Posts

रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-लेखक:-डाँ. बलदेव

लेख रायगढ़ घराने के चार कीर्ति स्तंभ:-- --------------------------------------------  लेखक:-डाँ. बलदेव  राजा चक्रधर सिंह को कथक नृत्य के विकास के लिए योग्य शिष्यों की तलाश थी। अक्सर गणेशोत्सव के समय जो गम्मत या नाचा पार्टियां आती, उन्हीं में से बाल कलाकारों का चुनाव किया जाता था। बाकायदा इन बाल कलाकारों का खर्चा , आवास व्यवस्था समेत 25 रूपये माहवारी छात्रवृति भी दी जाती थी। दरबार में प्रथम नृत्य गुरु जगन्नाथ प्रसाद थे और उनका पहला शिष्य थे अनुजराम मालाकार । वे रायगढ़ के पूर्व नेपाल दरबार में नियुक्त थे। कालांतर में पं. कार्तिकराम, कल्याणदास, फिरतू महाराज एवं बर्मनलाल जी इस घराने से दीक्षित होकर चार कीर्ति स्तंभ के रुप में सामने आये।  पं. कार्तिकरामः-   अपने जीवन में कथक.नृत्य का पर्यायवाची बन गये कार्तिकराम का जन्म चांपा-जांजगीर के एक छोटे से गाँव भंवरमाल में सन् 1910 में हुआ था। वे अपने चाचा माखनलाल की गम्मत नाचा पार्टि में बतौर बाल कलाकार के रुप में हिस्सा लिया करते थे। एक दफा गणेश मेला के दौरान परी के रूप में राजा चक्रधर सिंह ने उन्हें देख लिया। बालक जितना सुन्...

रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर:डाँ. बलदेव(शभूलाल शर्मा"बसन्त")

*रायगढ़ जिले के कालजयी हस्ताक्षर .. - डॉ. बलदेव* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ कृतिशेष डॉ. बलदेव भैया जी के साथ मेरा पाँच दशक से अधिक समय तक घनिष्ठ एवं घरेलू संबंध रहा है । वे जीवन पर्यन्त नवोदित रचनाकारों को सदैव प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देते रहे। गीत , कहानी , निबंध , आलेख , आलोचनात्मक लेख आदि साहित्य के हर विधा को निरंतर पोषण दिया। जिनकी प्रतिभा ने नवोदित रचनाकारों को खूब प्रभावित किया । ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी बलदेव भैया आज स्मृतिशेष हैं ।  उनके हिन्दी व छत्तीसगढ़ी साहित्य में शिल्प सौन्दर्य का एक सहज रूप ---- दृष्टिगोचर होते हैं , इसमें बिम्बों तथा प्रतीकों का प्रयोग सुन्दर बन पड़ा है । भाषा सरल है , पढ़ते ही आत्मसात हो जाते हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ आज साहित्य जगत के राष्ट्रीय फलक पर जगमगा रहे हैं ।  भैया जी के इस साहित्यिक यात्रा में आदरणीया भाभीश्री जी ने उनको सदैव प्रोत्साहित किया । वे हमेशा उनकी ख्याल रखतीं थीं । भैया जैसे जीवन साथी पाकर अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानतीं हैं । बलदेव भैया जी भी यही कहते थे कि , "आज मैं साहित्य के क्षेत्र में जो कुछ भी हूँ , तुम्हारी भाभीश्री ज...

नवोदित रचनाकारों के प्रेरणास्रोत थे डाँ. बलदेव (डाँ. प्रमोद सोनवानी)

*नवोदित रचनाकारों के प्रेरणास्त्रोत थे डॉ. बलदेव* ~~~~~~~~~~~~~~~~~ छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण साहित्यकार व शिक्षाविद् डॉ. बलदेव जी से मेरी मुलाकात अक्सर शिवकुटीर करमागढ़ में होता था । जब भी ललित निबंधकार जय प्रकाश 'मानस' जी का रायगढ़ आगमन होता तो , डॉ. बलदेव जी के साथ करमागढ़ अवश्य आते थे । वहीं करमागढ़ के सुरम्यवादी में बना बालकवि 'वसंत' जी का निवास स्थल - शिवकुटीर में , उनसे मुलाकात होती थी ।  वे मुझे बाल साहित्य के एक नवागत रचनाकार के रूप में कुशल मागर्दर्शन देते रहते थे । उनका कहना था कि - "बाल कविता यदि सृजन करनी हो तो , सबसे पहले बच्चों के हाव -भाव को समझना सिखो । क्योंकि , उसी से बालकाव्य का प्रथम पुट निकलकर सामने आता है ।  डॉ. साहब व्याकरण संबंधित जानकारी देते हुये कहते थे - " पति - पत्नी , इन दो छोटे शब्द का भेद समझ लोगे तो पूरे व्याकरण को समझना तुम्हारे लिए आसान हो जायेगा ।  वे ऐसी छोटी - छोटी युक्ति के माध्यम से , बड़ी - बड़ी बातों को समझाने की कोशिश किया करते थे।  डॉ.बलदेव जी , जब भी करमागढ़ आते उनकी सेवा करने का मुझे सुअवसर मिलता था ।  वे मुझे नाम से नहीं ब...

पुण्य पथ पथिक:डाँ. बलदेव(रामनाथ साहू)

पुण्य पथ पथिक ************** पुण्य पथ पथिक बढ़ चला कर् विरल नेह -उपवन । स्मृतियाँ इतनी घनी .. इतनी घनी कि लगता है तुम पास ही हो यकीनन । सहज सरल समरस समगात तुम्हारी मन्द - मन्द मुस्कान जैसे प्राची में मुकुलित नवल प्रभात जिसके भी सर पर रखा प्रशस्त हस्त बन गया वह साम गान उदगाता । अवदान तुम्हारा  युग सम्भाल सके तो सम्भाले कहाँ से लाते थे तुम यह सब भर भर लुटाते पर कभी न् घटता । विस्मित चकित खड़े हैं हम क्या सचमुच कुछ हुआ ? नहीं ।  कभी और कोई भवभूति तुम सा समान- धर्मा आएगा तुम्हारे मर्मों को जगत को समझाएगा तुम तो शाश्वत हो ..चिरन्तन हो । अभी तो इस समय केवल तुम्हारा वंदन । रामनाथ साहू देवरघटा डभरा जिला जांजगीर चाम्पा  मो -9977362668

डाँ. बलदेव साव:एक शुध्द बहाव:-सुरेश उपाध्याय

डाँ. बलदेव साव: एक शुध्द बहाव :- सुरेश उपाध्याय -----------------------------------------  हिन्दी में जो भी मेरे फ्रैंड , फिल्मकार या गाइड हैं, उनमें डाँ. बलदेव साव जितने मेरे आत्मीय, अंतरंग और अभिन्न मित्र हैं, शायद कोई दूसरा नहीं और इसका सबसे मुख्य और मूल कारण यही है कि उनके भीतर का समपर्ण का भाव शिद्दत और संजीदगी के साथ घर कर गया है। वे जिसके विरोधी है, तो विशुद्ध और पूर्ण रूप से विरोधी ही हैं और इसके विपरीत वे जिसके प्रति समर्पित और सेवा भावी हैं, वहाँ पर उन पर कोई भी और कभी भी उंगली उठाने में सर्वथा असमर्थ है, और असहाय अनुभव करता है। छत्तीसगढ़ में रायगढ़ शहर में रचे बसे जनकवि श्री आनंदी सहाय शुक्ल जी जो रिश्ते में मेरे रिश्ते में श्वसुर हैं, उनके प्रति जो श्रध्दा और आस्था डाँ. बलदेव साव में है, संभवतः किसी अन्य में नहीं। और यही कारण है कि आनंदी सहाय शुक्ल के जो तीन-चार छोटे-मोटे संकलन प्रकाश में आये हैं, वे डाँ. बलदेव साव ने ही अपनी अचानक और अनायास मेहनत मशक्कत से जलाये हैं।श्री शुक्ल जी के प्रति जो जिम्मेदारी का अहसास उन्हें है, उसे महसूस कर मैं उनके प्रति आभार, धन्यवाद और अहोभ...

हिंदी साहित्य के दुलर्भ रत्न:-डाँ. बलदेव (जयन्त कुमार थोरात)

हिन्दी साहित्य के दुलर्भ रत्न-डाँ. बलदेव ----------------------------------------------------- (जयन्त कुमार थोरात)             उन दिनों मैं रायगढ़ जिले में पदस्थ था। पदस्थापना के बाद साहित्यिक अभिरुचि के कारण वहां के साहित्यकारों से मेरा जल्दी ही परिचय हो गया। वहाँ के ख्याति लब्ध साहित्यकार डा. आनन्दी सहाय शुक्ल जी से मेरी अच्छा खासा मित्रता हो गयी थी। वे प्रतिदिन शाम चार बजे मेरे कार्यालय में आते थे व आधे घंटे बैठ कर चले जाते थे।उनके अधिकतर साहित्य की बात होती थी। चुंकि वे उम्र में मुझ से काफी बड़े थे इस कारण मेरी इच्छा के अनुसार मुझे 'जयन्त जी'  ही कहा करते थे। एक दिन उनके साथ एक अपरिचित व्यक्ति भी आये। जब वे दोनों मेरे कमरे के भीतर आये उस समय में किसी जरूरी फाईल में उलझा था। इस कारण मैंने शुक्ल जी को बैठने को कहा व एक एक उड़ती नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर डाल कर काम में लग गया। अपने कार्य से मुक्त हो कर मैंने शुक्ल जी की ओर देखा।          तभी मेरी नजर उनके साथ आये व्यक्ति पर पड़ी। वे कद से छोटे, थोड़ा भारी बदन,सर पर खिचड़ी बाल,आँखो...

बल देने वाले डाँ. बलदेव भैय्या:-डाँ. देवधर महंत

बल देने वाले डा बलदेव भैया ***********************   "प्रिय देवधर । तुम निराला की तरह महाप्राण हो  ।अपनी कन्या के शोक से उबरो ।तुम्हारे भीतर अपार प्रतिभा है। तुम्हें अभी बहुत कुछ सृजन करना है । तुम निराला की सरोज स्मृति को पढ डालो।" मैं अपने गांव में था .जैसे ही डाकिया ने डा बलदेव की यह दुर्लभ  पाती दी,मेरे शोक विदग्ध मन पर शीतलता के छींटे पड गये ।सन् 1993 में वज्रपात हुआ था. मेरी सात वर्षीया दुहिता रेणुकाश्री का सफदरजंग हास्पिटल दिल्ली मे निधन हो गया था ।हम दोनों पति -पत्नी लंबे समय तक शोकाकुल रहे ।डा बलदेव ने मानो झकझोर दिया था। मैं"सरोज स्मृति " में डूब गया था ।शनै:-शनै: मैं अपनी दुनिया में लौटने लगा । ड्यूटी ज्वाइन किया । ऐसे थे डा बलदेव ।       डा बलदेव जैसा घनघोर अध्ययनशील,शोधकर्ता और समर्पित रचनाधर्मी  मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं पाया । उन्होंने मुझे साहित्य सृजन को सांस की तरह लेना सिखाया ।वे स्वप्न में भी कविताएं रचा करते थे।              अक्टूबर सन् 1988 से 1992-93 तक शासकीय सेवा के बहाने  मेरा ...