखे तो यह समझ कर कि लक्ष्मीकांत से जरूर कुछ झगड़ा हो गया है, मन  में बड़ी खुश हुई । उसके अंतर में पल रहे प्रतिशोध भाव को काफी ठंडकता मिली। 
                उसने तुरंत स्टोव जलाकर चाय बनाई। एक कप जल्दी से गटक गई  तथा एक एक कप मोयना और सोना के लिए भी ले गई। लो, घाव में तेजाब ! पल्लू को कमर में खोसते हुए इंदु ने कहा - 
     "आज बड़ी सुबह उठ गई  मोयना? लो, चाय पी लो, ठंडी हो रही है । " 
            मोयना ने बुझी हुई नजर से इंदु को देखा एक उदास मुस्कान होठों पर फैल गई । 
       " चाय पीने के लिए ही तो गई थी इन्दु दी । पहले जानती कि 'आज' तुम चाय पिलाने वाली हो तो हरगिज नहीं जाती । क्यों सोना ? ... " और वह सोना को देखने लगी। सोना एक ओर सिमटी हुई गुस्से का घूट पी रही थी ।
       इंदु मर्माहत जरूर हुई परंतु  संभलते हुए बोली - "जब ले ही आई हूँ तो पी लो मोयना, एक कप में क्या हो जाता है" 
     " अच्छा , इतना आग्रह करती हो तो जरुर पी लूंगी । परंतु यह दूसरा कप तो तुम पीओ इंदु दी, सोना चाय सिर्फ पिलाती है , पीती नहीं ।" इन्दु ने मोयना के वाक्य पूरा होने के पहले कप उठा लिया  था। इंदु भीतर से बहुत प्रसन्न थी क्योंकि उसे अब पूरा विश्वास हो गया था कि मोयना बहुत दुखी है । 
             उधर सुबोध नजरें चुराने लगा था । वह नहीं चाहता था कि  उसका सामना मोयना से हो।
                  रात में सोना साथ ही रहती थी । इंदु को समझ नहीं आ रहा था माजरा क्या है । एकदिन छुट्टी के वक्त  इंदु ने पूछ लिया -" मोयना सोना को साथ रखने का  क्या मतलब? " 
        मोयना ने छूटते हुए कहा- "बहुत बड़ा मतलब है। "
     'पहले भी तो अकेली रहती थी?"
     "हाँ , पर अब मुझे डर लगता है । " 
   " डर ? कैसा डर ? मोयना यह मुझे अच्छा नहीं लगता..... यह मेरा अपमान है कि तुम......तुम नहीं जानती मोयना, यहाँ औरतों में क्या बात हो रही है......."
        "मैं सब जानती हूँ इन्दु दी, तुम नहीं जानती तो जान लो!" मोयना के कंठ में खीज उतर गई थी । "तो क्या यह सच है , उस रात तुम मेरे पति को गाली दे रही थी?.... विमल की माँ कह रही थी , उसने खुद सुना है।"
          " और मुझे ताज्जुब है कि तुमने क्यों नहीं सुना क्या नींद की गोली खा ली थी।?"
           इन्दु जो अब तक आविष्ट थी , विष - स्खलित नागिन की तरफ श्लथ हो गई थी। उसे एक झटका सा लगा जैसे नंगे तार पर हाथ पड़ गया हो । तो क्या उस दिन जो मीठी सी गोली उसके पति ने उसे खिलाई थी क्या नींद की गोली थी  परंतु उसने तो पेरासिटामोल बताया था। पेरासिटामोल,जो सीधा हलक में उतरने के बाद भी कड़वापन छोड़ जाता है । 
      मोयना बाहर चली आई- इन्दु के सामने अनेक प्रश्नचिन्ह छोड़कर।
       हरिदेव कम्पाउन्डर ट्रांसफर होकर चला गया था । मोयना ने सोना को त्रिलोकी की बहू से मकान के संबंध में बात करने के लिए भेजा । सोना वापस आकर बताई कि मकान खाली नहीं है , कोई सज्जन पहले से बात पक्की कर गए हैं । मोयना दिल मसोस कर रह गई । वह कर भी क्या सकती थी अनजानी जगह , पराये लोग ।
       मोयना कभी कभी अजीब सी तनहाई में ऊभ चूभ करने लगती - एक विचित्र सी रिक्ततता का बोध गहरे अंतस में उतरने लगता  - उसकी सारे देह के पोर पोर में मीठी सी आंच धँसने लगती । मोयना चाहती  कि यह सब भूलकर , सब प्रतिक्रियाओं से तटस्थ होकर जीवन के व्यस्ततम क्षणों में डूब जाय  दिन भर वह काम करती करती थक कर चूर चूर हो जाय ताकि लम्बी लम्बी रातों का  दंश महसूस न हो ! पर ऐसा कभी नहीं हुआ। वह दिनभर स्कूल की लड़कियों के बीच उलझी रहती । स्कूल के आने के बाद शाम तक कढ़ाई बुनाई का काम तथा नाटक आदि के लिए अभिनय तथा नृत्य भंगिमाओं की तैयारी। लड़कियां हर वक्त उसे घेरे रहती और मोयना उनके बीच  लड़की हो जाती विल्कुल अंतरंग। वह खुद अपने हाथ से खाना पकाती और जब रात में विल्कुल अकेली  रह जाती  तो देर तक कोई पुस्तक लेकर बैठ जाती । शरीर और मस्तिष्क जब विल्कुल  थक जाते , परंतु फिर भी  नींद मुह बिचका कर दूर भाग जाती, तब वह परेशान हो जाती । और ऐसे क्षणों में अक्सर वह सोचती , काश कि कोई उसका साथी होता उसकी आखों को नींद लौटा देता..... और यह सोचते हुए उसका चेहरा सुर्ख हो जाता । होठों में बरसों की प्यास जाग जाती और वह बेचैन हो जाती ।    
         कल वह तेइस की हो जाएगी। ओह अब वह बच्ची नहीं रही । पूर्ण जिम्मेदार, अपने मन की मालिक। लक्ष्मीकांत को वह कैसे बताएगी कि कल उसकी तेइसवीं वर्षगांठ है । उसदिन न जाने कैसे उसने लक्ष्मीकांत की कलाई पकड़ ली थी,  जब वह गुस्से से कांपता हुआ बाहर निकला था- कितनी सहजता से सब कुछ हो गया था । परंतु बाद में कितनी वह लजा गई थी- और लक्ष्मीकांत ने भी तो संबोधन ऐसे अनायास बदल दिए कि मोयना को बड़ा स्वाभाविक सा लगा था बिलकुल अपना सा । नहीं तो हमेशा ' मिस मिंज' 'मोयना जी ', ' आप ' सुनते सुनते जैसे वह स्वयं  फासला अनुभव करने लगी थी । एक दिन तो मोयना ने रोक दिया था - " देखिए , आप मुझे सिर्फ मोयना कहा करें ' मोयना जी', नहीं ।....   जब आप ' मोयना जी ' कहते हैं तो जोर ' जी'  पर अधिक पड़ता है मोयना पर कम , और मैं यह नहीं चाहती.........."
          उस दिन शनिवार था ।  शाम को अमृत आया और कहने लगा - साहब बुला रहे हैं । मोयना को जैसे विश्वास न हुआ। वह अमृत को ऐसे देखने लगी जैसे पूछ रही हो 'क्या सच ' ? उसने 'मोन्टो' की कहानी किताब रख दी और तैयार होने लगी । 
      उसने हलके आसमानी रंग की साड़ी पहनी जो उसे सबसे अच्छी लगती थी । वह कमरे को ' लॉक ' करने जैसे ही बाहर आना चाहती थी दरवाजे पर पोस्ट मेन दिख गया उसके हाथ मे एक पार्सल का डिब्बा था। मोयना को देखते ही पोस्टमेन ने कहा "आपके नाम का यह पार्सल....... मोयना ने दस्तखत किए और पुन : दरवाजा खोलकर और चली गई ,उसने पार्सल खोलकर देखा , कासनी रंग की जापानी साड़ी तथा मिठाई का पैकेट था ।  कोने में एक पत्र भी था मोयना के नाम - मि ०मिंज ने लिखा था-  प्रिय मोयना बेटे ,
        बहुत बहुत प्यार। 
      इस उम्मीद के साथ कि तुम्हारे पिछले दो पत्रों का सम्मिलित उत्तर इतना संक्षिप्त लिख रहा हूँ नाराज न होगी । इस सप्ताह कि रविवार तुम्हारी तेइसवीं  वर्षगांठ का दिन होगा । अशेष शुभकामनाओंके साथ- तुम्हारा पापा
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         उसने पत्र चूम लिया । उसकी आखों में आंसू आ गए शायद खुशी के-  शायद दुख के ? शायद मिश्रित ! ' हाँ पापा , मैं तुम्हारा बेटा हूँ । " मोयना ने पत्र दोबारा चूमा और बाहर आ गई - मिश्रित  भावनाओं के आवेग के साथ।
       लक्ष्मीकांत बेसब्री से इंतजार कर रहा था। सामने मोड़ पर जब एक नीले रंग की साड़ी लहरायी तब वह गौर से देखने लगा । मोयना जब पास होती है तब वह ठीक से देख ही नहीं पाता । देखने की कोशिश करता भी है तो नजर जैसे फिसल जाती है । मोयना पास आ गई तो भी वह अभिभूत देखता रह गया , सौन्दर्य पीता हुआ । उसे आज मालुम हुआ जब मोयना चलती है तो और भी सुंदर दिखाई देती है । 
         मोयना ने पास आकर दोनों हाथ जोड़ दिए तो लक्ष्मीकांत को अपनी बेख़ुदी का अहसास हुआ । 
     "आओ मोयना , वेलकम ! "  कम्पाउन्ड के भीतर दाखिल होते ही मोयना ने पूछा , " सोना कहाँ है ? " 
      "सोना अपने कमरे में है,  तीन - चार दिन के लिए फुरसत" " ओह, आई सी।"  मोयना ने धीरे से कहा । 
      "जानती हो मोयना, तुम्हें बुलाया क्यो है ? " 
      " अगर जानती तो क्या तुम्हारे बुलाने का इंतजार करती ? वैसे तुम्हारा बुलाया जाना विल्कुल आकस्मिक है मेरे लिए "  मोयना लक्ष्मीकांत की ओर देखने लगी और लक्ष्मीकांत मस्ती से चल रहा था । कुछ देर चुप रहकर जैसे सस्पेन्स को और भी तीव्र करने के लिए । बरामदे तक पहुंचते पहुंचते मोयना की जिज्ञासा चरम को पार कर गई "बताओ न , क्यों बुलाया है " 
      " पहले आराम से बैठो,  फिर बताऊंगा.......अगर पहले  बता दिया तो तुम वापस लौट जाओगी ' लक्ष्मीकांत मुस्कुराने लगा , " ओफ्..ओ , तुम तो बेकार सस्पेन्स- क्रिएट कर रहे हो......देखो मैं तीन गिन रही हूँ अगर नहीं बताओगे तो मैं वापस लौट जाउंगी...... , एक..... दो .........
   " बता रहा हूँ भई, मैं तो यूं ही तुम्हारा धैर्य देख रहा था। .....दरअसल.... तुम्हारे हाथ का खाना खाने के लिए....."
" बस बस सुन लिया । तो इतनी सी बात को कहने के लिए जनाब को  इतनी ज्यादा ' संकोच' हो रहा था। ऊपर से  कहते हैं कि मेरा धैर्य देख रहे थे । "  मोयना चुटकी ले रही थी धीरे धीरे,  जैसे मिस्री की डली पानी में धीरे धीरे घुलती है । दोनों का अभ्यन्तर ताजा हवा के रोमांचक स्पर्श की पुलक से भरने लगा था । दोनों के रोम रोम भावी ग्राहस्थ्य की कल्पना से स्फूर्त थे। मोयना  कह रही थी- 
             वैसे में स्वयं आ रही थी ... जानते हो क्यों ? "    "खाना बनाने के लिए" लक्ष्मीकांत हंस दिया।
      ' ऊ हूँ"  यह बताने के लिए कि .... कल मेरा ..... आराम से बैठो , शाम होने दो फिर बताऊंगी । इतनी अच्छी बात क्या इतनी आसानी से बता दूँ...... ।  मोयना हँसने लगी।और वातावरण बिलकुल हलका हो गया था । 
     "मोयना  तुमने तो पूरा बता दिया कि कल तुम्हारा 'बर्थ डे ' है.......इसमें सस्पेन्स ही कहाँ रहा । " 
मोयना के कपोलो के आवर्त में लाज की लाली घुलने लगी । उसने कहा- ' हाँ लक्ष्मीकांत जी , कल मैं तेईस की हो जाऊंगी ।" 
       " बहुत ही प्यारा दिन होगा मोयना, एक तो ' सन्डे ' और ऊपर से तुम्हारा 'बर्थ डे ', सोने में सुहागा"  परंतु लक्ष्मीकांत एकाएक गंभीर हो गया । भावों की धूपछांव चेहरे पर झिलमिलाने लगी । मोयना को भी लगा जैसे लक्ष्मीकांत एकाएक उदास हो गया है। उसने पूछा  " क्या बात है लक्ष्मीकांत जी ? "  
    "मैं एक खास बात कहना चाहता था मोयना" 
     लक्ष्मीकांत ने बिना भूमिका बांधे ही कहा -" क्या तुम यहाँ नहीं रह सकती मेरे साथ...... हमारे साथ ?आखिर बाहर रहने का क्या तुक है । सिर्फ इस लिए न कि लोग क्या समझेंगे....समाज का बंधन .....समाज की मर्यादाएं  ... मोयना, तुमने कभी मंगतराय सेठ की दूकान की दीवाल पर नजर डाली है"        
       " नई तो ? " मोयना हैरत से देखती रही । लक्ष्मीकांत कह रहा था-' नहीं देखी तो अब देख लेना समाज और समाज के लोगों की करतूत ..... "  लक्ष्मीकांत का स्वर आक्रोश युक्त हो गया और उसने अमृत को आवाज दी । अमृत आ गया तो ,उसनें कहा - "अमृत तुम एक काम करो , मेम साहब का सारा का सारा सामान बांधकर ले आओ। ये अब यहीं रहेंगी । " 
अमृत अवाक् लक्ष्मीकांत को देखने लगा, फिर चला गया । आदेश पालन , उसका कर्तव्य है बीच में दखल देना नहीं। 
   .        " तुम्हें एतराज तो नहीं मोयना ? " एतराज ? " मोयना लक्ष्मीकांत को अपलक देखने लगी । लक्ष्मीकांत को यह अचानक हुआ क्या?  लक्ष्मीकांत तो बगावत करने के लिए तुला है, समाज से, दुनिया वालों से -  वह चुप रही। उसकी  चुप्पी स्वीकृति  बन रही थी। ठीक तो कह रहा है लक्ष्मीकांत! क्या मोयना  यही नहीं चाहती अपने भीतरी अंतर्मन में है ! और फिर उससे सुरक्षित स्थान अन्यत्र नहीं मिल सकता । वह सुरक्षित ही नहीं , वह तो चाहती है अपना सर्वस्व लुटा दे यहाँ।  लक्ष्मीकांत को लेकर मोयना  क्या अजीब सी कल्पनाएं नहीं करती? रामपुर आने के पहले मि. मिंज ने लक्ष्मीकांत के बारे में बताया तभी से अपरिचित, अनदेखा लक्ष्मीकांत के विषय में उसने सोचना शुरू कर दिया था। क्या ऐसा तो नहीं ; लक्ष्मीकांत उसके लिए ही प्रतीक्षित हो वरना एक विधर्मी व्यक्ति के प्रति इतना तीव्र आकर्षण उसके भीतर भला कैसे पैदा हो सकता है । क्या लक्ष्मीकांत अपनी सोसायटी अपने स्तर की समस्त शर्तों से ऊपर उठकर उसे स्वीकार कर पाएगा?  क्या लक्ष्मीकांत भी उसके लिए ऐसा ही भाव रखता है?  कहीं ऐसा तो नहीं कि 'पापा' द्वारा दी गई ज़िम्मेदारी का महज औपचारिक निर्वाह कर रहा है लक्ष्मीकांत ! पापा लक्ष्मीकांत के श्रद्धेय रहे हैं, हो सकता है  वह कर्तव्य भावना से यह सब कर रहा हो। काश कि लक्ष्मीकांत उसे स्पष्ट कह देता - मोयना, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ । "
             मोयना - न्यूजपेपर सिर्फ देख रही थी .. छोटे अक्षर, बड़े अक्षर और मझोले अक्षर । मस्तिष्क जैसे तटस्थ होकर कुछ और ही सोच रहा था । 
            लक्ष्मीकांत भी चुप बैठा, दूर कहीं क्षितिज पर देख रहा था । भीतर तो वह भी अपनी अन्तरात्मा से जूझ रहा था , लड़ रहा था । दोनों की मनःस्थिति किसी बिन्दु पर  जाकर मिलने लगी थी। दोनो के विचार आमने सामने थे, पर वे दोनो विल्कुल  बेखबर! मोयना एकाएक उठ बैठी और सोना के कमरे की ओर चली गई । सोना को हर महीने कुछ रोज इसी तरह अनमनी , सुस्त पड़ा रहना पड़ता है उस दिन भी वह उसी तरह लेटी हुई थी । सिर में दर्द ,  शरीर में ऐठन। मोयना ने सोना के माथे को छुआ  और वापस चली आई। वह सो रही थी, शायद जाग भी रही हो, क्योंकि पलकों का बंद होना नींद की गारंटी  नहीं है।
               " क्या सोना को बुखार है।" लक्ष्मीकांत ने पूछा। आदमी जब रीत जाता है तो कुछ भी कह लेता है , कुछ भी सुन लेता है । कोई फर्क नहीं पड़ता। लक्ष्मीकांत के पूछने में न उत्तर की लालसा थी, न ललक।
      " नहीं " ऐसी कोई बात नहीं"  मोयना कह रही थी सपाट सीधा।  " क्या हर महीना ऐसा ही होता है ? " 
     " हाँ" लक्ष्मीकांत ने कहा। 
     "तब तो किसी यूरोलॉजिस्ट से जरूर दिखाना चाहिए उसे" वह कुछ देर चुप रही फिर बोली "औरतों का इस तरह का होना आम बात है  परन्तु उसके साथ बेइन्तहा दर्द होना आम बात नहीं है .....।"
      " तुम्हें तो एक डॉक्टर होना था " लक्ष्मीकांत ने कहा और खुद हंस दिया । विल्कुल यान्त्रिक ढंग से।
               मोयना को लगा जैसे  वह अपने मूल कथ्य से बहुत हट गई है । वह जो कहना चाहती थी-  अर्थवाही (अर्थ-सूचक) शब्द पंछी की तरह पास आकर, दूर उड़ गए।  । और वह जैसे हाथ मलते रह गई, उसके होंठ हिल कर रह गए । यह ठीक है कि उसका समर्पण भाव अंदर में कुलबुलाने लगा है परंतु क्या उसकी शाब्दिक अभिव्यक्ति जरूरी है! क्या लक्ष्मीकांत उसके बिना समझ नहीं सकता? कि वह सब समझता है और जान बूझकर अपने को टालता जा रहा है । उसने तय कर लिया वह इस संबंध में कुछ न कहेगी, लक्ष्मीकांत चाहे समझे या न समझे । एक स्त्री के लिए कितना मुश्किल है अपने प्रेम का इजहार-  वह भी पहली बार! उसकी आखों में तैरते हुए कामना के लाल डोरे क्या किसी गूढ़ भाव की ओर संकेत नहीं कर रहे हैं । " 
       लक्ष्मीकांत , मैं एक बात पूछूँ?'
 " हाँ , पूछो "  लक्ष्मीकांत की दृष्टि उठ गई । " 
......यह ठीक है कि मेरे लिए तुम्हारे मन में बहुत अधिक सहानुभूति है और इससे बढ़कर मेरे लिए खुशी की बात और नहीं,परंतु इसके लिए क्या  हम लोगों का साथ रहना जरूरी है?" मोयना बहुत गंभीर होकर कह रही थी । और लक्ष्मीकांत ने भी महसूस किया यह मजाक में नहीं टाला जा सकता । लक्ष्मीकांत सोचने लगा , क्या उसने जो निर्णय लिया है - कहीं आवेश मात्र तो नहीं ? इधर आवेश खत्म हुआ , उधर पछतावा शुरु। मोयना ठीक ही कह रही है। लक्ष्मीकांत ने कहा -" नहीं मोयना, हमारे जीवन में कुछ भी जरूरी नहीं .........तुम्हारे यहाँ ( रामपुर में ) आने के पहले तो ये जरुरियाँ बिलकुल अकल्पित थीं मेरे लिए....... परंतु हाँ , तुम्हारे आने के बाद मेरी जिम्मेदारियाँ जरूर बढ़ गई है ।
   लक्ष्मीकांत की आवाज दृढ़ता से आविष्ट थी । 
" मैं कोई बच्ची नहीं हूँ लक्ष्मीकांत, जब अकेली घर से निकल आई हूँ तो अपने खुद के भरोसे । मुझे किसी की आत्म दया की जरूरत नहीं ........." ।
        " यह क्या तुम कह रही हो मोयना? " लक्ष्मीकांत झल्ला सा गया। " कुछ और मत समझाना लक्ष्मीकांत, मैं तो यह कह रही थी कि मेरा यहाँ रहना समाज के हित में ठीक नहीं होगा । यह समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी । मैं पूछती हूँ  क्या तुममें इतना नैतिक बल हैं कि इस चुनौती को स्वीकार कर सको ! कल जब तुम्हारा समाज यह पूछेगा कि मैं तुम्हारी कौन हूँ , तुम्हारी क्या लगती हूँ  तो क्या जबाब दोगे , क्या जवाब दोगे लक्ष्मीकांत ?........
      " और लक्ष्मीकांत ने कोई जवाब नहीं दिया । कोई जवाब भी नहीं था उसके पास।  कुछ प्रश्न अनुत्तरित होते हैं । वह प्रश्न अंतर की छटपटाहट होती है , अंतस की कौंध होती है । मोयना हर वक्त कुछ दबाती चली गई थी उसके भीतर की कोई गहरी पर्त अतृप्त थी, द‌मित थी । वह पूरी की पूरी पर्त बाहर आ गई थी - प्रश्न के रूप में । और लक्ष्मीकांत के पास कोई उत्तर नहीं। लक्ष्मीकांत , जो आदर्शों में जीता है और ऐसा हर व्यक्ति जो आदशों में जीता है  उनके सभी निर्णय आवेश में लिए गए होते हैं।
        आवेश जब थम जाता है , अंधड़ जब रूक जाता है तो लगता है सब कुछ बदल गया है। जो अनसोचा था,अकल्पित था  वह घट गया होता है। लक्ष्मीकांत को भी लगा जैसे कुछ घट गया है - कुछ बदल गया है। और जो स्वयं इस घटना और परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार है । तो क्या इस नई स्थिति को स्वीकार ले ? या इसकी तरफ से  आंखें मूंद ले लक्ष्मीकांत,  स्वीकारने का अर्थ होगा-  मोयना के नारीत्व को एक सार्थक रिश्ते में बांध लेना और आंख मूंद लेने का अर्थ होगा अपने भीतर के पुरुष को कुचल देना।  लक्ष्मीकांत दोराहा में आ खड़ा हुआ है ! और मोयना की आखें व्यग्र है यह देखने के लिए कि लक्ष्मीकांत कौन सा रास्ता अपनाता है । 
        मोयना हंस देती है और लक्ष्मीकांत खोया हुआ है । मोयना कुछ कहना चाहती थी-  तभी कुछ मिली जुली आवाजें आई । मि. तामस्कर , मि ० शुक्ला और मि ०सिंग जो लक्ष्मीकांत मिश्रा के दोस्त थे , आपस में बातें करते हुए आ रहे थे । लक्ष्मीकांत हड़बड़ा गया । उसने मोयना से कहा-' मोयना , प्लीज , तुम अंदर चली जाओ मैं थोड़ी देर इनसे बात कर लूँ । प्लीज मोयना , जल्दी करो .... ! " 
       " बस डर गए ! " मोयना ने व्यंग्य किया ! वह  खड़ी हो  गई " ना बाबा, मैं अंदर नहीं जाऊंगी। अगर बाइ-द-वे , उनको मालूम हो गया कि अंदर मैं हूँ, तो न जाने क्या सोच लें। इससे बेहतर है कि मैं इनके सामने बाहर चली जाती हूँ.... ... 'एक्सक्यूज मी'  मैं जा रही हूँ ...     और सुनो , कल मेरा 'बर्थडे' है । जरूर आना .... 
         मोयना जिस मस्ती से आई थी उसी मस्ती से लौट गई। लक्ष्मीकांत उसे जाने से रोक सकता था पर रोका नहीं-  उसके दोस्त लोग आ गए और वह बंध गया। दरअसल वह कहीं आहत हो गया था - वह कहीं टूट सा गया था। मोयना एक तरह  उसे धिक्कार गई थी । उसके पौरुष को चेलेन्ज कर गई थी।  मि. तामस्कर कह रहा था - "वी आर सॉरी लक्ष्मीकांत, तुम्हे डिस्टर्ब किया ......" लक्ष्मीकांत वैसे ही अनसुना बैठा रहा । " शब्द चूक कर लौट गए ।
        सावली सांझ काली रात में बदल गई और काली रात ढलकर लाली सुबह हो गई । उस दिन मोयना पूरी तेइस वर्ष की हो गई परन्तु उसने महसूस किया वह तेइस की नहीं बल्कि बत्तीस की हो गई है- उसे लगा जैसे वह बहुत बड़ी हो गई है, अपनी उम्र से, अपनी ज़िम्मेदारी से अपने कर्तव्य से, सब में बड़ी।

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बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396

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