राजा साहब
(कहानी) राजा साहब ********* डाँ. बलदेव खास उम्मीदवार के लिए एक दल , दूसरे दल के लिए एक एक की जगह दो दो सीट छोड़ने को तैयार हो जाता है । इसके लिए वह कमजोर व्यक्ति को डमी के रूप में खड़ा कर देते हैं । चुनाव या सरकार बनाने के समय कुछ इस तरह के गोपनीय समझौते करने होते हैं । ये उच्चस्तरीय होते हैं । डमी को इसका पता नहीं रहता । वह बड़े उत्साह मे खर्च करता है । आम जनता इसे नहीं समझ पाती । इसीलिए वह बार बार धोखा खाती है । जातिगत समीकरण के चलते मूर्ख से मूर्ख को टिकिट देनी पड़ती है । इस बार राजघराने के दो शूरवीर मामा और भांजा चुनाव मैदान में हैं । कॉटे की टक्कर है । गाँव में धूल उड़ने लगी है । जीप और कारों की धूल आसमान को बदरंग कर रही है । इस चुनाव में आपसी स्वार्थ टकराने लगे हैं । भाई - भाई का दुश्मन चुनाव प्रचार में हैं । चाचा भतीजे खून के प्यासे बने हुए हैं । गली - खोर में मुड़ी - झंडी फरफरा रहे हैं । तिराहे - चौराहे पर नेताओं के कट आउट लगे हुए हैं । .... मुर्गे और बकरे ऊँचे दामों पर ...