कबरा का प्रारब्ध : (कहानी) बसन्त राघव
संभावना का अंकुर : (कहानी)
-----------------------
बसन्त राघव
मैं जलती हुई मोमबती को देखे जा रहूँ | एकटक - अपलक त्राटक सा कर रहा हूँ । लेकिन मेरा ध्यान डोलती हुई लौ पर उतना नहीं जितना ऊपरी सिरे के मोम के पिघलने- पिघल- पिघल कर अस्त व्यस्त गिरकर , कहीं भी जमने और खुद पर बोझ बनने जैसी कुछ प्रक्रिया पर.......
मैं कई बातें एक साथ सोच रहा हूँ- जैसे यह मोमबत्ती एक साथ कई महत्वपूर्ण घटनाओं के प्रतीकों को संभाले जल रही है । यह कहना ठीक होगा , मेरे सोचने और इस मोमबत्ती के जलने में कुछ हद तक समानता है । ... मैं सिर्फ सोच नहीं रहा , जैसे यह मोमबती सिर्फ जल नहीं रही ... यह पिघल रही है . एक एक क्षण मृत्यु की ओर सरकती जा रही है . तेज हवाओं से संघर्ष कर रही है मुश्किल से अपना अस्तित्व बनाए रख , तिल - तिल घुल रही है.... समय के प्रवाह में अपना क्षीण प्रकाश लुटाती हूई स्वयं बौनी होती जा रही है ..... यह मोमबत्ती अपनी आखिरी बूंद तक अंधकार की नियति को स्वीकार नहीं कर पाएगी और बुझने के पहले अंतिम बार भी अंधकार के सीने में लात मारना नहीं भूलेगी ...
ठीक इसी तरह मैं अपने भीतर के किसी कोने में चुपचाप जल रहा हूँ । मेरे अंतर का कोई नाजुक कोना जो सर्वाधिक प्रवण शील है - अपने ही ईगो की स्पृहणीय आंच से पिघल रहा है..... क्षण , पतंगो की तरह एक - एक कर मेरी ज्वलनशीलता को शिकार होते जा रहे हैं ... बीते क्षणों की राख की ढेर और मेरी निरर्थक पिघली अस्मिता का जमाव मेरे लिए ही बोझ बन रहे हैं ......और मैं जैसे इस दुर्निवार बोझ को ढोने के लिए बाध्य हूँ .........
मस्तिष्क के सारे खिड़कियां खुले हुए हैं और विचारों के तेज झोंके एक बारगी सरसराकर मुझे ही बुझा देने के लिए आतुर हैं । लेकिन मेरे ही भीतर दूर कहीं भटकी हुई आत्म सजगता मुझे संभाल लेती है..... मेरा ही मुरझाया हुआ विवेक झोंके की दिशा में अपनी हथेली फैलाकर मेरी चेतना की लौ को सहेज लेता है और मैं पुनर्जीवित सा होकर स्थिर खड़ा हो जाता हूँ ... मृत्यु मेरी नियति नहीं है ...
मैं देख रहा हूँ , मोमबत्ती आधी से अधिक जल चुकी है । अगर इसी तरह निर्बाध जलती रहे तो ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा या एक घंटा और.....और अचानक मुझे खयाल आता है यह तो मेरी ही उम्र को घोषित कर रही है ......करीब - करीब आधी से अधिक तो मैं भी जल चुका हूँ , ......बहुत पहले किसी ज्योतिषी ने मेरी आयु अस्सी के लगभग बताया था और वर्तमान में मेरी आयु पचास ...... और यह एहसास - कि अभी तक जीवन में ऐसा काम जो मरने के बाद मुझे जीवित रखे नहीं कर पाया बुरी तरह कचोटने लगा है । एक गहरी रिक्तता के बीच में से कोई कह रहा है 'जीवन के एक क्षण का प्रकाश कितने जन्मों के अंधकार को मिटाने के लिए पर्याप्त है ...... अगला क्षण ही , प्रकाश क्षण है ........?
मैंने झटके से दर्पण उठा लिया है , जो बीचों बीच किनारों तक चटक गया है , और मद्दिम रोशनी में आंखें गड़ाकर अपना अक्स देख लिया। सहसा मेरा बाँया हाथ कान के पास चला गया है जहाँ पर से बाल सफेद हो गए हैं .....होंठ स्वयमेव भींच गए हैं .... ......इस बीचों बीच से टूटे दर्पण में गोया मेरा अक्स भी जैसे विभाजित हो गया है...... और न जाने क्यों माथे पर की कुछ लकीरें गहरी हो गई हैं ... ....मैं अपनी ही विभिन्न नजरों को महसूस कर रहा हूँ अलबत्ता आधा चेहरा ही गायब हो गया हो ...... आधा चेहरा ही क्यों ? अगर आदमकद शीशे के सामने में खड़ा हो जाऊँ - सिर से पैर तक आधा नजर आऊंगा, 'क्यों?'....... . इस क्यों के लिए मैंने अपने प्रतिबिंब को विभिन्न कोणों से देखा है हालाकि , अपने आपको देखने के लिए दर्पण और दर्पण से बनने वाले कोण की बात बेमानी है .... यह मुझे उसमें स्वयं को शामिल होने की कल्पना करने जैसा लगा.....और मैं वहीं कर रहा हूँ। मेरे अपने ही होठों को लरजते हुए देख रहा हूँ जो एक अजनबी मुस्कान में भीग गए हैं .........झटके से मैंने दर्पण नीचे रख दिया है । एक वाहियात सम्मोहन से जैसे निजात मिल गया मुझे ...
सब कुछ हिल सा रहा है- दीवारे, छत -कुर्सी- मेज और तस्वीरें ....
स्थूल चीजों की परछाइयों की तरह स्मृति के अनेकानेक छाया चित्र आपस में गडमड से हो रहे हैं ..... सारा परिवेश अस्थिर है-- अन्दर - बाहर, कमरे की हवा , अपने रुष्ट होने का एहसास करा रही है ।
साथ ही साथ, मैं देख रहा हूँ - कहीं से एक बड़ा सा पतंगा आ धमका है और मेरी मोमबत्ती के पीछे हाथ धोकर पड़ गया है । जब भी वह आक्रामक तरीके से लौ पर झपटता है , लौ एक बारगी विचलित हो जाती है ।
मैं बड़े गौर से देख रहा हूँ - पतंगा बार बार लौ को झपटा मारता है और इस प्रयत्न में वह स्वयं झुलस - झुलस जाता है । कभी कभी तो वह पूरी लौ को अपने कोमल पंखों से ढाँप सा लेता है तब , लौ उस भारी भरकम अपने परवाने के आवेग पूर्ण आलिंगन में कसमसा सी उठती है ।
कितना मार्मिक परिदृश्य है यह ! ओह इस बार वह पतंगा बत्ती के ऊपर अटक सा गया है......और लौ बुझने को हो गई है । तभी मैंने कागज के टुकड़े से उसे छूकर दूर गिरा दिया है । परंतु व्यर्थ !
वह बेचारा उत्सर्ग हो चुका है । मृत्यु का रोमांच - सारी त्वचा को कंटकित करता हुआ आँखों में फैल गया है ...
इस अवलोकन से एक तथ्य उभर आया है कि बहिर्जगत में घट रही घटनाएँ , जिन्हें हम ध्यान पूर्वक देख रहे होते हैं वस्तुतः हमारे जीवन की उन घटनाओं के ' संकेत मात्र ' होते है जो या तो घट गई होती हैं या घटने को तैयार ....
प्रत्येक वह घटना जरूरी नहीं कि दुर्घटना ही हो, चाहे साधारण हो अथवा असाधारण , अगर हम देख रहे हैं तो इसका मतलब है - हम भी उस घटना में शामिल हो गए ......हमारे देखे बिना वह घटना अधूरी या अर्थहीन थी ।
मामूली सी लगने वाली घटना भी कभी कभी जीवन की गंभीर संभावनाओं का पूर्वाभास देने लगती है यह बात और है कि हम जल्दबाजी , व्यस्तता या ' ' प्रेक्टिकल ' होने के नाते नजर अंदाज कर जाते हैं ...
अब यहाँ , अभी अभी मेरे सामने एक अच्छा खासा उड़ता- फांदता हुआ पतंगा जल मरा है और एक हलकी सी गंध नथुने में भर गई है तो मुझे वैसा ही लगा ......जैसे मैं अपनी पहली वाली पत्नी की चिता फूंककर हताश , पराजित और अनुमुख बैठा महसूस कर रहा था ... ऊपर की ओर लपकते हुए शोले को
निर्निमेष देख रहा था जो देखते ही देखते ' पौराणिक' सौन्दर्य से युक्त एक नारी देह को चाट गया था .... हड्डियाँ तड़क रही थी .... मांस जलने की तीखी गंध नासा पुट में भर रही थी ......
विश्वास ही नहीं हो रहा था -' कल तक जो मेरी अर्धांगिनी थी आज सदा सदा के लिए मुझसे अलग होकर चली गई ।
अब भी विश्वास नहीं हो रहा है ।
पन्द्रह वर्ष पुराने आँसू आज सहसा ही बह रहे हैं । अगर यह पतंगा यों न जलता तो शायद संजू मुझे याद भी न आती और अगर आती भी तो चिता की सेज पर विश्रान्त की हालत में नहीं।
मैं चाहता हूं कि वर्तमान से पीछे न जाऊँ लेकिन जब तक मेरे सामने यह मोमबत्ती जलती रहेगी और पतंगे की राख मेरे सामने रहेगी , अतीत के गुरुत्वाकर्षण से मैं उबर नहीं पाऊंगा ...
हठात्! मैंने मोमबत्ती फूंक दी है । घुप्प अंधेरा कमरे में - चेतना में फैल गया है । मैं स्वयं हैरान हूँ , क्यों किया ऐसा ? अब मुझे यह विचार भी सालेगा कि मैंने किसी को जबरदस्ती अकाल मृत्यु में ढकेल दिया ......
अब अंधेरे में मुझे याद आया - मैं यहाँ किसी को जरूरी पत्र लिखने के लिए आया था ... कल 'पोस्ट ' कर देना है । लेकिन विचारों का ऐसा अन्तहीन सिलसिला चला कि कुछ भी याद न रहा.......अब माचिस भी ढूंढे नहीं मिल रही है । मोमबत्ती का अभी इतना भाग अवश्य बाकी है कि एक पत्र लिखा जा सकता है ..... और लो , मेज पर से यह इंकपाट भी गिर गया शायद ! मेरे पांव,रोशनाई की ठंडकता महसूस कर रहे हैं .
" क्या गिर गया बापू ? लालटेन लाऊं....... , "
" नहीं " , नहीं रिया ! तुम पढ़ो , मोमबती मैं जला लूंगा ....."
बिल्कुल वही आवाज.... कम्पन , वही मुखाकृति क्या विडंबना है- जिसकी स्मृति को पूरी शक्ति के साथ मन के बाहर रोके रखा हूँ उसका साक्षात प्रतिरूप मेरे सामने खड़ा है..... ओफ !
" बापू , मैं पढ़ चुकी । आप लालटेन ले लें " रिया कह रही है लेकिन आँखों से प्रश्न सी कर रही है " क्यों क्या हुआ ?"
शायद मेरी आँखे गीली हैं वर्ना इस तरह रिया सहानुभूति पूर्ण नजरों से मुझे न देखती | मैं मुंह फेर लेता हूँ और वह देहरी के पास लालटेन रख आँगन की ओर चली गई है । वह चुपचाप फर्श पर फैली हुई नीली रोशनाई पर पानी डालकर बोरे के टुकड़े से पोंछ रही है । अव्यक्त पीड़ा के संस्पर्श से उसका मुख आभामय हो गया है । मैं स्पष्टीकरण देने की कोशिश करता हूँ -
' मोमबत्ती अचानक ' बुझ गई रिया , में माचिस ढूंढ़ रहा था मेज पर कि यह इंकपाट ......"
मैं चाहकर भी वाक्य पूरा नहीं कर पाया जैसे मेरी जुबान को बीच में ही रोक कर रिया की चुप्पी ने कुछ कहा हो ..... मुझे ग्लानि हो रही है.....सच से भी ज्यादा सच लगने वाला झूठ बोलकर मुझे यह तो होना ही चाहिए ... इतना सूक्ष्म झूठ ! मोमबत्ती बुझ गई या बुझा दी गई ? रिया फर्श पर रच सी गई स्याही को धोने का प्रयास कर रही है..... वह लीप रही है ... मुझे कह देना चाहिए था कि रिया मैंने ही बलात् मोमबत्ती बुझाई है जिसकी सजा तुम्हें भोगनी पड़ रही है.... मेरी सारी गलतियों की सजा तुम्हे ही ताउम्र भोगनी पड़ेगी . .... कुछ देर पहले हवा जरूर चल रही थी तेज लेकिन अब स्थिर है फिर मोमबत्ती कैसे बुझ गई ? अपने आप..... बापू , अब मैं सयानी हो गई हूँ , सब समझती हूँ ......परसों दर्पण तोड़ डाला , कल लालटेन का कांच और आज.....
मौन भी कभी कभी मुखर हो जाता है। बोलने सा , दो तरफा बोलने लगता है मौन.......जिस तरह अंधकार कभी - कभी साक्षात्कार करने के लिए उपयुक्त होता है- . आत्मसाक्षात्कार के लिए भी और परम साक्षात्कार के लिए भी ....... आंख खोलकर देखने के बजाय कभी कभी आंख मूंदकर देखते से परिदृश्य कहीं अधिक सुंदर और चमकीला दिख पड़ता है.........
स्टूल पर लालटेन रख, रिया बाहर चली गयी हैं और मैं अपने वर्तमान में सम्यक् होने की प्रतीति में त्रिशंकु की तरह अधर में लटक सा गया हूँ और मैं , इस मनः स्थिति में पत्र लिखने की कार्रवाई को असंभव करार देकर टाल जाता हूँ ।
बाहर बरामदे में रिया की पदचाप सुनाई पड़ रही है ... कभी पास आती हुई तो कभी दूर जाती हुई । शायद दिन का शेष खटराग पूरा कर रही है....... बेचारी दिन रात खटती रहती है ..... हंसने खेलने की उम्र में घर की सारी जिम्मेदारी थोप दी गई है..... बहुत कम मुस्कुराते हुए देखा है उसे .......उम्र जैसे किशौर्य पर पैर रखकर एकदम छलांग लगा दी ... कैसी गंभीर हो गई है लड़की .. ....
उधर कुछ दिनों से साड़ी पहनने लगी है रिया। गंभीरता और भी गहरा गई है । हालाकि वह अभी साड़ी की अभ्यस्त नहीं हो पाई है , मैं स्वयं उसे नारी परिधान में देखने का अभ्यस्त कहाँ हो पाया हूँ ! उस दिन शाम को जब पहली बार मैंने रिया को साड़ी - ब्लाउज में देखा , जी 'धक' से रह गया..... वही कद,वही गठन वैसी ही नाक नक्श ... मैं ठगा सा खड़ा रह गया .......मुझे इस तरह देखते हुए देखकर वह हो- हो कर खिलखिला उठी और मनभावनी अल्हड़ता के साथ बोली-
" कैसी लग रही हूँ बापू?"
' अ ... बहुत सुंदर ... ओ रिया मैं तो ........."
याद है , बोल नहीं फूटे थे । मैं विमूढ़ बना बैठक की ओर बढ़ गया था और जब रिया चाय लेकर आई तब वह स्कर्ट - ब्लाउज में थी। उसका मुख रक्ताभ हो रहा था और मेरे माथे पर पसीना चुहचुहा आया था। शायद हम दोनों एक दूसरे की मनोदशा भांप चुके थे ।
दरवाजे पर खड़का हुआ है - मेरा ध्यान उस ओर चला गया है - रिया चारपाई लिए चली आ रही है ...
" आज मैं यहीं सोऊंगी बापू चार बजे का एलार्म लगा दिया है......, अगर मैं अपने से उठ ना पाई तब आप उठा देना ... "
, मैने हाँ- ना कहने के बजाय उसकी ओर देखा भर !
लेकिन अगर आप भी न उठें तो बड़ी परेशानी होगी" वह बिस्तर लगाते हुए कह रही है ।
बड़ी फिक्र है बेचारी को ... कल से उसके मैट्रिक का इम्तिहान है , कहती है - इस बार अगर मैं फर्स्ट क्लास न आई तो जिन्दगी में कभी भी इम्तिहान न दूंगी"
कितना भोलापन है उसकी प्रतिज्ञा में.......जीवन का हर क्षण इम्तिहान ही तो होता है, वह स्वयं समझ जाएगी इस परम सत्य को.......
"इस टेबल घड़ी का भी क्या विश्वास रिया, यदि ठीक चार बजे न बजी तो ? ... "
मुझे कुछ भी कह कर बोझिल होते मौन को तोड़ना था जैसे दर्पण तोड़ डाला था ,जैसे लालटेन का काँच और दवात तोड़ डाला था .. .... ताज्जुब है रिया टेबिल घड़ी को मेरी मेज पर रखकर कितनी बेफिक्री से सो रही है........
सहसा वह बोली है - बापू आप कहा करते है न, कि यदि सोने के पहले निश्चित समय में उठने का संकल्प किया जाय तो ठीक समय में नींद अपने आप खुल जाती है ..... "
" हाँ, क्यों नहीं! संकल्प शक्ति बड़ी चीज होती है.... प्रयोग करके देखो न..
" आज जरूर प्रयोग करके देखूंगी - साइंस की छात्रा जो हूँ.....लेकिन बापू , बाइ - द - वे उठ न पाई तब ?... "
वह मेरी तरफ उत्सुक निगाहों से देख रही है । मैने दार्शनिक मुद्रा ओढ़ते हुए कहा है -
" देखो रिया,अव्वल तो यह 'आज ' रहेगा नहीं जब तक तुझे नींद आयेगी 'कल' हो गया रहेगा......और फिर तुम संकल्प कर रही हो जगने का लेकिन बीच में सो जाना है ... "
रिया कहती है .." यानी नींद में पड़कर हम परवश हो गए ... संकल्प शक्ति हमें इसी तरह की परवशता से तो छलांग लगवाती है ... अंधकार से प्रकाश में या नींद."से जागरण में......बापू , क्या आप यही कहना चाहते हैं कि अगर कोई ब्रह्म मुहूर्त में उठने का संकल्प करे तो यह कहे 'हे निद्रा देवी ,तुम ठीक चार बजे मुझे छोड़ देना..."
मैं हँस देता हूँ । वस्तुतः यह हंसी उसकी तेज मेघा से समुद्रभूत् तर्कनाओं की स्वीकृति की हंसी है । मुझे खुशी होती है बहुत दिनों के बाद रिया मुखर और प्रफुल्लित नजर आई है .....मैं चुपचाप कुछ लिखने का उपक्रम करता हूँ या अपने आपको एक पारदर्शी भ्रम में छुपाने की कोशिश करता हूँ।
रिया, पसर कर लेट गई है।मैं कुछ महत्वपूर्ण लिखने के पूर्व की चिंतन मुद्रा में उसकी ओर देख लेता हूँ । उसकी मुखाकृति कुछ कठोर हो गई ...जैसे कोई संकल्प कर रहा होता है तब उसका मुख किंचित कठोर हो जाता है ... दृढ़ता के भाव चेहरे पर टंग जाते है........ रिया की यह विशेष मुद्रा , प्राणायाम में किसी योगिनी सी लग रही है ।
रिया ! " मैंने कुछ टोकने के टोन में कहा है । वह दीर्घ निश्वास छोड़कर मुझे देख लेती है ।
"भई , बात दरअसल यह है, हमारा संकल्प पूरा होता है या नहीं . वह इस बात पर निर्भर करता है कि हमने उसे कितनी शक्ति या आंतरिक ऊर्जा दी है ..... यदि उस संकल्प को पूरा होने में लगने वाली आंतरिक उर्जा या आत्मिक शक्ति और हमारी संकल्पात्मक अनुभूति में एक निश्चित अनुपात हो तो वह संकल्प अवश्य पूरा होगा ... "
रिया, सवालिया निगाहों से मुझे देख रही है और वही क्यों , कोई भी मेरी इस तर्क को सुनकर सवालिया निगाह से देखता..... मैं स्वयं यदि इस वक्त एकान्त में होता तो अपने आप से पूछता - "यह संकल्पात्मक अनुभूति क्या है? यह आंतरिक ऊर्जा..... यह आत्मिक शक्ति?.....
रिया मुझे लगातार देखे जा रही है । उसकी सप्रश्न नजरों में किसी रहस्य को जान लेने की आतुरता नहीं है बल्कि अनावश्यक तरीके से उलझा दी गई बौद्धिक ग्रन्थि को सुलझाने का आग्रह है ।
"देखो बेटे !"
मैं थोड़ी देर के लिए चुप हो गया हूँ । चुप्पी के इस अन्तराल में मैं महसूस कर रहा हूँ- ' बेटे' के स्नेह पूरित संबोधन की आर्द्रता कंठ को भीगो गई है । रिया अधलेटी सो गई है । मैं कहता हूँ - - " मैं तुम्हें यह बताना चाहता था रिया कि मान लो तुम ठीक ब्रह्म मुहूर्त में उठने का निश्चय करती हो तो आवश्यक है तुम्हारे मन - प्राण उस वक्त ब्रह्म मुहूर्त की ताजगी और पवित्रता से भर जायें...... फिर चाहे तुम सो भी जाओ अंतर नहीं पड़ने वाला.....तुम्हारी अंतरात्मा उस क्षण की प्रतीक्षा करेगी जब ब्रह्म मुहूर्त शुरू होता है ..
वह स्वयं तुम्हें उद्बुद्ध करेगी ।
रिया जम्हाई लेते हुए मुंह के पास चुटकी बजाई है । इसका मतलब है उसे जोरों से अभी भी नींद आ रही है। उसकी बड़ी बड़ी उज्ज्वल आँखें अलसा गई हैं । लालटेन की रोशनी आंखों में न पड़े इसलिए उसने अपना दांया हाथ आंखों पर रख लिया है और मैं उसे हैरानी से देख रहा हूँ ......मेरे मस्तिष्क के किसी केन्द्र में कोई चीज फिरकी सी घूमने लगी है ... बड़ी तेजी से मैं न चाहते हुए भी रिया की इस विशिष्ट मुद्रा को देख रहा हूँ .. मन में यह भय भी है कि कहीं इस तरह देखते हुए रिया मुझे देख लेती है, तो शायद अचकचा जाएगी .....मैं स्वयं बड़ी विचित्र मनोदशा में पड़ जाऊंगा..... कह नहीं सकता ग्लानि होगी, पछतावा या क्षोभ......
माँ- बेटी में कितना साम्य है.....रूप साम्य.....प्रकृति साम्य यहाँ तक कि स्वर भी वैसा ही.... हे ईश्वर, मुझे दंड देने का यह कैसा नायाब तरीका है तुम्हारा......
मैं देर रात तक लिखता पढ़ता था और संजू (रिया की माँ ) इसी तरह आँखों पर हाथ रख सो जाया करती थी....
मैंने लॉलटेन को मद्दिम कर दिया है और' हे राम ' के बाद खाट पर निढाल हो गया हूँ ......यह 'हे राम' कभी गहरी थकान का व्यंजक होता है। कभी पराजय बोध का तो कभी विवशता का लेकिन आज इस वक्त, मैंने अपनी खतरनाक स्मृतियों के इन्द्रजालिक प्रभाव से मुक्ति की व्यंजना महसूस की है । इस हे राम में ...
रिया ने अचानक मेरी ओर करवट ली है । उसके कोमल .. नासा -पुट से नींद धीमे सुर में झर रही है ..... काश कि मुझे भी नींद घेर लेती अपनी चरम गहराई में.........विगत से स्वयमेव निजात मिल जाता.....स्वप्न की छटपटाहट से भी ......चिर निद्रा सी गहनता.........
डाक्टर सहगल ने सख्त हिदायत दी है कि मैं जहाँ तक हो सके , मानसिक तनाव से मुक्त रहूं... . ज्यादा सोचूं विचारूं न...... स्वाभाविक नींद पड़नी चाहिए.... जिस तरह की दवा मुझे दी जा रही है , अनिद्रा की स्थिति में ' एलर्जी ' या किसी अवांछनीय किस्म की' जटिलता उत्पन्न कर सकती हैं ..... डॉ.सहगल ने हलके से बुदबुदाया था स्वाभाविक नींद पड़नी चाहिए...... नींद क्या मेरे वश में है ?........ तमाम अस्वाभाविक वर्जनाओं के बीच जीने वाला इंसान कभी स्वाभाविक नींद सो सकता है? पन्द्रह साल के इस सुदीर्घ विधुर जीवन में पूर्णतः टूट गया हूँ मैं ....हर पल टूटता रहा हूँ.....
पौने बारह हो गए। पन्द्रह मिनट बाद मिशन का 'घड़ियाल' अर्धरात्रि की घोषणा करेगा .....अब क्या खाक नींद आएगी मुझे ?
रिया कुछ अस्पुट स्वर में लगातार बड़बड़ाए जा रही है ..... शायद मेरे चिंतन की तरंगे उसके मस्तिष्क के तन्तुओं को प्रभावित कर रही हैं ..... नहीं , मुझे कुछ भी नहीं सोचना चाहिए। समीप में सोई किशोरी रिया का मस्तिष्क बड़ा संवेदनशील है ...... उसके होंठ लगातार फड़क रहे हैं , जाने क्या कह रही है ... कल हिन्दी का पेपर है शायद उसी की धुन लगी है ..... लेकिन वह तो बीच बीच में 'माँ'..... मेरी स्नेहमयी ... करुणामयी माँ .... कहे जा रही है। ओह... बच्ची का मन अपनी माँ के लिए भटक रहा है" शायद....
मैंने स्नेह से उसके माथे को छुआ है 'हे भगवान , इस अनाथ बालिका का मंगल करो...... हे दयामय मेरी अमंगल छाया इस गरीब पर न पड़ने देना भोले .....रक्षा करो ...
आँखों से स्वतःसहस्त्र धारा फूट चला है। मैं काफी हलका महसूस कर रहा हूँ जैसे बहुत बड़ा बोझ कन्धे से एकाएक हट गया हो ...... उस ' अनन्त ' ने प्रार्थना सुन ली लगता है । सहसा वर्षों पहले देखा एक स्वप्न याद आ गया है । वह विचित्र ' विजन ' वाला स्वप्न मेरी डायरी में कहीं लिखा हुआ है इसलिए अक्सर याद आ जाता है । और फिर इस स्वप्न का मेरे जीवन से गहरा संबंध भी तो है ..... एक 'आरो ' - प्रकाश वलप में घिरा दिव्य पुरुष - कुछ कुछ विष्णु की प्रतीति कराता हुआ प्रकट होकर कहने लगा " बोलो , तुम्हें क्या चाहिए ! .....
मैं हतप्रभ उसकी ओर देखता रहा । कुछ समझ में न आया किस तपस्या का परिणाम है यह - मुझे देखकर उस प्रभामय ने अमृतवाणी से फिर कहा- ' 'बोलो , तुम्हें क्या चाहिए और मैं सचमुच हड़बड़ा कर मांग लिया 'वेदना' वह देव मूर्ति मुझे यों देखने लगी जैसे मैंने कुछ गलत या दुर्लभ वस्तु मांग ली हो जो शायद उसके पास न थी......फिर बड़ी मुश्किल से उसने अपना दायां हाथ उठाया और मायूसी के साथ कहा- 'एवमस्तु ....' और वह प्रकाश की तरह अन्तर्धान हो गया तब मैं चौक कर उठ बैठा था शायद......
मैं अब भी सोचता हूँ - वह स्वप्न मेरे लिए सिर्फ स्वप्न न था.....बल्कि स्वप्न से भी बढ़कर था । किसी जन्म में मैंने जरूर तपस्या की रही होगी और मुझे मेरा वरदान स्वप्न में मिला...... यह संसार भी तो स्वप्न है ...... सच्चिदानन्द के द्वारा वेदना जैसी दुर्लभ वस्तु का दान सिर्फ स्वप्न में ही संभव हो सकता था.......
तो जीवन में दुखों का यह चौतरफा आक्रमण मेरी खुद की इच्छा का फल है...... लेकिन मुझे यह अधिकार नहीं कि रिया जैसी निर्दोष बालिका को अपने दुखद संदर्भ का आखेट बना दूं...... वेदना का यह वैभव नितान्त मेरा है - मुझे दूसरे को इसमें भागीदार बनाने का कोई हक नहीं ।
दूसकी शादी रचाने के पहले यह मुझे अच्छी तरह सोच लेनी चाहिए थी कि नन्ही रिया की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है । लेकिन कहाँ ? मैंने अपने सुख और स्वार्थ को ही प्रधानता दी ...... अब सोचने से क्या फायदा जब ... ....काश , रिया के भविष्य के बारे में सोच लेता .......
लेकिन वह सब तो होना था जिनके लिए हमारा जन्म हुआ है ..... किसी भी दुर्घटना के पात्र तो पहले से चुने चुनाए होते हैं ....... नियति के मोहरे हैं हम सब ...
....... दूसरी वाली उड़ीसा से थी- स्वभाव से निर्लज्ज , कर्कशा और ... शादी के बाद ही पछतावे की शुरुआत हो गई....... उसके माँ - बाप ने बहुत सोच समझ कर नाम रखा था - झसकेतनी-
मैं पुनर्विवाहित होकर भी मन से विधुरता का केंचुल न निकाल सका । दूसरे साल रिया का भाई ( सौतेला ) हुआ और तीसरे साल ही गांव के एक डबरे में डूबकर गुजर गया । तब रिया सात वर्ष की थी । वह अपने छोटे भाई को सीने से लगाए घर - घर घूमा करती थी। कभी स्कूल तक घुमा लाती तो कभी गांव के दूसरे छोर में स्थित मनराखन सिंह फिरकी वाले के घर तक और कभी गांव के उस मनहूस बड़े से डबरे के पास कछुआ या मेंढक दिखाने ले जाती ।
और एक दिन अचानक उस डबरे के बड़े पार की फिसलनदार दर्रीली सीढ़ीनुमा पाँव डगरी से उतरते वक्त रिया का पैर फिसल गया और मुन्ने को लिए हुए एकदम पानी के भीतर चली गई।
जनानाघाट से दौड़कर , थेथीबाई नामक एक औरत डबरे में कूद गई और कुछ प्रयास के बाद दोनों बच्चों को बाहर ले आई...... लेकिन मुन्ने के लिए शायद विलम्ब हो गया था ......और इस तरह उसकी मृत्यु का कलंक सात वर्षीया रिया के मत्थे मढ़ दिया गया । फिर तो उसके जीवन में यन्त्रणा का वह दौर चला , जिसे सिर्फ वही महसूस कर सकता है जो उस दौर में साथ चला।
बड़े खतरनाक और मारक विशेषणों से विभूषित हुई थी रिया ! कभी कभी मुझे उसका डूबने से बच जाना अखरता था। छोटी उम्र में इतने बड़े अन्याय और अत्याचार सहने से तो अच्छा था वह भी उस डबरे में डूब कर मर जाती।
एक दिन वह समय भी आया जब मेरी दूसरी वाली ने एक बड़ा विचित्र प्रस्ताव मेरे सामने रखा कि मैं किसी एक को चुन लूं - उसे या रिया ( को )
मैंने रिया को चुना...... किसकी आत्मदया पर छोड़ता उसे?
वैसे भी मैं समझ गया था यह झसकेतनी मेरे साथ ठहरने वाली नहीं । उसे बहाना चाहिए था और मुझे एक मौका। वह दूसरे ही दिन अपने मायके को प्रस्थान कर गई फिर लौटकर कभी न आई ...
मैंने लालटेन की बत्ती चढ़ा दी है । मटमैला प्रकाश कमरे में फैल गया है और बरबस मेरी भीगी आखें रिया के जूही की तरह खिले हुए मुख पर स्थिर हो गई है। रिया बेसुध सो रही है।
करीब करीब इसी उम्र में तो 'संजू' हमारे घर आई थी । पहली रात को रिश्ते की एक चंचल - पूजा भाभी ने चुटकी लेकर कहा था -" देवर जी, अभी कली है, जरा संभाल के....'
पुराणों में वर्णित किसी सुंदरी सी थी वह । मैं उसकी रूपमाधुर्य को देखकर चकित रह गया था । चम्पक वर्णी देह से तरल धृति झरती सी लगती । उसकी आखें मुग्धा हिरणी की तरह बड़ी बड़ी और साफ चमकीली थीं । पतले - पतले गुलाबी होठों से जैसे मधु टपकने का भ्रम होता । जब बोलती तो होठों के बीच प्रवाल से छोटे - छोटे दांत झलक जाते । जब वह शर्माती कर्णपल्लव तक लाली दौड़ जाती और पतली नासिका की नोक इतनी लाल हो जाती कि लगता लहू अब टपका - अब टपका।
संजू मर गई लेकिन रिया , को जन्म दे गई। दाइयों का कहना है - प्रसव के तुरन्त बाद उसकी इहलीला समाप्त हो गई थी ... मैं समझता हूँ इसका सिर्फ कायान्तरण हुआ है .....
संजू के संदर्भ में मृत्यु की बात सोचना मुझे अब भी बड़ा विचित्र लगता है.......लेकिन यह सब मुझे याद क्यों आ रहा है....... आज ही , गोया महाप्रयाण की तैयारी में सारा विगत जीवन फिल्म की तरह आघान्त घूम गया हो .... लोग कहते हैं ...... बाएं हाथ का सीने पर आ जाने के बाद दुःस्वप्न जैसा....ओह ।
डाँ. सहगल ने सख्त हिदायत दी है .......वर्जनाओं का अंबार लगा दिया है उसने...... और मैं सब वही कर रहा हूँ.......तनाव पूर्ण कार्रवाइयाँ ......नैश जागरण.... चिन्ता...... अन्तहीन विचारों का सिलसिला ... कौन जाने अगली सुबह नसीब में है या नहीं.......सुबह होने में अब देर भी कहाँ है ! ... दो का घड़ियाल तो अभी अभी ठनका है।
और मुझे यह अवांछनीय एहसास क्यों होने लगा है कि अगर मैं आज बच जाता हूँ तो ज्यादा से ज्यादा कुछ दिन और खींच ले जाऊंगा लेकिन शायद रिया के हाथ पीले कर जाने की तमन्ना रह जाएगी..... जबसे उसे साड़ी ब्लाउज में देखा है यह नए किस्म की चिन्ता सवार हो गई है........ आखिर मैं यह सब नहीं करूंगा तो और कौन करेगा ? डा. सहगल क्या आकर सब कर जाएंगे! योग्य वर की तलाश कर पाना क्या आसान काम है । आज जबकि सभी समाज में दहेज के मामले में होड़ लगी हुईं हैं ..... कम से कम पन्द्रह लाख रुपए का जुगाड़ और अपना यह आलम ... पैसे के बल पर अच्छा से अच्छा वर किसी भी दूकान से खरीद लिया जा सकता है......
परसों रिश्ते की एक काकी आकर चेता गई है, ' बाबू ! नोनी तो चंदा कस बाढ़त हावे , अब ओखर सेती योग्य बर के खोज करौ ... तुहीच ओखर माँ - बाप हव ... हाथ म हाथ धरे झिन बैठे रहव ... '
मैंने मन ही मन कहा था- किसी अज्ञात अमेरिका की खोज कर लेना सरल है किन्तु योग्य वर खोज पाना .....ओह ! असंभव ,कितना कठिन है ........
तो उस काकी ने खूब भांपा....... मैं हाथ में हाथ धरे बैठा हूँ ... मुझे कोई चिंता नही ... और यह जो मेरे भीतर मोम की तरह तिल - तिल पिघल रहा है वह! चिन्ता-सोच का दीमक सारे स्वास्थ्य को चाट गया और काकी कहती है कि मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा हूँ ।
इधर डाँ.सहगल की चेतावनी अब सीमा पार करने लगी है। कल सुबह देखते ही टोक दिया मुझे - " ओ माय गॉड , आखें लाल - चेहरे पर लटकी हुई थकान माथे पर चिन्ता की गहरी लकीरें ... मिथलेश जी , यह सब क्या बकवास है ......तुम रतजगा करने से बाज नहीं आने वाले ... तभी वो सारी दवाइयाँ बेअसर हो रही है.... ।
तुम्हें किस बात की चिंता है आखिर?
फिर सहसा उसकी नजर पास खड़ी रिया पर पड़ी थी,और वह जैसे नरम हो गया - बोला "अरे रिया तुम ? भई , साड़ी में तो बिल्कुल पहचान में नहीं आ रही.......
वह लजाकर नतमुखी हो गई तो डॉ.सहगल ने मेरी सारी चिन्ताओं को उस बेचारी की साड़ी से जोड़ते हुए कहा " रिया, देखा, तुम जरा साड़ी में क्या उतर आई और इधर तुम्हारे बाप तुम्हे घर से निकालने की सोच रहे हैं ... "
वह अंदर की ओर भाग गई तो डा .सहगल ने मेरी तरफ गौर से देखा और मेरे कन्धे पर अपना हाथ रख दिया- आश्वासन का हाथ - मिथलेश बाबू, डोन्ट वरी ... बिटिया के ब्याह की सारी जिम्मेदारी आज से मेरी..... ओ . के .?
रिया फिर कुछ बुदबुदाई है- उसके होंठ जल्दी जल्दी हिल रहें हैं जैसे जाप कर रही हो . ओम भूर्भुवः स्व.....माँ .......माँ........ करूणामयी .......ममतामयी.......
मैं उचटती निगाह से उसे देख लेता हूँ लेकिन इस बार अनायास ही मेरा ध्यान उसके नीले परिधान पर ठहर गया है और अब मेरी समझ में आया कि काफी देर से डामर गोलियों की गन्ध मैं क्यों महसूस कर रहा था ... लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि रिया इन नामुराद यादों के ताने बाने से बुनी साड़ियों को पहनकर कौन सा सुख पा लेती है....... जबकि मैंने नई साड़ियाँ पहले से लाकर रखी हुई है उसके लिए ... कभी वह इन स्मारक साड़ियों के बहाने मुझे दुखी कर आत्म पीड़न जैसा सुख पाने के जटिल क्रिया का शिकार तो नहीं हो रही?.....
मैं देख रहा हूँ - आए दिन वह ऊपर वाला कमरा , जो बरसों से बंद पड़ा था , विधिवत साफ सुथरा रखा जा रहा है और 'उसके' ट्रंक,ड्रेसिंग, टेबल, आदि सामानों के रखरखाव पर ध्यान दिया जा रहा है
शायद , परसों की ही बात है - अल सुबह , रिया अपनी मां के तैल चित्र के सामने अञ्जलि बद्ध ध्यानमुद्रा में खड़ी थी ... निर्निमेष उस धुंधला गए तैलचित्र को देखे जा रही थी।
बड़ा अद्भुत और मार्मिक दृश्य था वह ... लाल रंग की बनारसी साड़ी में ... आराध्या और आराधिका दोनों थी......यह कहना बेहतर होगा कि एक ही साड़ी को दोनों पहने हुई थीं। पन्द्रह वर्षों का बहा हुआ समय जैसे घूम - फिर कर वापस लौट आया था और नए सिरे से अपने को दुहरा रहा था.....
मैं जैसे किसी अंतर्प्रेरणा से इस विचित्र दृश्य को देखने के लिए ही उतनी सुबह उठा था वर्ना सात के पहले उठने वाला जीव नहीं हूँ मैं ...
मुझे व्दार पर खड़े देख अचानक वह चौक गई थी - " अरे बापू ,आप ?"
"क्यो! यकीन नहीं हो रहा है ? " मैंने हँस कर कहा । अनजाने तौर पर उसे दुलहन - रूप में देखने की साध पूरी हो गई थी .....आत्मिक सुख .....आंखों में विचित्र चमक थी उसकी ... चिर परिचित सुगंध आसपास फैले रही थी ...
" माँ की बहुत याद आती है रिया?
मैं न चाहते हुए भी उसे पूछ लिया था । वह जाने को हुई तब मैंने पुनः कहा- " रिया, ऐसी साड़ियाँ अब 'आउट ऑफ फैशन' हो गई हैं बेटा ... तुम्हारी सहेलियाँ ही देख कर हँस देंगी . मैंने जो साड़ियां लाई , पसन्द नहीं है क्या ... ?
कुछ क्षण वह बेबसी से देखती रही मुझे , फिर बोली-" बापू , मैं सब समझती हूँ ... लेकिन न जाने क्यों , माँ की इन साड़ियों को जब भी मैं अपने शरीर पर धारण करती हूँ - मुझे लगता है जैसे माँ का कोमल स्पर्श मेरे रोम - रोम में प्रवीष्ट हो रहा है.........बापू....."
वह एकाएक रो पड़ी थी । मैं सीने से लगा लिया था उसे । बड़ी अजीब है रिया। तुरन्त सिर उठाकर होठों पर मुस्कुराहट ले आई थी .......कितनी विचित्र लगी थी उसके उदास होठों की सायास मुस्कुराहट .. उसने कहा था 'छी आप भी रोते है बापू ! "
" पगली , तुझे रोती देखकर भला किस पत्थर का दिल नहीं पसीजेगा...."
बाहर तेज हवा चल रही है । आसमान में बादलों की चहल पहल बढ़ गई है । बिजली रह रह कर कौंध रही है। पीछे की ओर खुलने वाली खिड़की के शेड पर झुक आई आम की टहनी रह रह कर रगड़ खा रही है जिससे वातावरण की शांति भंग हो गई है।
मुझ पर तन्द्रा सी छाने लगी है । पलकों में नींद का भार होने के बावजूद वे बंद नहीं हो पा रही है जैसे पलकों में छोटे छोटे कांटे उग आए हों..... मैं स्थिर सो जाने की कोशिश में हूँ अतएव अपने आपको ढीला छोड़ दिया हूँ आखिर नींद अपना मान तोड़ेगी ही ... लेकिन मान टूटा नहीं
लगता है , समय के पहले , रिया उठ गई है । सबसे पहले उसने अलार्म का स्वीच दबाया है कि मेरी नींद में खलल न पड़े । वह टेबल पर जम गई है ... घनघोर अध्ययन शुरू हो गया है - इंद्रासन को हिलाने की हद तक ... आखिर मुझ पर निद्रा देवी की कृपा हुई.....
अचानक नींद खुल गई है.... बीच में टूटन का एहसास..... सूरज काफी ऊपर चढ़ आया है इतना खयाल है , कोई दुःस्वप्न में लगातार पुकार रहा था ...ओह डा. सहगल आकर लौट गये होंगे रिया मुझे उठाए बगैर परीक्षा देने चली गई- आश्चर्य ।
सारा घर भांय- भांय कर रहा है ..... माथे में दर्द बेहद ..
बाहर कोई रो रहा है । " कौन ? ... अरे काकी तुम?क्या हुआ?... काकी मेरे उठने का इंतजार कर रही थी।
"भगवान के लिए जल्दी बोलो काकी क्या हुआ ? " किसी भारी अनिष्ट की आशंका से बेतरह घिर गया हूँ मैं "। काफी मुश्किल से बोल पायी है -
" तोर बर विधाता बाम हो गइस बेटा ... "
" पहेलियाँ मत बुझाओं काकी ,क्या हुआ बोलो.. रिया कहाँ है ? .. "मैं उसकी बाहों से पकड़कर झंझोड़ दिया हूँ । वह रुद्ध कंठ से बोली है
रिया बिटिया परीक्षा देहे बर गय रहिस कि रद्दा म ऊँखर एक्सीडेंट होगिस बेटा .......
मैं हतसंज्ञ उसे देख रहा हूँ.....दुःस्वप्न की प्रतीति घना अंधेरा छा गया है मस्तिष्क में..... मैं किस तरह मिशन हस्पताल पहुंचा स्वयं नहीं जानता ....
डा. सहगल के शब्द कानों में पड़ रहे हैं कोई खास बात नहीं है मिथलेश बाबू .... चिंता की बात नहीं है .... बचा ली गई......
मैं कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ ... आखें सिर्फ देख रही हैं रिया पड़े हुई है , कराहती हुई । हाथों में- पैरों में पट्टियां बांधी जा रही है ... मुझे आया जानकर वह अपनी कराहों को दबाकर मुस्कुराने की चेष्टा करती है ... और मैं उसकी इस चेष्टा को बर्दाश्त नहीं कर पाया ... सहसा उससे लिपट कर रो पड़ता हूँ डॉ.सहगल मुझे खींचकर बाहर ले गए हैं ।
मेरे कानों में रिया के शब्द गूंज रहे हैं - बापू , इस बार अगर मैट्रिक में फर्स्ट क्लास न आई तो जिंदगी में कोई परीक्षा न दूंगी।
बसन्त राघव
पंचवटी नगर,मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड,बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़,basantsao52@gmail.com मो.नं.8319939396
---------------------------
Comments
Post a Comment