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राजा साहब

(कहानी) राजा साहब ********* डाँ. बलदेव                 खास उम्मीदवार के लिए एक दल , दूसरे दल के लिए एक एक की जगह दो दो सीट छोड़ने को तैयार हो जाता है । इसके लिए वह कमजोर व्यक्ति को डमी के रूप में खड़ा कर देते हैं । चुनाव या सरकार बनाने के समय कुछ इस तरह के गोपनीय समझौते करने होते हैं । ये उच्चस्तरीय होते हैं । डमी को इसका पता नहीं रहता । वह बड़े उत्साह मे खर्च करता है । आम जनता इसे नहीं समझ पाती । इसीलिए वह बार बार धोखा खाती है । जातिगत समीकरण के चलते मूर्ख से मूर्ख को टिकिट देनी पड़ती है ।               इस बार राजघराने के दो शूरवीर मामा और भांजा चुनाव मैदान में हैं । कॉटे की टक्कर है । गाँव में धूल उड़ने लगी है । जीप और कारों की धूल आसमान को बदरंग कर रही है । इस चुनाव में आपसी स्वार्थ टकराने लगे हैं । भाई - भाई का दुश्मन चुनाव प्रचार में हैं । चाचा भतीजे खून के प्यासे बने हुए हैं । गली - खोर में मुड़ी - झंडी फरफरा रहे हैं । तिराहे - चौराहे पर नेताओं के कट आउट लगे हुए हैं । .... मुर्गे और बकरे ऊँचे दामों पर ...

एक छंद प्रेम का************महाकाल के क्रूरतम व्योम में निस्पंद *****************************डाँ.बलदेव

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एक छंद प्रेम का ************ महाकाल के क्रूरतम व्योम में निस्पंद  ***************************** डाँ.बलदेव                   कविता प्रभात के लिए एक ऐसी दोस्त है , जो उसके अनुभव संसार को अधिकाधिक प्रामाणिक और व्यापक बनाती है । बाहरी दुनिया को उसकी भाषा निजता में तब्दील करती है । ताकतवर और अद्वितीय , अद्वितीय इसलिए कि उसकी नकल संभव नहीं गद्यानुवाद से भी नहीं । आत्मा के पड़ोस की इस बच्ची को कवि अपनी रचना में रूपक की तरह पिरोता है । उसके बायें सिर छिपाकर उसकी धुकधुकी सुनता है और दाएं के स्पर्श से उसके बालारुण का रंग भी जानता है । कविता शब्दों का खेल है , जिसमें मिलन के लिए पूरा - पूरा समय है । मृत्यु की दस्तक के बावजूद अधरात को घर उसकी सुगंधि से भर जाता है ।               .         प्रिया की व्याप्ति उन्मत्त इच्छाओं में बहती हवाओं में है । वह अपने मुक्त समर्पण के बेसुध विलास में निमम्न है । मिलने के बाद बिछुड़ने की क्रिया से कवि औरत की बेवफाई में अपनी करुण भूमिका को समझता है । प...

अज्ञेय जी के साथ कुछ क्षण********************** डॉ . बलदेव

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अज्ञेय जी के साथ कुछ क्षण **********************  डॉ . बलदेव  अज्ञेय जैसा सुदर्शन और शालीन व्यक्तित्व का कवि मैंने अब तक नहीं देखा था , शोध प्रबन्ध की सामग्री जुटाने अक्टूबर 1975 के पूरे महीने मै दिल्ली प्रवास पर था । जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मानस चतुष्शताव्दी समारोह चल रहा था । वहाँ डॉ . विजयेन्द्र स्नातक , डॉ . भोलानाथ तिवारी , डॉ . रामदरश मिश्र , निर्मला जैन आदि से मुलाकात हुई।डॉ. भोलानाथ तिवारी तथा डॉ . मिश्र ने चर्चा के लिए मुझे काफी समय दिया डॉ . तिवारी ने समारोह के लिए व्ही . आई.पी. कार्ड भी दिया , जिससे मुझे प्रथम पंक्ति में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । मैंने डॉ . सिद्धेश्वर वर्मा ( ऊर्जा मंत्री ) रमा प्रसन्न नायक डॉ . नगेन्द्र और डॉ.भगीरथ मिश्र जी जैसे बड़े साहित्यकारों के वहीं दर्शन किए । हम उम्र के आलोचक चंचल चौहान , नाटककार रमेश उपाध्याय आदि साथ ही बैठे थे । सभा समाप्ति के बाद जलपान हुआ । इसी दौरान मैने डॉक्टर तिवारी से अज्ञेय जी के विषय में पूछा , मिलने की इच्छा भी व्यक्त की उन्होने उनके बंगले का सेचुएशन बतलाया ही नहीं बल्कि फोन पर अज्ञेय जी...

गये तब से कितने युग बीत:- डाँ. बलदेव (संस्मरण)

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गये तव से कितने युग बीत ********************  डॉ. बलदेव  महाकवि सुमित्रानन्दन पंत की शीतल छाया में जेठ की भरी दोपहरी का भरपूर आनन्द उठा लेने के बाद , विदा लेते हुए मैंने उनसे महादेवी वर्मा जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की । उन्होंने तुरन्त नंबर डायल किया " देवी जी , आपके एक भक्त बिलासपुर से पधारे हैं , आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं देवी जी का उत्तर था -आज हमारे परिवार में बहुत सारे मेहमान आए हुए हैं , कल आ सकें तो इतमीनान से बातें हो सकेंगी । अगले ही दिन वापसी थी । मन की इच्छा मन में ही रह गई शायद सत्य सनेहू के अभाव में तुलसी की " तुरते ताही मिलहीं नहीं संदेहू " की भविष्य वाणी फेल हो गई ... पर इच्छा बराबर बनी रही जो सोलह साल बाद पूरी हुई .....          हुआ यों मैंने देश के बडे पुस्तकालयों की खाक छानकर मुकुटधर पाण्डेय के कुछ अमूल्य विखरे रत्न बटोरे थे उसी के प्रकाशन के सिलसिले में दो बार पन्द्रह - पन्द्रह दिनों के लिए इलाहाबाद प्रवास पर रहा । सभी क्षेत्रों में यहाँ पण्डों का वर्चस्व है , अस्तु मुझ जैसे देहाती का ठगी का शिकार हो जाना , कोई बड़ी ...

अनाविल प्राण महाकवि सुमित्रानन्दन पंत के दर्शन-------------------------------------------------------------- डॉ . बलदेव

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अनाविल प्राण महाकवि सुमित्रानन्दन पंत के दर्शन -------------------------------------------------------------- डॉ . बलदेव प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत के दर्शन उन्हीं के निवास में दिनाँक 22/05 /1968 को हुए थे । सभी दृष्टि से वे महान थे , उनकी छवि आज भी मेरे मन प्राणों में अंकित है ।          मई का महिना , पूज्यपाद राम कुमार वर्मा के यहाँ ( सावेत भवन ) जलपान के बाद उनके बताए गए शार्ट कट रास्ते से में इस्टर्नली रोड स्थित पंत जी के निवास स्थान पहुँचा । उस समय दिन के एक बज रहे थे , इलाहाबाद की चिलचिलाती धूप ... चलते - चलते पसीने से तर - बतर हो रहा था ..... मैं ठहरा ठेठ देहाती , बमुश्किलं पच्चीस - छब्बीस साल का अधकचरा ज्ञान वाला युवक " उत्सुकता दबाए न दबती थी , भूल गया कहाँ किसके पास जा रहा हूँ । हेज की घनी दूरी बाऊन्टी है, फाटक की कमानी पर गुच्छेदार फूलों से लदी बेला चढ़ी हुई है । उसके सामने थोड़ी दूर पर राजा काला कांकर ( दिनेश सिंह जी का ) लम्बे चौड़े दालान वाला बंगला । बरांडे पर खूखार अलसेसियन । वह बार - बार सिर उठाकर मुझे देख लेता ...

पिता

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पिता  -------       मैं उगा   और   पनपता रहा   शनै: शनै:  पिता की   अमृत - छांव तले  अचानक   एक दिन  तब्दील हो गये  मेरे पिता  एक विशालकाय  पेड में   अब जितना भी  बरसे   बावरा मेघ  जितनी भी उगले  आग   तमतमाता सूरज   मैं सुरक्षित हूं   पूरी तरह सुरक्षित हूं  उस पेड की  स्वर्गिक गोद में ।        * बसन्त राघव पंचवटी नगर,बोईरदादर,कृषि फार्म रोड रायगढ़, पिन नं. 496001 छत्तीसगढ़

गुलमोहर

गुलमोहर ******** जब भी निहारता हूं गुलमोहर न जाने क्यों चिपक जाती हैं आंखें ठीक वैसे ही जैसे निहारा था तुम्हें पहली बार और निहारता ही रह गया था अपलक मेरी आंखें समा गयी थीं तुम्हारे भीतर भला कैसे भूल सकता हूं गुलमोहर तरु तले का वह अनिर्वचनीय दृश्य उन पलों की साक्षी चिडिया आज भी दुहराती है वही ऋचा बार- बार गुलमोहर की टहनियों में बैठकर तुम नहीं बांच पायी उसके कंठ की भाषा उसमें छपी है तुम्हारी ही तो अनाम गाथा । बसन्त राघव पंचवटी नगर,बोईरदादर, रायगढ़ छ.ग. मो.नं. बसन्त की कविता