Posts

सपनों की तलाश

Image
सपनों की तलाश-(कहानी)  --------------------------- बसन्त राघव              मिस मोयना मिंज जब बस से उतरी तो उसे बड़ा अजीब सा लगा। नई जगह, नए लोग । सब कुछ नया और अनजाना था उसके लिए। कई अपरिचित निगाहें उसे घूर रही थीं । एक अनजाना भय उसके भीतर कुलबुलाने लगा। उसने अपना पल्ल्रू ठीक किया और कुली को सामान नीचे उतारने के लिए कह दिया । जैसे ही वह चलने के लिए तैयार हुई , एक सजीला नवजवान सामने आकर खड़ा हो गया । उसने झिझकते हुए कहा- " क्या आप ही मिस मोयना मिंज है ? '       "जी हाँ , आपकी तारीफ़ ?"  मोयना मिंज ने ऐसे कहा जैसे वह बिलकुल सहज और बेधड़क हो । ... और उसने प्रश्न वाचक दृष्टि उस पर डाल दी । युवक की आँखों में एक चमक उठी, उसने किंचित मुस्कुरा कर कहा- मैं वेट्रिनरी फील्ड असिस्टेंट लक्ष्मीकांत मिश्रा हूँ । मि ०मिंज ने लिखा था कि आज आप शाम वाली बस से आ रही है । "        " बड़ी प्रसन्नता हुई आपसे मिलकर " और उसने नमस्ते की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़ दिए। "पापा ने बताया ...

संभावनाओं का अंकुर (कहानी) बसन्त राघव

Image
  संभावनाओं का अंकुर  :  (कहानी)   ----------------------- बसन्त राघव  मैं जलती हुई मोमबती को देखे जा रहूँ | एकटक - अपलक त्राटक सा कर रहा हूँ । लेकिन मेरा ध्यान डोलती हुई लौ पर उतना नहीं जितना ऊपरी सिरे के मोम के पिघलने- पिघल- पिघल कर अस्त व्यस्त  गिरकर , कहीं भी जमने और खुद पर बोझ बनने जैसी कुछ प्रक्रिया पर.......                    मैं कई बातें एक साथ सोच रहा हूँ- जैसे यह मोमबत्ती एक साथ कई महत्वपूर्ण घटनाओं के प्रतीकों को संभाले जल रही है । यह कहना ठीक होगा , मेरे सोचने और इस मोमबत्ती के जलने में कुछ हद तक समानता है । ... मैं सिर्फ सोच नहीं रहा , जैसे यह मोमबती सिर्फ जल नहीं रही ... यह पिघल रही है . एक एक क्षण मृत्यु की ओर सरकती जा रही है . तेज हवाओं से संघर्ष कर रही है मुश्किल से अपना अस्तित्व बनाए रख , तिल - तिल घुल रही है.... समय के प्रवाह में अपना क्षीण प्रकाश लुटाती हूई स्वयं बौनी होती जा रही है ..... यह मोमबत्ती अपनी आखिरी बूंद तक अंधकार  की नियति को स्वीकार नहीं कर पाएगी और बुझने  के पहले...

कबरा का प्रारब्ध : (कहानी) बसन्त राघव

  संभावना का अंकुर  :  (कहानी)   ----------------------- बसन्त राघव  मैं जलती हुई मोमबती को देखे जा रहूँ | एकटक - अपलक त्राटक सा कर रहा हूँ । लेकिन मेरा ध्यान डोलती हुई लौ पर उतना नहीं जितना ऊपरी सिरे के मोम के पिघलने- पिघल- पिघल कर अस्त व्यस्त  गिरकर , कहीं भी जमने और खुद पर बोझ बनने जैसी कुछ प्रक्रिया पर.......                    मैं कई बातें एक साथ सोच रहा हूँ- जैसे यह मोमबत्ती एक साथ कई महत्वपूर्ण घटनाओं के प्रतीकों को संभाले जल रही है । यह कहना ठीक होगा , मेरे सोचने और इस मोमबत्ती के जलने में कुछ हद तक समानता है । ... मैं सिर्फ सोच नहीं रहा , जैसे यह मोमबती सिर्फ जल नहीं रही ... यह पिघल रही है . एक एक क्षण मृत्यु की ओर सरकती जा रही है . तेज हवाओं से संघर्ष कर रही है मुश्किल से अपना अस्तित्व बनाए रख , तिल - तिल घुल रही है.... समय के प्रवाह में अपना क्षीण प्रकाश लुटाती हूई स्वयं बौनी होती जा रही है ..... यह मोमबत्ती अपनी आखिरी बूंद तक अंधकार  की नियति को स्वीकार नहीं कर पाएगी और बुझने  के पहले अ...