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यूक्रेन युद्ध

यूक्रेन-युध्द ------------- ....क्या हो गया है  इस बदहवास भीड़ को! क्यों भागे जा रहे हैं बेतहाशा क्यों है इतनी बेचैनी छोड़ने की .. अपने वतन को .... सहमें हुए हैं घायल रक्त रंजित वृध्द,बच्चे, स्त्रियां भागे जा रहे हैं भागे जा रहे हैं शरणार्थी शिविरों की ओर .... आज सारा युक्रेन  तब्दील हो गया है  श्मशान में  जल रहा है धू -धू   एक आग सुलगने लगी है लोगों के भीतर भी लहू खौल  रहा है युद्धोन्माद के खिलाफ एक यक्ष प्रश्न तैर रहा है हवा में  क्या युद्ध के अलावा और कोई रास्ता  नहीं बचा है समाधान का ... ... हर क्षण भयावह और वीभत्स जाने कब कौन,कहाँ  शिकार हो जाये निर्दय खूंखार गोलियों का उडाये जा रहे हैं मिसाइलों से इंसानियत के परखच्चे  शनैश्चर विचरण  कर रहा है मुंडेर - दर -मुंडेर .... कहीं यह अतंर्दृष्टि की  घोर चूक तो नहीं वोलोदिमीर जेलेंस्की देखो तो कैसा मंजर है  चारों ओर  या फिर तुम्हें दिखाई नहीं देता कि क्या हो रहा है? .. किसी को कुछ नजर नहीं आता कोहरा बहुत घना है तो जायें कहाँ,  हर मोड़ पर तो खतरा है "टैंक"  मुह...

राष्ट्र को समर्पित पं.लोचन प्रसाद पांडेय की पद्म पुष्पांजलि

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राष्ट्र को समर्पित पं . लोचनप्रसाद पाण्डेय की पद्म पुष्पांजलि *************************************** डाँ. बलदेव     अन्य समकालीन साहित्यकारों की अपेक्षा पाण्डेय जी की मुश्किलें कुछ ज्यादा दिखाई देती हैं । पहले दो भाषा को ही लें । वे पहले ब्रजभाषा में लिखते थे । तब छत्तीसगढ़ के दो साहित्यकार जगमोहन सिंह ठाकुर और आचार्य जगन्नाथ भानु पूरे हिन्दी प्रदेश में ख्यात हो चुके थे । इनमें प्रथम प्रेम और सौंदर्य के रसिकराज कवि थे , तो दूसरे पिंगलाचार्य । दोनों की भाषा ब्रज थी । पाण्डेय जी आचार्य भानु को गुरुवर मानते थे , उनके सानिध्य का लाभ भी उन्हें मिला , लेकिन ब्रज छोड़ कर उन्होंने हिन्दी में प्रवेश किया , यह एक जोखिम भरा काम था । जबकि ब्रज और हिन्दी का झगड़ा उग्र रूप धारण कर चुका था । इतना ही नहीं , आगे बढ़कर पाण्डेय जी ने उड़िया ही नहीं , छत्तीसगढ़ी में भी लिखने का साहस किया । इसके पीछे उनका उद्देश्य समझ में आता है निम्न पंक्तियों दृष्टव्य हैं:-            सुनत हव निंद के घोर        ...

बचपन कहीं पीछे छूट गया (कविता)

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बचपन कहीं पीछे छूट गया                 *********************          कंकरीट का जंगल शायद रास आ आया          कागज का गुलशन और भी पास आ गया          कमल तलैया, अमरैया स्वप्न हुए          मेरे गांव में बसने शहर आ गया         बचपन के सभी साथी लगते हैं पराए         कोई नहीं पूछता अब क्या हाल बताएं         चल देते हैं करीब से  जैसे जानते नहीं         छुटपन की जिद्दी यादों को कैसे समझाएं         बचपन बहुत बहुत पीछे कहीं छूट गया         सपनों वाला इन्द्रधनुष भी, लो टूट गया         उसकी भोली सावली सूरत भूला...

कवि और उसका चरित्र:-पं.मुकुटधर पांडेय.

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कवि और उसका चरित्र  ******************* पं.मुकुटधर पांडेय       कवि शब्द बहुत महत्व का है । कवि का आसन बहुत ऊंचा है । राज राजेश्वरों की भी पहुंच वहाँ तक नहीं । इसका कारण यह है कि कवि ईश्वरीय विभूति संपन्न होते हैं । इसीलिए लोग उन्हें पूज्य दृष्टि से देखते हैं । और उनकी रचनाएँ संसार की स्थाई संपत्ति समझी जाती हैं । इन रचनाओं में सर्वत्र प्रतिभा की प्रभावशालिनी रश्मियों का समावेश रहता है । इस कारण वे मनुष्य की हृदय कलिका को खिलाकर उसके अंतर प्रदेश को प्रकाशित करने की शक्ति रखती है ।        अच्छा , तो कवियों के व्यक्तिगत चरित्र कैसे होते हैं ? क्या वे सदैव ही अनुकरण योग्य होते हैं ? क्या साधारण लोग उनका अनुकरण करके लाभ ही उठा सकते हैं ? आजकल शिक्षित लोगों में विशेषकर उन नवयुवकों में जिन्हें कविता से प्रेम है और जो कुछ तुकबंदी करने का यत्न किया करते हैं , कवियों के चरित के अनुकरण की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है । कवियों का महत्व देखते यदि लोगों में उनकी नकल करने का उत्साह उत्पन्न हो तो कोई आश्चर्य नहीं । यदि वे नीर क्षीर विवेक का अनुसरण करत...

पं.लोचन प्रसाद पांडेय लेख डाँ. बलदेव

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18 नवम्बर साहित्य वाचस्पति पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी की पुण्यतिथ पर विशेष आलेख:- डाँ. बलदेव काव्य यात्रा *********  खड़ी बोली के विकास में जिन साहित्य मनीषियों ने अपना सर्वस्व अर्पित किया था , उनके बीच साहित्य वाचस्पति पं . लोचनप्रसाद पांडेय का नाम अत्यंत श्रद्धापूर्वक लिया जाता है । आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने म.प्र . की काव्य प्रवृत्तियां शीर्षक लेख में उनकी महत्ता इन शब्दों में व्यक्त की है- श्री लोचन प्रसाद पाण्डेय और उनके अनुज श्री मुकुटधर पाण्डेय हिन्दी काव्य में उसी प्रकार समादृत हैं , जिस प्रकार उत्तर प्रदेश में मैथिलीशरण गुप्त और उनके छोटे भाई सियारामशरण गुप्त ' । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल की नई धारा के प्रथम उत्थान में भारतेन्दु , प्रतापनारायण मिश्र , प्रेमधन , ठा . जगमोहन सिंह और अम्बिका प्रसाद व्यास को प्रमुख कवियों के रूप में स्वीकार किया है । नई धारा के द्वितीय उत्थान के कवियों में उन्होंने श्रीधर पाठक , हरिऔध पं . महावीरप्रसाद द्विवेदी , मैथिलीशरण गुप्त , पं . रामचरित उपाध्याय , गिरधर शर्मा नवरत्न और लोचनप्रसाद पाण्डेय की ...

विशेष लेख

(छः अक्टूबर डाँ. बलदेव जी की जयंती पर विशेष) अनन्य अनुसंधिस्तु डा. बलदेव ************************ डॉ बलदेव को पहली बार मैंने तब देखा था जब मैं बमुश्किल 9-10 वर्ष का था। वे मेरे पिता और हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ प्रो. ईश्वर शरण पाण्डेय के पास अपनी पीएचडी थीसिस की पांडुलिपि लेकर आए थे। उन्होंने पिताजी से आग्रह किया कि वे इसे पढ़कर अपने बहुमूल्य सुझाव दें ताकि यह शोध अधिक प्रामाणिक, परिवर्धित,परिष्कृत और परिमार्जित बन सके। प्रो ईश्वर शरण जी के साथ उनकी अनेक बैठकें हुईं। कई अध्यायों पर चर्चा हुई। अनेक संशोधन किए गए। तब जाकर दोनों शोध की उत्कृष्टता एवं गुणवत्ता को लेकर आश्वस्त हुए। मैं बहुत जिज्ञासा से दोनों के वार्तालाप को सुना करता था। अब भी  मैं अपने पूज्य पिता को डॉ बलदेव का प्रशंसात्मक उल्लेख करते सुनता हूँ। वे प्रायः कहते हैं - उन जैसे शोधकर्त्ता अब कहाँ? कैसी अद्भुत लगन! कैसा गहन समर्पण!! डॉ बलदेव के अंदर का शोधकर्त्ता, जिज्ञासु, सत्यान्वेषी आजीवन सक्रिय रहा। उन्होंने छत्तीसगढ़ में निवास करने वाली कितनी ही अल्प चर्चित और अचर्चित विभूतियों पर गहन एवं प्रामाणिक शोध कार्य किया जिसके का...

राम की शक्ति पूजा, समीक्षक डाँ. बलदेव

  राम की शक्ति पूजा *************** डाँ. बलदेव ------------- (1973) ऐसा नहीं है कि राम की शक्ति पूजा के आकार - प्रकार की रचनाएँ उस युग में नहीं लिखी गईं , लिखी गईं , अकेले मैथिलीशरण गुप्त ने इस प्रकार की कम - से - कम दस लम्बी रचनाएँ लिखी है , किन्तु उनमें वर्णन और किसी वृत्ति की प्रधानता है । इन रचनाओं के बीच राम की शक्ति पूजा जैसी प्रौढ़ आत्मपरक रचना आई , तो विभ्रम होना स्वाभाविक है । किसी ने इसे महाकाव्य कहा तो किसी ने खण्डकाव्य और किसी ने वीर गीत या लम्बी कविता कहा । जानकी वल्लभ शास्त्री के अनुसार ' राम की शक्ति पूजा ' के समान स्वरूप आकार - प्रकार का परम प्रौढ़ प्रबन्ध काव्य विश्व की किसी भाषा में नहीं लिखा गया है । निराला के लिए भी यह नया प्रयोग था । उनके शब्दों में , “ इसका विषय तो पुराना है पर अदायगी और अनुबन्ध एकदम नया है । "                               “ महाकाव्य में जहाँ जीवन की सम्पूर्णता पर ध्यान होता है , वहाँ यह जीवन क...